where it all began

Hearth, in its earlier days, came out in form of a newsletter. while the magazine was a tedious, more strenuous affair and was periodical, Hearth never depended itself on time and was published whenever an incessant need to do so was felt- be it some political or literary incident or the opening of a new joint in the city -
as a famous philosopher once said, we are not prisoned by time but by clocks, we must accept our ruins and our downfalls. true poetry and literature will come out of those.
The cover of the blog is called "LOVERS" and has been clicked by eminent poet and photographer Anurag Vats

13/09/2016

सतीश कुमार की दो कवितायेँ

सतीश कविता लिखते हैं , गीत लिखते हैं और कहानी भी । उनके लेखन में बचपन पूरे रंग में विद्यमान है।वो हर विधा में लिखना चाहते हैं । उनका मानना है कि स्याही को शब्द में बदल कर सम्मान पाया जा सकता है । उनकी रचना की धुरी कभी ग्राम्य-जीवन पर टिकती है तो कभी शहर की भाग-दौड़ पर । इनकी रचना में शब्द सहज हीं एक गंभीर अर्थ दे जाते है । उन्हीं रचनाओं में से ये कविताएँ-

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अम्मा

एक किरण चुपके से आई
सबको ताका
पर बस अम्मा को जगाई।
कलियाँ अभी खिली नहीं थी,
हंस का जोड़ा जागा नहीं था,
पर अम्मा का चूल्हा-चौका, 
सब हो चुका था।
खुशियों की अगवानी करती
झरझर मुस्काती अम्मा
डलिया लटकाए
खुरपी की धार बनाती
सखियों संग बतियाती,
विचर रही थी स्वछन्द
सारी दिशाओं में
फूल-पत्तियों की ठहाकों के बीच
खुद में सामंजस्य बिठाती,
सैर कर रही थी कल्पनाओं में।
अम्मा की एक अदद मुस्कान से
अँधियारे को चिराग छू जाती है।
सिर पर हाथ फिराती है 
तो लगता है जैसे
अभी बरसात 
धान की पत्तियों को छू गई हो।
अम्मा की बात निराली है,
शान हरियाली है।
पर अम्मा जब  साथ नहीं होती
तो लगता है जैसे  सब खाली-खाली है।

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कदम -कदम पर मुश्किलें हैं

कदम -कदम पर मुश्किलें हैं,
हालात हमारे दुश्मन हैं,
तरह-तरह की ख्वाहिशे हैं,
निष्पाप ये कोमल मन है।
बचपन को खोने के डर से,
कदम बढ़ाए अब कैसे,
गुड्डे-गुड़ियों के खेल को,
हम लोग भुलाये अब कैसे।

बाहों की झूलों में रहकर,
दुनिया की खुशियाँ साथ में थी,
फैले अंबर की छाया में,
बागों की अमिया हाथ में थी।
बचपन के सतरंगीपन का,
ये डोर छुड़ाये अब कैसे,
गुड्डे-गुड़ियों के खेल को,
हम लोग भुलाये अब कैसे।

गन्ने की लहलहाते खेतों में,
अंबार लगा रंग-रसियों का,
मिट्टी में लोटा ये तन-मन,
ग़ाजा बन जाना मसियों का,
अंगुली की इशारों से बापू,
मेलें में घुमाये अब कैसे,
गुड्डे-गुड़ियों के खेल को,
हम लोग भुलाये अब कैसे।

गंगा मईया की धारा में,
नाविक का सहज हीं मुस्काना,
काका की गुमटी के चूरन,
ठेले का टिकिया गरमाना,
जो पोखर अब सूख गये,
उन्हें सहज बहाये अब कैसे
गुड्डे-गुड़ियों के खेल को,
हम लोग भुलाये अब कैसे।

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