where it all began

Hearth, in its earlier days, came out in form of a newsletter. while the magazine was a tedious, more strenuous affair and was periodical, Hearth never depended itself on time and was published whenever an incessant need to do so was felt- be it some political or literary incident or the opening of a new joint in the city -
as a famous philosopher once said, we are not prisoned by time but by clocks, we must accept our ruins and our downfalls. true poetry and literature will come out of those.
The cover of the blog is called "LOVERS" and has been clicked by eminent poet and photographer Anurag Vats

16/11/2016

रामकृष्ण पाण्डेय की कुछ कवितायेँ. 




(वैसे तो "आवाजें" हर दो तीन महीने में एक बार पलट ही लेते हैं, कुछ तकनीक की सरलता की और लौटने के लिए और कुछ जो अपने बूते से बाहर होता है उसको समझ सकने के लिए. बड़े पापा को गये अब सात साल बीत गये हैं. उनसे आखिरी बहस सितम्बर २००९ में हुई थी वो एक सोमवार को गये,सोलह नवम्बर की तारीख. बहस कई बार होती थी और अलग अलग विषयों पर. हॉस्टल से हर शनिवार रविवार उनके पास चले जाते थे, नार्थ कैम्पस से लगभग दो घंटे दूर उनके घर पर कुछ घर के खाने के लालच में, कुछ उनसे सीखने के चक्कर में. कैम्पस की हर गतिविधि पर उनकी गंभीर नज़र रहती थी. इक पूरी इतवार वो बस इसीलिए डांटते रहे क्योंकि मेरा किसी पोलिटिकल पार्टी की किसी कार्यशाला में जाना हो गया था. फिर खुद उन्होंने अख़बार के मार्जिन में पोलिटिकल स्ट्रक्चर समझाया था. एक बार अनुवाद के बारे में हमने बहुत लम्बी बात की. ऐसे ही एक बार कविताओं की तकनीक पर. मार्केज़ और बोर्खेज़ में फर्क करने के लिए उन्होंने एक बार हैरी पॉटर से भी एक उदाहरण उठाया था.
वो बढ़िया पत्रकार थे, उस तरह के जो शायद उनके जाने के साथ विलुप्त हो गए. वो बढ़िया शिक्षक हो सकते थे पर उनको जीवन से थोडा ही चाहिए था. वो बेजोड़ कवि थे - आत्मसंतुष्ट, कितने प्रतिष्ठित कवि आज ये कह पायेंगे.  उनकी कविताओं से किरदार अक्सर निकल निकल कर आते हैं और उनकी कवितायेँ समय की सब सीमाएं लांघ कर अपनी स्वतंत्रता के साथ अमर हो चुकी हैं. कवि भर होने की हिम्मत, उनसे ही मिलती हैं.
 दूसरों को असुविधा ना हो ये उन्होंने हमेशा ध्यान में रखा.उनके होने में कोई शोर नहीं था पर उनका जाना अभी तक शोर करता है. - anchit)

हत्यारे
कहाँ जाएगी यह सड़क
किस जंगल, किस बियाबान की ओर
क़दम-क़दम पर जमा हुआ है
गाढ़ा-गाढ़ा ख़ून
हत्यारों का आतंक चारों ओर व्याप्त है
ठीक आपके पीछे जो चल रहा है
उसके हाथ में एक चाकू है आपके लिए
और जो लोग चल रहे हैं आपके आगे
वे अचानक ही पीछे मुड़ कर
मशीनगन का मुँह खोल सकते हैं
आपके ऊपर
तड़-तड़, तड़-तड़, तड़-तड़, तड़-तड़
आप क्या कर लेंगे
धीरे से आँखें मूंद कर सो जाएँगे
यही ना
अपनी नई कविता की आख़िरी पंक्ति सोचते हुए
या अपनी पेंटिंग में एक रंग और भरते हुए
ख़ून का गाढ़ा लाल रंग
यह सोचते हुए
कि थोड़ा-सा और सुन्दर नहीं बना पाए
इस बदरंग होती दुनिया को
बस थोड़ा सा
पर, हत्यारे
उतनी भी मोहलत नहीं दे सकते
क्योंकि वे जानते हैं
कि इतनी ही देर में उनकी वह दुनिया
बदल सकती है
पूरी हो सकती है कविता की आख़िरी पक्ति
अधूरी पेंटिंग को मिल सकता है
रंगों का आख़िरी स्पर्श
मुकम्मल हो सकता है मनुष्य
अपनी सम्पूर्ण गरिमा के साथ
पर, हत्यारों को

कोई ख़ूबसूरत दुनिया नहीं चाहिए

समय

आगे ही आगे
भाग रहा है समय
और मैं उसे पकड़ने के लिए
भागता जा रहा हूँ उसके पीछे
गुज़र गए
न जाने कितने नदी, जंगल, पहाड़
न जाने कितने पड़ाव छूट गए राह में
दौड़ लगी है समय से मेरी
थकूँगा नहीं मैं
रुकूँगा नहीं मैं
लाँघता ही जाऊँगा सारी बाधाएँ
अनवरत अविश्राम
भाग रहा है समय
आगे ही आगे
और मैं उसे पकड़ने के लिए
भागता जा रहा हूँ उसके पीछे

हम बहस करते हैं

हम बहस करते हैं
तूफ़ान की गति क्या थी
हम बहस करते हैं
पानी किस ऊँचाई से आया
हम बहस करते हैं
दस हज़ार लोग मरे या बीस हज़ार
हम बहस करते हैं
केन्द्र ने क्या कहा है और राज्य ने क्या कहा
हम बहस करते हैं
हम बहस करते हैं