where it all began

Hearth, in its earlier days, came out in form of a newsletter. while the magazine was a tedious, more strenuous affair and was periodical, Hearth never depended itself on time and was published whenever an incessant need to do so was felt- be it some political or literary incident or the opening of a new joint in the city -
as a famous philosopher once said, we are not prisoned by time but by clocks, we must accept our ruins and our downfalls. true poetry and literature will come out of those.


19/11/2016

आगा शाहिद अली की कवितायेँ


(आगा शाहिद अली यादों के शायर हैं और उनकी व्यक्तिगत स्मृतियाँ उनकी ज़मीन के इतिहास से मिलती जुलती डूबती उतरती रहती हैं. अपनी कविताओं में वो हमेशा घर लौटने को बेचैन दिखाई देते लगते हैं. उनकी कविता दर्द की पड़ताल में अपना समय व्यतीत करती है और कविता में उस ख़ास चीज़ की बहुतायत है जिसको पामुक अपनी किताब इस्तांबुल में "हुज़ुं" कहते हैं.
उनका अनुवाद करते हुए उनके करीब जाना उनके काम्प्लेक्स पोएटिक सिस्टम से भी रूबरू होना है और दर्द और शैली के अभूतपूर्व संयोजन से झूझना भी है. एक अनुवादक के लिए ये एक बहुत मुश्किल काम था और उनकी अंग्रेजी के ग़ज़लों की रेंदिशन का शायद ही अनुवाद किया जा सके. -अंचित)
आज आगा शाहिद अली की तीन कवितायेँ-

मैदानों के मौसम
कश्मीर में,जहाँ साल में
चार चिन्हित अलग अलग मौसम होते हैं 
अम्मी अपने लखनऊ के मैदानी इलाके में बीते
बचपन की बात करती हैं 
और उस मौसम की भी,
मानसून,
जब कृष्ण की बांसुरी 
जमुना के किनारों पर सुनाई देती है. 
वो बनारस के ठुमरी गायकों के पुराने रिकार्ड्स
बजाया करती थीं -सिद्धेश्वरी और रसूलन,
उनकी आवाजों में चाह होती, जब भी बादल जमा होते,
उस अदृश्य,नीले भगवान के लिए. बिछोह
संभव नहीं है जब बारिशें आती हैं ;
उनके हर गीत में ये होता था.
जब बच्चे दौड़ते थे गलियों में
अपनी अपनी उष्णता को भिन्गोते हुए,
प्रेमियों के बीच
चिट्ठियां बदल ली जाती थीं .
हीर-रांझा और दूसरे कई किस्से,
उनका प्रेम, कुफ्र.
और फिर सारी रात जलते हुए खुशबु की तरह
होता जवाब का इंतज़ार. अम्मी 
हीर का दर्द गुनगुनाती थीं 
पर मुझसे कभी नहीं कहा
कि क्या उन्होंने भी जैस्मिन की खुशबुएँ 
जलाईं जो, ख़ाक होते हुए,
राख की छोटी मुलायम चोटियाँ
बनाती जाती हैं. मैं कल्पना करता था कि
हर चोटी उम्साई हवा पर
लद जाती है.
अम्मी बस इतना कहती थीं :
मानसून कभी पहाड़ों को फांद कर 
कश्मीर नहीं आता.
(यहाँ incense sticks का अनुवाद "अगरबत्ती" की जगह "खुशबू" किया गया है)

चांदनी चौक, दिल्ली
इस गर्मी के चौराहे को निगल जाओ 
और फिर मानसून का इंतज़ार करो.
बारिश की सूईयाँ
जीभ पर पिघल जाती हैं. थोड़ी दूर 
और जाओगे? सूखे की एक याद
जकड़ती है तुमको: तुम्हें याद आता है
भूखे शब्दों का स्वाद 
और तुमने नमक के अक्षर चबाये थे.
क्या तुम इस शहर को पाक कर सकते हो 
जो कटी हुई जीभ पर खून की तरह जज़्ब होता है?

कश्मीर से आया ख़त
कश्मीर सिमट जाता है मेरे मेलबॉक्स में.
चार गुने छह का सुलझा हुआ मेरा घर.
मुझे साफ़ चीज़ों से प्यार था हमेशा. अब
मेरे हाथों में है आधा इंच हिमालय.
ये घर है.और ये सबसे करीब
जहाँ मैं हूँ अपने घर से. जब मैं लौटूंगा,
ये रंग इतने बेहतरीन नहीं होंगे,
झेलम का पानी इतना साफ़,
इतना गहरा नीला.मेरी मोहब्बत
इतनी ज़ाहिर .
और मेरी याद धुंधली होगी थोड़ी
उसमे एक बड़ा नेगेटिव,
काला और सफ़ेद, अभी भी पूरा रौशन नहीं.