where it all began

Hearth, in its earlier days, came out in form of a newsletter. while the magazine was a tedious, more strenuous affair and was periodical, Hearth never depended itself on time and was published whenever an incessant need to do so was felt- be it some political or literary incident or the opening of a new joint in the city -
as a famous philosopher once said, we are not prisoned by time but by clocks, we must accept our ruins and our downfalls. true poetry and literature will come out of those.
The cover of the blog is called "LOVERS" and has been clicked by eminent poet and photographer Anurag Vats

05/12/2016

ख़त नंबर एक



मियां असद 

सलाम, 

सर्दियों की पहली खेप आकर गुज़र गयी. दूसरी अपनी लम्बी उम्र की दुआ करती हुई मारी जायेगी. इसको तो हर साल आना होता है. घर से कुछ दूर एक कंप्यूटर की दूकान है. वहां से पुराना कंप्यूटर ठीक करा कर लौटा हूँ. सोचा तुम्हारे ख़त से ही इसकी नयी ज़िन्दगी की इबारत शुरू हो. दिल्ली में भी ठण्ड पड़ने लगी होगी, वहां की शामों का हाल तुमसे बेहतर कौन जानता है. यहाँ इतनी दूर उस जाड़े के बारे में सोचना भी ठिठुरन बढ़ा देता है, पर पटने का भी कोई अलग हाल नहीं है. यहाँ भी पेड़ों के तने और लाशें सब एक तरह से महकते हैं. 
तुम्हारा दीवान एक बार फिर पढ़ डाला है. इस बार पिछली बार जैसी तल्खी से नहीं, ना किसी के साथ. अकेले ही. मियाँ मीर की किस्मत कब होगी अल्लाह पर ही छोड़ देना बेहतर है. ये जो लैपटॉप है, थोडा स्लो है पर हाथों में समा जाता है. तुमको ख़त लिखता हुआ सोचता हूँ, जाने कितनी चीज़ें अब बची हैं जिनको पूरी तरह समेटा जा सके. एक भीड़ से तो भरी हुई जगह पर बैठा हूँ, अकेला, एक शीशे की बड़ी खिड़की के पास प्रेम देखता हुआ. कैमरे की पुरानी रील की तरह एक एक कर पुराने प्यार याद आ जाते हैं. सिर्फ अपने नहीं सबके... अधूरे. तुम तो मियाँ भगोड़े हो, झेल नहीं पाते तो शराब मिल जाती है. यहाँ शराब का भी नसीब होना जैसे खुदा की तलाश हो गया है. बंदी जब से हुई यही सोचता हूँ, कौन वाजिब वजह होगी अब जो तुम बेदिल के अज़ीमाबाद आओगे. 

जितना तुम याद आते हो, उतना कामू भी याद आता है. एक अलाव होगा  ना किसी शहर में जो कभी नहीं बुझता होगा , जहाँ कभी भी जाया जा सकता होगा हाथ सेंकने? कैसा समय है यार असद, कितने लोग बेवजह मारे जा रहे हैं और कोई कुत्ता तक नहीं भूंकता. स्वीकृतियों का कैसा दौर आ पहुंचा है जब सन्नाटा हावी है. बादशाह सलामत के बेटों के सर जब थाल में सजा कर तख़्त तक लाये गये, क्या हुआ था दिल्ली में? सोचता हूँ पिछले ना जाने कितने सौ सालों से यूँ ही तो मार काट करते आ रहे हैं हमलोग , फिर भी कुछ नहीं सीखे?  मैं और तुम भले ही राजाओं से परे चलते हैं, वाजिब है कि हमारे जैसे कई हैं, जो कुर्की जब्ती से डरे बिना जंग का पैराहन अपने माथे बाँध कर चलते हैं. फिर सब ठीक क्यों नहीं होता?  हमारी हारों में शान क्यों नहीं होती? 
कभी कभी सोचता हूँ, मियाँ युसूफ को इन्ही बातों ने परेशां तो नहीं कर दिया? 
जहाजों और समन्दरों की कवितायेँ पढ़ रहा हूँ इधर, एक अँगरेज़, एक अमरीकन, एक स्पानी जो एक समंदर, एक जहाज़, और एक नाविक की कहानी कहते हैं. एक तवायफ की भी बात सुनी है इधर जो उस बन्दरगाह वाले शहर की रानी है. गमे रोज़गार के बहाने नज्में बेंच रहा हूँ मोहब्बत करने के लिए. शबे-वस्ल से पहले पूरा दिन भटकना पड़ता है, जानता हूँ. 
तो ठण्ड की इस शाम को, इस भीड़ वाली जगह पर बैठा हुआ, शीशे की बड़ी खिड़की से प्यार करते हुए लोगों को देखते हुए ये ख़त जितना तुमको लिख रहा हूँ, उतना खुद को भी. 
कोई ख्वाब ही है ना जिसमे शायरी और माशूक में से एक को आशिक को चुनना न पड़े - दोनों कमबख्त इंडिया पाकिस्तान हैं. ना अलग ही किया जा सके ना एक ही. जंगें बस टीस पैदा करती हैं. 
तुम्हारा दीवान एक बार में खत्म कर बेज़ा नहीं किया जा सकता - उससे मोहब्बत का मसला चलता रहेगा. कलकत्ते की बात हो या पटना की या तुम्हारी दिल्ली की, सर्दियों में शबे वस्ल का इंतज़ार फेफड़े सेंकते हुए करना भी भारी पड़ता है. बात-बेबात हम शायरी की तकनीक पर बात करते रहेंगे. कल जो कविता लिखी, उसके शब्दों को कम करते हुए भी कहीं और भटकता चला गया . इसका अच्छा बुरा हम फिर तय करेंगे. कॉफ़ी का आखिरी सिप लेकर, मैं यहाँ से निकल लूँगा. 

एक जलती हुई सिगार की झडती हुई राख सी ही तो है ज़िन्दगी. 

जय. 

पुनश्च: - जब बादशाह फ़क़ीर हो जाते हैं असद, तो शायरों को ऐय्याश हो जाना चाहिए. 


(अंचित कवितायेँ और कहानियाँ लिखता है)