दिल्ली दरबार

आख़िरकार इस साल के अंत में 'सत्य व्यास' का दूसरा उपन्यास पाठकों के बीच आ गया। जिन्होंने इनका पहला उपन्यास पढ़ा था वो सब इसका बेसब्री से इंतज़ार कर रहे थे। इस बात से आप समझ सकते हैं कि लेखक ने अपने पहली किताब से ही कुछ जादू कर दिया था और ढेरों फैन बना लिए थे। 'बनारस टॉकिज' तो आज भी पाठकों के बीच बहुत प्रसिद्ध है। अभी इनकी दूसरी किताब की बात करते हैं जिसका नाम है "दिल्ली दरबार"। किताब के रिलीज़ होने से पहले वीडियो ट्रेलर आया और प्री-बुकिंग भी शुरू हुई। मैंने भी उत्साहित होकर प्री-बुकिंग की और सत्य व्यास के हस्ताक्षर वाली किताब मेरे घर आयी। किताब देखते हीं मन खुश हो गया और जल्द ही पूरा पढ़ लिए।
जैसा की लेखक बताते है - "कहानी इसी सदी के दूसरे दशक के पहले दो सालों की है। वह वक्त जब तकनीक इंसान से ज्यादा स्मार्ट होकर उसकी हथेलियों में आनी शुरू ही हुई थी। नई तकनीक ने नई तरकीबों को जन्म देना शुरू किया था।" आगे कहानी इन बातों को सही साबित भी करती है। उपन्यास की कहानी दो दोस्तों के बैचलर लाइफ की है। कहानी है एक ऐसे मनमौजी युवा की जो सिर्फ अपनी सुनता है। चतुर, आवारा, पागल, दीवाना कुछ भी कह सकते हैं। लेकिन है बड़ा तेज। तकनीक से खेलता है और उसका पूरा इस्तेमाल करता हैं। प्रेमी है तो इसकी एक प्रेमिका भी है। यही प्रेम उसे आगे चलकर एक अच्छा इंसान बनाता है।
कहानी के मुख्य पात्र हैं - राहुल मिश्रा उर्फ़ पंडित और मोहित सिंह उर्फ झाड़ी। सत्य व्यास की पात्रों से परिचय करने का अंदाज़ बड़ा ही लाज़वाब है। राहुल के बारे लेखक बताते हैं कि "राहुल मिश्रा पैदा ही प्रेम करने के लिए हुए हैं, ऐसा उनका खुद का कहना है। राजीव राय के बाद जो प्यार, इश्क़ और मुहब्बत में ठीक-ठाक अंतर बता सकते हैं।" ठीक इसके विपरीत मोहित एक सीधा-साधा लड़का है और पढ़ाई में राहुल से तेज है लेकिन चतुराई में नहीं। मोहित और राहुल बचपन से पक्के दोस्त हैं और साथ में पढ़े और बढ़े हैं। दोनों अपने शहर टाटानगर(जमशेदपुर) से ग्रेजुएशन करते हैं। मोहित जहाँ अपने कैरियर के बारे में सोचते रहता है वहीं राहुल लड़की के बारे में। लेखक कहते हैं - "दोस्त की सबसे बड़ी कीमत यही होती है कि यह सही गलत से परे होती है"। और कुछ ऐसी ही दोस्ती है इन दोनों के बीच। मोहित राहुल के हर अच्छे-बुरे काम में साथ देता है लेकिन उसे बहुत समझाता भी है। लेकिन राहुल माने तब तो। वह एक बार जो सोच लेता है उसे करता है।
"छोटे शहर के छोटे सपनों को विस्तार देते शहर का उनवान है दिल्ली।" ग्रेजुएशन के बाद दोनों एमबीए करने के लिए और मोहित सीडीएस की भी तैयारी के लिए दिल्ली जाते हैं। किराये के एक मकान में रहने लगते हैं और फिर शुरू होती है दिल्ली दरबार वाली कहानी। कहानी में कुछ और पात्र भी हैं। परिधि - राहुल की प्रेमिका और मकान मालिक की बेटी। परिधि एक सुन्दर, सुशिल और साधारण लड़की है जो राहुल से बहुत प्यार करने लगती है। बटुक शर्मा - मकान मालिक जो हमेशा इंग्लिश की बेज्जती करते रहते हैं और सुनने वाला खुद को हँसे बगैर रोक नहीं पता है। जैसे वो लिंक को लिंग बोलते हैं, बिलो जॉब को ब्लो जॉब और तेलंगाना को तेल लगाना इत्यादि। राहुल इन बातों पर खूब चुटकी लेते हैं और बटुक शर्मा भी राहुल की खिंचाई करने से नहीं चुकते। एक महिका रायजादा भी कहानी में है जो राहुल के कॉलेज की है जो बाद में कुछ दिन गर्लफ्रेंड भी बन जाती है। एक छोटू नाम का लड़का भी है जो राहुल और मोहित के यहां घर का काम करता है। ये बहुत बड़ा क्रिकेट प्रेमी मालूम होता है पर बाद में ये छोटू सबको आउट कर देता है अपनी गुगली से।
कहानी की शुरुआत राहुल मिश्रा के प्रेम-प्रसंगों से होता है और अंत में इन्हीं पर जाकर खत्म होता है। लेकिन कैसे? ये बड़ा ही मजेदार है और इसे और भी मजेदार बनाया है लेखक सत्य व्यास ने। पाठक को कैसे बांध कर रखते है ये चीज ये बखूबी जानते हैं। आप पढ़ते समय एक पेज भी छोड़ना पसंद नहीं करेंगे। हमेशा आपके मन में एक सस्पेंस रहेगा की आगे क्या होगा। बीच-बीच राहुल की कुछ मजेदार बातें आपको हँसाते रहेगी। जैसे- किताब खोलो और थर्मोडायनामिक्स से गरम रहो, थम्स-अप पीने को अंगूठा पिएगा कहना, आज मेरे और तेरे भाभी का इंटीग्रेशन होते-होते डिफरेंशियेशन हो गया इत्यादि। राहुल हमेशा मोहित को शायरी सुनाने कहता है फिर उस शायरी की चिर-हरण कर देता है। जैसे मोहित सुनाता है-
"तुम मुखातिब भी हो करीब भी हो,
तुमको देखें की तुमसे बात करें।"
राहुल इस पर कहता है "इसलिए कहते हैं झाड़ी की तुम पगलंठ हो। भाग जाएगी, पक्का भाग जाएगी। मतलब या तो देखोगे या फिर बात करोगे। तीसरा काम सिलेबस में है ही नहीं क्या? सत्य ने कुछ लाइन्स ऐसी भी लिखी है जो चुपके से एक सच्चाई कह देती है। जैसे-
" प्रेम के कारण नहीं होते परिणाम होते हैं";
"बांधकर रखना भी तो कोई प्यार नहीं हुआ न",
जिंदगी एयर होस्टेज हो गई है जिसमें बिना चाहे मुस्कुराना पड़ता है",
प्रेम,पानी और प्रयास की अपनी ही जिद होती है और अपना ही रास्ता"!!!
सत्य व्यास कहानी को अपने अंदाज़ में बहुत अच्छे तरीके से प्रस्तुत किये हैं। कहानी अच्छी भी है। और सभी पाठक, ज्यादातर युवा इस से जुड़ सकते हैं। भाषा सरल है और इसका लप्रेक और हास्य वाला अंदाज़ भाता है। डबल मीनिंग वाली बातें गुदगुदाती भी है तो कुछ पैराग्राफ मन मोह लेती है और दूबारा पढ़ने को मजबूर करती है। आपको भी पढ़ कर मज़ा आएगा लेकिन ये बनारस टॉकीज के तरह शायद यादगार नहीं बन पाएगा। दिल्ली दरबार दो-तीन घण्टे अच्छा मनोरंजन करती है लेकिन इसमें सिखने के लिए शायद कुछ नहीं है। इसमें  ऐसा कुछ खास भी नहीं है जो याद रह जाये, लेखक के लेखनी के अलावे। साहित्य की पगडण्डी से हट कर सत्य व्यास भी नए लेखकों की तरह अपनी राह चल रहे हैं। परंतु नये लेखकों को अब समझ जाना चाहिए की एक ही तरह की कहानी पाठकों को उनसे दूर भी कर सकती है। इनको कुछ अच्छा और अलग कहानी लिखना होगा। हिंदी में आये नये लेख़क के योग्यता पर कोई शक़्क़ नहीं है और हमें ये पता की नये लेखक और भी बेहतरीन कहानी लिख सकते हैं। इसलिए सत्य व्यास के अगली किताब का इंतज़ार रहेगा। आपको भी इस उपन्यास को पढ़कर आनन्द लेना चाहिए और लेखक को अपनी बात बतानी चाहिए। फेसबुक पर बड़ी आसानी से मिल जायेंगे। मैंने तो अपने मन की बात लिख दी।
सत्य व्यास के पहले उपन्यास 'बनारस टॉकीज का रिव्यु भी पढ़े - https://kuchhpadholikho.blogspot.in/2016/08/book-review-banaras-talkies-hindi.html?m=1
शुभम फिजिक्स ऑनर्स सेकंड ईयर के स्टूडेंट हैं। साइंस में दिमाग जितना लगाते हैं उससे ज़्यादा साहित्य से मोह्हबत करते हैं । किताब पढ़ना शौक है । साहित्य के जोड़ घटाव से इतर अपनी बात कहते रहते हैं।




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