अस्पताल की भीड़ - अमर प्रताप सिंह

( अमर के शब्दों में लिखने के मायने - विश्व पर्यटन दिवस के दिन जन्म लेने के कारण शायद घूमना सबसे ज्यादा पसंद है।लेखन का शौक़ नया है।घूमने के कारण आपको वो सामग्री मिल जाती है जो लेखन के काम आती है।ऐसा मेरा मानना है।
 खेल-कूद से बचपन का रिश्ता है।याद है जिस दिन हमारे क्रिकेट अकादमी का मैच रहता था उसके पहली रात नींद नहीं आती थी कितनी बेचैनी होती थी जल्दी सुबह होने की।
अब ये बेचैनी दिखती है लेखन में।यूँ तो बहुत कम लिखा हूँ परंतु जब लिखने का मन होता है तो नींद,भूख-प्यास सब दूर छूटते चले जाते हैं।अपने विचारों को व्यक्त करने का सबसे सरल और कारगर माध्यम लेखन लगता है इसीलिए लिखता हूँ।)



भीड़ कई किस्म की होती हैं,
पर यहाँ की भीड़ कुछ अलग होती है।
क्योंकि ये हॉस्पिटल है,
कोई दवा हाथ में लिए,
कोई जाँच की पुर्जी।

घबराहट  दिल में लिए,
सोचता आगे 'उसकी' मर्जी।

मर्ज,मर्ज की दवा और मरीज,
फिर कोई ला के देता ताबीज़।

खुशियाँ भी आती हॉस्पिटल में,
पर एक डर लिए साथ में।

हॉस्पिटल में जाना भी सौभाग्य है,
कितने तो सीधे शमसान जाते हैं।

भारत में सस्ता है हॉस्पिटल,
पर गरीबो के लिए कहाँ हॉस्पिटल?



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