where it all began

Hearth, in its earlier days, came out in form of a newsletter. while the magazine was a tedious, more strenuous affair and was periodical, Hearth never depended itself on time and was published whenever an incessant need to do so was felt- be it some political or literary incident or the opening of a new joint in the city -
as a famous philosopher once said, we are not prisoned by time but by clocks, we must accept our ruins and our downfalls. true poetry and literature will come out of those.
The cover of the blog is called "LOVERS" and has been clicked by eminent poet and photographer Anurag Vats

22/03/2017

पढ़ते हुए 2 : गीत चतुर्वेदी, न्यूनतम मैं !

                                                                                                               
                            गीत की कविताओं पर बहुत लिखा जा चुका है. इसीलिए ये एक मुश्किल काम है. गीत चतुर्वेदी का मिलना मुश्किल था. उनके बारे में अनिमेष जोशी ने मुझे बताया था लगभग एक साल पहले. अनिमेष तब "आनक" नाम की एक पत्रिका निकालते थे. उन्होंने मेरी कुछ कवितायें छापी थीं और मैं उनसे अक्सर हिंदी में क्या पढूँ इस बारे में सलाह लिया करता था .इसी बातचीत के दौरान एक बार गीत का ज़िक्र हुआ और फिर मैंने उनको कुछ कुछ पढ़ा. "सदानीरा" में उनके कुछ अनुवाद भी पढ़े थे पर पूरा संग्रह नहीं पढ़ा था. गीत के बारे में लिखना इसीलिए भी मुश्किल रहा मेरे लिए क्योंकि मुझे उन्हें प्लेस करने में दिक्कत हुई. हिंदी कविता का जो आम मिजाज़ है, (फिर ये कहना ज़रूरी है कि हिंदी कविता इस लेबल से परिभाषित नहीं होती) उस के साथ कंटेंट और कहन में गीत को किस के साथ रखा जाए ये एक सवाल मेरे सामने रहा. अमूमन हम पढ़ते हुए दो चार कवियों को साथ में पढ़ते हैं, फिर जो अभी तक पढ़ा हुआ है उसका असर आगे पढ़े पर तो पड़ता ही है, ये कोई नयी बात नहीं है.
गीत की जो शुरुआती कवितायेँ पढ़ीं, वो नयी लगीं इसीलिए गीत को बिना किसी पूर्वाग्रह के पढ़ पाया. साहित्य के पाठकों के लिए ये मुश्किल काम है.
"न्यूनतम मैं" की कुछ कवितायेँ, गीत की वाल पर पढ़ी थीं, कुछ अनुराग वत्स के ब्लॉग पर, कुछ राजकमल के पेज पर. पटना पुस्तक मेले के आखिरी दिन, ये किताब पुस्तक मेले से गायब थी और अपने अजेंडे में रहते हुए भी ये किताब वहां नहीं खरीद पाया. कुछ दिनों बाद दरियागंज से ये किताब उठाई पर पढना नहीं हो पाया. हाँ, जहाँ जहाँ मैं रहा, किताब साथ घूमती रही और मैं भी किताब के मुझ तक आने का इंतज़ार करता रहा. आप कवितायेँ ऐसे ही पढ़ सकते हैं, सही तरीका शायद यही है. जैसे कवितायेँ लिखते हुए कवि को इंतज़ार करना होता है, पाठकों को भी सहज मिलें ये मुश्किल होता है. इस दौरान, गुलज़ार के अफसाने, मंटों के एसेज और कुछ और कवियों की कवितायेँ पढता रहा और गीत की किताब सिरहाने पड़ी रही. इसका पहला पाठ मुझे हवाई जहाज में नसीब हुआ, होली की देर शाम दिल्ली आते हुए. सहयात्री एक प्रेमी जोड़ा था जो पूरे सफ़र के दौरान किसी प्रेजेंटेशन और रिपोर्ट पर काम करने और चिकन सैंडविच खाने में व्यस्त रहा. मुझे लगा गीत की किताब में ही सिर घुसना चाहिए.
                                                        किताब ख़ूबसूरत है. कवितायेँ जिस तरह खण्डों में बांटी गयी हैं, और उनके साथ दूसरे कवियों और अपनी पंक्तियों का इस्तेमाल किया गया है वो चार्मिंग भी है और aesthetically प्लीसिंग भी है. गीत की कविताओं के बारे में कैसे लिखा जाए. इनको ना एकल पढ़ा जा सकता है ना कवि से अलग कर के. ये कवि का हाई पॉइंट भी है और लो पॉइंट भी है. जो गीत का पढ़ा हुआ है वो उनके लेखन में हाईलाइट होता है और उसको समझने के लिए आपको अपने पढ़े हुए का भी इस्तेमाल करना पड़ता है. सुन्दरता की समझ भी गीत को अलग करती है, जो उनकी अपनी है और विश्व साहित्य से प्रेरित है कहीं कहीं.  मेरी समझ के अनुसार जो बातें किताब में मुझे याद रह गयीं, उनकी बात करता हूँ. गीत उन सवालों से जूझते हुए कवी के रूप में सबसे परिपक्व होते हैं जो सवाल, हिंदी कविता अपने मान कर नहीं चलती. गीत का समाज उनके भीतर है और गीत उस ओर सफ़र करते हुए कम्फर्टेबल भी हैं और सहज भी हैं. जीवन के उद्देश्य और दर्शन जैसे सवालों को हिंदी के आलोचक समीक्षक लोगों को हाल ही कलावादी सवाल मानते हुए सुना है. हालांकि उनकी चर्चा इस लेख में करने की आवश्यकता नहीं है. प्रेम इन कविताओं में वायुमंडल जैसा है, सब अपने भीतर समेटे हुए - कामू, कर्क्गार्ड, नीत्ज़े सार्त्र इधर उधर मिल जाते है. प्लेटो और अरस्तु भी. पर इनको जोड़ने के लिए गीत के पास प्रेम है. और कुछ चाहिए भी नहीं. इन सबसे गीत के फासले और नजदीकियां अलग अलग हैं पर जिल्द एक ही है -उर्जा उसी फ्रीक्वेंसी तक जाने की कोशिश करती हुई. पाश्चात्य एपिक की शैली की किन्तु छोटी छोटी कवितायेँ, उद्हरण ग्रीक कवियों के,महान नाटकों से और सवाल जो तब भी प्रासंगिक हे और अब भी हैं. एक एकान्तप्रिय पाठक की जिज्ञासा- अपना अन्दर और बाहर अलग अलग रखने की कोशिश, असल और  क्षद्म की पड़ताल - अपनी उम्र के अच्छे कवियों से गीत को अलग करता है.सबसे असहज कवि उन कविताओं में है (हालाँकि इसको छुपाने के लिए वो करतब करता है और यहाँ मेरी सब्जेक्टिव समझ का भी रोल है.) जहाँ वो दबाव में उस ओर जाता है जिधर वो स्वत: नहीं होना चाहता है. वहां दोहराव हैं, हिंदी साहित्य का चिर-उपस्थित peer pressure है और शायद थोड़ी बहुत conformity और acceptance की जदोजहद भी है. हाँ, एक गिल्ट फैक्टर भी काम करता है. किताब का चतुर्थ असाधारण होते हुए भी बाकी खण्डों जितना असाधारण नहीं है. आखिर में उनकी टिप्पणियों में रेफ़रन्स देते हुए इलियट वाली अकड़ नहीं, हिंदी के पाठकों को कॉन्टेक्स्ट से परिचित करने की कोशिश है.
                                                                                         जो गीत पर लिखते होंगे, गीत की कविताओं में उसके बिम्बों में बात करते होंगे. विश्व साहित्य की थोड़ी समझ रखने वाला भी ज़रूर इनपर बात करेगा. गीत बिम्बों को खोजते रहते हैं, किताब पढ़ते हुए ऐसा कई बार लगा. कई बार वो बिम्ब क्लिक करते हैं, कई बार वो कवि से संभाले नहीं जाते पर कवि का लेबर पेन, उसके शिल्पों में दिखता है.  अब जबकि हिंदी कविता की मुख्यधारा उसी एकरसता से एकरूप हो रही है, जिसने भारतीय अंग्रेजी कविता का नब्बे प्रतिशत मार गिराया है, गीत का बिम्बों में होना, कविता के हम पाठकों के लिए न सिर्फ सुखद है, उम्मीद भरा भी है. हालाँकि नयी कविता को परिभाषित कर पाने जितनी समझ मुझमे नहीं है ना टेक्स्टबुक की तरफ जाने का कोई सद्विचार कभी मेरे मन में रहा है, हमारी कविताओं का स्वरुप बदल रहा है, उनकी भाषा की संरचना दूसरी ओर घूम चुकी है और अधिकांश इससे या तो अनिभिज्ञ हैं या इसको इग्नोर करना चाह रहे हैं. अगले पचास सालों में कविता में जो abstract और randomness आने वाला है,उसकी व्यूह रचना का प्रथम भाग अब लिखा जा रहा है.  अरुण कमल की कविता "प्रलय" इसका एक बढ़िया उदहारण है. गीत भी उसी रास्ते की conscious तलाश में नज़र आते हैं . 
अंत में, ये बस पढ़ते हुए बनाये गये रफ नोट्स हैं जो मैंने किताब पढ़ते हुए वहीँ पन्नों में इधर उधर लिख दिए. आलोचना लिखते हुए "वादों" का वादा करना होता है जो कि मेरे लिए संभव नहीं है. कविता की तरफ मैं अपने हेडोनिजम में बंधा हुआ आता हूँ - बिम्ब आकर्षित करते हैं और इसका इस्केप. अपने न्यूनतम में भी कविता मुझे दीर्घ लगती है. जैसे गीत कहते हैं - 
" तुम जो सुख देती हो, उनसे जिंदा रहता हूँ.
तुम जो दुःख देती हो, उनसे कविता करता हूँ
इतना जिया जीवन, कविता कितनी कम कर पाया." 

anchit