where it all began

Hearth, in its earlier days, came out in form of a newsletter. while the magazine was a tedious, more strenuous affair and was periodical, Hearth never depended itself on time and was published whenever an incessant need to do so was felt- be it some political or literary incident or the opening of a new joint in the city -
as a famous philosopher once said, we are not prisoned by time but by clocks, we must accept our ruins and our downfalls. true poetry and literature will come out of those.


05/03/2017

पढ़ते हुए, एक : रंजन बाबू के गाँव में



(ये कोई आलोचनाएं नहीं हैं. "पढ़ते हुए" कॉलम का काम भी ये नहीं है. जहाँ तक मेरी बात है, ना कविता में ना हिंदी आलोचना में इतनी मेरी इतनी समझ है कि कोई गूढ़ बात कह पाऊं. बहरहाल जैसे कुछ लिखते हुए लेखक/कवि अपने पाठकों से संवाद करता है, उसको पढ़ते हुए पाठकों में भी एक कहन पैदा होती है. मुझे लगता है मैं और मेरे जितने साथी इस श्रृंखला में लिखेंगे सब इसी कहन का अनुभव लिखेंगे. तो ये प्यार की चिट्ठियां हैं, कवि के लिए नहीं, उसकी कविताओं के लिए. शिकायतें भी हो सकती हैं और असंभव अतार्किक मोहब्बत भी.)

राकेश रंजन का संग्रह "दिव्य कैदखाने में" इधर पढ़ा. उनका पहला कविता संग्रह "अभी अभी जन्मा है कवि" एक बड़े कवि की मेज़ से उठाया था जिन्होंने बहुत ताकीद से कहा था कि राकेश रंजन को ज़रूर पढना चाहिए. मेरी हिंदी भाषा और हिंदी कविता को लेकर समझ कम है. बार बार लिखते और पढ़ते हुए इसकी हीन भावना से जूझना पड़ता है. राकेश रंजन उन तीन कवियों में से हैं, जो मेरे पटने के आसपास से हैं और "फ्रेश" वाली कविताओं को लिखते हैं. मनोज कुमार झा को पढना अनुभव होता है और शंकरानंद जी की सूक्ष्म दृष्टि वाली कविताओं से प्रभावित होने में कोई गुरेज़ नहीं दिखता. जो आसपास के कवियों का एक और कविता संग्रह पढना चाहता हूँ, वो राजकिशोर राजन का "कुशीनारा से गुज़रते हुए" संग्रह है. पाठक मतलबी होता है और मेरे जैसा अंग्रेजी वाले विमर्श और ट्रेंड की ट्रेनिंग रखने वाला पूर्वाग्रह ग्रसित कवि-पाठक जो अपनी सीमितताओं को अपनी रीडिंग के बल पर टालने की कोशिश करता रहता है वो और ज्यादा मतलबी होता है. तो हमारी समझ से हिंदी कविता अभी "उत्तरआधुनिक" समझ के आसपास चलती है और हिंदी समाज का पाठक वर्ग अभी भी व्यक्ति और समाज के बीच कविता जोड़ कर चलता है - जहाँ जन संघर्ष और समाज के लिए कला वाले प्रिंसिपल काम करते हैं. "art for art's sake" या "art for one's own sake" जैसे वाक्य या तो घोर पुरातन हैं या फिर शायद भविष्य में कभी सन्दर्भ पाएंगे. तो इस तरह की कविता में जो सबसे बड़ी दिक्कत होती है वो होती है कविता का सपाटबयानी हो जाना या फिर एक फोर्मुले फॉर्मेट पर कवि का चलते चले जाना. ऐसे में जो कवि की uniqueness या individuality है, वो लोप हो जाती है. पाठक कवि अ और कवि ब में भेद करले ये भी मुश्किल होता है. पर आजकल कवि "साइड से" समीक्षक होने की ज़रूरत भी करता है और अधिकांश: भीड़ इस खुशफहमी में जीती है कि कविता trolling और social media के युग में प्रासंगिक है .
बहरहाल लेख का मकसद मार्क्सवादी विमर्श से जूझना नहीं बल्कि अभी तक के कथन का कारण बस ये सिद्ध करना है है कि "नया" बस शिल्प की दृष्टि से ही खोजा जा सकता है क्योंकि उत्तरआधुनिकता हमसे मांग करती है कि हम मान कर चलें कि कुछ नया नहीं है सूरज के नीचे कम से कम कंटेंट के लिहाज से. ऐसे में कम से कम हिंदी में शिल्प की दृष्टि से ही सही और अगर सब की सब नहीं तो कुछ कवितायेँ ज़रूर ही साबित करती हैं कि ग्लोबल वार्मिंग वाले हिंदी युग में कभी कभी ठंडी हवा भी चलती है.उत्तर-आधुनिकता में जो सबसे अच्छी चीज़ है वो ये कि वो जो "लोकल" है वहां तक लौटने की कोशिश करती है- फिर चाहे भाषा के स्तर पर या फिर शैली के स्तर पर. farce भले ही हमारे समय की भाषा है पर उस लायक हास्य प्रवीणता कम लोगों में दिखती है. सौभाग्य से कम कम से मेरे आसपास के क्षेत्रों में जो एलिवेटेड हास्य है, वो सब का सब शायद रंजन बाबू के गाँव से ही निकलता है.  इसीलिए मेरे जैसे नए हिंदी पाठक के लिए जो अपने गुरुओं के बिगाड़े जाने के कारण नए और यूनिक की तलाश में रहता है, क्षेत्रीय और  सामायिक सुखाड़ के बाद राकेश रंजन का मिलना सुखद है. मार्केज़ को पढ़ते हुए जिस एक बात की समझ सबसे कम होती है वो ये कि हँसना कब है और कब जो हास्य था वो ट्रेजेडी में बदल गया. इस कविता संग्रह में कुछ हद तक ये उहापोह बना रहा. कवि अपना मजाक बनाता है, कविता में जो समाज है उसको भी कई जगह छेड़ता है और ये सब करते हुए भी इन सब का कारुण्य कविता की काया में लहू बनकर बहता रहता है. 
                                                                                         मैं कविताओं की बात करता हूँ.हमारा समय "भाग्य-विधाताओं" और "अधिनायकों" का समय है. हमारे राष्ट्रीय गान से जुडी जो दो कवितायेँ मुझे याद आती हैं, एक तो विद्रोही की और दूसरी रघुवीर सहाय की. तीसरी कविता राकेश रंजन की है और कवि रघुवीर सहाय को याद करते हुए बात करते हैं . ये राष्ट्रगान है पर जोश में नहीं गाया जा रहा, ना अभिव्यक्ति की आज़ादी से बेलौस उसका मखौल, ना क्रांतिकारी की अधिनायकवाद को चुनौती. कैदखाना है कोई, दिखता-अनदेखा पर हर जगह हाज़िरी दाखिल करता हुआ जहाँ मन को बेमन ज़बरदस्ती वो करना पड़ता है जो कहा जाता है. हमारा समय "विकल्प-हन्ता" होने का पाप भी अपने काँधे ढोता है- ये बेबसी इस कविता में दिखती है और इस बेबसी का और उन्मुक्त रूप "बेकस-बकरे" कविता में सामने आता है - जब आप हँसते हुए इस कविता को पढ़ते हैं और फिर एकबारगी आपको लग सकता है कि बकरे आप हैं. छंद कवि का अस्त्र है छंद को जो कपड़े कवि पहनता है उसको अपनी फैक्ट्री में बनाता है.(मैं चरखा लिखना चाहता था पर चरखा लिखते ही एक दूसरा हैशटैग ट्रेंड करने लगता है मित्रों.) इस बेबसी का उपाय भी कविताओं में है और ये खोज अंत में जनता में भरोसे में जाकर खत्म होती है क्योंकि "सब हिसाब जनता करती है, नहीं किसी को देती माफ़ी." 
जन्मते हुए कवि ने जो स्वर पाए थे वो कवि के साथ ही हैं और कभी कभी तो उनसे कवि का इतना संवाद हो जाता है कि फिर उसके microcosm और macrocosm में भेद मिट जाता है- वसंत होता है , खंजन होता है और रंजन होता है- जहाँ रंजन सीधे तौर पर नहीं होता वहां दोनाली से डरता हुआ प्रेम पांडे होता है, कहीं रंजन साइकिल होता है और कहीं पूरा गाँव रंजन होता है और कहीं रंजन पूरा गाँव हो जाता है. 
अभी जब कि सामान्यत: एक स्वर में ही तमाम कथन होता है, अधिकांश कवितायेँ फॉर्म और स्ट्रक्चर से बहुत छेड़छाड़ करती हुई नहीं दिखती ( पटना और आसपास कम से कम.) और जब कंटेंट भी अपनी सीमाओं से बंधा हुआ है( किसी कवि की स्वीकृति हो समाज में ये एक बिंदु है, प्रकाशक क्या चाह रहा है ये दूसरा बिंदु है, और जो समय का प्रधान स्वर होता है वो तो होता ही है और नयी कविता युग से, अज्ञेयवादियों को ज्यादा नहीं तो थोडा बगल करते हुए, मोटे तौर पर स्वयं को दोहराता हुआ है, ये भी सही गलत से परे है. ), बेकस बकरे जैसी कविताओं का होना फूस के ढेर में सुई जैसा है.  एक तरह से ये संग्रह स्मृति में पुनर्वास का आह्वान भी है. एक बड़े कैदखाने में घूमते हुए रंजन बाबु, नाई की दुकान पर बैठा या भैंस की बात करता या सिलौट कूटने वाले को खोजता हुआ रंजनवा है जो जितना मुस्कुराता है उतनी शिद्दत से कैदखाने की बेबसी भी महसूस कर रहा है. अंत में ये कहना ज़रूरी लगता है कि हमारी समझ पर हमारे पढ़े हुए का गहन प्रभाव पड़ता है और जो हम पढ़ते हैं उस पर पहले से हमारी बनी हुई समझ का प्रभाव भी बहुत पड़ता है.

- अंचित                              
(अंचित लिखता है.)