शहर डायरी : पारो के लिए 




नाटक देखना बहुत देर से शुरू किया. दिल्ली यूनिवर्सिटी चले जाने के बाद. तब तक बारहवीं की पढाई में ज़िन्दगी ही नाटक बनी हुई थी. तो पटना से पहले दिल्ली में नाटक देखे थे. मोहन राकेश के "आधे- अधूरे" का मंचन देखा था, गिरीश कर्नाड का कोई नाटक था, जो बीच से देखा था और समझ नहीं पाया था. टॉम आल्टर "मौलाना" लेकर हमारे कॉलेज आये थे. कोई चस्का लगा नहीं फिर भी. बढ़िया नाटक भले ही अगर कहीं दिख जाता तो देख लेता था. स्कूल में "कलिंग विजय" नाटक में अशोक का किरदार निभाया था और फिर कॉलेज में दो नाटकों में भी रोल निभाए, निर्देशन किया और लिखा भी. पर फिर भी, ये शुरू से पता था कि अपनी जगह देखने वाली जनता में ही है. पटना आने के बाद दो सालों तक कोई नाटक नहीं देखा. हिंदी नाटकों की जानकारी नहीं थी, अंग्रेजी के नाटक यहाँ होते नहीं. तो युट्यूब पर ही मंचन की बकवास रिकॉर्डिंग देखता रहा. 
फिर यहाँ पढ़ते हुए कॉलेज के तीसरे साल में फिर नाटक देखने शुरू किये पर अनुभव सों सों रहा. कुल दस के आसपास नाटक देखे. इनमे से जो पहला नाटक अटका वो कोर्ट-मार्शल था. शायद इप्टा से हुआ था. वरिष्ठ रंगकर्मी जावेद अख्तर का सधा अभिनय और निर्देशन किसका ये याद नहीं पर वो भी सधा हुआ. बाकी नाटक उच्चारण की कमियों, मंच की कमियों और क्लियर विज़न के आभाव में जूझते दिखे. दस के आसपास देख चुकने के बाद, दोहराव लगने लगा और कुछ अच्छे नाटक भी रहे होंगे उस लिस्ट में पर वो दिमाग में अटके नहीं. जावेद अख्तर का जो अगला नाटक मैंने देखा वो कामू के लिखे का नाट्य- रूपांतर था और उसको साध पाना भीषण काम. पहले एक्ट में टीम बेजोड़ रूप से सफल रही पर दूसरा एक्ट , खास कर अंत का कुछ वक़्त टीम पर और दर्शकों पर भारी गुज़रा पर इसको मैं कामू के लिखे और उनकी जटिलता का दोष मानता हूँ. 
आज जिस नाटक की चर्चा कर रहा हूँ, उसकी तुलना वरिष्ठ रंगकर्मियों से नहीं की जा सकती. ना ये नयी टीम वहां तक पहुंचेगी इसको लेकर मैं दंभ भर रहा हूँ. दोहराव से परेशान एक गंभीर दर्शक की हैसियत से कहूँगा जो कुछ कहूँगा और पारो का आकर्षण भी उस दोहराव में ना फंसने की वजह से ही है. पटना में चीज़ों से नयापन खोजना बीरबल की खिचड़ी पकाने जैसा काम है. सांस्कृतिक कार्यक्रमों में वही पचास लोग जुटते हैं, मंच पर वही दस लोग बैठते हैं और कमोबेश वही कहा सुना जाता है जो हमेशा से कहा सुना जा रहा है. इसमें भी वही हाईलाइट होता है जो बाहर से इम्पोर्ट हुआ होता है या जो डायस्पोरा वापस आता है- थोडा नास्टैल्जिया लेकर और थोड़ा सम्मान की लालसा में - और यहाँ तो होती है भाग जाने की जदोजेहद.  इन वजहों से, नया ना भी और ढांचे से बंधा हुआ ही सही , कुछ ताज़ा सीखने, सुनने और समझने वाले लोगों को कभी कभी ही मन-मुताबिक मिलता है. 
"पारो" आश्चर्यजनक रूप से कई नाटकों के बाद एक फ्रेश नाटक लगता है. नागार्जुन का उपन्यास होने के कारण इसका नाट्य रूपान्तर कर देना सरल नहीं हो सकता था. इसलिए त्रुटियों का रह जाना स्वाभाविक था. जहाँ यह नाटक खेला गया और मैंने दो मंचन देखे, उस कालिदास रंगालय की अपनी सीमितता है- सो उसकी बाद करने का कोई फायदा नहीं है. नाटक की यु.एस.पी. उसके कलाकार हैं. अपने शहर में सबसे ज्यादा उच्चारण की कमी खटकती है, फ्लैट संवाद कुछ हद तक आदमी भूल भी जाता है, सब समझ भी नहीं पाते. सो, नाटक के मुख्य पात्रों में से एक बिरजू बना सोवित, जो ग्रामीण पृष्ठभूमि से आता है जब उच्चारण की एक भी गलती नहीं करता, सहज हर्ष होता है. मात्सी, युसूफ जिस सहजता से बिना किसी अभिनय की लम्बी ट्रेनिंग से काम्प्लेक्स किरदारों को निभा जाते हैं, अचम्भा भी होता है और ढांचों के टूटने की आवाज़ सुनकर संतुष्टि भी होती है. कलाकार अपने किरदारों की स्किन में अभी भी परिपक्व नहीं हैं और शायद यही इनको "मेथड" से दूर और संवाद अदाएगी के टोनों से दूर रखता है. नॉन-एक्टर्स की म्हणत में निर्देशन और टीम-स्पिरिट का भी महत्वपूर्ण रोल होता है और एक उठता अभिनेता भी पूरी टीम उठा सकता है. कईयों का ये पहला नाटक है- औरत की दुनिया और मर्द की दुनिया के बीच के विमर्श पर खुद को केन्द्रित करता हुआ- सबसे बड़ी बात, सभागारों के आख्यानों से दूर- विमर्श की, गद्य होती कविताओं और उनके उबासीपन से दूर- सरल और सहज- शायद सचमुच का बदलाव लाने के काबिल, कम से कम दर्शक तक खुद को संप्रेषित करता हुआ. 
हाँ ऐसा नहीं है कि मंचन की दृष्टि से इसके दो शो जो मैंने देखे, वो सम्पूर्ण रहे, कुछ चीज़ें आराम से अवॉयड की जा सकती थीं. पर उन बातों का यहाँ ज़िक्र करने की ज़रूरत नहीं. एक अच्छी शाम को एक बढ़िया नाटक करने के बाद, कलाकार थके हों और अपनी हद से बाहर जा कर अपना कैलिबर प्रूव कर चुके हों तो हम दर्शकों को उनके मुक्कमल होने का सम्मान करते हुए खड़े होकर ताली बजानी चाहिए.

अंचित
(कवितायेँ लिखता है.)


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