युवा कविता #1 नेहा नारायण सिंह

हाल ही में पटना में हुई कविता गोष्ठी में सशक्त पहचान बनाने वाली कवि नेहा नारायण सिंह अपने लेखन में स्त्री विमर्श को केंद्र में रखती हैं.

1.
"तू होता है कौन? "

आगाज़-ऐ-सरफ़रोशी, कर दिया है हमने।
सर आँचल नहीं, कफ़न बाँध लिया है हमने।
तुझे इस दुनिया में लाने वाले होते हैं हम।
हमें आज़ादी देने वाला तू होता है कौन?

अब आवाज़ बुलंद कर, चल पड़े हैं हम।
इन्हें दबाने वाला, तू होता है कौन?
तेरी दुनिया सजाने वाले, होते हैं हम।
हमें कुचलने वाला, तू होता है कौन?

इस बेरंग दुनिया को, रंगीन करने वाले हैं हम
हमें बेरंग करने वाला, तू होता है कौन?
हम पर बंदिशें लगाने वाला, तू होता है कौन?
हमें आज़ादी देने वाला, तू होता है कौन?

हम तख़्त पर हैं हम फ़र्श पर हैं
पर जहाँ हैं परवान पर हैं
हमें फ़रमान सुनाने वाला, तू होता है कौन?
हमें आजादी देने वाला, तू होता है कौन?

वो वक़्त कुछ और था
जब हमने घूँघट में भी तलवार चलाना सीखा।।
ये दौर हमारा है
अब कंधे से कंधा मिलाकर चल पड़े हैं हम।।
न छोड़ चुके हो हम तुम्हें पीछे, 
ऐसा कोई काफ़िला नहीं है।।
फिर सीमाएँ तय करने वाला तू होता है कौन?
हमें आज़ादी देने वाला तू होता है कौन??


वो निर्भया थी जो आगाज़ कर चली गई।
उसे अंजाम तक पहुंचाने वाले होंगे हम।।
अपनी आज़ादी को, आप पाने वाले होंगे हम।
हमें आज़ादी देने वाला तू होता है कौन??


तीन तलाक विषय पर अपनी रचित रचना "तीन तलाक"

अनवरत,
नयन नीर बहता रहे,
नर निरतंर चरता रहे,
चहु चौहद्दी तेरी रहे,
अब तू बता-
तेरी संगिनी है कहाँ?

सीना ठोक तू गुमान करे,
जब घूँघट ओढ़े अगुवाई करूँ ,
तेरे वंश का सृजन मैं करूँ।
अब तू बात- 
किसे अपना? किसे तेरा कहूँ!!!

तस्वीर हैं साफ कहता,
बग़ावत आज मैं कर लूं।
इस जमी ओर उस फ़लक में,
खुद कि चौहद्दी माप लूँ!!!

दिल कहता है तेरा-
मेरी आँखों में अश्क जंचता है!!
अल्फाज तेरे बदल दूँगी,
तूझे तेरी औकात दे दूँगी,
तीन तलाक -
अब मैं बोल दूँगी!!



" रक्षा सुत्र "

रक्षा-सुत्र तैयार किया है मैंने 
अपने भाई का श्रृंगार किया है|
एक सुत लिया है, कद का अपने 
नख से बाल तक माप लिया है|
उसपे मैंने रंग. चढ़ा कर 
हल्दी, चन्दन, फूल लगा कर 
रक्षा-सुत्र का श्रृंगार किया है|
जिसका राखी, नाम दिया है 
रक्षा-सुत्र तैयार किया है मैंने| 
रोड़ी, चन्दन, अछ्त लगा कर 
मैंने भाई से संकल्प लिया है|
नख से बाल तक रक्षा करोगे 
मेरी चिता तक साथ रहोगे|
नाप को मैंने अपने आप को 
सुत्र से तुमको बान्ध दिया है|
पग-पग मेरी ढाल बनोगे 
कमजोर परु तो विश्वास बनोगे
आन बनोगे, मान बनोगे
मेरा तुम स्वाभिमान बनोगे|
समय का चक्र भी घुमेगा 
अपना रिश्ता भी छुटेगा 
टूटेग़ा न वादा करो तुम 
जब पुकारु आना पड़ेगा 
मेरी लाज़ बचाना पड़ेगा|
शय्या तक तुम आओगे ना 
मुझको आग दे जाओगे ना 
रक्षा-सुत्र जो बान्ध दिया है 
अपने भाई का श्रृंगार किया है||
 
नेहा नारायण सिंह
 
मैं क्यों लिखती हूँ ?
प्रकृति और समाज के प्रति अपनी राय रखने और अपनी सोच पहुंचाने का सरल और सार्थक माध्यम  है लेखन  मेरे स्वाभाव में है जिसे आकार दे रही हूँ

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