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Showing posts from December, 2017

युवा कविता #18 अभिषेक

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अभिषेक कहते हैं कि कविता उनके लिए एक हॉबी की तरह है जैसे दूसरी चीज़ें हैं मसलन भाषण और क्विज़.उन्होंने कई लेख लिखे हैं और अपना एक पर्सनल ब्लॉग भी चलाते हैं.

मुझे दूर ले चलो।

मुझे दूर ले चलो...कहीं और ले चलो। किसी ऐसी जगह, जहाँ आईने न हों। जहाँ दुनिया के बेड़ियों के मायने ने हों। जहाँ रुख़्सत लेने की विवशता न हो, जहाँ फ़ुर्सत से हम गुफ़्तगू कर सकें। जहाँ सपनो पर किसी का पहरा न हो, जहाँ ज़ख्म तो हो, पर गहरा न हो। जहाँ हो कर बेख़ौफ़ कह सकूँ दिल की बातें, जहाँ दिन भी हमारा, हमारी हो रातें। मुझे दूर ले चलो...कहीं और ले चलो।


एक गाँव था। एक गांव था, दूर तराई में। बसा घाटियों की गहराई में। थे लोग वहां के प्यारे से, …

युवा कविता #17 शालिनी झा

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शालिनी झा - मुझे ठीक से याद नहीं , मैं कब लिखने लगी, पहले छोटे छोटे भाषण और फिर कविताएँ और फिर ये सिलसिला जारी है. कविता लिखना मेरे लिए संगीत सुनने जैसा है! जैसे आप किसी गाने को बस सुनते हैं . उसमे से आवाज़ , ताल , सुर अलग किए बिना,बिना ज़्यादा सोचे समझे! एक पूरा गाना महसूस करते हैं और उस के बाद कमाल की तसल्ली मिलती है | वैसे ही मैं कविताएँ सोच के नहीं लिखती , कोशिश नहीं करती, बस जब कहीं तसल्ली नहीं मिलती, जब आँसू बाहर नही आ पाते, जब खुशी संभाली नहीं जाती और जब मन चुपचाप होता है तो कविताएँ बन जाती हैं .ऐसे ही! और फिर कविता पूरी होने पर जो सुकून मिलता है शायद वही ज़िंदगी है.

कुछ सोच रही हूं मैं

वो रात नहीं दिन भी तो नहीं एक शाम अधूरी बाकी थी गिरती थी मोती की बूंदे आंसू के फूलों को थामें वो धूप नहीं ना छांव ही थी एक सांस अधूरी बाकी थी रोका तो था पर टूट गया एक ख्वाब हवा के झोंको सा एक चुप्पी की चादर ओढ़े समेट रही उस खुशबू को कुछ सोच रही हूं मैं खामोशी है...एक सिसकी है शायद छोटी सी उलझन है वो कौन है जो , कुछ भी नहीं पर मेरा भाग्य विधाता है है किस भाषा के शब्द जिन्हें पीड़ा …

नीर की कुछ प्रेम कविताएँ

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पावस नीर दिल्ली में रहते हैं -कविताएँ करते हैं - फ़ुट्बॉल खेलते हैं और पत्रकारिता करते हैं.
वो कहते हैं जब वो प्यार में होते हैं तब भी लिखते हैं, जब नहीं होते तब भी.


उनकी कुछ कविताएँ -


मूव आन

हम रोज फैसला लेते हैं, फैसला लेने का
हम रोज दिल को थोड़ा और कड़ा करते हैं
होते हैं अधिक निष्ठुर, अधिक साहसी
भूल जाते हैं प्यार
हो जाते हैं समझदार

चालाक हो गई हैं प्रेम कहानियां
आज के युग में
वह अपना अंत खुद लिख रही हैं
बेकार हो रहे हैं कवि, लेखक
जनतंत्र से बाहर किए जा रहे हैं पागल

'13 रीजन्स वाई' से जानते हैं जवाब
लेकिन सबसे अहम सवाल नहीं पूछ पाते कभी
'क्यों'

अब जब पर्दे पर जब पूछता है डिंपल वाला हीरो
'क्यों हम सब प्यार के बिना जीना सीख लेते हैं
... क्यों प्यार को मौका नहीं देते'
तो हम हिलाते हैं सिर
और चैनल बदल लेते हैं

अब हम इंतजार नहीं करते
सबकुछ ठीक होने का एतबार नहीं करते
अब हम चुन-चुनकर चुनते हैं रिश्ते
बेसाख्ता, बेपरवाह, बेमतलब वाला प्यार नहीं करते.

सिर्फ तुम्हारे लिए लिखना

तुम्हारे लिए लिखना 
अब किसी सूखे तालाब से मछली मार लाने जैसा है
(सिंपली इम्पोसिबल)

शब्द गढ़ना पानी का पुल बनाने…

युवा कविता #16 नीरज प्रियदर्शी

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नीरज प्रियदर्शी परवरिश भोजपुर के गांव में हुई है, इसीलिए रंग दिखता है । पिता अब दर्शनशास्त्र के लेक्चरर हैं।तब ठेठ किसान थे। इन्हीं की सोहबत ने पहले पढ़ना सिखाया और फिर लिखना। अब तो उम्मीद भी करने लगे हैं। कहते हैं- कुछ भी लिखो, मगर ऐसा लिखो कि वो कागज किसी के हाथ आए तो आईने सा लगे। तुम्हारे खुद के भी । जब भी लिखता हूं, किसी न किसी के वास्ते ही लिखता हूं। और वास्ते का क्या है! किसी से भी हो जाता है। पेशे से पत्रकार हूं। हर दफे बस यही चाहता हूं कि कागज पर सिर्फ कविताएँ लिखूं, मगर नौकरी ने उसी कागज पर लूट, हत्या और बलात्कार लिखवा दिए। अब नौकरी छोड़ दी है। मन का लिखता हूं। मन करता है हर बार कविता ही लिखूं। विचार अघोर है, सो हर बार प्रेम पर अटक जाता है । हर बार प्रेम भी हो जाता है।







मुमकिन नहीं था 'के मुमकिन नहीं था तुम्हारा आना फिर से उदास कमरे में ये सिर्फ हम नहीं वरन, समझती है हमारी रात भी मुझसे ही खफा है घुप्प बैठी है मुझसे पूछ के सिर्फ़ मेरी ही होकर कैसे गुजर सकती है जबकि पहर बाकी है अभी। शहर छोटा है जब सोता है तब ख्वाब बुनता है और जुगत भिड़ाता है इक और शहर बनाने क…