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Showing posts from February, 2018

सम्पादकीय पोस्ट : रेडियो, कभी न भूलने वाला पहाड़ा और बातें जो बस अख़बारी नहीं - उत्कर्ष

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डायरी का पन्ना


आज सुबह-सुबह देखा मैंने गौरैया हलकी ओस में नहाई हुई चावल के दाने चुग रही थी। फ़रवरी। बसंत। रेडियो पर बज रहा गीत...'तुम आ गए हो, नूर आ गया है...'

पड़ोस का एक प्यारा-पर-शरारती बच्चा एक दिन मेरे घर आया और उसने बताया कि कैसे क्लास की बातें उसकी समझ में नहीं आती। उसने बताया कि अध्यापक पूरा पाठ नहीं पढ़ाते, कहते हैं मेरी कोचिंग में आ जाओ, अच्छे से समझा दूँगा। मैंने उसे बताया कि कैसे रटे से ज्यादा समझना जरुरी है। मैंने बातों ही बातों में उससे पूछा कि क्या उसे सत्रह का पहाड़ा याद है? उसने वापस पूछा कि ये पहाड़ा क्या होता है तब मुझे याद आया अंग्रेजी-माध्यम वाले बच्चे भला कैसे जानेंगे पहाड़ा। मैंने बताया फिर कि मैं 'टेबल' की बात कर रहा हूँ। उसने ना में सर हिलाया, मेरे पूछने पर उसने बताया कि कभी जरुरत ही नहीं पड़ी। खैर, मैंने उसे बताया कि पहाड़ा कैसे जीवन भर काम आता है।

बचपन में प्राइमरी स्कूल से ही, बल्कि घर में ही होती थी हमारी पहाड़ा रटने की शुरुआत। आज भी गूंजती है मन में वो लयबद्ध आवाज़...दो एकम दो, दो दूनी चार। शिक्षा कब देशी से विदेशी इतनी घर कर गई समाज में कि पता ही न च…

सम्पादकीय पोस्ट - नेता बनेंगे, पकौड़ा नहीं बेचेंगे- अंचित भाग 1

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विश्वविद्यालयों के छात्र संघ चुनाव होने वाले हैं. दो हज़ार तेरह में जब आख़िरी बार चुनाव हुए थे, मैं पटना विश्वविद्यालय में पढ़ रहा था. तब से अब तक पाँच साल गुज़रे हैं. इस चुनाव की पृष्ठभूमि बनाते हुए चंद  बातें देख ली जाएँ.

1. देश का माहौल कुछ बदला है. सरकार बदली है.

2. पटना विश्वविद्यालय का पिछला छात्रसंघ अध्यक्ष लगभग एक दो साल में दिखा नहीं.

3. उपाध्यक्ष हर सीनेट बैठक में उपस्थित रहा है और गाहे बगाहे यूनिवर्सिटी के गेट पर दिख जाता है. उसने एक PIL भी लगाई है कोर्ट में कि चुनाव रोके जाएँ क्योंकि फ़रवरी इसके लिए सही समय नहीं है.

4. कई सारी पार्टियाँ इस बीच प्रकट हुई हैं- जनअधिकार पार्टी का छात्र विंग और आम आदमी पार्टी का छात्र विंग भी उपस्थित है. सही मायने में देखा जाए तो दो एक वाम पार्टियों और अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के कैडर के अलावा, अन्य पार्टियाँ एक दो चेहरों पर ही निर्भर रहीं थीं. इस बार क्या स्थिति कुछ अलग है?

                                          आप सोचेंगे एक साहित्यिक ब्लॉग को चुनावों से क्या काम? इधर नेरुदा के मेमायर्स फिर से पढ़ता रहा, बीच बीच में से - नेरुदा को लग…