युवा कविता #21 : अमर प्रताप सिंह

परिचय :  ख़ुद को बयां करना सबसे मुश्किल होता है वो भी शब्दों में।एक कोशिश करता हूँ खुद को समझाने की। पढ़ाई से ज्यादा चित खेल और भ्रमण में लगता है।पर जैसे तैसे मास्टर की डिग्री ले ली है-इतिहास में।

कविता लिखने की वजह : कविता से प्रेम बचपन में ही हुआ था।जब कविता दिखती और मिलती थी,उसे समझने और पढ़ने की काफ़ी कोशिश करता था।कविता लेखन और पठन में अज़ीब सी सुकून देने वाली एहसास की अनुभूति होती है।सो गाहे बगाहे शब्दों को तोड़ता मरोड़ता हूँ।और सामूहिक हत्या का प्रयास करता हूँ और ऐसा यकीन है कि आगे भी करता रहूँगा।


1.

चिता पर भी शांति नहीं,
मरघट भी एक बाज़ार है।
बैकुंठ धाम में भी नहीं,
मिलता आराम है।

चित,चिता,खोपड़ी और मसान,
जीवन -मृत्यु एक समान।
अर्थी से अस्थि तक रिश्ते फ़ीके पड़ते,
सर्दी में लोग चिता के पास होते,
गर्मी में छायाओं के नीचे।

जिनका मंत्रों पर अधिकार नहीं,
वे मरघट के राजा हैं।
मुखाग्नि से लेकर घाट छुड़ाना उनका काम,
पर इसके लिए भी देना होता एक मोटा दाम।
जैसी हैसियत वैसा दाम,
पर आप मोल भाव भी कर सकते हैं,
अगर आप ग्राहक अच्छे हैं।
क्योंकि मरघट भी एक बाज़ार है।

घृतलेपित मुर्दा भी सोचता है,
कभी घी शायद ही चखा जीवन में,
मरने के बाद घृत से नहलाने का क्या उद्देश्य,
धारण किए हुए हैं लोग ये कौन सा भेष।
दुखी भी हैं कुछ लोग पर उससे क्या,
मरकर किसी को दुबारा जीवन कभी मिला क्या?
आग पड़ी चिता में,धुआँ हुईं साँसे, राख शरीर,
धीरे धीरे मिटने लगी फकीर के हाथों की लकीर।

झलासी-लकड़ी का जलना साथ लिए लाश,
पट पट की आवाज़ दृश्य को बना देती ख़ास।
ब्रह्मभोज अभी बाकी है,आइएगा हज़ूर जरूर,
ब्राह्मण तो आएंगे और भोज भी खाएंगे।
जिसको रोटी नहीं मिलती थी ठीक से,
उसके मरनी-भोज में पुड़ी-सब्जी हुई बर्बाद,
दक्षिणा मतभेद के कारण अधूरा रहा गया श्राद्ध।

तो क्या अब उसकी आत्मा भटकेगी,
पता नहीं पर जब प्राण थे, वो बहुत भटका था।

2.

चिलम गर्म है और बर्फ धूआँ,
ताकत नहीं फेफड़ों में, उसमें धुआँ -धुआँ।
धुआँ  चिता से भी उठता है,
दोनों में फर्क क्या है?
फर्क है-एक जीवन दर्शाता है दूसरा मौत।

पर जीवित रहते मुखाग्नि लेना ?
जीवित रहते
मरते भी तो हैं।

विष ही अमृत है,चिलम को देखो,
अग्नि-पानी-वायु और आकाश- पृथ्वी,
ये एक दूसरे के पूरक नहीं भिन्न हैं,
पर ये पंचतत्व भी साथ मिलते हैं,
और शरीर निर्माण करते हैं।
तो विष और अमृत का क्या समर,
शरीर मरता है,आत्मा 'अमर'।

दम पर दम पर कम नहीं हुआ गम,
गाल धँसे,आँखें सुखी और बाल बिखरे,
आधी मौत और आधे जीवन के फ़लसफ़े।                             
मस्तिक शून्य शून्य हुआ शरीर,
जीवन-मृत्यु की बीच की अज़ीब सी लकीर।
चिलम शून्य की तरफ ले जाती है,
योग चंचलता से शून्य होना आदर्श मानती है।
तो क्या चिलमची भी योगी हैं ?

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