युवा कविता #22 : सलमान अशहदी साहिल

सलमान शायरी का रियाज़ करने में यक़ीन रखते हैं और काफ़ी गम्भीरता से इस काम में लगे रहते हैं.


1.

वो रात हो के दिन हो के फिर सुब्ह शाम हो
मेरी ज़बां पे सिर्फ तुम्हारा ही नाम हो

जो पैकरे वफ़ा हो मोहब्बत के बाब में
वो शख़्स राहे इश्क़ में सबका इमाम हो

आवारा गर्दी उस से ज़्यादा करेगा कौन
दाग़े जुनून जिसका हमेशा से काम हो

मत खोल अपना मुंह तु मोहब्बत की बात पर
ऐ मुनकिरीने इश्क़ ज़बां पर लगाम हो

सलमान की ग़ज़ल पे कभी दाद तुम न दो
बस ये दुआ करो के उसे इश्क़ ताम हो


2.

मैं मोहब्बतों का सफ़ीर हूं मैं मोहब्बतें ही पढ़ाउंगा
ये जो नफ़रतों का हुजूम है इसे मैं सिरे से मिटाउंगा

मेरे शहरे अम्न के हाकिमों !! तेरे दस्ते ज़ुल्म को तोड़ कर जो परिंदे
तेरे क़फ़स में हैं, उसे मैं रेहाई दिलाऊँगा.

जहां अम्न हो जहां चैन हो जहां दोसती की दिया जले
जहां नफ़रतों की जगह न हो मैं एक ऐसा शह् बसाउंगा

मेरे दोस्ता!! मुझे बख़्श दे, ये फ़लक को सर पे तो मत उठा
ये लो कान मैंने पकड़ लिया तुम्हें अब कभी न सताउंगा

किसी गांवों में किसी शहर में किसी उजड़े बिछड़े दियार में
कोई राह चलते भटक गया हो तो रास्ता मैं दिखाऊंगा

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