आत्मकथ्य : निशांत रंजन
मेरी स्मृतियां फीकी पड़ रही हैं. मुझे अच्छी तरह यह भी याद नहीं कि पाँच साल पहले मैं अपने घर से किस तरह बहुत दूर चला आया था. एक मक़सद से निकला था, मुट्ठी भर सपने को अपनी झोली में लेकर, पक्के इरादों के साथ. यादों के नाम पर बस इतना ही याद है कि माथे पर माँ का चुंबन की हल्की सी नमी को लेकर निकला था, दादी ने अपनी झोली भर आशीर्वाद दिया था. बूढ़े दादा को वादा देकर निकला था कि आपकी खाँसी का इलाज़ जरूर करवाऊँगा. साथ लेकर कुछ भी तो नहीं निकला था. थके माँदे पिता स्टेशन तक साथ ...
Comments
Post a Comment