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मील के पत्थर
अपना शहर और रंगमंच
अधिकांश लोग समझते हैं सपनो का घर है रंगमंच और सारे अभिनेता जगाते हैं नशा अंधेरे कमरे में.. ब्रतोल्त ब्रेख्त का यह काव्यांश यह बतलाने के लिए काफी है कि फिलवक्त रंगमंच के संबंध में लोगों ने किस प्रकार की राय बना रखी है. बहरहाल आज लोगों का इस प्रकार से सोचना भी कहीं ना कहीं जायज हीं जान पड़ता है ! वर्तमान समय स्वयं अपने आप में इस बात का गवाह है जो हमारे देश के लोगों में इन दिनों सोचने-समझने की क्षमता कम हुई है, साथ हीं कायदे से पढ़ने-लिखने वाले लोग भी लगातार कम हो रहे हैं. यह भी इसका प्रतिफल हीं है जो मोटे दिमाग वाले लोगों का हुजूम हमारे इर्द-गिर्द इतना ज्यादा बढ़ गया है जो कि सरकार चुनने से लेकर, सच्ची कला की परख करने और चीजों को देखने-समझने तक में अधिकांश लोग एकदम से गलत दिशा की ओर अग्रसर हो रहे हैं. इन्हीं बातों के कारण वह आजकल काफी चिढ़ा हुआ सा रहता था तथा लोगो से बातचीत करते हुए भी उसकी बातों में चिड़-चिड़ापन देखा जा सकता था. वैसे उस समय में भी जब हिन्दी सिनेमा की कद्र करनेवाले ज्यादातर लोग यश चोपड़ा की फिल्मों का मुरीद हुआ करते थे उसे अनुराग कश्यप की फिल्...
जब तक आदमी का होना प्रासंगिक है कविता भी प्रासंगिक है - कुमार मुकुल
आज से हमलोग अपनी इंटरव्यू वाली श्रृंखला की शुरुआत कर रहे हैं. इस श्रृंखला में हम कवियों से बात करेंगे और उनकी मनोस्थिति और कविता के प्रति नजरिया जानेंगे. हर कवि से हमने एक ही तरह के सवाल पूछे हैं और आगे हम देखेंगे कि उनमें किस तरह भिन्नता और समानताएं हैं. कुमार मुकुल जाने-माने कवि हैं और अभी हाल ही में उनका नया कविता संग्रह आया है. उन्होंने हमारे सवालों के जवाब दिए :- १. कविता क्या है आपके हिसाब से? क्यों लिखनी शुरू की? कविता अपनी बातों को रखने का एक रूपाकार या फार्मेट है। एक कन्विंश करने वाला फार्मेट। पिता बचपन में रामायण,गीता आदि के हिस्से याद कराया करते थे। फिर दिनकर की किताब 'चक्रवाल', मुक्तिबोध की 'भूरि भूरि खाक धूल', कविता के नये प्रतिमान आदि उनकी टेबल पर रखे होते थे जिन्हें पढते हुए लगता है कविता की समझ आई और फिर उस समझ को प्रकट करने की ईच्छा से कविता का आरंभ हुआ होगा। २. पठन का रचना में क्या योगदान है, आपको क्या लगता है? पढने का तो योगदान है ही। यह पढना किताब तक सीमित नहीं रहता कलाकृतियों और जीवन को भी साथ साथ पढना होता है। पढना ही मनुष्...
नीर की कुछ प्रेम कविताएँ
पावस नीर दिल्ली में रहते हैं -कविताएँ करते हैं - फ़ुट्बॉल खेलते हैं और पत्रकारिता करते हैं. वो कहते हैं जब वो प्यार में होते हैं तब भी लिखते हैं, जब नहीं होते तब भी. उनकी कुछ कविताएँ - मूव आन हम रोज फैसला लेते हैं, फैसला लेने का हम रोज दिल को थोड़ा और कड़ा करते हैं होते हैं अधिक निष्ठुर, अधिक साहसी भूल जाते हैं प्यार हो जाते हैं समझदार चालाक हो गई हैं प्रेम कहानियां आज के युग में वह अपना अंत खुद लिख रही हैं बेकार हो रहे हैं कवि, लेखक जनतंत्र से बाहर किए जा रहे हैं पागल '13 रीजन्स वाई' से जानते हैं जवाब लेकिन सबसे अहम सवाल नहीं पूछ पाते कभी 'क्यों' अब जब पर्दे पर जब पूछता है डिंपल वाला हीरो 'क्यों हम सब प्यार के बिना जीना सीख लेते हैं ... क्यों प्यार को मौका नहीं देते' तो हम हिलाते हैं सिर और चैनल बदल लेते हैं अब हम इंतजार नहीं करते सबकुछ ठीक होने का एतबार नहीं करते अब हम चुन-चुनकर चुनते हैं रिश्ते बेसाख्ता, बेपरवाह, बेमतलब वाला प्यार नहीं करते. सिर्फ तुम्हारे लिए लिखना तुम्हारे लिए लिखना अब किसी सूखे तालाब से मछली मार लाने जैसा है (सिंपली इम्पोसि...