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मील के पत्थर
आत्मकथ्य : निशांत रंजन
मेरी स्मृतियां फीकी पड़ रही हैं. मुझे अच्छी तरह यह भी याद नहीं कि पाँच साल पहले मैं अपने घर से किस तरह बहुत दूर चला आया था. एक मक़सद से निकला था, मुट्ठी भर सपने को अपनी झोली में लेकर, पक्के इरादों के साथ. यादों के नाम पर बस इतना ही याद है कि माथे पर माँ का चुंबन की हल्की सी नमी को लेकर निकला था, दादी ने अपनी झोली भर आशीर्वाद दिया था. बूढ़े दादा को वादा देकर निकला था कि आपकी खाँसी का इलाज़ जरूर करवाऊँगा. साथ लेकर कुछ भी तो नहीं निकला था. थके माँदे पिता स्टेशन तक साथ ...
ओ धरती! तुमसे मुँह मोड़कर मैं मरना नहीं चाहता - अस्मुरारी नंदन मिश्र
अस्मुरारी पटना के हम पाठकों के लिए नए हैं. उनको कुछ दिन पहले ही जल्दी जल्दी दो तीन बार सुनने का मौका मिला. उनकी कवितायेँ ईर्ष्या भी पैदा करती हैं और प्रभावित भी करती हैं, कवि अपनी ज़मीन पर इतने मज़बूत और इतने मंझे हुए कि प्रतिरोध अपने इंडिविजुअल शिल्प के साथ कविताओं में मैनिफेस्ट होता है. हम उनकी कुछ कविताओं को भी इस साक्षात्कार के साथ लगा रहे हैं. उनका एक संग्रह "चांदमारी समय में" बोधि प्रकाशन से प्रकाशित से. - अंचित १. कविता क्या है आपके हिसाब से? क्यों लिखनी शुरू की? ‘कविता क्या है?’ अपने आप में बहुत बड़ा सवाल है| और उसकी कोई सर्वमान्य परिभाषा हो भी नहीं सकती| लेकिन मेरे लिए वह जगत के उद्दीपन के प्रति शाब्दिक अनुक्रिया है| जरूरी नहीं कि यह अनुक्रिया उद्दीपन के साथ लगी ही आए| लेकिन है वह यही| मुझे हमेशा लगता रहा है कि सृजनशीलता मनुष्य की सामान्य विशेषता है| वैसा कोई व्यक्ति नहीं, जो सृजनशील न रहा हो| लेकिन अभिव्यक्ति के रूप में अंतर आ जाता है| कोई किसी कलारूप को अपनाता है, तो कोई किसी विधा का हो जाता है| कलारूपों और विधाओ...
निर्मल करे जो मन... - निशान्त रंजन
"मैं मानता हूँ , मुझे पता है कि क्या और कौन चिरकालिक है जो एक सभ्यता संस्कृति की शहर की तरह सफेद आकाश में भी जीवित रहेगा जहाँ प्रकाश की किरणें भी अपना समापन देखती हैं." निर्मल वर्मा को पढ़ते समय रिल्के की कुछ पंक्तियों की याद कुछ यूँ आती है जैसे एक धुंध को चीरता हुआ प्रकाश हमारे सामने आता और आनेवाले कोहरे और धुंध को स्थगित कर देता है. निर्मल वर्मा को पढ़ते वक़्त कुछ ऐसा आभास हुआ की जैसे निर्मल वर्मा को पढ़ने का सबसे सही समय सर्दी का मौसम ही है, कड़कड़ाती हुई ठंड. यूं भी निर्मल वर्मा की बहुत कहानियों का तानबाना शिमला और पहाड़ी और शीतल प्रदेशों में ही बुना गया है. निर्मल वर्मा की लेखनी पर प्राग देश का एक अनूठा प्रभाव देखने को मिलता है. इस प्रभाव को हम "वे दिन" उपन्यास को पढ़ते वक़्त देख सकते हैं. प्राग की बर्फबारी और ऊजले-सफेद बर्फ की चादरों का वर्णन एक पाठक को उसके हिस्से की खुशी देती है क्योंकि वह किताब पढ़ते वक़्त एक असिमित यात्रा भी कर रहा होता है. निर्मल वर्मा को पढते वक़्त मुझे एकांत में रहना अच्छा लगता है. भीड़भाड़ और कोलाहल से मुक्त दुनिया जहाँ शोर के नाम पर हम दि...