- Get link
- X
- Other Apps
Posts
Featured post
मील के पत्थर
ओ धरती! तुमसे मुँह मोड़कर मैं मरना नहीं चाहता - अस्मुरारी नंदन मिश्र
अस्मुरारी पटना के हम पाठकों के लिए नए हैं. उनको कुछ दिन पहले ही जल्दी जल्दी दो तीन बार सुनने का मौका मिला. उनकी कवितायेँ ईर्ष्या भी पैदा करती हैं और प्रभावित भी करती हैं, कवि अपनी ज़मीन पर इतने मज़बूत और इतने मंझे हुए कि प्रतिरोध अपने इंडिविजुअल शिल्प के साथ कविताओं में मैनिफेस्ट होता है. हम उनकी कुछ कविताओं को भी इस साक्षात्कार के साथ लगा रहे हैं. उनका एक संग्रह "चांदमारी समय में" बोधि प्रकाशन से प्रकाशित से. - अंचित १. कविता क्या है आपके हिसाब से? क्यों लिखनी शुरू की? ‘कविता क्या है?’ अपने आप में बहुत बड़ा सवाल है| और उसकी कोई सर्वमान्य परिभाषा हो भी नहीं सकती| लेकिन मेरे लिए वह जगत के उद्दीपन के प्रति शाब्दिक अनुक्रिया है| जरूरी नहीं कि यह अनुक्रिया उद्दीपन के साथ लगी ही आए| लेकिन है वह यही| मुझे हमेशा लगता रहा है कि सृजनशीलता मनुष्य की सामान्य विशेषता है| वैसा कोई व्यक्ति नहीं, जो सृजनशील न रहा हो| लेकिन अभिव्यक्ति के रूप में अंतर आ जाता है| कोई किसी कलारूप को अपनाता है, तो कोई किसी विधा का हो जाता है| कलारूपों और विधाओ...
नीर की कुछ प्रेम कविताएँ
पावस नीर दिल्ली में रहते हैं -कविताएँ करते हैं - फ़ुट्बॉल खेलते हैं और पत्रकारिता करते हैं. वो कहते हैं जब वो प्यार में होते हैं तब भी लिखते हैं, जब नहीं होते तब भी. उनकी कुछ कविताएँ - मूव आन हम रोज फैसला लेते हैं, फैसला लेने का हम रोज दिल को थोड़ा और कड़ा करते हैं होते हैं अधिक निष्ठुर, अधिक साहसी भूल जाते हैं प्यार हो जाते हैं समझदार चालाक हो गई हैं प्रेम कहानियां आज के युग में वह अपना अंत खुद लिख रही हैं बेकार हो रहे हैं कवि, लेखक जनतंत्र से बाहर किए जा रहे हैं पागल '13 रीजन्स वाई' से जानते हैं जवाब लेकिन सबसे अहम सवाल नहीं पूछ पाते कभी 'क्यों' अब जब पर्दे पर जब पूछता है डिंपल वाला हीरो 'क्यों हम सब प्यार के बिना जीना सीख लेते हैं ... क्यों प्यार को मौका नहीं देते' तो हम हिलाते हैं सिर और चैनल बदल लेते हैं अब हम इंतजार नहीं करते सबकुछ ठीक होने का एतबार नहीं करते अब हम चुन-चुनकर चुनते हैं रिश्ते बेसाख्ता, बेपरवाह, बेमतलब वाला प्यार नहीं करते. सिर्फ तुम्हारे लिए लिखना तुम्हारे लिए लिखना अब किसी सूखे तालाब से मछली मार लाने जैसा है (सिंपली इम्पोसि...
सुधाकर रवि की दो कविताएँ
सुधाकर की कवितायेँ तरुण मन की गहराइयों में गोता खाते नज़र आती हैं। सुधाकर के ही शब्दों में- " मैं लिखता हूँ सही गलत की परिधि से बाहर। मैं लिखता हूँ क्यूंकि मैं बस लिखना चाहता हूँ । मेरा लिखना नौसिखिये के हाथ में गुलेल जैसा है जो असफल निशाना लगाते रहता है एकदिन सफल होने की उम्मीद में । " .................. चाँद को फतवा प्रेम में तड़पता प्रेमी अपने हृदय की व्याकुलता शांत करने के लिए घंटों देखता है चाँद को शायद चाँद में उसे अपनी महबूबा नजर आती होगी कवि ने भी चाँद को कभी प्रेमिका बताया कभी प्रेमिका को चाँद से भी सुन्दर यह चाँद ही गुनहगार है किसी के प्यार करने के जुर्म में यह चाँद ही है जो भड़काता है प्यार करने को और यह प्यार, तोड़ रहा है उनके बनाये नियम को यह...