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मील के पत्थर
मनोज कुमार झा : हर भाषा में जीवित-मृत असंख्य लोगों की सांस बसती है
मनोज उन थोड़े कवियों में से हैं जो लिखते हैं तो अपनी भाषा से भाषा के बाकी पथों को तोड़ते हुए चलते हैं. उन थोड़े लोगों में से भी हैं जो rigorously पढ़ते हैं और पाश्चात्य चिंतकों और दर्शन पर उनकी कमाल की पकड़ है. 1. कविता क्या है आपके हिसाब से?क्यों लिखनी शुरू की? हमलोग बातचीत शुरू करें इससे पहले मैं उद्धरण उदृत करना चाहूँगा heraclitus को , जो कहते हैं, कि Let us not conjecture at random about great things. कविता क्या है , इसको कई लोगों ने कई तरह से कहा है , मैं अभी तक उस स्थिति तक नहीं पहुंचा हूँ जहाँ आके पूरे जोर से कह सकूं की कविता क्या है, हाँ यह जरुर बता सकता हूँ की कविता क्या नहीं है . कोई कविता देखूं तो कह सकूं की यह कविता नहीं है, क्यों नहीं है . चूँकि मैं दूसरा काम मैं जानता नहीं था , खेल में कमजोर था , पढने में ठीक ठाक था, कविता लिखने लगा. 2. पठन का रचना में क्या योगदान है, आपको क्या लगता है? बहुत योगदान है , दृष्टि देता है , पता चलता है कि आपकी परम्परा में क्या कुछ हो चुका है और आप कहाँ है...
आज चंद्र्ग्रहण है - निशान्त
आजतक वह यह नहीं समझ पाया था कि कलकत्ता एक महानगर है या कई छोटे-छोटे गाँवों से मिलकर बना एक नगर जिसका किसी ने केन्द्रीयकरण कर दिया हो. देबा कलकत्ता इस मर्तबा आठ सालों बाद लौटा था. आठ साल में कलकत्ता के राजनीतिक नारे भले ही बदल गये, लेकिन कलकत्ता शायद ही बदल पाया. स्टेशन पर वही भीड़भाड़, संकरी गलियां, कालीघाट की ओर जाने वाली सुरंग उसी हाल में कराहती नजर आ रही थी. सड़क पर बैठे तांत्रिक जो दस रुपए में भविष्य देखने का दावा आज भी कर रहे हैं, जो आज भी अपने आपको कामख्या से सिद्ध होकर आया हुए बताना नहीं भूले. मांसल शरीर वाली बंगाली औरतें जो आज भी भर मांग सिंदूर करती हैं और कम उम्र की जवान होती लड़कियां आज भी अपने माथे पर बिंदी लगाना नहीं भूली हैं. किसी भी किताब-कॉपी के दुकान पर शरतचंद्र की किताबें प्रथम पंक्ति में आज भी उसी तरह विराजमान है जैसे कि अंत तक देवदास के मन में पारो विराजमान थी. देबा का परिवार सात पीढ़ी पहले कलकत्ता आ गया था, जैसे कि पटना, भागलपुर ,बनारस की कई बस्तियां रातोंरात कलकत्ता के हिस्से आ जाता था. देबा के परिवार के कई लोगों ने कालीघाट पर बैठकर तांत्रिक का काम किया, उसक...
सम्पादकीय पोस्ट : रेडियो, कभी न भूलने वाला पहाड़ा और बातें जो बस अख़बारी नहीं - उत्कर्ष
डायरी का पन्ना आज सुबह-सुबह देखा मैंने गौरैया हलकी ओस में नहाई हुई चावल के दाने चुग रही थी। फ़रवरी। बसंत। रेडियो पर बज रहा गीत...'तुम आ गए हो, नूर आ गया है...' पड़ोस का एक प्यारा-पर-शरारती बच्चा एक दिन मेरे घर आया और उसने बताया कि कैसे क्लास की बातें उसकी समझ में नहीं आती। उसने बताया कि अध्यापक पूरा पाठ नहीं पढ़ाते, कहते हैं मेरी कोचिंग में आ जाओ, अच्छे से समझा दूँगा। मैंने उसे बताया कि कैसे रटे से ज्यादा समझना जरुरी है। मैंने बातों ही बातों में उससे पूछा कि क्या उसे सत्रह का पहाड़ा याद है? उसने वापस पूछा कि ये पहाड़ा क्या होता है तब मुझे याद आया अंग्रेजी-माध्यम वाले बच्चे भला कैसे जानेंगे पहाड़ा। मैंने बताया फिर कि मैं 'टेबल' की बात कर रहा हूँ। उसने ना में सर हिलाया, मेरे पूछने पर उसने बताया कि कभी जरुरत ही नहीं पड़ी। खैर, मैंने उसे बताया कि पहाड़ा कैसे जीवन भर काम आता है। बचपन में प्राइमरी स्कूल से ही, बल्कि घर में ही होती थी हमारी पहाड़ा रटने की शुरुआत। आज भी गूंजती है मन में वो लयबद्ध आवाज़...दो एकम दो, दो दूनी चार। शिक्षा कब देशी से विदेशी इतनी घर कर गई समाज में कि पता...