पावस नीर दिल्ली में रहते हैं -कविताएँ करते हैं - फ़ुट्बॉल खेलते हैं और पत्रकारिता करते हैं. वो कहते हैं जब वो प्यार में होते हैं तब भी लिखते हैं, जब नहीं होते तब भी. उनकी कुछ कविताएँ - मूव आन हम रोज फैसला लेते हैं, फैसला लेने का हम रोज दिल को थोड़ा और कड़ा करते हैं होते हैं अधिक निष्ठुर, अधिक साहसी भूल जाते हैं प्यार हो जाते हैं समझदार चालाक हो गई हैं प्रेम कहानियां आज के युग में वह अपना अंत खुद लिख रही हैं बेकार हो रहे हैं कवि, लेखक जनतंत्र से बाहर किए जा रहे हैं पागल '13 रीजन्स वाई' से जानते हैं जवाब लेकिन सबसे अहम सवाल नहीं पूछ पाते कभी 'क्यों' अब जब पर्दे पर जब पूछता है डिंपल वाला हीरो 'क्यों हम सब प्यार के बिना जीना सीख लेते हैं ... क्यों प्यार को मौका नहीं देते' तो हम हिलाते हैं सिर और चैनल बदल लेते हैं अब हम इंतजार नहीं करते सबकुछ ठीक होने का एतबार नहीं करते अब हम चुन-चुनकर चुनते हैं रिश्ते बेसाख्ता, बेपरवाह, बेमतलब वाला प्यार नहीं करते. सिर्फ तुम्हारे लिए लिखना तुम्हारे लिए लिखना अब किसी सूखे तालाब से मछली मार लाने जैसा है (सिंपली इम्पोसि...