चंद्रकांत देवताले: शब्दों की बुनाई में रचा जीवन।

कवि का जाना कैसा होता है? किसी रचना प्रक्रिया का सूर्यास्त!
आज सुबह हिंदी के सम्मानित कवि चंद्रकांत देवताले के निधन का समाचार स्तब्ध करनेवाला था। कैसी विडंबना है कि  अतीत समेटता जा रहा है उन लोगों को जो रचना-जगत के पुरोधा रहे हैं।

चंद्रकांत देवताले की कविताएँ शिल्पकार की सलीके से संजोयी गईं पूँजी हैं। उनकी कविताओं में जो संसार समेटा गया है वो सृजन की विराट परंपरा का पक्ष लेती अमिट स्मृतियों के होने की वजह बन जाती हैं। मैं उनकी एक कविता पढ़ रहा था... "पानी के पेड़ पर जब/ बसेरा करेंगे आग के परिंदे/ उनकी चहचहाहट के अनन्त में/ थोड़ी सी जगह होगी वहाँ मरूँगा..." कवि के मन की अभिव्यक्ति कितनी निर्णायक हो जाती है कभी-कभी किसी समय!

जिस संसार में हम रहते हैं उसकी सभी तहों में उनकी रचना बैठी मिल जाएँगी। देवताले जी ऐसे कवि हैं जिनको पढ़ना रचना को जीना है।  "जनवरी की दोपहर/ और बारिश हो रही है/जाड़े के दिनों में बारिश होती है/ तो उसे मावठा कहते हैं हमारे घरों में..."

उनकी कविता 'माँ जब खाना परोसती थी' माँ को खोजती आँखों का सच बुनते नज़र आती है। और प्रेम। अपनी कविता 'मैं आता रहूँगा तुम्हारे लिए' में कितना समर्पण घुला है। पूरी कविता प्रेम की परत खोलने में रत हो जैसे। "याद है न जितनी बार पैदा हुआ/ तुम्हें मैंने बैंजनी कमल कहकर ही पुकारा/ और अब भी अकेलेपन के पहाड़ से उतरकर/ मैं आऊंगा हमारी परछाइयों के खुशबूदार/ गाते हुए दरख्त़ के पास/ मैं आता रहूँगा उजली रातों में/ चन्द्रमा को गिटार-सा बजाऊंगा/तुम्हारे लिए।"

रिश्ते की पवित्र डोर थामे स्नेह के रेशों से बंधे एक पिता के बेटी से जुड़ाव को कितना प्यारा रचा है कवि ने। 'बेटी के घर से लौटना' हर पिता के अंतर्द्वंद की सच्चाई कह देती है बरबस ही। "बहुत जरुरी है पहुँचना/ सामान बाँधते बमुश्किल कहते पिता/ बेटी ज़िद करती/ एक दिन और रुक जाओ न पापा.../
...वापस लौटते में/ बादल बेटी के कह के घुमड़ते/ होती बारिश आँखों से टकराती नमी/ भीतर कंठ रूँध जाता थके कबूतर का/ सोचता पिता सर्दी और नम हवा से बचते/ दुनिया में सबसे कठिन है शायद/ बेटी के घर से लौटना।"

अपनी कविता 'औरत' में कवि स्त्री के जीवन की पूरी गाथा रचते दिखाई देता है तो वहीँ 'स्त्री के साथ' एक औरत की विराट छवि की पराकाष्ठा बुन देती है। इस कविता में तो कवि कह रहा है कैसे पुरुष रिक्त होता है स्त्री के बिना, शून्य का एहसास हो जैसे! हर पंक्ति में सिमटा सच। कवि कितना साकार हो जाता है जब वह कहता है..."सचमुच मैं भाग जाता चन्द्रमा से फूल और कविता से / नहीं सोचता कभी कोई भी बात ज़ुल्म और ज्यादती के बारे में/ अगर नहीं होतीं प्रेम करने वाली औरतें इस पृथ्वी पर...।"

अपनी कविता 'बिना किसी तानाशाह की तस्वीर के' और 'थोड़े से बच्चे और बाकी बच्चे' में देवताले बच्चों की दुनिया में लगी सेंध की पड़ताल करते हैं, सच उजागर करते हैं। 'इधर मत आना...यह काटीगाँव है' में कवि एक पिछड़े इलाके की छुपी हुई बदहाली को सामने लाते नज़र आते हैं..."जो होता बाढ़-भूकम्प जैसा इलाका कोई / तो आते पुष्पक विमानों से राहत की पोटली/ टपक जाते भाग्यविधाता/ पर मुद्दत हुई काटीगाँव में दर्शन देने/ नहीं आया है अन्न का एक भी दाना..."

कवि देवताले ने छोड़ दिए हैं कितने ही प्रश्न जो बराबरी के हक़ की बात करते रहेंगे, और ये सच कहते रहेंगे कि भला प्रकृति को बाँटा जा सकता है क्या! इतना ऊँचा और नीचा क्यूँ है समाज? ... " समुद्र को टुकड़ों में बाँटने वालो/ मनुष्य की विपदा के मलबे को/ अख़बारों से ढाँपने वालों/ जवाब दो माई के सवालों का/ लहुलुहान माथे को नोंचती पूछ रही माई- आकाश की जात बता भईया? धरती का धरम बता? धुएँ के पहाड़ में पथराई आँखों की चुप्पी के ईश्वर का नाम बता?"

कवि कहता रहा है, गया तो कहके गया कि..."अगर तुम्हें नींद नहीं आ रही/ तो मत करो कुछ ऐसा/ कि जो किसी तरह सोए हैं/ उनकी नींद हराम हो जाए/...हो सके तो बनो पहरुए/ दु:स्वप्नों से बचाने के लिए उन्हें/ गाओ कुछ शांत-मद्धिम/ नींद और पके उनकी जिससे।"

जब भी कविता की बात होगी चंद्रकांत देवताले किसी बयार की तरह रचना की प्रकृति को जानते दिखाई देंगे। कवि की स्मृतियाँ अपनी गोद में छलकते प्रेम की चादर में समेट लेती हैं कविताएँ। देवताले को याद करना उनके जीवन के पदचापों को समझने जैसा है। शायद देवताले के पास 'अंतिम दिन की अनुभूति' रही होगी जैसा उन्होंने लिखा कभी... "उस दिन हरा सूरज उगेगा/ और मैं अपने को और अधिक नहीं जानूँगा,/
कच्चे बादल-सा तकिया/ पिघलते बर्फ़-सा बिस्तर/कितने अनंत सिमट आएँगे आँखों में/ सिर्फ़ अंतिम बार देख लेने के लिए/ ठूंठे नीम पर टिके नंगे आसमान को..."

मैं कवि को कवि के अवसान पर उन्हीं की पंक्तियों में व्यक्त कर रहा हूँ। जब मैं पढ़ रहा हूँ उनकी कविता 'जहाँ थोड़ा-सा सूर्योदय होगा' की उनकी ये पंक्तियाँ..."मैं मरूँगा जहाँ वहाँ उगेगा पेड़ आग का/ उस पर बसेरा करेंगे पानी के परिंदे/ परिंदों की प्यास के आसमान में/ जहाँ थोड़ा-सा सूर्योदय होगा/ वहाँ छायाविहीन एक सफ़ेद काया/ मेरा पता पूछते मिलेगी।"

चंद्रकांत देवताले। कवि को नमन। कविता जिंदाबाद।

चंद्रकांत देवताले।
जन्म: 7 नवम्बर 1936, जौलखेड़ा, जिला बैतूल(मध्य-प्रदेश)
निधन: 14 अगस्त, 2017।


उत्कर्ष
(कवि है, कवितायेँ लिखता है.)

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