सम्पादकीय पोस्ट - नेता बनेंगे, पकौड़ा नहीं बेचेंगे- अंचित भाग 1

विश्वविद्यालयों के छात्र संघ चुनाव होने वाले हैं. दो हज़ार तेरह में जब आख़िरी बार चुनाव हुए थे, मैं पटना विश्वविद्यालय में पढ़ रहा था. तब से अब तक पाँच साल गुज़रे हैं. इस चुनाव की पृष्ठभूमि बनाते हुए चंद  बातें देख ली जाएँ.

1. देश का माहौल कुछ बदला है. सरकार बदली है.

2. पटना विश्वविद्यालय का पिछला छात्रसंघ अध्यक्ष लगभग एक दो साल में दिखा नहीं.

3. उपाध्यक्ष हर सीनेट बैठक में उपस्थित रहा है और गाहे बगाहे यूनिवर्सिटी के गेट पर दिख जाता है. उसने एक PIL भी लगाई है कोर्ट में कि चुनाव रोके जाएँ क्योंकि फ़रवरी इसके लिए सही समय नहीं है.

4. कई सारी पार्टियाँ इस बीच प्रकट हुई हैं- जनअधिकार पार्टी का छात्र विंग और आम आदमी पार्टी का छात्र विंग भी उपस्थित है. सही मायने में देखा जाए तो दो एक वाम पार्टियों और अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के कैडर के अलावा, अन्य पार्टियाँ एक दो चेहरों पर ही निर्भर रहीं थीं. इस बार क्या स्थिति कुछ अलग है?

                                          आप सोचेंगे एक साहित्यिक ब्लॉग को चुनावों से क्या काम? इधर नेरुदा के मेमायर्स फिर से पढ़ता रहा, बीच बीच में से - नेरुदा को लगता था कि उनकी कविता जिस दिशा में मुड़ी, लोर्का की मौत की वजह से ऐसा हुआ. राजनीति ने साहित्य का खाँचा बदला.

मुक्तिबोध का आत्म इतना समग्र था कि एक बूढ़ा होता हुआ कवि, अख़बार छापता और पर्चे बँटवाता , लिख ना पाने पर डिकटेशन देता कि जो थोड़ा बहुत दे सकता वह, दे सके समाज को वापस.
          
 इन चुनावों को देखने के लिए, पिछली बार मैंने कई चश्मे लगाए थे. इस बार सिस्टम से बाहर हूँ सो, सिस्टम के एक व्यक्ति का सहारा लिया है. वह अपना नाम नहीं बताना चाहता- उसको हमलोग पाब्लो पांडे कह देते हैं  ताकि उसके नाम में मौजूद दोनों शब्द जातीयता और धर्म दोनों को कन्नी कटा लेने पर मजबूर कर दें - हालाँकि मुख्य मुद्दे जितने लाइमलाइट में रहें, हर पार्टी अपना इक्वेज़न इसी तरह सेट करने के चक्कर में है - यह पाब्लो कहता है.
                             
 गोरख को हाल ही शहर ने सेलब्रेट किया, एक तामझाम वाले एलिट लिटरेचर फ़ेस्ट के ख़िलाफ़ दूर जयपुर में एक और आयोजन हुआ जो कितना इलीट था इसपर अभी पाब्लो की पूरी राय नहीं बनी है.

यह जेएनयू के चुनाव नहीं हैं जहाँ विद्रोही जैसा कवि लेफ़्ट पार्टियों के साथ दिखाई दे. पूरी लेफ़्ट यूनिटी अभी भी नहीं हो पायी है हालाँकि दो प्रमुख दल मिल कर चुनाव लड़ रहे हैं.

 छात्रसंघ जीत कर भी क्या मिलेगा - पिछले बार के चुनाव के बाद से यह सवाल लगातार परेशान कर रहा है. मुझे भी और पाब्लो को भी.

बाक़ी मैं चाहता था पोस्टर्ज़ लहराए जाएँ- गीत गाए जाएँ- और कैम्पस में जिस तरह लड़कियाँ छेड़ी जाती हैं, यह बंद हो.

मंटो कहते थे कि कॉम्युनिस्ट उन्हें सरकार का भेदी समझते और सरकार उनको कॉम्युनिस्ट मान कर उन पर निगरानी करवाती- फ़ैज़ को देश निकाला हुआ तो मंटो ने उसकी बहुत मुख़ालफ़त की.

जब मैं स्नातक में पढ़ता था, हिंदी का मेरा एक मित्र था जो एक वाम संगठन के लिए दिन रात एक किए रहता, उस मित्र की माँ इलाज के अभाव में गुज़र गयीं थीं, उसके पिता रिक्शा चलाते, और वह ख़ुद एक जगह रात भर गार्ड बना खड़ा रहता, वह एक फ़्लाइओवर के बग़ल बने घर में रहता था और तब भी जब मैं सिस्टम का दोगलापन देख देख कर हार चुका था, वह सब हार चुकने के बाद भी, उम्मीद की बात करता था.

दूसरे थोड़े ईलिट वाम संगठनों के लोग उसे हीनता से देखते, एक अधेड़ नेता जो कई बार मुझे अराजनीतिक और भाजपाई कह चुका है - उसका नाम जान कर ग़लत बुलाता - कभी लेनिन, कभी कुछ और.  वह मित्र बहुत बुरी कविताएँ लिखता था और मार्क्स और लोहिया में उसका भरोसा मुझे चिढ़ा देता था. 2013 में उसकी पार्टी सब सीटें हार गयी थी. वह फिर भी नहीं टूटा.

पाँच सालों में जो जीते, उनका भी बहुत कुछ जोड़ा नहीं दिखता - फिर भी, हर सही और हर नए में उम्मीद का एक सूरज देखना चाहिए
                पीली होती शामों को गंगा किनारे बैठा हुआ मेरा मित्र साहिर की नज़्म गाता था -
                                            
मनहूस समाजी ढाँचों में जब ज़ुल्म पाले जाएँगे
जब हाथ काटे जाएँगे जब सर उछाले जाएँगे
जेलों के बिना जब दुनिया की सरकार चलाई जाएगी
वो सुब्ह हमीं से आएगी
पटना विश्वविद्यालय के पास एक घाट पर अंचित





  

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