where it all began

Hearth, in its earlier days, came out in form of a newsletter. while the magazine was a tedious, more strenuous affair and was periodical, Hearth never depended itself on time and was published whenever an incessant need to do so was felt- be it some political or literary incident or the opening of a new joint in the city -
as a famous philosopher once said, we are not prisoned by time but by clocks, we must accept our ruins and our downfalls. true poetry and literature will come out of those.


31/08/2016

सुधाकर रवि की दो कविताएँ

सुधाकर की कवितायेँ तरुण मन की गहराइयों में गोता खाते नज़र आती हैं। सुधाकर के ही शब्दों में-
" मैं लिखता हूँ सही गलत की परिधि से बाहर। मैं लिखता हूँ क्यूंकि मैं बस लिखना चाहता हूँ । मेरा लिखना नौसिखिये के हाथ में गुलेल जैसा है जो असफल निशाना लगाते रहता है एकदिन सफल होने की उम्मीद में । "
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चाँद को फतवा
 प्रेम में
तड़पता प्रेमी
अपने हृदय की व्याकुलता 
शांत करने के लिए
घंटों देखता है चाँद को
शायद चाँद में उसे
अपनी महबूबा
नजर आती होगी

कवि ने भी चाँद को
कभी प्रेमिका बताया
कभी प्रेमिका को
चाँद से भी सुन्दर

यह चाँद ही गुनहगार है
किसी के प्यार करने के जुर्म में
यह चाँद ही है जो
भड़काता है प्यार करने को

और यह प्यार,
तोड़ रहा है
उनके बनाये नियम को
यह प्यार ही है जो
ख़राब कर रहा है
उनकी संस्कृति को
सदियों के संस्कार को

उन्होंने सुना दिया
चाँद को फ़तवा
मत निकलना कल से
आकाश में।
मत बिखेरना प्यार के बीज
धरती पर।
नहीं तो दर्जनों
प्रेमी युगल की तरह
तुम्हें भी चढ़ा दिया जायेगा
सूली पर ।
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प्यार का होना
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प्यार घास की तरह होता है
जो कभी नहीं खत्म होता।
ये तो धरती के इस छोर से
उस छोर तक फैला है ।
समाज की बन्दिशों के धूप से
सूख जाता है कुछ दिन
नहीं दिखता धरती की सतह पर
पर प्यार मरता नहीं
जीवित रहता है , सतह के नीचे।
चाहत,भरोसा,समर्पण
की नमी से
फिर उगता है प्यार
ये प्यार के सूखने
और फिर उगने
का द्वन्द चलता आ रहा है
मानव सभ्यता की शुरुआत से।