where it all began

Hearth, in its earlier days, came out in form of a newsletter. while the magazine was a tedious, more strenuous affair and was periodical, Hearth never depended itself on time and was published whenever an incessant need to do so was felt- be it some political or literary incident or the opening of a new joint in the city -
as a famous philosopher once said, we are not prisoned by time but by clocks, we must accept our ruins and our downfalls. true poetry and literature will come out of those.
The cover of the blog is called "LOVERS" and has been clicked by eminent poet and photographer Anurag Vats

24/09/2017

युवा कविता #7 आदित्य प्रकाश वर्मा

आदित्य  दिल्ली में रहते हैं और एक कवि, दिल्ली महाविश्वविद्यालया से स्नातक  और एक शिक्षक हैं. कहते हैं -
मैं कविता लिखता हूं बताने को जो महसूस करता हूं, जो नहीं कह पाता ऐसे ही सीधे।

अकल दाढ़

अकल दाढ़ का निकलना
दर्दनाक परेशान करने वाला हो सकता है
कवि अपनी अकल  दाढ़ से जुझ रहा है
उससे ये पूछ रहा है
क्यों आ जाती हो बार बार ?

क्या कोई नाता है तुम्हारे नाम का तुम्हारे काम से ?

अगर तुम सिर्फ एक मामूली दाढ़ हो
तो मत आओं !!
तुम्हारे आने से पहले भी,
मै ठीक ही चबा रहा था |

शायद अकल दाढ़ को सवाल पसंद नहीं
शायद ये सवाल उसकी अकल पर अंकुश
लग रहे है उसे
और गुस्से में वो
हर लजीज  दावत के बाद
मेरा खून बहा, मुझे ही पिला देती है
मेरा सुजा हुआ गाल और
शरीर का बढा हुआ तापमान
उसकी नाराजगी की निशानी है

एक तरफ कवि है कि
उसके बिना खाना भी नहीं खाता

अकल दाढ़ का निकलना
कुछ सालों या
ज़िन्दगी भर का रासा (झंझट) हो सकता है

अगर तुम पिघलो

तुम बर्फ की एक चट्टान हो
तो मैं प्यार सा गर्म
थाम लूं तुमको मैं
अगर तुम पिघलो
तो फैल जाना मुझ पर
जैसे आकाश धरा पर
तुम वो सूरज मत बनना
वो सिर्फ दिन का साथी
अंधेरा कर चला जाता है
रात में
चांद सी यादें दिए

अगर तुम पिघलो
तो लेना रुप रुधिर
फैल जाना मुझ में
तुम वो सांस मत बनना
जो सिर्फ एक  पल साथ  
फिर खो जाती है

अगर तुम पिघलो
तो समय हो जाना , फैल जाना
मेरे भूत, भविष्य और वर्तमान पर
तुम वो अच्छे दिन मत बनना 

अगर तुम पिघलो
तो मौत बनना
बस आ जाना
ज़िन्दगी मत बनना
जो सिर्फ चार दिन की है.

19/09/2017

युवा कविता #6 अभिषेक राज

अभिषेक मगध यूनिवर्सिटी से अंग्रेजी में स्नातक की डिग्री ले रहे हैं. अभी प्रथम वर्ष में हैं. कहते हैं - ज्यादातर हिंदी में ही लिखता हूँ ।
मुहब्बत की गज़लें और कविताएँ लिखता हूँ। 1. 

छत के घेरे से टिककर वो प्रेमी देख रहा है चाँद को देख-देख कर खुश होता है, चाँद की चमक ; हवाओं की सरसराहट में सुनता है पाजेब की खनक ; मुस्कुराता है, हँसता है हवा में किसी का नाम लिखता है। चाँद कोने में खड़ा देखता है तमाशा उसका , जानता है, सब समझता है देख रहा है मुद्दतों से वो प्रेमियों का खुश होना, उसे पता है कुछ समय बाद आएगा ये इसी छत पर आँसू बहाने, चाँद फीकी हँसी हँसता है ।। 2.
 लोग अक्सर मुझसे पूछते हैं मेरी मोहब्बत की दास्ताँ और वो बातें, जज्बातें अनसुलझी मुलाकातें; मैं अक्सर मौन हो जाता हूँ उनके सामने जब मैं शब्दों से शून्य नहीं माप पाता कह नहीं पाता कि समंदर की गहराई दिखाई नहीं देती हाँ कूद कर माप सको तो संभव है भवसागर पार होना । 3. 
तुझे भुलाने की कोशिशों में हद से गुजर भी जाऊँ फिर भी मुमकिन है तेरी तस्वीर आँखों से होकर दिल तक पहुँच जायेगी मैं धड़कनें रोक भी दूँ पर क्या करूँ तुम जो मुझ में साँस लेती हो मेरा कहा कब मानोगी । 4. 
किसी पेड़ के सूखे पत्तों की तरह मेरे ख्वाब गिर पड़ते हैं आँखों से बेजान होकर, चुपचाप निकल पड़ते हैं दर्द से परेशान होकर ; उनको भी पता है मुश्किल है जिन्दा रहना मुर्दों की तरह ।। 5. 
ये भी रोज़ का हिस्सा हो गया है, चाँद का निकलना मेरा उसे तकना , न किसी रोज़ चाँद को नींद आती है न मुझे ; अब धरती को ही कुछ करना होगा मुँह फेर लो इस चाँद से ।