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सड़कें:एक केस स्टडी (कहानी)

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प्रियन्तरा अभी आठवीं कक्षा की छात्रा है पर जिस उम्र में बच्चे कविताओं और कहानियों में अपनी दुनिया खोजते हैं, उस उम्र में ये अपनी दुनिया बनाने का कलात्मक उद्यम करती दिखाई दे जाती हैं।  प्रस्तुत कहानी में जोकि अलग-अलग भागों में अलग-अलग चित्र और विवरण समेटे हुए है, रचनाशील मन की अद्भुत कल्पना-शक्ति का सहज परिचायक है। इस बाल-मन या यूँ कहें कि किशोर-मन से रचना-यात्रा में नए पते तलाश कर लेने की उम्मीदें बढ़ जाती हैं। तो प्रस्तुत है प्रियन्तरा की ये रचना...  सड़कें:एक केस स्टडी
सड़क पर गिरती बारिश की बूँदें किसीका खून साफ कर रही हैं। फूटी आंखें ख़ुदा ने किसी और की किस्मत लिखा है तो नज़रें मेरी फूटी क्यों हैं ? अरे! प्यार चाहिए ? सीढ़ियों पर कदम कैसे रखेगा प्यार ? हृदय तो दफ़न है वहाँ, उस सड़क के नीचे। कल जब वह पहिया आया था तो उसकी लाश वहीं पड़ी थी। उसके कटोरे के सिक्के अब तक वहीं पड़े हैं और रोज-रोज की एक नाइंसाफी वही पड़ी रहेगी। रफ्तार जब रास्ता देखे तो किसी की कदर नहीं करती बग़ैर अपनी रफ्तार के। रातों की नींदों से बिस्तर की तरह बिछी सड़क कौन छीन सकता है? ये बूँदें वो मोटी आँसू हैं, जो ज़ख्मों …

बैसाख का महीना - निशान्त

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बैसाख का महीना बीत गया था और जेठ भी अपने चरम था.आम का पेड़ फल से लदा हुआ था और सूरज के ताप से फल पकने ही वाले थे. जिन लोगों का बगीचा था और जिनको बगीचे की रखवाली मिली हुई थी, वे हिसाब लगाने में व्यस्त थे कि इस साल आम से कितना आमद होगा.औरतें बेचैन थीं कि आम कब घर आये और जल्द से जल्द नये सगे-संबंधियों के यहाँ भेज दिया जाये. कुछ लोग आषाढ़ की पहली बारिश के इंतज़ार मे थे. आम के फल में रस का संचार पहली बारिश के बाद ही होता है. काली घटा के संग आम खाने का आनंद अलग ही होता है. खासकर मालदह आम का स्वाद तो एक-दो बारिश के बाद ही चढ़ता है.

सोनपुर गाँव में आम का सबसे बड़ा बगीचा संप्रदा प्रसाद का ही था. गाँव के दक्षिणी छोर पर दस बीघा जमीन में फैला हुआ आम का बगीचा. सैकड़ो आम के पेड़, तरह-तरह के. चौबीस प्रकार का पेड़ था बगीचा में. अचार के लिए अलग पेड़, लू से बचाव के लिए अलग पेड़, कंठ का प्यास मिटाने के लिए अलग पेड़ और बाकी जो बचा वह जीभ और पेट पूजा के लिए.

संप्रदा प्रसाद का खानदान पुराना जमींदार था. उनके दादा के नाम से अंग्रेजी अफसर चार आने का रसीद काटते थे. संप्रदा बाबू के पिता जी…

युवा कविता #22 : सलमान अशहदी साहिल

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सलमान शायरी का रियाज़ करने में यक़ीन रखते हैं और काफ़ी गम्भीरता से इस काम में लगे रहते हैं.


1.

वो रात हो के दिन हो के फिर सुब्ह शाम हो
मेरी ज़बां पे सिर्फ तुम्हारा ही नाम हो

जो पैकरे वफ़ा हो मोहब्बत के बाब में
वो शख़्स राहे इश्क़ में सबका इमाम हो

आवारा गर्दी उस से ज़्यादा करेगा कौन
दाग़े जुनून जिसका हमेशा से काम हो

मत खोल अपना मुंह तु मोहब्बत की बात पर
ऐ मुनकिरीने इश्क़ ज़बां पर लगाम हो

सलमान की ग़ज़ल पे कभी दाद तुम न दो
बस ये दुआ करो के उसे इश्क़ ताम हो


2.

मैं मोहब्बतों का सफ़ीर हूं मैं मोहब्बतें ही पढ़ाउंगा
ये जो नफ़रतों का हुजूम है इसे मैं सिरे से मिटाउंगा

मेरे शहरे अम्न के हाकिमों !! तेरे दस्ते ज़ुल्म को तोड़ कर जो परिंदे
तेरे क़फ़स में हैं, उसे मैं रेहाई दिलाऊँगा.

जहां अम्न हो जहां चैन हो जहां दोसती की दिया जले
जहां नफ़रतों की जगह न हो मैं एक ऐसा शह् बसाउंगा

मेरे दोस्ता!! मुझे बख़्श दे, ये फ़लक को सर पे तो मत उठा
ये लो कान मैंने पकड़ लिया तुम्हें अब कभी न सताउंगा

किसी गांवों में किसी शहर में किसी उजड़े बिछड़े दियार में
कोई राह चलते भटक गया हो तो रास्ता मैं दिखाऊंगा

Editorial Post: A Brief Analysis Of The Fortnight Of Violence In The Districts Of Bihar : Upanshu

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When I am writing this nine districts of Bihar have already been burnt and we have received little information about the violence that so ensued. The only ‘news’ we received was after the violence became difficult to conceal; and like the flame that rages after adding oil it has consumed completely if not the people then their hearts. And yet, here we are waiting. Waiting for things to go back to normal, for life to get back on track; waiting for state intervention, and in a single breath blaming the state, and the goons that so become the vanguard of such violence. Waiting is all we have become good for, My Friends, My fellow Humans, My fellow Indians and My fellow Biharis! The truth that escapes us - though we are completely aware of it from past experiences - is simple; no one is going to come for us. There is no rescue, only respite that weighs heavy upon us.
This violence, we see happening in Bihar, is merely a physical manifestation of the violence that has always been latent ben…

युवा कविता #21 : अमर प्रताप सिंह

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परिचय :  ख़ुद को बयां करना सबसे मुश्किल होता है वो भी शब्दों में।एक कोशिश करता हूँ खुद को समझाने की। पढ़ाई से ज्यादा चित खेल और भ्रमण में लगता है।पर जैसे तैसे मास्टर की डिग्री ले ली है-इतिहास में।

कविता लिखने की वजह : कविता से प्रेम बचपन में ही हुआ था।जब कविता दिखती और मिलती थी,उसे समझने और पढ़ने की काफ़ी कोशिश करता था।कविता लेखन और पठन में अज़ीब सी सुकून देने वाली एहसास की अनुभूति होती है।सो गाहे बगाहे शब्दों को तोड़ता मरोड़ता हूँ।और सामूहिक हत्या का प्रयास करता हूँ और ऐसा यकीन है कि आगे भी करता रहूँगा।


1.

चिता पर भी शांति नहीं,
मरघट भी एक बाज़ार है।
बैकुंठ धाम में भी नहीं,
मिलता आराम है।

चित,चिता,खोपड़ी और मसान,
जीवन -मृत्यु एक समान।
अर्थी से अस्थि तक रिश्ते फ़ीके पड़ते,
सर्दी में लोग चिता के पास होते,
गर्मी में छायाओं के नीचे।

जिनका मंत्रों पर अधिकार नहीं,
वे मरघट के राजा हैं।
मुखाग्नि से लेकर घाट छुड़ाना उनका काम,
पर इसके लिए भी देना होता एक मोटा दाम।
जैसी हैसियत वैसा दाम,
पर आप मोल भाव भी कर सकते हैं,
अगर आप ग्राहक अच्छे हैं।
क्योंकि मरघट भी एक बाज़ार है।

घृतलेपित मुर्दा भी सोचता है,
कभी घी शायद ही चखा जीवन …

अँचल के रेणु- निशान्त

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एक

फणीश्वरनाथ रेणु  के  गाँव  जैसा  ही  हमारा  गाँव  भी  है।
आखिर  वह  कौन सी चीज़ है  जो  एक  कथाकार  या  साहित्यकार  को  कालजयी   बना  देती  है। भले  ही  इस बात  में  भारी  विरोधाभास  हो  सकता  है  कि”  एक साहित्य अमर  होता  है  या  उसको  लिखने  वाला  साहित्यकार”।  ठीक  उसी  तरह  यह  भी  कहा  जा  सकता है  कि “कथानक  अमर  होता  है या  कथाकार”।
मुझे  वह  दिन  आज भी  अच्छी  तरह  याद  है  जब  मैंने  रेणु  को  पहली  बार  पढ़ा  था। वह  दिन  शायद  फाल्गुन  मास  का  कोई  दिन  था  और  कहानी  थी ठेस। करीब  दस  वर्ष  पहले  रेणु  को  पढ़ा  और  उसके  बाद  गाँवों  को  छोड़कर  एक  शहर  में  आ जाना  और  फिर  उस  शहर  को  छोड़कर  फिर  एक  बड़े  शहर में; जहाँ  रेणु  की  कहानियों  के  पात्र  दूर-दूर  तक  नज़र  दौड़ाने  पर  भी  नहीं  दिखाई  देते।
पर  रेणु  को  देखने  के  लिए  क्या  नज़र  दौड़ाने  की  जरूरत  है?

शायद  मेरे  लिए  तो  नहीं  क्योंकि-” रेणु  को  मैं  अपने  दिल  में  लेकर  चलता  हूँ  और  अपनी  औकात  में  भी  रहता  हूँ”।
रेणु  हमारे  गाँवों  की  हवा  में  बस  गये  हैं, पतझड़  में  रेणु  बस  गये  हैं, रेणु…

सम्पादकीय पोस्ट : रेडियो, कभी न भूलने वाला पहाड़ा और बातें जो बस अख़बारी नहीं - उत्कर्ष

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डायरी का पन्ना


आज सुबह-सुबह देखा मैंने गौरैया हलकी ओस में नहाई हुई चावल के दाने चुग रही थी। फ़रवरी। बसंत। रेडियो पर बज रहा गीत...'तुम आ गए हो, नूर आ गया है...'

पड़ोस का एक प्यारा-पर-शरारती बच्चा एक दिन मेरे घर आया और उसने बताया कि कैसे क्लास की बातें उसकी समझ में नहीं आती। उसने बताया कि अध्यापक पूरा पाठ नहीं पढ़ाते, कहते हैं मेरी कोचिंग में आ जाओ, अच्छे से समझा दूँगा। मैंने उसे बताया कि कैसे रटे से ज्यादा समझना जरुरी है। मैंने बातों ही बातों में उससे पूछा कि क्या उसे सत्रह का पहाड़ा याद है? उसने वापस पूछा कि ये पहाड़ा क्या होता है तब मुझे याद आया अंग्रेजी-माध्यम वाले बच्चे भला कैसे जानेंगे पहाड़ा। मैंने बताया फिर कि मैं 'टेबल' की बात कर रहा हूँ। उसने ना में सर हिलाया, मेरे पूछने पर उसने बताया कि कभी जरुरत ही नहीं पड़ी। खैर, मैंने उसे बताया कि पहाड़ा कैसे जीवन भर काम आता है।

बचपन में प्राइमरी स्कूल से ही, बल्कि घर में ही होती थी हमारी पहाड़ा रटने की शुरुआत। आज भी गूंजती है मन में वो लयबद्ध आवाज़...दो एकम दो, दो दूनी चार। शिक्षा कब देशी से विदेशी इतनी घर कर गई समाज में कि पता ही न च…