where it all began

Hearth, in its earlier days, came out in form of a newsletter. while the magazine was a tedious, more strenuous affair and was periodical, Hearth never depended itself on time and was published whenever an incessant need to do so was felt- be it some political or literary incident or the opening of a new joint in the city -
as a famous philosopher once said, we are not prisoned by time but by clocks, we must accept our ruins and our downfalls. true poetry and literature will come out of those.
The cover of the blog is called "LOVERS" and has been clicked by eminent poet and photographer Anurag Vats

19/11/2017

गौरव अदीब की कविताएँ

गौरव कविता और थिएटर से ख़ूब जुड़े हुए हैं, उनकी कविताएँ कई जगह प्रकाशित हैं और कई नाटकों का निर्देशन भी उन्होंने किया है. पिछले दस साल से लगातार लिख रहे हैं और कविता पोस्टर भी बनाते हैं. लिखने की प्रेरणा के बारे में कहते हैं - "पिता लेखन से जुड़े थे, वहीँ से लिखने की प्रेरणा मिली , 14 साल की उम्र में पहली कविता लिखी थी."

अमृता और साहिर के लिए

 (कवि का नोट : - ये तीन कवितायेँ एक श्रृंखला की हैं जिसमें अब तक 38 लिखी जा चुकी हैं अमृता और साहिर की ज़मीन पर इन्हें लिखा गया है।।)

1. 

 सुनो अमृता !! तन की थकन को टूटने की हद तक बरदाश्त कर सकता हूँ बहुत-बहुत बार पहले भी टूटा तो हूँ पर बिखरा नही अब तक हर बार किसी न किसी के लिए समेट लिया ख़ुद को चुपचाप हर बार कुछ कम रह गया लेकिन जितनी बार ख़ुद को समेटा अपना कुछ हिस्सा शायद खोता गया हर बार और अब इतना कम रह गया हूँ ख़ुद में कि टूटता नही हूँ - सीधा बिखर जाता हूँ मन की थकन ऐसे ही होती है अमृता !! तुमने मन को जोड़ना सीखा है क्या ?? सुनो, मन का माथा चूमना कभी आत्मा के गाल लाल हो जाते हैं, सच्ची और इसकी लालरी कहीं नही दिखती मन पर लव बाइट बन जाती है दो लोगों को ही दिखती है ये बस कई बार एक को ही तुम्हारी आत्मा का गोरापन यूँही नही सुहाता मुझे एक कत्थई लव बाइट बनानी है वहाँ गाढ़ी और चिरस्थायी ये मेरे छोटे से घर की नेमप्लेट होगी मेरा घर तो पता है न !! ----------------------------------------------------------- - 2. 

 सुनो अमृता !! देर शाम नीम अँधेरे में जब सूरज घर पहुँच कर मुँह हाथ धो चुका हो और चाँद आने की तैयारी में लगा हो जैसे नाईट शिफ़्ट पर जाने से पहले तैयार होता है कोई वक़्त के इसी पल में ज्यादातर घरों में जब डिनर की तैयारी हो रही हो और A 39 के बाहर लगे सफ़ेद गुलहड़ों ने तुनक कर समेट लिया हो ख़ुद को ख़ुद में जैसे उस रोज़ तुमने समेट लिया था ख़ुद को और लाख कहने पर नही मिलायी थी मुझसे नज़रें दरसल मैं अपनी मौजूदगी की शर्म नापना चाहता था तुम्हारी आँखों में मैं तुम्हारी उँगलियों की पंखुड़ियों को खोल देना चाहता हूँ अपनी हथेली की गर्माहट से होंठो के पास लाकर चूमना चाहता हूँ और घोल देना चाहता हूँ इनमे अपनी साँसों की महक को तुम भी चाहो तो कर सकते हो ऐसा ही कुछ या आज़मा सकते हो वो नया हुनर जो हाल ही में तुमने मुझसे सीखा है लेकिन मैं मानता हूँ कि अभी हुनर को निखारने की गुंजाइश बाकी है बहुत पेड़ की टहनियों के बीच से झाँकती लाइट जब दिखाई थी तुम्हे तुमने यकायक कहा था तुम इस अँधेरे में सुनसान रस्ते पर कहीं दूर तक चलना चाहोगी मेरे साथ ठीक उसी पल से मैं जंगल हुआ जाता हूँ जहाँ से गुम हुई जाती है वो जंगली ख़ुशबू वो जो घुली थी उस रोज़ हवा में सुबह की सारी बेवकूफियां दरसअल इस खुशबू को ढूंढने की कवायद भर थी मैं जंगल हो गया था अकेला बेंच पर अकेले बैठने से डर लगता है मुझे हर मंज़र के कितने पसमंज़र होते हैं !! --------------------------------------------------------------- 3. सुनो अमृता!! कोई भी कविता बहुत अंदर से उपजती है अंतस की तलहटी से वहाँ से जहाँ से नीचे कुछ और नही होता इसीलिए जब अंत में कुछ नही बचता कविता बचती है इसका उपजना इसका आना वैसा ही है जैसे अचानक किसी दरार से नज़र आये कोई नन्ही कोपल सी या सर के ऊपर से गुज़र जाए जहाज़ इनका होना तय नही होता कमोबेश मेरे लिए तो मैं इन्हें खोदकर नही निकाल सकता ये फुहार सा बरस जाती हैं जैसे कल हम एक दुसरे पर बरस गये थे न बादल आये थे न बदली हुई थी अचानक फुहारें आयीं और दोनों के मन भीग गए थे तुमसे दूर होकर कुछ नही लिखा जाता तुम्हारा ह्रदय रस है तुम्हारे चुम्बन शब्द हैं तुम्हारी पीठ कागज़ तुम्हारी गन्ध शिल्प है तुम्हारी आँखें अलंकार तुम्हारे बाल समास हैं और तुम्हारी देह व्याकरण माफ़ करना इन सबके बग़ैर कविता क्यूँकर होगी बोलो !!

15/11/2017

कुँवर नारायण : बाक़ी बची दुनिया उसके बाद का आयोजन है- निशान्त रंजन

इसे महज संयोग ही कहा जा सकता है की परसों अर्थात् 13 नवंबर को मेरे प्रिय लेखक मुक्तिबोध की जन्म शताब्दी थी. रायपुर में उनके जन्म शताब्दी को लेकर जो आयोजन हुआ था, उसमें मेरा भी जाना हुआ था. वहाँ पर भी कुछ दोस्तों से कुंवर नारायण को लेकर बातें हुई थीं. यह भी संयोग ही है की मुक्तिबोध ने भी दुनिया को अलविदा मस्तिष्काघात के चलते ही कहा था. कुंवर नारायण को भी करीब तीन महीने पहले मस्तिष्काघात लगा था और आज यह महान आत्मा हमारे बीच से सदा के लिए अलविदा कह गयी. लेकिन वास्तव में कवि मरते नहीं. मैंनें जाना है की सोना, आभूषण और कवि समय के साथ और भी अधिक महान और मूल्यवान बनते हैं. आज के कठिन समय में समाज को कुंवर नारायण जैसे कवियों की और भी जरूरत है. कुंवर नारायण ने अपने आपको हर विधा में आजमाया चाहे वह कहानी लेखन हो, कविता, निबंध, आलोचना और काव्य तक. वर्ष 2009 में कुंवर नारायण को ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया था. कुंवर नारायण एक ऐसे इंसान थे जो खबर बनने से दूर रहे और बहुतों के लिए आज भी एक अनजान नाम हैं. ज्ञानपीठ पुरस्कार मिलने पर राजेन्द्र यादव ने तीखी टिप्पणी कि थी की '" आज के समय में हिन्दी का ऐसा कोई भी पुरस्कार ऐसा नहीं है। जिसे खरीदा न जा सकता है. इस बात पर कुंवर नारायण ने कहा था कि वैसे तो विवादों का कोई चेहरा और चरित्र नहीं होता पर राजेद्र् यादव जैसे लोग ही माहौल को बनाए रखते हैं. कुछ दिनों पहले मैंने कुंवर नारायण की कविता संग्रह "वाजश्रवा के बहाने" को पढ़ा और उसके बाद मेरे मन में तरह -तरह के विचार तैरने लगे. एक ऐसे कवि जिन्होंने ने कठिन से कठिनतम समय में भी महान मानवीय मूल्यों को बरकरार रखकर जिंदगी के प्रति एक विशेष लगाव, आग्रह,सम्मान का सृजन किया. मेरे मन में जीवित हैं उनके शब्द और मेेरे द्वारा बनाया गया वह चित्र जिसमें नचिकेता अपने पिता से गले मिलते हुए आश्वस्त होता है कि उसके पिता जीवन और संसार आज भी जीवित हैं. नचिकेता कल्पना करता है कि माँ महज शब्द नहीं, बल्कि एक भाषा है, एक दुनिया. नचिकेता लौटना चाहता है अपने घर जहाँ एक खूला आँगन हो और दीवारों पर गुदे हो तुतलाते बच्चों के हस्ताक्षर. नचिकेता के बहाने कुंवर नारायण ने अपने घर और अपने गंतव्य के महत्व को इंगित किया है. पलायनवादियों का अपन घर नहीं होता, कहाँ होता है अप्रवासियों का कोई अपना घर. पर मुझे उम्मीद है की एकदिन मैं लौटूँगा अपने घर, कुंवर नारायण की कविताओं के बहाने ही सही. कुंवर नारायण अपने आप में एक संपूर्ण दुनिया थे.फिल्म समीझा से लेकर कला के विषयों पर भी उन्होंने गहनतम शोध किया. कुंवर नारायण की कविताओं में इतिहास और मिथक, परंपरा और आधुनिकता का एक अनूठा संगम है.कुंवर नारायण हमारे बीच से बस शरीर से दूर हुए हैं. वह हमें मिलते रहेंगे जबभी हम उनकी कविताओं से गुजरेंगे. जैसे कि कुंवर नारायण हमारे बीच इस तरह लौटते रहेंगे कविताओं के माध्यम से जैसे लौटती है पानी में एक मछली और एक मरी हुई मछली भी पानी मेंं ही मिलती है : अबकी बार लौटा तो बृहत्तर लौटूंगा चेहरे पर लगाए नोकदार मूँछें नहीं कमर में बांधें लोहे की पूँछे नहीं जगह दूंगा साथ चल रहे लोगों को तरेर कर न देखूंगा उन्हें भूखी शेर-आँखों से अबकी बार लौटा तो मनुष्यतर लौटूंगा घर से निकलते सड़को पर चलते बसों पर चढ़ते ट्रेनें पकड़ते जगह बेजगह कुचला पड़ा पिद्दी-सा जानवर नहीं अगर बचा रहा तो कृतज्ञतर लौटूंगा अबकी बार लौटा तो हताहत नहीं सबके हिताहित को सोचता पूर्णतर लौटूंगा.

(निशान्त कहानियाँ लिखते हैं और किताबें पढ़ते हैं.)