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Showing posts from September, 2016

Poems by Ajitabh

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A vagabond and occasional writer. Ajitabh resides in Hyderabad.He writes what he wants to present in the form of emotional explorations. He talks about love, tradition and those  emotional fragments in vivid colors of life............................Your memoryThe solitude of bike's backseat still scrapes.
That remaining cold-coffee in your glass.
Those leftover pizza slices.
They still yearn for the touch of your gentle fingers.
Deprived from the breeze is
The scent of your body
And your troubles bent over my shoulders,
Your memory is a beautiful wound on my soul
And I pray it remains unhealed forever..............................Then and nowThe distance that exists between you and I,
Through which the shivering moon peeps out.
Your perturbed breathing warming the wintry winds.
Your obstinate desire to merge within me by melting everything.But now what remains is your heart
Like a dim sun covered in mist
And some damp memories,
With whose support I have to spend
My remaining …

सतीश कुमार की दो कवितायेँ

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सतीश कविता लिखते हैं , गीत लिखते हैं और कहानी भी । उनके लेखन में बचपन पूरे रंग में विद्यमान है।वो हर विधा में लिखना चाहते हैं । उनका मानना है कि स्याही को शब्द में बदल कर सम्मान पाया जा सकता है । उनकी रचना की धुरी कभी ग्राम्य-जीवन पर टिकती है तो कभी शहर की भाग-दौड़ पर । इनकी रचना में शब्द सहज हीं एक गंभीर अर्थ दे जाते है । उन्हीं रचनाओं में से ये कविताएँ-...................अम्माएक किरण चुपके से आई
सबको ताका
पर बस अम्मा को जगाई।
कलियाँ अभी खिली नहीं थी,
हंस का जोड़ा जागा नहीं था,
पर अम्मा का चूल्हा-चौका, 
सब हो चुका था।
खुशियों की अगवानी करती
झरझर मुस्काती अम्मा
डलिया लटकाए
खुरपी की धार बनाती
सखियों संग बतियाती,
विचर रही थी स्वछन्द
सारी दिशाओं में
फूल-पत्तियों की ठहाकों के बीच
खुद में सामंजस्य बिठाती,
सैर कर रही थी कल्पनाओं में।
अम्मा की एक अदद मुस्कान से
अँधियारे को चिराग छू जाती है।
सिर पर हाथ फिराती है 
तो लगता है जैसे
अभी बरसात 
धान की पत्तियों को छू गई हो।
अम्मा की बात निराली है,
शान हरियाली है।
पर अम्मा जब  साथ नहीं होती
तो लगता है जैसे  सब खाली-खाली है।
.....…

कुमार राहुल की दो कवितायेँ

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राहुल गीतकार है और कवितायेँ खोजता रहता है. वो चाहता है कि वो कविताओं के आसपास रहे हमेशा. उसके शब्दों में, "कविता मेरे लिए कहानी कहने का एक खुबसूरत अंदाज़ है । शायद उस धागे के मानिंद भी जिसमें जीवन के कुछ अनगढ़ मगर नायाब मोती पिरोये जाते रहे हैं । कुछ ऐसे ही अनगाये-अनसुने गीतों को अधर देने की कोशिश मेरी भी है ।"..............................१.जाने जीवन की चौसर पे, मन हारा है कितनी बार
मन हारा-हारा-हारा है, मन जाने हारा कितनी बार...
पण में हारी पांचाली की
मैं पराधीन परिभाषा हूँ
नैनों में थामे बाग काल की
शाकुन्तल अभिलाषा हूँ
एक कहानी लिख जाने में, दूजी जाऊं अक्सर हार
मन हारा-हारा-हारा है, मन जाने हारा कितनी बार...
संघर्षों में हंस के - गा के
जीवन को भरमाया है
मीत रहे दृग जल के आगे
वैतरणी को ठुकराया है
दिन महीने वो साल न पूछो, जीते थे कैसे मन मार
मन हारा-हारा-हारा है, मन जाने हारा कितनी बार...
अभिजनों में घिरी हुई
मैं अपमानित जिज्ञासा हूँ
अर्जुन को मैं भेंट द्रोन की
याचित कोई पिपासा हूँ
मान अपमान का खेल पुराना, खेल गया है फिर संसार
मन हारा-हारा-हारा है, मन जाने हारा कितनी बार.....…

Neruda: Four Poems

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Probably the most loved modern poet who is an enchanter. Pablo Neruda was the pen name of the Chilean poet-diplomat and politician Ricardo Eliécer Neftalí Reyes Basoalto.Not many know that he derived his pen name from the Czech poet Jan Neruda. Neruda won the Nobel Prize for Literature in 1971. In his poems is the feel of love, a desire to unite and emotions for his beloved motherland. Here are four lovely poems from his bouquet of poetry.
.................................... The Word The word was born
in the blood,
it grew in the dark body, pulsing,
and took flight with the lips and mouth.
Farther away and nearer,
still, still it came
from dead fathers and from wandering races,
from territories that had become stone,
that had tired of their poor tribes,
because when grief set out on the road
the people went and arrived
and united new land and water
to sow their word once again.
And that's why the inheritance is this:
this is the air that connects us
with the buried man and with …

दो लघु-कथाएँ

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उत्कर्ष के ही शब्दों में उनके लिए लिखना खुद की ख़ुशी है, संतोष है और एक ऐसा उपक्रम है कि लोगों तक उनके दुनिया देखने का तरीका उनके अपने अंदाज़ में पहुँच सके। दो लघुकथाएँ
................. दूसरी दुनिया का आदमी खिड़की बंद थी कब से उस शायर के घर की। रात के सन्नाटे को तोड़ती बस कुछ सुगबुगाहट सुनाई दे रही थी। चौराहे पर कुछ लोग अलाव ताप रहे थे। सर्द रुत की एक और रात जैसे-तैसे बीत रही थी। "नज़र आये नहीं हमारे उस्ताद, क्या बात है?"
"हाँ, हम भी देखे नहीं कब से"
"पता नहीं। ठंड बहुत है न भईया इसीलिए ना निकले हों।"
"हाँ, इ हो सकत है। मंगरुआ कहत रहे उनकर घरे काम करे वाला कि बंद रहे लन मालिक अपना कमरा में।"
"अबे नहीं, पड़े होंगे कश लगा के नशे में धुत कहीं, कौन जाने का चलत है इन लोगों के मन में!"
"सही कहते हो भिया! अलग ही दुनिया के लोग होते हैं ई लोग।"
" बड़ा दुखी था आदमी हफ्ते पहले मिला था तो बोल रहा था कि दरिया का पानी बर्फ़ सा जम गया है और सूखी घास हो गयी है दुनिया।" रात के अंतिम प्रहर उसकी चीख सुनाई दी। पड़ोस के लोग भागे आये। देखते…