where it all began

Hearth, in its earlier days, came out in form of a newsletter. while the magazine was a tedious, more strenuous affair and was periodical, Hearth never depended itself on time and was published whenever an incessant need to do so was felt- be it some political or literary incident or the opening of a new joint in the city -
as a famous philosopher once said, we are not prisoned by time but by clocks, we must accept our ruins and our downfalls. true poetry and literature will come out of those.


23/12/2016

Quote unquote feminism - some general personal thoughts

Dear women,
Being repetitively told that you are strong, smart and independent does not make you one, you should feel that yourselves.  Let no one ever tell you what you are and what you are not. Not only us but also others including transgender and homosexuals whose rights have become a subject of recent concern, are surrounded by same insecurities as us. Ours have always been a patriarchal set up but that didn’t mean that women were not given any ‘rights’, they did have a say in household matters and had their own social life. We should not compare the past to the present. Comparing would only be useful if we compare contemporary societies.  To change anything today would require a change of people’s mental set up. There have always been movements which demand certain things from the society and are able to succeed in getting some fulfilled, but just by telling to start a movement is no solution. You should stand up for what you believe. I am not suggesting that there shouldn’t have been any such thing. After all, movements are passageways to what seems to be unattainable goals. People often misunderstand the word ‘feminism’. It has now become a very subjective term. I am sure it does not mean hatred for men. You may call yourself a feminist and if not so people may label you as one, according to their own understanding of the term. Over the time, the definition of the term has been contested and new ones have been imposed. It has done one thing for sure that it has brought women issues and rights into the limelight. I am not anyone to tell you what it means and what various definitions are but just to ask you that you should always support what you believe. This would only start if people start believing that treating everybody equal is not an extraordinary thing. It is their right. In our times, more and more people are trying to think about these issues and supporting the cause. However, nothing would change unless we change ourselves. It is us who will have to teach our children to give respect to everyone and not just women. It is therefore important that we inculcate a sense of respect in their minds.
(Amogha  loves history and can talk about women rights in her sleep. an avid reader, she thinks she argues all the time. )

22/12/2016

To the Women - a letter by Neha Shama

Dear Women ,
we are strong ,smart and independent and also responsible. We have many perils around,we have been suppressed by the regressive society of which we are an equal part for long.
Let's change where we are and how we are.
Let us claim our power.
We shall bring feminist movements to actions and I am sure all men would support us only if we do not exploit the resources to our advantage. If we want equal rights ,we should be equally ready to give upon the privileges that being women brings along. We shouldn't be exploiting the rape and dowry and laws to avenge old hatreds or to get personal benefits. We should stop slut shaming our own gender.
Men and the society will follow once we ourselves become united and give ourselves to the cause. It is our own actions that are not letting the change come.
Not all women are wrong.
But then the wrong ones are making a deeper impact. Let the world not fear the change we want. It is essential for everyone.
Give power to the right ones and they won't misuse it.
Ladies ,we should becomes idols of inspiration for our daughters to emulate and for our sons to look up to. This depends on our strength ,resilience and courage. Because the world is not going to change ,but we can. 
It is time to redefine 'feminism' from 'advocating equal rights for women ' to 'showing the world the true potential of the power women possess."



(Neha "Shama"'s works are frequently published in various magazines and newspapers. Neha feels that her writing is a meeting space for what is possible and what is impossible.)

21/12/2016

दिल्ली दरबार

आख़िरकार इस साल के अंत में 'सत्य व्यास' का दूसरा उपन्यास पाठकों के बीच आ गया। जिन्होंने इनका पहला उपन्यास पढ़ा था वो सब इसका बेसब्री से इंतज़ार कर रहे थे। इस बात से आप समझ सकते हैं कि लेखक ने अपने पहली किताब से ही कुछ जादू कर दिया था और ढेरों फैन बना लिए थे। 'बनारस टॉकिज' तो आज भी पाठकों के बीच बहुत प्रसिद्ध है। अभी इनकी दूसरी किताब की बात करते हैं जिसका नाम है "दिल्ली दरबार"। किताब के रिलीज़ होने से पहले वीडियो ट्रेलर आया और प्री-बुकिंग भी शुरू हुई। मैंने भी उत्साहित होकर प्री-बुकिंग की और सत्य व्यास के हस्ताक्षर वाली किताब मेरे घर आयी। किताब देखते हीं मन खुश हो गया और जल्द ही पूरा पढ़ लिए।
जैसा की लेखक बताते है - "कहानी इसी सदी के दूसरे दशक के पहले दो सालों की है। वह वक्त जब तकनीक इंसान से ज्यादा स्मार्ट होकर उसकी हथेलियों में आनी शुरू ही हुई थी। नई तकनीक ने नई तरकीबों को जन्म देना शुरू किया था।" आगे कहानी इन बातों को सही साबित भी करती है। उपन्यास की कहानी दो दोस्तों के बैचलर लाइफ की है। कहानी है एक ऐसे मनमौजी युवा की जो सिर्फ अपनी सुनता है। चतुर, आवारा, पागल, दीवाना कुछ भी कह सकते हैं। लेकिन है बड़ा तेज। तकनीक से खेलता है और उसका पूरा इस्तेमाल करता हैं। प्रेमी है तो इसकी एक प्रेमिका भी है। यही प्रेम उसे आगे चलकर एक अच्छा इंसान बनाता है।
कहानी के मुख्य पात्र हैं - राहुल मिश्रा उर्फ़ पंडित और मोहित सिंह उर्फ झाड़ी। सत्य व्यास की पात्रों से परिचय करने का अंदाज़ बड़ा ही लाज़वाब है। राहुल के बारे लेखक बताते हैं कि "राहुल मिश्रा पैदा ही प्रेम करने के लिए हुए हैं, ऐसा उनका खुद का कहना है। राजीव राय के बाद जो प्यार, इश्क़ और मुहब्बत में ठीक-ठाक अंतर बता सकते हैं।" ठीक इसके विपरीत मोहित एक सीधा-साधा लड़का है और पढ़ाई में राहुल से तेज है लेकिन चतुराई में नहीं। मोहित और राहुल बचपन से पक्के दोस्त हैं और साथ में पढ़े और बढ़े हैं। दोनों अपने शहर टाटानगर(जमशेदपुर) से ग्रेजुएशन करते हैं। मोहित जहाँ अपने कैरियर के बारे में सोचते रहता है वहीं राहुल लड़की के बारे में। लेखक कहते हैं - "दोस्त की सबसे बड़ी कीमत यही होती है कि यह सही गलत से परे होती है"। और कुछ ऐसी ही दोस्ती है इन दोनों के बीच। मोहित राहुल के हर अच्छे-बुरे काम में साथ देता है लेकिन उसे बहुत समझाता भी है। लेकिन राहुल माने तब तो। वह एक बार जो सोच लेता है उसे करता है।
"छोटे शहर के छोटे सपनों को विस्तार देते शहर का उनवान है दिल्ली।" ग्रेजुएशन के बाद दोनों एमबीए करने के लिए और मोहित सीडीएस की भी तैयारी के लिए दिल्ली जाते हैं। किराये के एक मकान में रहने लगते हैं और फिर शुरू होती है दिल्ली दरबार वाली कहानी। कहानी में कुछ और पात्र भी हैं। परिधि - राहुल की प्रेमिका और मकान मालिक की बेटी। परिधि एक सुन्दर, सुशिल और साधारण लड़की है जो राहुल से बहुत प्यार करने लगती है। बटुक शर्मा - मकान मालिक जो हमेशा इंग्लिश की बेज्जती करते रहते हैं और सुनने वाला खुद को हँसे बगैर रोक नहीं पता है। जैसे वो लिंक को लिंग बोलते हैं, बिलो जॉब को ब्लो जॉब और तेलंगाना को तेल लगाना इत्यादि। राहुल इन बातों पर खूब चुटकी लेते हैं और बटुक शर्मा भी राहुल की खिंचाई करने से नहीं चुकते। एक महिका रायजादा भी कहानी में है जो राहुल के कॉलेज की है जो बाद में कुछ दिन गर्लफ्रेंड भी बन जाती है। एक छोटू नाम का लड़का भी है जो राहुल और मोहित के यहां घर का काम करता है। ये बहुत बड़ा क्रिकेट प्रेमी मालूम होता है पर बाद में ये छोटू सबको आउट कर देता है अपनी गुगली से।
कहानी की शुरुआत राहुल मिश्रा के प्रेम-प्रसंगों से होता है और अंत में इन्हीं पर जाकर खत्म होता है। लेकिन कैसे? ये बड़ा ही मजेदार है और इसे और भी मजेदार बनाया है लेखक सत्य व्यास ने। पाठक को कैसे बांध कर रखते है ये चीज ये बखूबी जानते हैं। आप पढ़ते समय एक पेज भी छोड़ना पसंद नहीं करेंगे। हमेशा आपके मन में एक सस्पेंस रहेगा की आगे क्या होगा। बीच-बीच राहुल की कुछ मजेदार बातें आपको हँसाते रहेगी। जैसे- किताब खोलो और थर्मोडायनामिक्स से गरम रहो, थम्स-अप पीने को अंगूठा पिएगा कहना, आज मेरे और तेरे भाभी का इंटीग्रेशन होते-होते डिफरेंशियेशन हो गया इत्यादि। राहुल हमेशा मोहित को शायरी सुनाने कहता है फिर उस शायरी की चिर-हरण कर देता है। जैसे मोहित सुनाता है-
"तुम मुखातिब भी हो करीब भी हो,
तुमको देखें की तुमसे बात करें।"
राहुल इस पर कहता है "इसलिए कहते हैं झाड़ी की तुम पगलंठ हो। भाग जाएगी, पक्का भाग जाएगी। मतलब या तो देखोगे या फिर बात करोगे। तीसरा काम सिलेबस में है ही नहीं क्या? सत्य ने कुछ लाइन्स ऐसी भी लिखी है जो चुपके से एक सच्चाई कह देती है। जैसे-
" प्रेम के कारण नहीं होते परिणाम होते हैं";
"बांधकर रखना भी तो कोई प्यार नहीं हुआ न",
जिंदगी एयर होस्टेज हो गई है जिसमें बिना चाहे मुस्कुराना पड़ता है",
प्रेम,पानी और प्रयास की अपनी ही जिद होती है और अपना ही रास्ता"!!!
सत्य व्यास कहानी को अपने अंदाज़ में बहुत अच्छे तरीके से प्रस्तुत किये हैं। कहानी अच्छी भी है। और सभी पाठक, ज्यादातर युवा इस से जुड़ सकते हैं। भाषा सरल है और इसका लप्रेक और हास्य वाला अंदाज़ भाता है। डबल मीनिंग वाली बातें गुदगुदाती भी है तो कुछ पैराग्राफ मन मोह लेती है और दूबारा पढ़ने को मजबूर करती है। आपको भी पढ़ कर मज़ा आएगा लेकिन ये बनारस टॉकीज के तरह शायद यादगार नहीं बन पाएगा। दिल्ली दरबार दो-तीन घण्टे अच्छा मनोरंजन करती है लेकिन इसमें सिखने के लिए शायद कुछ नहीं है। इसमें  ऐसा कुछ खास भी नहीं है जो याद रह जाये, लेखक के लेखनी के अलावे। साहित्य की पगडण्डी से हट कर सत्य व्यास भी नए लेखकों की तरह अपनी राह चल रहे हैं। परंतु नये लेखकों को अब समझ जाना चाहिए की एक ही तरह की कहानी पाठकों को उनसे दूर भी कर सकती है। इनको कुछ अच्छा और अलग कहानी लिखना होगा। हिंदी में आये नये लेख़क के योग्यता पर कोई शक़्क़ नहीं है और हमें ये पता की नये लेखक और भी बेहतरीन कहानी लिख सकते हैं। इसलिए सत्य व्यास के अगली किताब का इंतज़ार रहेगा। आपको भी इस उपन्यास को पढ़कर आनन्द लेना चाहिए और लेखक को अपनी बात बतानी चाहिए। फेसबुक पर बड़ी आसानी से मिल जायेंगे। मैंने तो अपने मन की बात लिख दी।
सत्य व्यास के पहले उपन्यास 'बनारस टॉकीज का रिव्यु भी पढ़े - https://kuchhpadholikho.blogspot.in/2016/08/book-review-banaras-talkies-hindi.html?m=1
शुभम फिजिक्स ऑनर्स सेकंड ईयर के स्टूडेंट हैं। साइंस में दिमाग जितना लगाते हैं उससे ज़्यादा साहित्य से मोह्हबत करते हैं । किताब पढ़ना शौक है । साहित्य के जोड़ घटाव से इतर अपनी बात कहते रहते हैं।




20/12/2016

letter to the chef

Sanjeev kapoor Sir,

How are you? Wish you are allright.
It's very cold and being a foody how can I forget you. I am in a car on a road trip, on my way to your state Haryana. I will stay in karnal. Thought to inform you. 
                                           Anyway winter means tasty and spicy foods for me. As I love cooking, so now a days I am trying some regional dishes. Last time I tried south indian but my cooking failed to meet my expectations. Now sir I want you to mail me some new recipes.I also tried your paneer and it was just awesome.
Now tell me something about your city. Now a days all are talking about weather. Your place being nearer delhi, I can imagine the condition there. But today, the weather is quite sunny and it feels great. Infact I am able to type on my small screen with my bare hands. Winters are great for travelling, isn't it?. 
Life has just two things for me food and travel. Rest is just "moh maya". Funny but true, right. Now what else should I say. I will wait for your recipe.
Car is in it's pace. I would like to end my words here. Take care and stay healthy.
SHRISTI

(Shristi is one of the budding poets from Patna University. in the process of finding her voice, she feels that writing helps in releasing stress and gives her a kind of  pleasure that nothing else can provide.)

19/12/2016

I WAS THERE WHERE IT ALL BEGAN




so, 
this is an interesting story to tell- the one i have told too many times. 

there are these moments in one's live which gleam more than other usual monochromatic ones, the moments, gogol, the russian writer calls, the moment of absolute happiness and satisfaction. chandradhar sharma guleri talks about it the important moments in one's life, which one remembers, may be years later, and they flash in the final moments of ones life. 
let us start before the start then. it was 2012. i had already lost hope to see some good literary activity in the department of English  Patna college. there was no initiative from the faculty and the students in my batch had taken on themselves to prove that at last, poetry and creative writing had lost all their relevancy. a failed attempt to publish a magazine sat on my back- the burden tiring and the life threatening experience it had been, it led me to believe that my days in literature were numbered. 

but it was 2012 and things changed - drastically and for better. one day, pooja and amulya, two of my juniors, very dedicated in their approach, presented a proposal to the department for organizing regular meetings in a literature club. as a senior i was told look after the proceedings and help them co-ordinate and hungry and thirsty i was, i jumped on it with both hands. and so "renaissance" was born. 
five people attended the first meeting. we discussed shakespeare and a little of history. the meetings were interesting... to say the least and irregular. 
and then one day we thought, we should have a fest.it was 2013. people knew about the forum a little bit but there was no funding. the head of the department came to the rescue. the darling that she was, she encouraged us and took the responsibility of the whole budget. the students contributed a tiny sum as well. we wanted to flow. as a final year student, i wanted to leave something and to take away one good memory, to think that i had tried would suffice, would be enough consolation. 

there was no stage yet i wrote a play. there was no electricity and yet the hostelers, avanish, hrisabh and sandeep and others from junior batches, wired the department somehow. roushan went up on the roof of the lecture theater through an opening in the terrace and brought sun. everyone contributed. and rubaroo happened. a department so old, with no history of a literature fest, with a very rich legacy to pursue after and without any infrastructure and enough means had nothing to lose. and we had our enthusiasm to fight every negativity we had in our life.
i wrote a play. i smoked marijuana (totally fake) in front of hundred people (teachers in the first row)' it had seemed impossible that we can have an english play staged in patna let alone be it in patna college.(godot happened in masters later but that is a story for another day)  we had poetry reading session, some brilliant speeches about literature and we watched some brilliant movies. one of them, which i made, which talked about poetry and in which two friends from hindi department had acted alongside me and there were people from the department as well. all this happened and we somehow managed to have loads of fun. 
now that i look back, it seems impossible to  imagine that something of this sort and this magnitude can be pulled off at a place like patna college. 
the activity continued for three more years in one way or another. it becomes important to remember and celebrate rubaroo this year because this has been the first year and despite some brilliant students nothing could be organised. this is the first year i am out of the university and most of us from the original team have trailed into different directions.
      as a team leader, it was challenging but then to have a team like that , i never had to think about failing. life has funny ways. just when i was thinking about how lonely i was getting, i had this bunch of wonderful people with me to tell how wrong i was and to share a common passion with these people even for those few days was something i was going to keep with me, something which was going to be a fireplace in the chilling cold to sit by.
the thing with a legacy is that there should always be carriers of it, similarly passioned, indifferent to the practicality of the idea and tough enough to bend whatever comes in the way. "rubaroo" was where i became more open to literature and its various realms. a legacy if not remembered is forgotten very easily and so it is important to keep revisiting. 
in broad senses, we did not do anything extra ordinary, but in various ways, it was the best thing to happen to us and it is probably one of those few things in this meaningless life we did, which we did for ourselves without any materialistic or career ambitions and just for the sheer joys of it.
time, if like they say in string theory, is just another dimension and can be traveled through, rubaroo is still happening to us somewhere in that direction. 
like pooja said, i was there where it all began. and i am still there.

(anchit writes poems.)

वीकेंड डायरी : गम-ए-हस्ती का 'असद' किस से हो जुज्मर्ग इलाज


( इस लेख का संक्षिप्त रूप आज दैनिक भास्कर से प्रकाशित हुआ है. लिखते हुए कुछ ज़्यादा लिख गया था, सो बाकी इधर है.  - अंचित)

पांच साल की औपचारिक ट्रेनिंग और उसके पहले और बाद मिला कर कुछ दसेक साल का वास्ता साहित्य और कविताओं से, इतने सालों के अनुभव से जो एक वाजिब निष्कर्ष निकल कर सामने आता है वो ये कि हमलोग दरअसल पूरा जीवन एक बढ़िया पाठक बनने की प्रक्रिया में होते हैं और बढ़िया पाठक पूरी तरह से निर्भर होता है बढ़िया कवियों,लेखकों पर. पैमानों पर बहस तो चंगेज़ खान से ज़माने से शराबबंदी तक जारी है और रोज़े क़यामत तक उसको दरबदर चलना है. पर फिर भी गुस्ताखी माफ़. बढ़िया पाठक जो होता है वो घाघ होता है, अपना मसाला, अपनी दवा, उसके चंगुल में अब फंसे तो तब फंसे. जैसे कोई बगुला. (सुधांशु फिरदौस अपनी ताज़ी कविता में लिखते हैं , "वक़्त एक बगूला है जो किसी को भी अपने चपेटे में ले सकता है" भैया, ये बढ़िया पाठक भी ऐसा ही है. खैर सुधांशु पर बाद में आते हैं.) बगुले हमेशा फ़िराक में रहते हैं और पाठक भी ऐसे ही हैं.और अगर मैं मान लूं कि कई धाकड़ बगुलों के बाद, मेरा भी नम्बर आता है तो काम की बात शुरू हो. हर समय में बहुत मुश्किल रहा है बढ़िया पढ़ना तो जो किताब्ची लोग हैं, खोजते रहते हैं. पटना में रहते हुए ये मुश्किल काम है- ढंग की किताब की दुकानें कम हैं, जो हैं वहां किताबें कम हैं, पुस्तकालय बंद होते जा रहे हैं और किताब की दुकानों में गोष्ठियां करने की कोशिश में मेरे शिक्षकों के बाल सफ़ेद हो गये. पर पिछला हफ्ता अच्छा था - उदास ठण्ड थी सो किसी तरह के अभिनय की आवश्यकता नहीं थी, कमरे को गर्म रखने वाला हीटर ख़ुशी ख़ुशी ओवरटाइम कर रहा था और कुछ बेजोड़ किताबें और कवितायेँ पढने को मिल गयीं.  
जो चाय पीते हैं वो जानते हैं कि आम चाय से कुछ फर्क नहीं पड़ता, कड़ी चाय की ज़रूरत बदस्तूर रहती है. कविताओं की जो मास मनुफक्चारिंग होती है, उसमे छिलका ज्यादा होता है और जूस कम. ये सब पाठक की हैसियत से कहना पड़ता है. जब जब कवि होता हूँ, इस "छिलका-थ्योरी" पर कम विश्वास रहता है. बहरहाल, प्रभात की चर्चा अरुण कमल से कई बार सुनी थीं, मनोज कुमार झा ही के जैसे. अलग कवितायेँ पढने की चाह रखते हुए बहुत मगजमारी करने के बाद ये तय किया है कि औसत से तौबा की जाए और अलग डिक्शन, शैली और भाषा के नयेपन की तलाश हो. रविश और गिरीन्द्र भाई के लप्रेक से यही आकर्षण था- कम शब्दों में सब कहना,शैली का आकर्षण.  मनोज भाई के बाद प्रभात भी ऐसे ही एक कवि मिले. उनके बारे में कुछ नहीं पता था, अब भी नहीं है. सिर्फ सफ़ेद पन्ने पर टंके काले अक्षर हैं लेकिन कवि को कविता से ज्यादा जान कर करना भी क्या है. किसी सन्दर्भ में एक बार मनोज भाई बोले, "बंधू बिना करुणा कविता कैसे?" गुरु कहते थे, कविता दुखी ह्रदय में घर करती है. प्रभात का जो संग्रह हाथ लगा, दो साल पुराना है- "अपनों में नहीं रह पाने का गीत." पूरा संग्रह रूंधे गले से पढना होगा. कवि बस अपने सब बंधू बांधवों को खोज रहा है इनमें , याद रखने की कोशिश, माँ की याद- "मैं अभी भी उस पानी को अपने शरीर पर बहता हुआ देख सकता हूँ/जिसमे माँ ने मुझे नहलाया." माँ जो गोबर की हेल पटकती है बच्चे पर, जब कवि भींग रहा है भैंस की पेशाब में, जब पुरुष हुक्का पी रहे हैं. माँ जिसको -"अपने सारे बच्चों का धयान रखना होता है/ वे चाहे जीवित हों या मृत." ऐसे ही फांसी झूल गयी बहन की याद, मर चुकी बुआ जिसके जैसा एक सुख था जीवन में. मेरी माँ इन कविताओं को सुनते हुए आधे घंटे रोते रही. प्रभात को समय देना होगा. बार बार उस ओर लौटना होगा पाठक को भी और सीखते हुए कवि को भी. 
समालोचन ब्लॉग ने सुधांशु की कुछ कवितायेँ छापी हैं. उनकी छोटी कवितायेँ काफी समय से पढ़ रहा हूँ- गंभीर घाव करने वाली छोटी कवितायेँ. भाषा से और शैली से खेलना ज़रूरी है, और इसमें एक कौन्शिअस समझ भी ज़रूरी है. सुधांशु गणितज्ञ हैं, सो उनका हिसाब बराबर रहता है. दोहराव से दूर बार बार खुद को रीइन्वेंट करने की जद्दोजहद. अधेड़ हो चुके कई युवा कवियों में ये कम है. फिर कविता का सामाजिक पक्ष कितना है इस पर बहस नहीं होनी चाहिए. जितनी संख्या में हिंदी के पाठक हैं, ये बहस अब अपना सरोकार खो चुकी है. बढ़िया कवि लौटता है हमेशा- सुधांशु भी लौटते हैं एक कविता में कालिदास की ओर. चार साल पहले मैंने कालिदास की ओर कविता में कदम बढ़ाये थे, समान से विषय पर सुधांशु लिखते हैं- "कोई नहीं जानता कहां से आता है कालिदास/कोई नहीं जानता कहां को चला जाता है कालिदास/हर कालिदास के जीवन में आता है एक उज्जैन/जहां पहुंच वह रचता है अपना सर्वश्रेष्ठ. "
दास्ताने साहित्य में भाषा की जंगे आज़ादी है कविता. तो ये समीक्षाएं तो कतई नहीं हैं. सोच के बढ़ने की प्रक्रिया में नोट होता हुआ पन्ना भर है. ना कुछ छोटा करने की कोशिश ना बड़ा दिखने का प्रयास. पूँजीवाद हर कुछ व्यवहारिक दृष्टिकोण से देखना चाहता है, शैक्षणिक सिस्टम, सब कुछ अप्लाई करता हुआ लेकिन उन से परे कभी कभी  चिरंतन सत्य पीछा करता है- इन समस्त विध्वंस निर्माण के बीच प्रयोजन खोजता हुआ. जैसे जैसे सब नकली होता जाता है, सच की तलाश में आदमी अकवियों से मनमुटाव कर लेता है, कुकवियों से मतभेद करता और कवियों का सर कलम करता जाता है और उनकी कविताओं से करना चाहता है प्रेम. असद, दिल्ली से कुफ्त होकर, अपने बंधू बांधवों के नाटकों से कुफ्त हो कर, जहाने-इश्क से कुफ्त हो कर लिखता है - "लिखता हूँ "असद" सोजिशे-ए-दिल से सुखन-ए-गर्म/
ता रख ना सके कोई मेरे हर्फ़ पर अंगुश्त." कविता जिंदाबाद.



(अंचित कवितायेँ लिखता है. )

08/12/2016

आखिरी जन कवि की पहली पुण्यतिथि


जेएनयू को अगर राष्ट्र मान ले तो उस राष्ट्र के राष्ट्रीय कवि थे रमाशंकर यादव विद्रोही। विद्रोही जी ने पिछले साल इसी दिन दिल्ली में यूजीसी के सामने सरकार के पीएचडी कर रहे छात्रों के स्कॉलरशिप वापस लेने के फैसले का विरोध करते हुए अपनी आखिरी सांस ली। दिल्ली के कड़कड़ाती हुई ठण्ड में भी वो छात्रों के साथ धरने पर बैठे रहे और अपनी कविता से उन ऊँचे ओहदे पर बैठे लोगों को ललकारते रहे। वो कवि थे और उनकी कविता का छंद, रस और अलंकार था विद्रोह करना और रमाशंकर यादव आखिरी समय तक सत्ता से विद्रोह करते रहे। उनके जीवन का केंद्र भले ही जेएनयू था लेकिन वो अपनी कविता में जॉर्ज बुश से ले के भगवा हुकुमत को ललकारते रहे, वो कविता के अखाड़े में भारत भाग्य विधाता से ले के भगवान तक को पटकनी दे देते रहे। वो कबीर की तरह अखड़ और दू टुक बात करते रहे। विद्रोही जी की दो खासियत थी एक तो उनकी कविता शीर्षक मुक्त थी दुसरे विद्रोही जी को उनकी सारी कवितायेँ मुंह जुबानी याद थी मानो विद्रोही जी ने कविता सिर्फ लिखा ही नहीं बल्कि हर एक शब्द को जिया है। उनकी कविता बंद कमरें में कैद नहीं थी , उनकी कविता आम आदमी और व्यवस्था के घर्षण की ऊपज थी और इस टकराहट के गवाह छात्रों के साथ अनेक रिक्शेवाले, दिहाड़ी मजदूर,मेहनतकश जनता थी ।
पिछले साल जब उनके निधन के बाद जेएनयू में उनका शव रखा है तो उनके अंतिम दर्शन में उनके चाहने वालों का हुजूम उमड़ पड़ा। तरौनी में बाबा नागार्जुन के दाह संस्कार में जितने लोग नम्र आंखों से उन्हें विदाई दे रहे थे वैसा विदाई बहुत दिन बाद किसी कवि को मिला। अब जब कविता सिलेबस के किताबों तक सिमट गयी है विद्रोही की कविता आम जनता से बातचीत करती, उनसे संबंध स्थापित करती है ।
1.
कविता क्या है
खेती है,
कवि के बेटा-बेटी है,
बाप का सूद है, मां की रोटी है। 
2.
हमारे खुरदुरे पांव की ठोकर से 
धसक सकती है ये तुम्हारी ज़मीन, 
हमारे खर्राये हुए हाथों की रगड़ से 
लहुलुहान हो सकता है 
तुम्हारा ये कोमल आसमान।।।
हम अपने ख़ून चूते नाख़ूनों से 
चीर देंगे तुम्हारे मखमली गलीचों को,
जब हम एक दिन ज़मीन से आसमान तक 
खड़े कर फाड़ देंगे तुम्हारे मेहराबें, 
तो न उसमें से कोई कच्छप निकलेगा न कोई नरसिंह।।।
3.
..और ये इंसान की बिखरी हुई हड्डियाँ
रोमन के गुलामों की भी हो सकती हैं और
बंगाल के जुलाहों की भी या फिर
वियतनामी, फ़िलिस्तीनी बच्चों की
साम्राज्य आख़िर साम्राज्य होता है
चाहे रोमन साम्राज्य हो, ब्रिटिश साम्राज्य हो
या अत्याधुनिक अमरीकी साम्राज्य
जिसका यही काम होता है कि
पहाड़ों पर पठारों पर नदी किनारे
सागर तीरे इंसानों की हड्डियाँ बिखेरना
4.
धर्म आखिर धर्म होता है
जो सूअरों को भगवान बना देता है,
चढ़ा देता है नागों के फन पर
गायों का थन,
धर्म की आज्ञा है कि लोग दबा रखें नाक
और महसूस करें कि भगवान गंदे में भी
गमकता है।
जिसने भी किया है संदेह
लग जाता है उसके पीछे जयंत वाला बाण,
और एक समझौते के तहत
हर अदालत बंद कर लेती है दरवाजा।
अदालतों के फैसले आदमी नहीं
पुरानी पोथियां करती हैं,
जिनमें दर्ज है पहले से ही
लंबे कुर्ते और छोटी-छोटी कमीजों
की दंड व्यवस्था।
5.
इतिहास में वह पहली औरत कौन थी 
जिसे सबसे पहले जलाया गया?
मैं नहीं जानता
लेकिन जो भी रही हो मेरी माँ रही होगी,
मेरी चिंता यह है कि भविष्य में वह आखिरी स्त्री कौन होगी
जिसे सबसे अंत में जलाया जाएगा?
मैं नहीं जानता
लेकिन जो भी होगी मेरी बेटी होगी
और यह मैं नहीं होने दूँगा।
6.
मैं भी मरूंगा
और भारत के भाग्य विधाता भी मरेंगे
लेकिन मैं चाहता हूं
कि पहले जन-गण-मन अधिनायक मरें
फिर भारत भाग्य विधाता मरें
फिर साधू के काका मरें
यानी सारे बड़े-बड़े लोग पहले मर लें
फिर मैं मरूं- आराम से
उधर चल कर वसंत ऋतु में
जब दानों में दूध और आमों में बौर आ जाता है
या फिर तब जब महुवा चूने लगता है
या फिर तब जब वनबेला फूलती है
नदी किनारे मेरी चिता दहक कर महके
और मित्र सब करें दिल्लगी
कि ये विद्रोही भी क्या तगड़ा कवि था
कि सारे बड़े-बड़े लोगों को मारकर तब मरा॥
7.
दंगों के व्यापारी
न कोई ईसा मसीह मानते हैं,
और न कोर्ट अबू बेन अधम।
उनके लिए जैसे चिली, वैसे वेनेजुएला,
जैसे अलेंदे, वैसे ह्यूगो शावेज,
वे मुशर्रफ और मनमोहन की बातचीत भी करवा सकते हैं,
और होती बात को बीच से दो-फाड़ भी
कर सकते हैं।
दंगों के व्यापारी कोई फादर-वादर नहीं
मानते,
कोई बापू-सापू नहीं मानते,
इन्हीं लोगों ने अब्राहम लिंकन को भी मारा,
और इन्हीं लोगों ने महात्मा गांधी को भी।
और सद्दाम हुसैन को किसने मारा?
हमारे देश के लम्पट राजनीतिक
जनता को झांसा दे रहे हैं कि
बगावत मत करो!
8.
दुनिया के बाजार में 
सबसे पहले क्या बिका था ?
तो सबसे पहले दोस्तों ।।।। 
बंदर का बच्चा बिका था।
और बाद में तो डार्विन ने सिद्ध बिल्कुल कर दिया,
वो जो था बंदर का बच्चा,
बंदर नहीं वो आदमी था।
9.
यह पुल हिल रहा है
तो क्यों हिल रहा है ?
तुमको पता है
हमको पता है
सबको पता है
क्यों हिल रहा है
दोस्तों वो भी इंसान थे
जिनके छाती पर पुल जमाया गया 
अब वही लापता है
न तुमको पता है
न हमको पता है
न किसी को पता है
कि क्यों लापता है।
10.
मैं भी मरूंगा 
और भारत भाग्य विधाता भी मरेगा 
मरना तो जन-गण-मन अधिनायक को भी पड़ेगा 
लेकिन मैं चाहता हूं 
कि पहले जन-गण-मन अधिनायक मरें 
फिर भारत भाग्य विधाता मरें 
फिर साधू के काका मरें 
यानी सारे के सारे बड़े-बड़े लोग पहले मर लें 
फिर मैं मरूं- आराम से उधर चल कर वसंत ऋतु में 
जब दानों में दूध और आमों में बौर जाता है 
या फिर तब जब महुवा चूने लगता है 
या फिर तब जब वनबेला फूलती है 
नदी किनारे मेरी चिता दहक कर महके 
और मित्र सब करें दिल्लगी 
कि ये विद्रोही भी क्या तगड़ा कवि था
11.
आसमान में धान बो रहा हूं 
कुछ लोग कह रहे हैं 
कि पगले! आसमान में धान नहीं जमा करता 
मैं कहता हूं, पगले! 
अगर जमीन पर भगवान जम सकता है 
तो आसमान में धान भी जम सकता है 
और अब तो दोनों में से कोई एक होकर रहेगा 
या तो जमीन से भगवान उखड़ेगा 
या आसमान में धान जमेगा।”
12. 
जब कवि रोता है तो भी कविता होता है 
जब कभी गाता है तो भी कविता होता है
कर्म है कविता जो मैं करता है 
फिर भी लोग पूछते हैं 
विद्रोही तुम क्या करते हो ?
13.
मरने को चे ग्वेरा भी मर गए,
और चंद्रशेखर भी,
लेकिन वास्तव में कोई नहीं मरा है।
सब जिंदा हैं,
जब मैं जिंदा हूं,
इस अकाल में।
मुझे क्या कम मारा गया है
इस कलिकाल में।
अनेकों बार मुझे मारा गया है,
अनेकों बार घोषित किया गया है
राष्ट्रीय अखबारों में, पत्रिकाओं में,
कथाओं में, कहानियों में
कि विद्रोही मर गया।
तो क्या मैं सचमुच मर गया!
नहीं, मैं जिंदा हूं,
और गा रहा हूं,
                                                                                                                                                
सुधाकर रवि

05/12/2016

ख़त नंबर एक



मियां असद 

सलाम, 

सर्दियों की पहली खेप आकर गुज़र गयी. दूसरी अपनी लम्बी उम्र की दुआ करती हुई मारी जायेगी. इसको तो हर साल आना होता है. घर से कुछ दूर एक कंप्यूटर की दूकान है. वहां से पुराना कंप्यूटर ठीक करा कर लौटा हूँ. सोचा तुम्हारे ख़त से ही इसकी नयी ज़िन्दगी की इबारत शुरू हो. दिल्ली में भी ठण्ड पड़ने लगी होगी, वहां की शामों का हाल तुमसे बेहतर कौन जानता है. यहाँ इतनी दूर उस जाड़े के बारे में सोचना भी ठिठुरन बढ़ा देता है, पर पटने का भी कोई अलग हाल नहीं है. यहाँ भी पेड़ों के तने और लाशें सब एक तरह से महकते हैं. 
तुम्हारा दीवान एक बार फिर पढ़ डाला है. इस बार पिछली बार जैसी तल्खी से नहीं, ना किसी के साथ. अकेले ही. मियाँ मीर की किस्मत कब होगी अल्लाह पर ही छोड़ देना बेहतर है. ये जो लैपटॉप है, थोडा स्लो है पर हाथों में समा जाता है. तुमको ख़त लिखता हुआ सोचता हूँ, जाने कितनी चीज़ें अब बची हैं जिनको पूरी तरह समेटा जा सके. एक भीड़ से तो भरी हुई जगह पर बैठा हूँ, अकेला, एक शीशे की बड़ी खिड़की के पास प्रेम देखता हुआ. कैमरे की पुरानी रील की तरह एक एक कर पुराने प्यार याद आ जाते हैं. सिर्फ अपने नहीं सबके... अधूरे. तुम तो मियाँ भगोड़े हो, झेल नहीं पाते तो शराब मिल जाती है. यहाँ शराब का भी नसीब होना जैसे खुदा की तलाश हो गया है. बंदी जब से हुई यही सोचता हूँ, कौन वाजिब वजह होगी अब जो तुम बेदिल के अज़ीमाबाद आओगे. 

जितना तुम याद आते हो, उतना कामू भी याद आता है. एक अलाव होगा  ना किसी शहर में जो कभी नहीं बुझता होगा , जहाँ कभी भी जाया जा सकता होगा हाथ सेंकने? कैसा समय है यार असद, कितने लोग बेवजह मारे जा रहे हैं और कोई कुत्ता तक नहीं भूंकता. स्वीकृतियों का कैसा दौर आ पहुंचा है जब सन्नाटा हावी है. बादशाह सलामत के बेटों के सर जब थाल में सजा कर तख़्त तक लाये गये, क्या हुआ था दिल्ली में? सोचता हूँ पिछले ना जाने कितने सौ सालों से यूँ ही तो मार काट करते आ रहे हैं हमलोग , फिर भी कुछ नहीं सीखे?  मैं और तुम भले ही राजाओं से परे चलते हैं, वाजिब है कि हमारे जैसे कई हैं, जो कुर्की जब्ती से डरे बिना जंग का पैराहन अपने माथे बाँध कर चलते हैं. फिर सब ठीक क्यों नहीं होता?  हमारी हारों में शान क्यों नहीं होती? 
कभी कभी सोचता हूँ, मियाँ युसूफ को इन्ही बातों ने परेशां तो नहीं कर दिया? 
जहाजों और समन्दरों की कवितायेँ पढ़ रहा हूँ इधर, एक अँगरेज़, एक अमरीकन, एक स्पानी जो एक समंदर, एक जहाज़, और एक नाविक की कहानी कहते हैं. एक तवायफ की भी बात सुनी है इधर जो उस बन्दरगाह वाले शहर की रानी है. गमे रोज़गार के बहाने नज्में बेंच रहा हूँ मोहब्बत करने के लिए. शबे-वस्ल से पहले पूरा दिन भटकना पड़ता है, जानता हूँ. 
तो ठण्ड की इस शाम को, इस भीड़ वाली जगह पर बैठा हुआ, शीशे की बड़ी खिड़की से प्यार करते हुए लोगों को देखते हुए ये ख़त जितना तुमको लिख रहा हूँ, उतना खुद को भी. 
कोई ख्वाब ही है ना जिसमे शायरी और माशूक में से एक को आशिक को चुनना न पड़े - दोनों कमबख्त इंडिया पाकिस्तान हैं. ना अलग ही किया जा सके ना एक ही. जंगें बस टीस पैदा करती हैं. 
तुम्हारा दीवान एक बार में खत्म कर बेज़ा नहीं किया जा सकता - उससे मोहब्बत का मसला चलता रहेगा. कलकत्ते की बात हो या पटना की या तुम्हारी दिल्ली की, सर्दियों में शबे वस्ल का इंतज़ार फेफड़े सेंकते हुए करना भी भारी पड़ता है. बात-बेबात हम शायरी की तकनीक पर बात करते रहेंगे. कल जो कविता लिखी, उसके शब्दों को कम करते हुए भी कहीं और भटकता चला गया . इसका अच्छा बुरा हम फिर तय करेंगे. कॉफ़ी का आखिरी सिप लेकर, मैं यहाँ से निकल लूँगा. 

एक जलती हुई सिगार की झडती हुई राख सी ही तो है ज़िन्दगी. 

जय. 

पुनश्च: - जब बादशाह फ़क़ीर हो जाते हैं असद, तो शायरों को ऐय्याश हो जाना चाहिए. 


(अंचित कवितायेँ और कहानियाँ लिखता है)