where it all began

Hearth, in its earlier days, came out in form of a newsletter. while the magazine was a tedious, more strenuous affair and was periodical, Hearth never depended itself on time and was published whenever an incessant need to do so was felt- be it some political or literary incident or the opening of a new joint in the city -
as a famous philosopher once said, we are not prisoned by time but by clocks, we must accept our ruins and our downfalls. true poetry and literature will come out of those.
The cover of the blog is called "LOVERS" and has been clicked by eminent poet and photographer Anurag Vats

19/11/2017

गौरव अदीब की कविताएँ

गौरव कविता और थिएटर से ख़ूब जुड़े हुए हैं, उनकी कविताएँ कई जगह प्रकाशित हैं और कई नाटकों का निर्देशन भी उन्होंने किया है. पिछले दस साल से लगातार लिख रहे हैं और कविता पोस्टर भी बनाते हैं. लिखने की प्रेरणा के बारे में कहते हैं - "पिता लेखन से जुड़े थे, वहीँ से लिखने की प्रेरणा मिली , 14 साल की उम्र में पहली कविता लिखी थी."

अमृता और साहिर के लिए

 (कवि का नोट : - ये तीन कवितायेँ एक श्रृंखला की हैं जिसमें अब तक 38 लिखी जा चुकी हैं अमृता और साहिर की ज़मीन पर इन्हें लिखा गया है।।)

1. 

 सुनो अमृता !! तन की थकन को टूटने की हद तक बरदाश्त कर सकता हूँ बहुत-बहुत बार पहले भी टूटा तो हूँ पर बिखरा नही अब तक हर बार किसी न किसी के लिए समेट लिया ख़ुद को चुपचाप हर बार कुछ कम रह गया लेकिन जितनी बार ख़ुद को समेटा अपना कुछ हिस्सा शायद खोता गया हर बार और अब इतना कम रह गया हूँ ख़ुद में कि टूटता नही हूँ - सीधा बिखर जाता हूँ मन की थकन ऐसे ही होती है अमृता !! तुमने मन को जोड़ना सीखा है क्या ?? सुनो, मन का माथा चूमना कभी आत्मा के गाल लाल हो जाते हैं, सच्ची और इसकी लालरी कहीं नही दिखती मन पर लव बाइट बन जाती है दो लोगों को ही दिखती है ये बस कई बार एक को ही तुम्हारी आत्मा का गोरापन यूँही नही सुहाता मुझे एक कत्थई लव बाइट बनानी है वहाँ गाढ़ी और चिरस्थायी ये मेरे छोटे से घर की नेमप्लेट होगी मेरा घर तो पता है न !! ----------------------------------------------------------- - 2. 

 सुनो अमृता !! देर शाम नीम अँधेरे में जब सूरज घर पहुँच कर मुँह हाथ धो चुका हो और चाँद आने की तैयारी में लगा हो जैसे नाईट शिफ़्ट पर जाने से पहले तैयार होता है कोई वक़्त के इसी पल में ज्यादातर घरों में जब डिनर की तैयारी हो रही हो और A 39 के बाहर लगे सफ़ेद गुलहड़ों ने तुनक कर समेट लिया हो ख़ुद को ख़ुद में जैसे उस रोज़ तुमने समेट लिया था ख़ुद को और लाख कहने पर नही मिलायी थी मुझसे नज़रें दरसल मैं अपनी मौजूदगी की शर्म नापना चाहता था तुम्हारी आँखों में मैं तुम्हारी उँगलियों की पंखुड़ियों को खोल देना चाहता हूँ अपनी हथेली की गर्माहट से होंठो के पास लाकर चूमना चाहता हूँ और घोल देना चाहता हूँ इनमे अपनी साँसों की महक को तुम भी चाहो तो कर सकते हो ऐसा ही कुछ या आज़मा सकते हो वो नया हुनर जो हाल ही में तुमने मुझसे सीखा है लेकिन मैं मानता हूँ कि अभी हुनर को निखारने की गुंजाइश बाकी है बहुत पेड़ की टहनियों के बीच से झाँकती लाइट जब दिखाई थी तुम्हे तुमने यकायक कहा था तुम इस अँधेरे में सुनसान रस्ते पर कहीं दूर तक चलना चाहोगी मेरे साथ ठीक उसी पल से मैं जंगल हुआ जाता हूँ जहाँ से गुम हुई जाती है वो जंगली ख़ुशबू वो जो घुली थी उस रोज़ हवा में सुबह की सारी बेवकूफियां दरसअल इस खुशबू को ढूंढने की कवायद भर थी मैं जंगल हो गया था अकेला बेंच पर अकेले बैठने से डर लगता है मुझे हर मंज़र के कितने पसमंज़र होते हैं !! --------------------------------------------------------------- 3. सुनो अमृता!! कोई भी कविता बहुत अंदर से उपजती है अंतस की तलहटी से वहाँ से जहाँ से नीचे कुछ और नही होता इसीलिए जब अंत में कुछ नही बचता कविता बचती है इसका उपजना इसका आना वैसा ही है जैसे अचानक किसी दरार से नज़र आये कोई नन्ही कोपल सी या सर के ऊपर से गुज़र जाए जहाज़ इनका होना तय नही होता कमोबेश मेरे लिए तो मैं इन्हें खोदकर नही निकाल सकता ये फुहार सा बरस जाती हैं जैसे कल हम एक दुसरे पर बरस गये थे न बादल आये थे न बदली हुई थी अचानक फुहारें आयीं और दोनों के मन भीग गए थे तुमसे दूर होकर कुछ नही लिखा जाता तुम्हारा ह्रदय रस है तुम्हारे चुम्बन शब्द हैं तुम्हारी पीठ कागज़ तुम्हारी गन्ध शिल्प है तुम्हारी आँखें अलंकार तुम्हारे बाल समास हैं और तुम्हारी देह व्याकरण माफ़ करना इन सबके बग़ैर कविता क्यूँकर होगी बोलो !!

15/11/2017

कुँवर नारायण : बाक़ी बची दुनिया उसके बाद का आयोजन है- निशान्त रंजन

इसे महज संयोग ही कहा जा सकता है की परसों अर्थात् 13 नवंबर को मेरे प्रिय लेखक मुक्तिबोध की जन्म शताब्दी थी. रायपुर में उनके जन्म शताब्दी को लेकर जो आयोजन हुआ था, उसमें मेरा भी जाना हुआ था. वहाँ पर भी कुछ दोस्तों से कुंवर नारायण को लेकर बातें हुई थीं. यह भी संयोग ही है की मुक्तिबोध ने भी दुनिया को अलविदा मस्तिष्काघात के चलते ही कहा था. कुंवर नारायण को भी करीब तीन महीने पहले मस्तिष्काघात लगा था और आज यह महान आत्मा हमारे बीच से सदा के लिए अलविदा कह गयी. लेकिन वास्तव में कवि मरते नहीं. मैंनें जाना है की सोना, आभूषण और कवि समय के साथ और भी अधिक महान और मूल्यवान बनते हैं. आज के कठिन समय में समाज को कुंवर नारायण जैसे कवियों की और भी जरूरत है. कुंवर नारायण ने अपने आपको हर विधा में आजमाया चाहे वह कहानी लेखन हो, कविता, निबंध, आलोचना और काव्य तक. वर्ष 2009 में कुंवर नारायण को ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया था. कुंवर नारायण एक ऐसे इंसान थे जो खबर बनने से दूर रहे और बहुतों के लिए आज भी एक अनजान नाम हैं. ज्ञानपीठ पुरस्कार मिलने पर राजेन्द्र यादव ने तीखी टिप्पणी कि थी की '" आज के समय में हिन्दी का ऐसा कोई भी पुरस्कार ऐसा नहीं है। जिसे खरीदा न जा सकता है. इस बात पर कुंवर नारायण ने कहा था कि वैसे तो विवादों का कोई चेहरा और चरित्र नहीं होता पर राजेद्र् यादव जैसे लोग ही माहौल को बनाए रखते हैं. कुछ दिनों पहले मैंने कुंवर नारायण की कविता संग्रह "वाजश्रवा के बहाने" को पढ़ा और उसके बाद मेरे मन में तरह -तरह के विचार तैरने लगे. एक ऐसे कवि जिन्होंने ने कठिन से कठिनतम समय में भी महान मानवीय मूल्यों को बरकरार रखकर जिंदगी के प्रति एक विशेष लगाव, आग्रह,सम्मान का सृजन किया. मेरे मन में जीवित हैं उनके शब्द और मेेरे द्वारा बनाया गया वह चित्र जिसमें नचिकेता अपने पिता से गले मिलते हुए आश्वस्त होता है कि उसके पिता जीवन और संसार आज भी जीवित हैं. नचिकेता कल्पना करता है कि माँ महज शब्द नहीं, बल्कि एक भाषा है, एक दुनिया. नचिकेता लौटना चाहता है अपने घर जहाँ एक खूला आँगन हो और दीवारों पर गुदे हो तुतलाते बच्चों के हस्ताक्षर. नचिकेता के बहाने कुंवर नारायण ने अपने घर और अपने गंतव्य के महत्व को इंगित किया है. पलायनवादियों का अपन घर नहीं होता, कहाँ होता है अप्रवासियों का कोई अपना घर. पर मुझे उम्मीद है की एकदिन मैं लौटूँगा अपने घर, कुंवर नारायण की कविताओं के बहाने ही सही. कुंवर नारायण अपने आप में एक संपूर्ण दुनिया थे.फिल्म समीझा से लेकर कला के विषयों पर भी उन्होंने गहनतम शोध किया. कुंवर नारायण की कविताओं में इतिहास और मिथक, परंपरा और आधुनिकता का एक अनूठा संगम है.कुंवर नारायण हमारे बीच से बस शरीर से दूर हुए हैं. वह हमें मिलते रहेंगे जबभी हम उनकी कविताओं से गुजरेंगे. जैसे कि कुंवर नारायण हमारे बीच इस तरह लौटते रहेंगे कविताओं के माध्यम से जैसे लौटती है पानी में एक मछली और एक मरी हुई मछली भी पानी मेंं ही मिलती है : अबकी बार लौटा तो बृहत्तर लौटूंगा चेहरे पर लगाए नोकदार मूँछें नहीं कमर में बांधें लोहे की पूँछे नहीं जगह दूंगा साथ चल रहे लोगों को तरेर कर न देखूंगा उन्हें भूखी शेर-आँखों से अबकी बार लौटा तो मनुष्यतर लौटूंगा घर से निकलते सड़को पर चलते बसों पर चढ़ते ट्रेनें पकड़ते जगह बेजगह कुचला पड़ा पिद्दी-सा जानवर नहीं अगर बचा रहा तो कृतज्ञतर लौटूंगा अबकी बार लौटा तो हताहत नहीं सबके हिताहित को सोचता पूर्णतर लौटूंगा.

(निशान्त कहानियाँ लिखते हैं और किताबें पढ़ते हैं.)

14/11/2017

YUVA KAVITA #15 SMRITI CHOUDHARY - A PROSE POEM OF SORTS

Smriti says about herself- 
If I had to describe myself in one word, the word would be 'writer', because there's no other part to my soul. I have grown up with my pen, and shall live with it.

 5-4-3-2-1

 The sun’s soft gaze is falling on our eyes, we’re sitting on the wet grass in our backyard, holding a mug of warm coffee in our hands. 

Sun has peeked from the foggy sky for the first time since winter commenced, there are other things hiding behind a fog, and no matter how hard I try, they refuse to peek outside, but today is different, today is a sunny day, for the first time in a long time.
 He places his coffee mug on the grass, and wraps his arm around me. It feels warm, but I’m cold.

 “When I was little”, he begins talking. My mind begins to wander around. It is everywhere, but not in the summer of 99 when he fell off a tree at his grandfather’s farm house, from where he got that scar behind his left ear. I let out a soft giggle, softer than the gaze of sun that is falling on our eyes.
“The scars on my left knee and right foot, they tattooed themselves on me when I was seven. It was a stormy evening, and I was playing with my cousins, when I tripped over. My elder brother carried me all the way back home.” I begin talking to myself.

There is a flood of words echoing around in the walls of my brain, but there’s no way to get them out. The walls are too high. Why are we talking about scars? Scars that don’t hurt anymore, but they’re there, shining brighter than diamonds, announcing that once upon a time, we were all damsels in distress.
“…And that is how this little baby on my elbow came into existence.” He finishes off his sentence. I still don’t know how or when did he get that tiny mark shaped like Harry Potter’s scar on his elbow. All I know is it is there, and it does not hurt anymore, but it is there. I begin looking for five things I can see, the sky, our house, birds, a door, him. A door, but there are no doors inside me, no windows, no peek holes, just a long and high stretch of wall, beyond which lies a world unexplored. He is looking for a door too, a door to my soul, but I have kept him waiting outside. I immediately begin looking for four things I can touch. Coffee mugs, grass, our shoes, him. I can touch him, but why am I so far away. How? I close my eyes and trace my fingers over his face, his forehead, his nose, his lips, him. “Bring me closer, please.” I scream, but not loud enough for him to hear. I realize I need to continue, and I begin looking for three things I can hear. A building under construction in the neighbourhood, a car honk, him. He is still talking about scars. Why can’t he stop? My scars are refusing to leave me, and no, they’re not harmless. They shout and scream into my ears, that once upon a time, I was hurt, and I can be hurt again. They ask me to run as fast as I can, into a huge black hole, to never return again, but he is guarding my walls, and I know I am safe, but these scars push me deep into anticipation of a deadly future.
Quick, two things I can smell. The coffee, and him. They smell vaguely similar, two things I am very fond of. Why is the smell drifting away? I push myself closer to him, to trap that scent with me forever. But beyond my walls, no flower lives on to see the sunshine of the day. I see the vapours rising from the coffee mugs, and disappearing into nothingness. I need to stop them, I need them, I need him. One thing I can taste, him. He leans in for a kiss. For the first time in a while, I am feeling like I’ve reached home. But when he pulls his lips away, I find myself lost again, in the labyrinth that I’ve built, the labyrinth that he’s trying to find a way in, the labyrinth that has made him seem far away, even when he’s beside me, holding my hand, promising to never let go.


My father taught me this trick. Grounding, when the thoughts kick in. Think of five things you can see, four things you can touch, three things you can hear, two things you can smell, one thing you can taste, it connects you with the environment, the connect which you otherwise seem to be losing. It connects me with him, the connect which I otherwise seem to be losing.

16/10/2017

युवा कविता #14 एकांश गुप्ता

मैं एकांश गुप्ता, कहने को तो इंजीनियरिंग कर रहा हूं NIT JAMSHEDPUR से, लेकिन अक्सर हिंदी साहित्य की किताबें पढ़ते हुए पाया जाता हूं।

 मैं क्यों लिखता हूं? इस प्रश्न का कोई मनभावन जवाब ना तो मुझे अब तक मिल पाया है ना उम्मीद है कभी मिल पाएगा । बस अक्सर ऐसा लगता है कोई टीस है मन में जो अक्सर मजबूर करती है अपनी बात कहने को क्योंकि शायद जिस माहौल में हूं, वहां अक्सर अपने मन की बातें कह नहीं पाता। शायद इसलिए ही लिख देता हूं।

सिगरेट

मेरे साथ खड़े दोस्त अक्सर, जब सिगरेट जला लेते हैं। मैं भी अक्सर तुम्हारी, यादों के छल्ले उडाने लगता हूं। इस उम्मीद में किसी रोज, तुम मेरे अंदर से खत्म हो जाओगी। जैसे वह सिगरेट हो जाती है, उंगलियों के बीच में फस कर। मगर यह भूल जाता हूं, उडाने के लिए छल्ले हवा में, कश को अंदर लेना पड़ता है। शायद इसलिए तुम से, जितना दूर जाना चाहा है। अक्सर उतना दिल तुम्हारी, यादों को मन में भर लेता है।। मानो तुम कोई सिगरेट हो, जिंदगी की, जिसे हर शाम, में यादों के लाइटर से, जला लेता हूं।। 


जख्म


कुछ चोटे होती है ना, जो बरहा कुछ नहीं होती। बस छलक उठता है लहू या आंसू। यूं ही कहीं टकराने से, लेकिन हम लोग अपनी आदत से मजबूर। उन्हें, कुरेद कुरेद कर। अक्सर एक करहाता घाव बना देते हैं।। और तड़पते रहते हैं दर्द में, जब तक कोई किसी नश्तर के सहारे से, उसका मुकम्मल इलाज नहीं कर देता।। भर जाता है वह घाव, वक्त की धूप के साए में और, रह जाता है बस एक निशान, अनंत काल तक।। यह बताने को कि, हर चोट को जख्म नहीं बनाया जाता।। अच्छा सुनो, कुछ रिश्ते भी तो ऐसे ही होते हैं ना ?


इश्क हुआ था

 एक शाम में, जब सावन बरस कर जा चुका था। वह तीज का त्योहार भी, अपने नए रंगों से या कुछ मनोभाव से, प्रकृति को सवार कर जा चुका था।। उस रोज तुम थोड़ी देर से आई थी, गुस्सा नहीं था मैं। पर न जाने क्यों तुमने अपना, सुर्ख लाल मेहंदी लगा हाथ आगे कर दिया था ? जिसमें एक दुनिया बसी थी, एकटक देखता रहा था मैं, फिर पता चला कि उस दुनिया के किसी कोने में, मेरे नाम का पहला अक्षर छुपा हुआ था।। उस मेहंदी से, तुमसे, उस पल, उस शाम में फिर से इश्क हुआ था।। फिर एक रोज जब जनवरी की सर्दी जाने को थी तब तुम्हारे नाम से एक कोरियर मिला था उसे देख कर पसीने से भीग गया था जैसे न जाने कौन सी भला आने को थी इतने अरसे बाद यह अचानक क्या और क्यों.? उसमें कार्ड रखा था, "मुझे पता है तुम यह नहीं रखोगे, लेकिन हैंड मेड हार्ड तुम्हें पसंद है इसलिए।" यह एक छोटे से कोने में लिखा हुआ था। उस कार्ड से, तुमसे उस पल, उस शाम में फिरसे इश्क हुआ था।।

फिर कल रात, जब मैं ऐसे ही हर बात लिखना चाहता था। तुम्हारी याद नहीं थी फिजा में कहीं भी, लेकिन दूर कही तूफान में, कुछ लम्हे गिर रहे थे। मैं हर उस ख्याल को खुद से बहुत दूर जमा देना चाहता था। लेकिन रह-रहकर पिघलता रहा था कुछ, मेरे भीतर। शायद वह नफरत थी, जो मैं एक अरसे से तुम से निभा नहीं पाया हूं। या वह मोहब्बत थी, तुमने निभाने का वादा कभी किया ही नहीं था। रात बीत रही थी मेरी आंखों के सामने से, संग उसके बीत रहे थे लम्हे जैसे कल ही सब हुआ था। उन लम्हों से, तुमसे, कल शायद आखिरी दफा इश्क हुआ था।

15/10/2017

युवा कविता #13 आफिज़ा तरन्नुम

आफिज़ा कहती हैं :- 
लिखना सुकून देता है ठीक वैसे ही जैसे की कुछ अच्छा पढ़ना...जब आप चीज़ों को महसूस करते हैं तो दिल करता है उस एहसास, उस पल, उस भावना और उस प्रेम को सहेज कर रख लें हमेशा के लिए... और इसके लिए लिखने से अच्छा और क्या हो सकता है..क्यूँकि कहा हुआ भुलाया जा सकता है पर लिखा हुआ मिटाया नहीं जा सकता



लिखो, 

कि अभी बहुत कुछ लिखा जाना बाकी है लिखो,
कि बहुतों का पढ़ा जाना बाकी है ये न सोचो कि 
लिखने से क्या हासिल होगा ये सोचो कि जो न लिखा तो फिर बहुतों का क्या होगा? तुम्हारे लफ्ज़ देते हैं आवाज़ उन छुपे हुए हौसलों को, दबी हुई चीख को.. लिखो, कि जो न लिखा तो खुद से कैसे नज़रें मिला पाओगे ?

 कलम जो उठे तो किसी का तुम पर यकीन बने

 किसी मासूम के खून के धब्बों को छिपाने के लिए मत लिखो किसी की चीख दबाने के लिए मत लिखो लिखो, जो न लिखा तो बहुत देर हो जाएगी अभी तो है उजियाला समझ का...जो न लिखा तो अंधेर हो जाएगी जो न लिखा तो कैसे भेड़ चाल से अलग कहलाओगे ? जो न लिखा तो मुमकिन है कि जीते जी अपनी अंतरात्मा को मार खाओगे 

लिखो की अभी बहुत ट्रोलिंग भी बाकी है बहुत स्क्रोलिंग भी बाकी है

 क्या हुआ जो है मालूम कि गर लिखा तो क़त्ल कर दिए जाओगे लिखो कि लिखने वालो के दिलो से ये खौफ मिटाना जरूरी है लिखो कि अभी बहुत कुछ लिखा जाना बाकी है...

 PS: हम लड़ेंगे साथी उदास मौसम के लिए! 
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हूँ कौन मैं...

 
खुली हुई किताब हूँ,
या धुंधली सर्द रात हूँ...

लहजे से कोई ना पकड़ सका
इज़्तेराब मेरे हालात का,
मुसलसल गिरती हुई
मैं कोई आबशार हूँ...
 

मुख्तलिफ ख़यालात हैं
ज़माने की भीड़ से,
कौन मासूम, कौन अय्यार
हूँ इसी आज कशमकश में मैं...
समझ सकूँ मैं ये जो फन
मैं उस मौत्ज्ज़े की तलाश हूँ...

हूँ कौन मैं...

मुख़्तसर ये ज़िन्दगी
है मुझको लम्बी लगने लगी,
दिन गुज़रते जा रहे
मंजिल मगर मिलती नहीं,
लड़खड़ाने लगे हैं अब क़दम
मैं कोई खौफ्ज़ेदाह सी राह हूँ...

मुतास्सिर हूँ हर्फों से मैं
है मिलता सुकून वस्ल-ए-कलम से,
दो लफ्ज़ कागज़ पर उतार
मैं सहर के इंतज़ार हूँ..

खुद में हूँ गुमशुदा
या भीड़ में,
वाकिफ़ हूँ हक़ीक़त से फिर भी
मुन्तज़िर कोई ख़्वाब हूँ...

हूँ कौन मैं...

PS: बड़ी Aristocracy है ज़बान में
फ़कीरी में भी नवाबी का मज़ा देती है उर्दू

युवा कविता #12 विशेष चन्द्र नमन

विशेष फ़िलहाल दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ते हैं और वहाँ साहित्य के लिए कई तरह के काम करते हैं. उनका परिचय और उनके लेखन के बारे में उनके शब्दों में - 

मैं क्यों लिखता हूँ ? इस सवाल का कोई ख़ास व सटीक उत्तर मेरे पास नहीं है, हो भी नहीं सकता. सोचता हूँ, और बचपन से लेकर अबतक के जीवन से समझने की चेष्टा करता हूँ तो यह जान पड़ता है की मेरे लिखने का सबसे पहला कारण यह रहा होगा कि मैं लोगों के बीच आसानी से खुल नहीं पाता, बोल नहीं पाता और इसी का After effect कह लें जो मेरे लिखने की शुरुआत करता है. पढने का खूब शौक रहा है. बचपन से ही साहित्य, कला- विज्ञान में खूब रूचि थी जो बढ़ती ही गयी.पहली कविता छठी कक्षा में धोनी पर लिखी थी. मैं झारखण्ड के एक छोटे से कस्बे धनवार का था और 10वीं तक वहीँ रहा. दसवीं बाद धनबाद में दो साल पढाई हुई, और वहीं मेरी कविता का असली खेत बना. पिछले दो वर्ष से दिल्ली विवि में गणित पढ़ रहा हूँ. दिल्ली को देखता हूँ. दिल्ली आकर बहुत ज्यादा पढना-सीखना-मिलना-जुलना-घुलना-लिखना हो पाया.ढेर सारे अंतर्द्वंद हैं , दुःख- सुख को समझने की कभी- कभार की चेष्टा है , कुछ संदेह - कुछ आवाज़ जिन्हें छूना चाहता हूँ , और बस लिखता हूँ.


 सपने -------- एक पेड़ हुआ, पत्ते सूखे, बिखर गए एक नदी बही जिस्मों के अवशेष धुले मंदिर का एक द्वार खुला कुछ फूल चढ़े, कुछ दूध बहे एक सादा कागज़ ज़र्द हुआ कुछ शब्द सुनहरे बदल गए एक पतला लड़का तार हुआ सपने जीवन से बड़े हुए फिर धरती घूमी, दिन बीता तार टूटकर कहीं गिरा अगले जीवन की आशा में कुछ सपने फिर से धरे रहे ।। 


 किसी दिन ---------------- जिन कविताओं को सोंचकर छोड़ दिया कभी किसी काँपती पुतलियों पर कभी किसी सफर की थकान में कभी किसी अधपकी रोटी में उन्हें फिर जब देखूँगा, लौटूँगा, पाऊंगा एक कोना, अपने स्मृति की कक्षा में. मैं, फिर सोच रहा हूँ: रात है चाँद मेघ में क़ैद है, मैं तेरी स्मृतियों के गृह में जिसकी दीवार पर किसी बेचैन दीये की लौ से खींची कालिख की काजल लगा मैं अपने चक्षुओं में जल भरता हूँ रात के तीसरे पहर जब दायीं करवट लेता हूँ, 
मेरा दायाँ कंधा तेरे भार से सुन्न पड़ जाता है एक प्रतीक्षा रहती है मुझमें,
असहनीय है, रुके हुए रक्त की छटपटाहट है तुम, दीवार के उस तरफ की दीवार पर हरा लिखती हो इस तरफ पीला उग आता है झर जाऊंगा किसी पल मैं भी पीला होकर उन्ही काँपती पुतलियों पर, उन्ही सफर की थकान में, उन्हीं अधपकी रोटियों पर उन्हीं कविताओं को सोंचकर.



 प्रेम- बगीचा ------------------ रात के स्वप्न में जितने नीर बहे, वे सभी फैल जाएंगे हमारे प्रेम बगीचे में ओस की तरह. तुम जब, पूजा के फूल लेने प्रवेश करोगी बगीचे में, तेरे तलवों को ये नमकीन ओस चूमेंगे, चुभेंगे, और भर देंगे एक सिहरन तेरे रोम- रोम में. अभी सूरज नहीं निकला है, मैं अभी भी स्वप्न में हूँ, वेदनाएं अब भी निकल रही हैं, निर्झर. कुछ अंतिम ओस अब भी गिरने हैं आकाश से, जो इंतज़ार में हैं गुलाब के कलियों के खिलने की, जो ले आते हैं तेरे होठों पर तबस्सुम, सुबह हो गयी है, कुछ ओस, जो तेरे स्पर्श से दूर रहे, उन्हें समेट ले जाएगा सूरज फिर से वापस बिखेरने के लिए, सूरज, मेरा मित्र कल फिर खिलाना चाहता है ग़ुलाबों को हमारे प्रेम बगीचे में.

11/10/2017

युवा कविता #11 सागर


 सागर इतिहास से स्नातक की पढाई कर रहे हैं. कहते हैं - हालात को देखते हुए लिखने का प्रयास करता हूँ । चाहे वो प्रेम हो या समाज । संक्षिप्त में कहूँ तो मेरा आशय विरोध रहा है , बदलाव रहा है । समाज से लेकर प्रेम तक । अपने गाँव और प्रेम के लिए ज्यादा लिखना चाहता हूँ ।


एक. 
 
तुम एक चैनस्मोकर हो और , मैं हूँ , तेरे लिये " एक सिगरेट " । उसका आखिरी हिस्सा "फिल्टर" मेरा प्रेम है । एक तरफ तुम लगाती हो लाइटर , सुलगा देती हो मुझमें "हल्की-सी-चिंगारी" । हवा में छोड़ती रहती हो फुँकें , उड़ाती हो मुझे , धुँआ बनाकर आसमानों में , और हरेक धुएँ के साथ , खत्म होता जाता हूँ मैं । कुछ ही क्षणों बाद जब मुझमें लगी , हल्की चिंगारी पहुँच जाती है , फिल्टर के पास और तेरे होठों के नीचें । फ़िर ,तुम फेंक देती हो मेरे बचे हिस्से को , और अपने प्यारे पैरों से मसल कर अंत कर देती हो , मेरा और मेरे "प्रेम के फिल्टर" का जिसे होठों से दबाए चूमती रहती हो तुम , एक "चैनस्मोकर" बनकर । 


 दो. खत्म हो इंतज़ार , आ जाये प्रलय ----------------------- कभी ऐसा हो कि आसमान को नींद आ जाये , एक-एक को लेकर धरती बेहोश हो जाये और पूरा मोहल्ला सुनसान हो जाये । हरेक कोने से , शांत सी डरावनी आवाज़ , सुर मिलाकर गाती रहे । वहाँ मैं अकेला , भटकता रहूँ , हर तरफ़ जैसे किसी को ढूंढने को ही जिन्दा बचा हूँ । टकराता रहूँ , दीवालों , मकानों और हरचीज़ से किसी से टकराने की आस में और हर एक चोट भुलाता रहूँ । फिर टकरा जाऊं उससे , जिसके लिये , "ये प्रलय" मिलन का एक मौसम बन आया हो , वो तुम रहो जो जाग रही हो , भटक रही हो ,किसी की आस में बिल्कुल मेरी तरह । मिलते ही , जल जाये वो चाँद भी ओढ़ ले वो बादलों का चादर , छा जाये , अँधेरा जिसमें , बस मैं दिखूँ और तुम दिखो । हर ओर , डरावनी आवाज़ की जगह , मेरा इंतज़ार , मेरा प्रेम गुनगुनाने लगे , जिसे सिर्फ तुम सुन सको । हम भूल जाएं सबकुछ , और प्रलय होता रहे हमारे चारों ओर , धरती के साथ हर एक जीव बेहोश रहे , सूरज फिर उगे नहीं और चाँद छुपा ही रहे , बस मैं रहूँ , तुम रहो और सर्वस्व रहे हमारा । 

नींद के नशे से ज्यादे ख़तरनाक हो "तुम" ----------------------------- अंगड़ाई लेती रातें , सोई हुई , भागी हुई नींदों को , आज दिनों बाद जगा रही है । नींद ,उस नशे की तरह बन आई है जिसे आज , मैंने पहली दफ़ा किया हो, मग़र अंधाधुंध लिया  हो और अब वो बड़ी तेज़ी से , मुझपर , चढ़ कर अपना करतब दिखा , मुझे बेहोश कर देना चाहती हो । ये नशा इतना हावी हुआ है ,मुझपर कि ये मुझे उठकर बैठने और पलकों को उठाकर , हिम्मत से डँटकर रहने की , इजाज़त भी नहीं दे रहा । मेरा हाथ किसी भी तरह बत्ती बुताने के प्रयास में जुटा है , घड़ी की हल्की-धीमी आवाज़ कानों में जोड़दार और डरावनी आवाज़ बनकर घुसती चली जा रही है । स्ट्रीट लाइट्स की रौशनी भी , बहुत कम और धूँधली-धूँधली दिख रही है । मेरी आँखें लाल टूस बनकर , काट रही है बूँदों को छलका रही है ,और मेरा मुँह काला , स्याह-सा बन गया है । मग़र मैं हूँ कि सोना नहीं चाह रहा, किसी वजह से , इससे और देर तक लड़ना चाह रहा हूँ । वो वजह इन रातों में , बस तुम ही बन सकती हो और तुम ही हो , क्यूँकि तेरी आवाज़ की हल्की भनक , मेरे कानों तक अब तक पहुँच रही है , तेरा मन भी अबतक खुलकर मुझे ही एकटक देख रहा है , और मेरी , तुम्हेँ देखने की आशाओं को सोने नहीं दे रहा । मैं इस नशें से , नींद से , मौत से आज तबतक लड़ूँगा , जबतक कि तुम्हारी आवाज़ , मेरी कानों को और खुला दरवाजा , मेरी आँखों को छोड़कर , अचानक से बंद न हो जाये । नींद और तुम वजह बनकर मुझे मार जाओगी , मैं एक लाश की तरह गिर पड़ूँगा और आज सपनों पर प्रतिबंध लगाकर , सो जाऊँगा ।
 

07/10/2017

ओ धरती! तुमसे मुँह मोड़कर मैं मरना नहीं चाहता - अस्मुरारी नंदन मिश्र

अस्मुरारी पटना के हम पाठकों के लिए नए हैं. उनको कुछ दिन पहले ही जल्दी जल्दी दो तीन बार सुनने का मौका मिला. उनकी कवितायेँ ईर्ष्या भी पैदा करती हैं और प्रभावित भी करती हैं, कवि अपनी ज़मीन पर इतने मज़बूत और इतने मंझे हुए कि प्रतिरोध अपने इंडिविजुअल शिल्प के साथ कविताओं में मैनिफेस्ट होता है.
हम उनकी कुछ कविताओं को भी इस साक्षात्कार के साथ लगा रहे हैं. उनका एक संग्रह "चांदमारी समय में" बोधि प्रकाशन से प्रकाशित से.
- अंचित


  १. कविता क्या है आपके हिसाब से? क्यों लिखनी शुरू की?


          ‘कविता क्या है?’ अपने आप में बहुत बड़ा सवाल है| और उसकी कोई सर्वमान्य परिभाषा हो भी नहीं सकती| लेकिन मेरे लिए वह जगत के उद्दीपन के प्रति शाब्दिक अनुक्रिया है| जरूरी नहीं कि यह अनुक्रिया उद्दीपन के साथ लगी ही आए| लेकिन है वह यही|
मुझे हमेशा लगता रहा है कि सृजनशीलता मनुष्य की सामान्य विशेषता है| वैसा कोई व्यक्ति नहीं, जो सृजनशील न रहा हो| लेकिन अभिव्यक्ति के रूप में अंतर आ जाता है| कोई किसी कलारूप को अपनाता है, तो कोई किसी विधा का हो जाता है| कलारूपों और विधाओं के चुनाव में कहीं-न-कहीं हमारे बचपन की परिस्थितियाँ और व्यक्तित्वों का बहुत बड़ा योगदान होता है| हम किसी के प्रभाव में, प्रतिक्रिया में, प्रतिच्छाया-रूप में और कभी-कभी तो पूरी तरह विरोध में आकर किसी ओर झुक जाते हैं|
तो मैंने क्यों लिखना शुरू किया इसका जवाब मेरे पास यही है कि अपनी सृजनशीलता को अभिव्यक्त करने के लिए| इसमें कुछ इगो की बात भी होती है कि देखो, मैं कुछ विशिष्ट कर रहा हूँ| मैंने जो पहला प्रयास किया था, वह सातवीं कक्षा में पढ़ते हुए पाठ के बाद ‘कुछ करने के लिए’ के अंतर्गत कविता लेखन के अंतर्गत तुकबंदी रची| मुझे दुःख है कि तब मेरे हिन्दी शिक्षक ने मेरा उत्साहवर्धन नहीं किया और जब मैं उस तुकबंदी को लेकर मंच तक जाना चाहता था, तो हँसी उड़ाते हुए उन्होंने मुझे दिनकर की कविता थमा दी| वह बारह साल का बच्चा आज भी दिनकर से होड़ लेना चाहता है| खैर|

२. पठन का रचना में क्या योगदान है, आपको क्या लगता है?

२.       पठन का रचना में बहुत योगदान है| रचने में भी और बाद में उसकी अपनी पहली आलोचना में भी| पठन हमारे ज्ञान और विवेक को बढाता है, लेखन के लिए यह बेहद जरुरी है| कविता के सन्दर्भ में आप कविताओं को पढ़कर अनेक लय को पकड़ना सीखते हैं और भाषा की कई विशिष्टताओं से अवगत होते हैं| साथ ही यह भी जानना जरुरी होता है कि अन्य लोग कैसे लिखते रहे और लिख रहे हैं? आप बहुत अच्छा लिखते हों, लेकिन यदि ‘राम की शक्तिपूजा’ का ही पुनर्लेखन कर रहे हों, तब वह ठहरा हुआ लेखन ही कहलायेगा|
यह तो स्पष्ट है कि अन्य जीवंत अनुभव ही साहित्य रचते हैं, लेकिन पठन की अपनी बड़ी महत्ता है|


३. पहली पढ़ी हुई कविता कौन सी याद आती है? प्रिय कविता कौन सी है ? प्रिय कवि कौन हैं?

३.       पहली पढी हुई कविता याद करूँ तो किसी कक्षा में पढ़ी कविता याद आती है-किसान| “नहीं हुआ है अभी सवेरा पूरब की लाली पहचान/ चिड़ियों के जगने से पहले खाट छोड़ उठ गया किसान|.....”
मुझे उस समय अपनी पाठ्य-पुस्तक, दीदी की पुस्तक और चच्चा-पिताजी की पुस्तक से पढी गयी कई कविताएँ याद हैं|
प्रिय कविता में किसी एक कविता का नाम लेना कठिन है| अनेक तरह की कविताएँ याद आ रही हैं, किन्तु उनमें से एक को ही चुनना हो तब ‘राम की शक्तिपूजा’ को कहूँगा|
कवि के सन्दर्भ में भी यही बात है, लेकिन यहाँ निराला को बताने में किसी तरह का ऊहापोह नहीं है|
४.    




           ४. कविता का रोल क्या है - समाज के सन्दर्भ में, या अन्य कोई सन्दर्भ आपके हिसाब से? क्या उसकी प्रासंगिकता जिंदा है अभी भी?

 देखिए प्रासंगिकता तो है ही और बनी भी रहेगी| उसे नकारा नहीं जा सकता लेकिन यह सवाल मेरे लिए बहुत कठिन सवाल है| कभी लगता है कि कविता की भूमिका निःसंदेह रूप से महत्त्वपूर्ण है- समाज के लिए भी और व्यक्ति के लिए भी| कभी लगता है कि ऐसा कहकर मानो मैं खुद को ही एक संतोष में रखना चाहता हूँ, खुद को दिलासा दिलाने की तरह| जमीन पर मैं समाज को घोर कविता-विरोधी देखता हूँ| मैं अपनी कविताओं के साथ कई मुद्दों पर बस तूती की आवाज बना रह जाता हूँ, और समाज का नक्कारखाना किसी अन्य आवाज से गूंजता और संचालित होता चला जाता है| लेकिन फिर कभी नए बच्चों के साथ बात करते हुए कविताओं के साथ जाता हूँ तो पाता हूँ कि उनसे संवाद करने में ज्यादा सफल हो रहा हूँ|
तो यह मेरे लिए उलझन से भरी स्थिति है| और इस स्थिति को एक कवि का अपनी ही कविता के प्रति उम्मीद और अविश्वास के संयुक्त भाव के रूप में दर्ज किया जाए|

५. क्या पढना है इसका चयन करने का आपका क्या तरीका है?

 कोई तरीका नहीं है और यह मेरे लिए बहुत अफसोस की बात नहीं है| कभी-कभी अफसोस जैसा लगता भी जरूर है, लेकिन उसे स्थायी नहीं कहा जा सकता|
दरअसल जब मैं बीए कर रहा था, तो हमारे एक शिक्षक ने मानो एक मन्त्र ही दिया कि ‘हर सप्ताह एक किताब तो जरुर पढ़ जाओ|’ जब मैंने यह कहा कि ‘कई किताबें समझ के ऊपर से निकल जाती हैं’, तो उनका कहना था कि ‘उस अवस्था में उसे पढ़ने भर के लिए पढ़ जाओ| क्या पता उसका कोई अंश ही समझ में आ जाए और अपना-सा लगने लगे|’ तब से वैसे ही पढ़ता जा रहा हूँ|
मैं किसी से कोई किताब लेकर यदि लौटाने में देर करूँ तो यही समझा जाना चाहिए कि पढ़ने में किसी तरह की अड़चन आ रही है, लेकिन पूरा पढ़े बिना रहना नही चाह रहा हूँ|

६. लिखते हुए शिल्प कितना महत्वपूर्ण होता है?

 पहले नहीं, लेकिन अब लिखते हुए शिल्प पर भी सोचता जाता हूँ| एकदम से साथ-साथ तो नहीं, लेकिन लिख-लिख कर उसे पुनः देखने के क्रम में| कभी-कभी दो-दो शिल्प में एक ही चीज रच डालता हूँ, फिर देखना पड़ता है|
यहाँ यह बताना जरूरी समझता हूँ कि मैंने अभी तक न ही किसी विशिष्ट शिल्प को अपनाया है और न ही रचा है, जिससे पहचाना जाऊँ| तो यह शिल्प-चर्चा सामान्य रचना-प्रक्रिया के अंतर्गत ही मानी जाए|
७. कविता से चरम महत्वाकांक्षा क्या है - प्रसिद्धि , पैसा, अमरता - कवि आखिर में क्या चाहता है?

 महत्त्वाकांक्षा!पहले कवि बनना चाहता था और खूब कविताएँ लिखता चला जाता था| अब कविता लिखना चाहता हूँ तो लिख नहीं पाता; दिनों-महीनों अटका पड़ा रहता हूँ|
महत्त्वाकांक्षा इससे स्पष्ट हुई? शायद प्रसिद्धि... शायद अमरता...बचपन से इतने कम में गुजारा किया कि पैसा मेरे लिए ज्यादा महत्त्वपूर्ण नहीं रहा| बस खाने-पहनने की चिंता से दूर रहने भर आ जाए|
८. नए लिखने वालों के लिए क्या सलाह देंगे?

 क्या मैं इस लायक हो गया कि सलाह दे सकूं?
लेखन के लिए ज्यादा सलाह मत लीजिए| लिखते जाइए| वैसे भी मैं सलाह देने की स्थिति में खुद को नहीं पाता| न पुराना हूँ और न ही कोई बड़ा नाम या प्रतिभा| किसी रचना पर टिप्पणी कर सकता हूँ, उसमें सलाह भी हो सकती है; लेकिन कुल लेखन के लिए कोई सलाह नहीं दे सकता|

९. इधर क्या पढ़ रहे हैं और कौन सी किताबें आपको लगता है कि हर किसी को पढनी चाहिए?    


  कविताएँ लगातार पढ़ता रहता हूँ| दुहरा-दुहराकर| गद्य में अब उपन्यास-कहानी से अधिक विचार-साहित्य और आत्मकथा पढ़ना ज्यादा अच्छा लगने लगा है| इधर मुक्तिबोध की कविताएँ पुनः-पुनः पढ़ रहा हूँ, साथ में कुँवर नारायण भी हैं| सामने राहुल सांकृत्यायन हैं| लोहिया की किताबें खरीद कर लाया हूँ, और अम्बेडकर साहित्य डाउनलोड किया है| हां, माओ भी मिल गए हैं| साथ में नयी-पुरानी कविताएँ चलती रहेंगी| आपने अभी के बारे में सवाल किया, मैं आगामी योजना के विषय में भी बता चुका|
मैं समझता हूँ कि हिंदी के पाठक को प्रेमचंद,निराला(कविताएँ), राहुल सांकृत्यायन, रामविलास शर्मा और मुक्तिबोध को बार-बार पढ़ना चाहिए|
किताबों की सूची तो लंबी है- राग-विराग(रामविलास शर्मा द्वारा संपादित निराला की कविताएँ), मैक्सिम गोर्की की आत्मकथा के तीनों खंड, गोदान, गबन और रंगभूमि, रागदरबारी, साये में धुप, अंधा युग, तमस आदि|


                  अस्मुरारी की कुछ कवितायेँ 



चांदमारी
(1)     
..............

उस अनाम अनचीन्हे
पुतले पर
गोली चलाते-चलाते जवान
चीन्हना ही भूल गया है
वह नहीं देखता पुतला या और कुछ
वह चीन्हता है केवल एक शब्द 'शूट'
और चलाता चला जाता है गोली
दनादन
सामने फिर बुद्ध या गाँधी ही क्यों न हों


चांदमारी 
  (2)
.............

भारत
पाकिस्तान
या दूर देश अमेरिका-इंगलैंड
हर जगह होते हैं
एक ही पुतले
जिस पर निशाना साध कर सीखते हैं
अलग-अलग देशों के अलग-अलग जवान
अपने कौशल

गोली खानेवाला पुतला एक ही होता है
हर जगह




गूँगा
......
1.
बेल्ट की सटसट
कहीं तेज थी
उसकी कई मिली जुली आवाजों से
गुंगिआया
सिसका
और चुप हो लिया
उसके गूँगे पन को पूरी सार्थकता देता
पसरा था
बस्ती का शालीन बहरापन..

2
उसके पास आवाज है
व्याकरण नहीं है
अर्थ है समूल
बरतने का आचरण नहीं है 
हर जगह जीता अपनी ही भाषा में
तानाशाह समय में
यही तो मरण है..


3.
समझ की पहुँच से
काफी दूरी है 
उसकी हर भंगिमा मानो आधी अधूरी है
फिर भी सहला रहे जो
बेमेल इशारों को
उनके लिए वह फकत सस्ती मजूरी है


4
खुद से ही तड़ीपार कोई देस है
आज अदालत में पेश है
भाषा तो है
पर आशा नहीं
इसलिए चुप है
अंधेरा घुप्प है...






मरना नहीं चाहता
-----------------------

तुम्हारे पास फूल है, तितली है, चिड़िया है
तुम्हारे पास बीज है, अंकुर है, फसलें हैं
हवा-पानी, साँस-प्यास सब है तुम्हारे पास
तुम्हारे पास स्वाद है, तृप्ति है
रंग, प्रकाश और आँखें
पूरा का पूरा जीवन है तुम्हारे पास
ओ धरती! तुमसे मुँह मोड़कर मैं मरना नहीं चाहता

तुम्हारे पास काँटों के जाल हैं
खर-पतवार है, वीरान मरुथल है
कीचड़ है, दलदल है, धुआँ है
जीभ जला देने वाले अम्ल हैं
बारुद और चिनगारी दोनों है तुम्हारे पास एक साथ
पल भर में तुझे ही खत्म कर देने वाले आग्नेयास्त्र हैं
ओ दुनिया! तुझे इस हालत में छोड़कर
मैं मरना नहीं चाहता...



लड़कियाँ प्यार कर रही हैं
…………………………………......


खिडकियों में लगाई जा रही हैं
मजबूत जालियाँ
परदे को किया जा रहा है
चाक-चौबंद
दरवाजे को दी जा रही है सीख
किस दबाव से खुलना है किससे नहीं
गढ़ी जा रही हैं घर की परिभाषाएँ
बतलाया जा रहा है दहलीज का अर्थ
ढोल पर गायी जा रही हैं तहजीबें
बड़े-बड़े धर्मज्ञानी लेकर बैठ चुके हैं धर्म की किताबें
पंडित - मुल्ला सभी हो गए हैं एक मत
सख्त की जा रही है फतवों की भाषा
कवि गा रहे हैं लाज लिपटे सौन्दर्य के गीत

शान चढ़  तेज हो रही हैं
नजरों की तलवारें
पूरी भीड़ धावा बोल चुकी है बसंत, बादल, स्वप्न पर
पार्कों में पहरे दे रहे हैं मुस्तैद जवान
गुलाब की खुशबू घोषित हो चुकी है जहरीली
चौराहों पर जमा हो रहे हैं ईंट-पत्थर
शीशियों में भरी जा चुकी हैं उबलती तेजाब

चमकाई जा रही है पिताओं की पगड़ी
रंगी जा रही है भाइयों की मूछें
जिम्मेदारों की एक पूरी मंडली
कर रही है संजीदा बहसें
खचाखच भरी खाप पंचायत में
सुनाई जा रही है
सभ्यता के सबसे जघन्य अपराध की सजा

और इनसब के बावजूद
लड़कियाँ प्यार कर रही हैं...