where it all began

Hearth, in its earlier days, came out in form of a newsletter. while the magazine was a tedious, more strenuous affair and was periodical, Hearth never depended itself on time and was published whenever an incessant need to do so was felt- be it some political or literary incident or the opening of a new joint in the city -
as a famous philosopher once said, we are not prisoned by time but by clocks, we must accept our ruins and our downfalls. true poetry and literature will come out of those.


19/08/2017

पढ़ते हुए : वोल्गा से गंगा - सुधाकर रवि

 
 
 
 
करीब दो महीने पहले की बात है,  मन बना कि शरतचंद्र का उपन्यास चरित्रहीन पढ़ लिया जाये, किताब जुगाड़ में अपने शहर के छात्र संगठन डी.एस.ओ की लाइब्रेरी में गया, वहां किताब इधर-उधर देखने के बाद चरित्रहीन नहीं मिला, उसकी जगह दिख गयी वोल्गा से गंगा. लगा कि यह किताब अब तक पढ़ ली जानी चाहिए थी, अब तक नहीं पढ़ पाने का मलाल था सो उसी अफ़सोस में वोल्गा से गंगा ले आया. 


पढ़ने से पहले अब तक लग रहाथा कि वोल्गा से गंगा दूसरे उपन्यास की ही तरह होगा , लेकिन यह 20 अलग अलग कहानियों की किताब है, जो प्राय एक दूसरे से सम्बंधित नहीं है और हर कहानी बड़े समय अंतराल से भी विभाजित हैं. आदिम साम्यवाद से शुरू हो दास युग , सामंत युग , मुग़ल काल , ब्रिटिश काल से होकर समाजवादी रूस तक की कहानी इसमें संकलित हैं. जो नए कथ्य और तथ्य , दोनों को खोलती हैं.या यूं कहें की यह किताब अँधेरे और प्रकाश के बीच खिचे दीवार में खिड़कियों की तरहहै , और इस दीवार में कहानी रुपी बीस खिड़कियाँ हैं. एक खिड़की रूस के जंगलों में खुलती है, तो एक खिड़की हिल्सा (पटना ) के एक गाँव में , एक खिड़की से बाणभट दिखाई देते हैं दुसरे खिड़की से कार्ल मार्क्स, एक खिड़की से मुग़ल दरबार दिखता है तो , एक खिड़कीसे तक्षशिला का प्रांगण. और जब एक-एक कर सारी खिड़कियाँ खुल जाती हैं तो अँधेरे और प्रकाश के बीच खड़ी दीवार टूट जाती है, और पाठक के सामने होता है नए ज्ञान का प्रकाश पुंज.


       वही कोई फ़िल्मकार इस किताब को पढ़े तो येकहानियां उसे बीस शार्ट फिल्मों जैसी लगेगी, जो खुद में भी मुक्कमल है और जो हर बार एक नई दुनियां एक्स्प्लोर करती जाती हैं. वहीँ अगर बीसों को एक साथ जोड़ दे तो सतत और व्यापक फिल्म बन जाये.
                ये बीस कहानियाँ 6000 ईसा पूर्व से शुरू होकर सेकंड वर्ल्ड वॉर तक की हैं। रूस के पहाड़ों से बहती हुई वोल्गा नदी के साथ कहानी, तजाकिस्तान , ईरान , पामीर , तक्षशिला ,काशी, मगध होते हुए बंगाल की खाड़ी में समाप्त होती है। शुरू कि चार कहानियाँ प्रागैतिहासिककाल की हैं , जिसमें जंगलों के दृश्य, बर्फ, नदी और आदिम संस्कृति को पढ़ते हुए उस वातावरण से धीरे धीरे एक सम्मोहन सा हो जाता है। दृश्यआँखों के सामने तैरने लगते हैं मानो कोई किताब न पढ़ के सिनेमा हॉल में कोई फिल्म देख रहे हो। सामाजिक दृष्टिकोण से यह चारों कहानियां महिला प्रधान समाज कि कहानी है. किताब के अंत में भदंत आनन्द कौसल्यायन लिखते भी हैं कि यह चार कहानियां एंग्लेस कि Origin of family private property and state के लिए प्रवेशिका हैं.  


किताब की हर कहानी का शीर्षक उसके खास किरदार के नाम पर है जिसके आस-पास घूमती है, जिसमे इतिहास और fiction का मेल है. इन बीस कहानी  में हर पाठक के लिए अलग अलग कहानी प्रभावशाली लगेगीं लेकिन, पढ़ते हुए मुझे दो कहानियाँ बहुत ज्यादा प्रभावशाली और नए तथ्य को कहने वाली लगी. सातवें और आठवें चैप्टर में राहुल सांकृत्यायन  ईश्वरीय अवधारणा , पुनर्जन्म और जातीय श्रेष्ठता को कल्पना जनित बताया है. ईश्वरीय अवधारणा कोराजा-पुरोहित-क्षत्रिय को बाकि के समाज पर शासन करने का जरिया बताते हैं.पुनर्जन्म और पाप-पूण्य को गुलामी और जातीय श्रेष्ठता को युगों युगों तक प्रमाणितऔर खंडित होने से बचाए रखने के लिए बनाया गया है. इन दो चैप्टर को पढ़ते हुए लगा कि भारत जैसे दकियानूस समाज में यह किताब कैसे इतने सालों से पढ़ीं जा रही है इस पर बैन कैसे नहीं लगाया गया, निश्चित ही यह राहुल सांकृत्यायन  की विद्वता और तथ्यों को प्रमाणिकता है जो अब तक पढ़ी जा रही है. 


दूसरी कहानी जो आज के समयमें सबसे ज्यादा प्रासंगिक है. प्रसंग है गौ हत्या का. अभी के समय में गौ हत्या के नाम पर कानून अपने हाथ में ले सामूहिक हत्या की खबरें आम होती जा रही है. देश में यह माहौल बनाया जा रहा है  कि गाय खाने वाले लोग या समूह दोयम दर्जे के हैं उनकीराष्ट्रीयता पर सवाल खड़े किये जा रहे हैं. वोल्गा से गंगा पढ़ते हुए लगा कि यह बखेड़ा कोई नया नहीं है. राहुल सांकृत्यायन उन प्रसंगों में लिखते हैं कि प्राचीन भारत में ब्राह्मण अतिथि के सत्कार में गोमांस पकाया जाता था और इस प्रसंग का उल्लेख महाभारत में भी है.


वोल्गा से गंगा में एकप्रसंग में पढ़ने को मिला कि बौद्धों को ब्राह्मण जबरदस्त प्रतिद्वंदी समझते थे,वह जानते थे की सरे देशों के बौद्ध गोमांस खाते हैं जिसे वह नहीं छोड़ेंगे इसलिएइन्होने भारत में धर्म के नाम पर गोमांस वर्जन – गो ब्राह्मण रक्षा का प्रचार शुरूकिया, बौद्ध जाति–वर्ण भेद उठाना चाहते थे.


बौद्ध धर्म के लोग औरब्राह्मण लोग गोमांस खाते थे लेकिन अपने खत्म होते धर्म और अपने आराम को बचाने केलिए ब्राह्मण गो हत्या को रोकने और शुद्धता का माहौल खड़ा किये, गाय से इनका कोई  मतलब नहीं.


आज के समय देखें तो यहपूरी घटना और प्रसंग इस्लाम के आने के बहुत पहले की है.  लेकिन इस्लाम से अंध विरोध के कारण इस्लाम को बाहरी और मुस्लिम को दोयम नागरिक साबित करने के लिए गो हत्या माहौल बनाया जा रहाहै. एक समूह गोमांस खाना छोड़ भी दे, एक रंग में देखने वाले इन लोगों की नफरत खत्म नहीं होने वाली, इनका विरोध उस पूरे समूह से है.

इन दो प्रसंगो के जैसी ही अन्य कहानियां भी नए तथ्य को सामने रखती हैं , जिससे पन्ना दर पन्ना कुछ नया सीखता गया और शायद ही कोई पाठक होगा जिसे यह किताब प्रभावित न करेगी. निश्चित ही मेरे जैसे नए पाठकों के लिए राहुल सांकृत्यायन का  आगे के जीवन पर गहरा प्रभाव रहेगा.

                                  *****

बुद्धि के भी ऊपर पोथी को रखना, संसार के कर्ता ईश्वर को मानना , स्नान करने के धर्म की इच्छा , जन्म-जाति काअभिमान , पाप नाश करने के लिए शरीर को संतप्त करना अक्ल मारे हुओं की जड़ता के येपांच लक्षण हैं.

- इसी किताब से
 
 
(सुधाकर साहित्य पढता है और कवितायेँ लिखता है)

15/08/2017

चंद्रकांत देवताले: शब्दों की बुनाई में रचा जीवन।

कवि का जाना कैसा होता है? किसी रचना प्रक्रिया का सूर्यास्त!
आज सुबह हिंदी के सम्मानित कवि चंद्रकांत देवताले के निधन का समाचार स्तब्ध करनेवाला था। कैसी विडंबना है कि  अतीत समेटता जा रहा है उन लोगों को जो रचना-जगत के पुरोधा रहे हैं।

चंद्रकांत देवताले की कविताएँ शिल्पकार की सलीके से संजोयी गईं पूँजी हैं। उनकी कविताओं में जो संसार समेटा गया है वो सृजन की विराट परंपरा का पक्ष लेती अमिट स्मृतियों के होने की वजह बन जाती हैं। मैं उनकी एक कविता पढ़ रहा था... "पानी के पेड़ पर जब/ बसेरा करेंगे आग के परिंदे/ उनकी चहचहाहट के अनन्त में/ थोड़ी सी जगह होगी वहाँ मरूँगा..." कवि के मन की अभिव्यक्ति कितनी निर्णायक हो जाती है कभी-कभी किसी समय!

जिस संसार में हम रहते हैं उसकी सभी तहों में उनकी रचना बैठी मिल जाएँगी। देवताले जी ऐसे कवि हैं जिनको पढ़ना रचना को जीना है।  "जनवरी की दोपहर/ और बारिश हो रही है/जाड़े के दिनों में बारिश होती है/ तो उसे मावठा कहते हैं हमारे घरों में..."

उनकी कविता 'माँ जब खाना परोसती थी' माँ को खोजती आँखों का सच बुनते नज़र आती है। और प्रेम। अपनी कविता 'मैं आता रहूँगा तुम्हारे लिए' में कितना समर्पण घुला है। पूरी कविता प्रेम की परत खोलने में रत हो जैसे। "याद है न जितनी बार पैदा हुआ/ तुम्हें मैंने बैंजनी कमल कहकर ही पुकारा/ और अब भी अकेलेपन के पहाड़ से उतरकर/ मैं आऊंगा हमारी परछाइयों के खुशबूदार/ गाते हुए दरख्त़ के पास/ मैं आता रहूँगा उजली रातों में/ चन्द्रमा को गिटार-सा बजाऊंगा/तुम्हारे लिए।"

रिश्ते की पवित्र डोर थामे स्नेह के रेशों से बंधे एक पिता के बेटी से जुड़ाव को कितना प्यारा रचा है कवि ने। 'बेटी के घर से लौटना' हर पिता के अंतर्द्वंद की सच्चाई कह देती है बरबस ही। "बहुत जरुरी है पहुँचना/ सामान बाँधते बमुश्किल कहते पिता/ बेटी ज़िद करती/ एक दिन और रुक जाओ न पापा.../
...वापस लौटते में/ बादल बेटी के कह के घुमड़ते/ होती बारिश आँखों से टकराती नमी/ भीतर कंठ रूँध जाता थके कबूतर का/ सोचता पिता सर्दी और नम हवा से बचते/ दुनिया में सबसे कठिन है शायद/ बेटी के घर से लौटना।"

अपनी कविता 'औरत' में कवि स्त्री के जीवन की पूरी गाथा रचते दिखाई देता है तो वहीँ 'स्त्री के साथ' एक औरत की विराट छवि की पराकाष्ठा बुन देती है। इस कविता में तो कवि कह रहा है कैसे पुरुष रिक्त होता है स्त्री के बिना, शून्य का एहसास हो जैसे! हर पंक्ति में सिमटा सच। कवि कितना साकार हो जाता है जब वह कहता है..."सचमुच मैं भाग जाता चन्द्रमा से फूल और कविता से / नहीं सोचता कभी कोई भी बात ज़ुल्म और ज्यादती के बारे में/ अगर नहीं होतीं प्रेम करने वाली औरतें इस पृथ्वी पर...।"

अपनी कविता 'बिना किसी तानाशाह की तस्वीर के' और 'थोड़े से बच्चे और बाकी बच्चे' में देवताले बच्चों की दुनिया में लगी सेंध की पड़ताल करते हैं, सच उजागर करते हैं। 'इधर मत आना...यह काटीगाँव है' में कवि एक पिछड़े इलाके की छुपी हुई बदहाली को सामने लाते नज़र आते हैं..."जो होता बाढ़-भूकम्प जैसा इलाका कोई / तो आते पुष्पक विमानों से राहत की पोटली/ टपक जाते भाग्यविधाता/ पर मुद्दत हुई काटीगाँव में दर्शन देने/ नहीं आया है अन्न का एक भी दाना..."

कवि देवताले ने छोड़ दिए हैं कितने ही प्रश्न जो बराबरी के हक़ की बात करते रहेंगे, और ये सच कहते रहेंगे कि भला प्रकृति को बाँटा जा सकता है क्या! इतना ऊँचा और नीचा क्यूँ है समाज? ... " समुद्र को टुकड़ों में बाँटने वालो/ मनुष्य की विपदा के मलबे को/ अख़बारों से ढाँपने वालों/ जवाब दो माई के सवालों का/ लहुलुहान माथे को नोंचती पूछ रही माई- आकाश की जात बता भईया? धरती का धरम बता? धुएँ के पहाड़ में पथराई आँखों की चुप्पी के ईश्वर का नाम बता?"

कवि कहता रहा है, गया तो कहके गया कि..."अगर तुम्हें नींद नहीं आ रही/ तो मत करो कुछ ऐसा/ कि जो किसी तरह सोए हैं/ उनकी नींद हराम हो जाए/...हो सके तो बनो पहरुए/ दु:स्वप्नों से बचाने के लिए उन्हें/ गाओ कुछ शांत-मद्धिम/ नींद और पके उनकी जिससे।"

जब भी कविता की बात होगी चंद्रकांत देवताले किसी बयार की तरह रचना की प्रकृति को जानते दिखाई देंगे। कवि की स्मृतियाँ अपनी गोद में छलकते प्रेम की चादर में समेट लेती हैं कविताएँ। देवताले को याद करना उनके जीवन के पदचापों को समझने जैसा है। शायद देवताले के पास 'अंतिम दिन की अनुभूति' रही होगी जैसा उन्होंने लिखा कभी... "उस दिन हरा सूरज उगेगा/ और मैं अपने को और अधिक नहीं जानूँगा,/
कच्चे बादल-सा तकिया/ पिघलते बर्फ़-सा बिस्तर/कितने अनंत सिमट आएँगे आँखों में/ सिर्फ़ अंतिम बार देख लेने के लिए/ ठूंठे नीम पर टिके नंगे आसमान को..."

मैं कवि को कवि के अवसान पर उन्हीं की पंक्तियों में व्यक्त कर रहा हूँ। जब मैं पढ़ रहा हूँ उनकी कविता 'जहाँ थोड़ा-सा सूर्योदय होगा' की उनकी ये पंक्तियाँ..."मैं मरूँगा जहाँ वहाँ उगेगा पेड़ आग का/ उस पर बसेरा करेंगे पानी के परिंदे/ परिंदों की प्यास के आसमान में/ जहाँ थोड़ा-सा सूर्योदय होगा/ वहाँ छायाविहीन एक सफ़ेद काया/ मेरा पता पूछते मिलेगी।"

चंद्रकांत देवताले। कवि को नमन। कविता जिंदाबाद।

चंद्रकांत देवताले।
जन्म: 7 नवम्बर 1936, जौलखेड़ा, जिला बैतूल(मध्य-प्रदेश)
निधन: 14 अगस्त, 2017।


उत्कर्ष
(कवि है, कवितायेँ लिखता है.)

12/08/2017

युवा कविता #1 नेहा नारायण सिंह

हाल ही में पटना में हुई कविता गोष्ठी में सशक्त पहचान बनाने वाली कवि नेहा नारायण सिंह अपने लेखन में स्त्री विमर्श को केंद्र में रखती हैं.

1.
"तू होता है कौन? "

आगाज़-ऐ-सरफ़रोशी, कर दिया है हमने।
सर आँचल नहीं, कफ़न बाँध लिया है हमने।
तुझे इस दुनिया में लाने वाले होते हैं हम।
हमें आज़ादी देने वाला तू होता है कौन?

अब आवाज़ बुलंद कर, चल पड़े हैं हम।
इन्हें दबाने वाला, तू होता है कौन?
तेरी दुनिया सजाने वाले, होते हैं हम।
हमें कुचलने वाला, तू होता है कौन?

इस बेरंग दुनिया को, रंगीन करने वाले हैं हम
हमें बेरंग करने वाला, तू होता है कौन?
हम पर बंदिशें लगाने वाला, तू होता है कौन?
हमें आज़ादी देने वाला, तू होता है कौन?

हम तख़्त पर हैं हम फ़र्श पर हैं
पर जहाँ हैं परवान पर हैं
हमें फ़रमान सुनाने वाला, तू होता है कौन?
हमें आजादी देने वाला, तू होता है कौन?

वो वक़्त कुछ और था
जब हमने घूँघट में भी तलवार चलाना सीखा।।
ये दौर हमारा है
अब कंधे से कंधा मिलाकर चल पड़े हैं हम।।
न छोड़ चुके हो हम तुम्हें पीछे, 
ऐसा कोई काफ़िला नहीं है।।
फिर सीमाएँ तय करने वाला तू होता है कौन?
हमें आज़ादी देने वाला तू होता है कौन??


वो निर्भया थी जो आगाज़ कर चली गई।
उसे अंजाम तक पहुंचाने वाले होंगे हम।।
अपनी आज़ादी को, आप पाने वाले होंगे हम।
हमें आज़ादी देने वाला तू होता है कौन??


तीन तलाक विषय पर अपनी रचित रचना "तीन तलाक"

अनवरत,
नयन नीर बहता रहे,
नर निरतंर चरता रहे,
चहु चौहद्दी तेरी रहे,
अब तू बता-
तेरी संगिनी है कहाँ?

सीना ठोक तू गुमान करे,
जब घूँघट ओढ़े अगुवाई करूँ ,
तेरे वंश का सृजन मैं करूँ।
अब तू बात- 
किसे अपना? किसे तेरा कहूँ!!!

तस्वीर हैं साफ कहता,
बग़ावत आज मैं कर लूं।
इस जमी ओर उस फ़लक में,
खुद कि चौहद्दी माप लूँ!!!

दिल कहता है तेरा-
मेरी आँखों में अश्क जंचता है!!
अल्फाज तेरे बदल दूँगी,
तूझे तेरी औकात दे दूँगी,
तीन तलाक -
अब मैं बोल दूँगी!!



" रक्षा सुत्र "

रक्षा-सुत्र तैयार किया है मैंने 
अपने भाई का श्रृंगार किया है|
एक सुत लिया है, कद का अपने 
नख से बाल तक माप लिया है|
उसपे मैंने रंग. चढ़ा कर 
हल्दी, चन्दन, फूल लगा कर 
रक्षा-सुत्र का श्रृंगार किया है|
जिसका राखी, नाम दिया है 
रक्षा-सुत्र तैयार किया है मैंने| 
रोड़ी, चन्दन, अछ्त लगा कर 
मैंने भाई से संकल्प लिया है|
नख से बाल तक रक्षा करोगे 
मेरी चिता तक साथ रहोगे|
नाप को मैंने अपने आप को 
सुत्र से तुमको बान्ध दिया है|
पग-पग मेरी ढाल बनोगे 
कमजोर परु तो विश्वास बनोगे
आन बनोगे, मान बनोगे
मेरा तुम स्वाभिमान बनोगे|
समय का चक्र भी घुमेगा 
अपना रिश्ता भी छुटेगा 
टूटेग़ा न वादा करो तुम 
जब पुकारु आना पड़ेगा 
मेरी लाज़ बचाना पड़ेगा|
शय्या तक तुम आओगे ना 
मुझको आग दे जाओगे ना 
रक्षा-सुत्र जो बान्ध दिया है 
अपने भाई का श्रृंगार किया है||
 
नेहा नारायण सिंह
 
मैं क्यों लिखती हूँ ?
प्रकृति और समाज के प्रति अपनी राय रखने और अपनी सोच पहुंचाने का सरल और सार्थक माध्यम  है लेखन  मेरे स्वाभाव में है जिसे आकार दे रही हूँ