where it all began

Hearth, in its earlier days, came out in form of a newsletter. while the magazine was a tedious, more strenuous affair and was periodical, Hearth never depended itself on time and was published whenever an incessant need to do so was felt- be it some political or literary incident or the opening of a new joint in the city -
as a famous philosopher once said, we are not prisoned by time but by clocks, we must accept our ruins and our downfalls. true poetry and literature will come out of those.
The cover of the blog is called "LOVERS" and has been clicked by eminent poet and photographer Anurag Vats

28/12/2017

युवा कविता #18 अभिषेक

अभिषेक कहते हैं कि कविता उनके लिए एक हॉबी की तरह है जैसे दूसरी चीज़ें हैं मसलन भाषण और क्विज़.उन्होंने कई लेख लिखे हैं और अपना एक पर्सनल ब्लॉग भी चलाते हैं.

मुझे दूर ले चलो।

मुझे दूर ले चलो...कहीं और ले चलो। किसी ऐसी जगह, जहाँ आईने न हों। जहाँ दुनिया के बेड़ियों के मायने ने हों। जहाँ रुख़्सत लेने की विवशता न हो, जहाँ फ़ुर्सत से हम गुफ़्तगू कर सकें। जहाँ सपनो पर किसी का पहरा न हो, जहाँ ज़ख्म तो हो, पर गहरा न हो। जहाँ हो कर बेख़ौफ़ कह सकूँ दिल की बातें, जहाँ दिन भी हमारा, हमारी हो रातें। मुझे दूर ले चलो...कहीं और ले चलो।


 एक गाँव था। एक गांव था, दूर तराई में। बसा घाटियों की गहराई में। थे लोग वहां के प्यारे से, किसी विस्मय भरे नज़ारे से। एक लड़की थोड़ी सहमी थी, और गांव में गहमा-गहमी थी। कुछ लोग खड़े थे मीनारों पर, कुछ दूर नदी के किनारों पर। जो लोग खड़े थे मीनारों पे, वो लैश थे हथियारों से। कुछ नदी किनारे,खाली हाथ, थे सिसक रहेेे लाचारों से। फिर गोली चली और दिल टूटे। न जाने कितने घर लुटे। एक घाटी फिर ज़रखेज़ हुई, और बातें सनसनीखेज़ हुई। थे पंडित घाटी से भाग रहे, अपनी आँखों में आग लिए। उनके पडोसी चिंतित थे, पसोपेक्ष का दिल में राग लिए। वो जानते थे,ये गलत है, जो भी हो रहा है। एक भाई ज़मीरे-ज़र्ब है, और दूजा रो रहा है। इन्सानियत का भी इल्म न हुआ, सरकार-ऐ-जम्हूरियत को। थे गाँव के गाँव उजड़ रहे, और वो थामे रह गए हुर्रियत को। सरकार-ऐ-जम्हूरियत उस दिन, चद्दर तान के सो गयी। पर न जाने उस दिन, उस साल, आने वाले कितने सालो तक, कितने ही गाँव उजड़े, दिल टूटे, और कितनि ही रूहें दफ़्न हो गयी। एक गाँव था तराई में। बसा घाटियों की गहराई में।

युवा कविता #17 शालिनी झा

शालिनी झा - मुझे ठीक से याद नहीं , मैं कब लिखने लगी, पहले छोटे छोटे भाषण और फिर कविताएँ और फिर ये सिलसिला जारी है. कविता लिखना मेरे लिए संगीत सुनने जैसा है! जैसे आप किसी गाने को बस सुनते हैं . उसमे से आवाज़ , ताल , सुर अलग किए बिना,बिना ज़्यादा सोचे समझे! एक पूरा गाना महसूस करते हैं और उस के बाद कमाल की तसल्ली मिलती है | वैसे ही मैं कविताएँ सोच के नहीं लिखती , कोशिश नहीं करती, बस जब कहीं तसल्ली नहीं मिलती, जब आँसू बाहर नही आ पाते, जब खुशी संभाली नहीं जाती और जब मन चुपचाप होता है तो कविताएँ बन जाती हैं .ऐसे ही! और फिर कविता पूरी होने पर जो सुकून मिलता है शायद वही ज़िंदगी है.

कुछ सोच रही हूं मैं 

वो रात नहीं दिन भी तो नहीं एक शाम अधूरी बाकी थी गिरती थी मोती की बूंदे आंसू के फूलों को थामें वो धूप नहीं ना छांव ही थी एक सांस अधूरी बाकी थी रोका तो था पर टूट गया एक ख्वाब हवा के झोंको सा एक चुप्पी की चादर ओढ़े समेट रही उस खुशबू को कुछ सोच रही हूं मैं खामोशी है...एक सिसकी है शायद छोटी सी उलझन है वो कौन है जो , कुछ भी नहीं पर मेरा भाग्य विधाता है है किस भाषा के शब्द जिन्हें पीड़ा से शक्ति मिलती है मुस्कान नहीं , रोना भी नहीं एक चोट अभी भी बाकी है वो चला गया, हां रूका नहीं उन कदमों की आहटों में कुछ खोज रही हूं मैं.. एक पीड़ा है , जीवन भर की एक सपना था, मेरा मन का जैसे सर्दी की ठंडक हो पहले जीवन की आशा हो अब तुम तो नहीं, हां मैं भी नहीं बस हम थोड़े से बाकी है तुम दिखते हो, हां ! अब भी तो वह प्यारी सी मुस्कान लिए जीवन के उस छोर पर आंखों में मेरे प्राण लिए उन आंखों से ही बांधी हुई अब जी रही हूं मैं उन्हें सोच रही हूं मैं.


 तुम ही हो  

तुम सांस मेरी इन पलकों की, इन लहरों की तुम धड़कन हो। कैसे रोकूँ इन आँखों को, चल पड़ती हैं तुमको छूने। ज्योति हो मेरे अधरों की, आकाश मेरा- हाँ तुम ही हो। . मीठी सी महक हो, तन-मन की, मेरी पायल की गुंजन हो। जो सुनी नहीं खुद मैनें भी, उन साज़ों की आवाज़ तुम्हीं। जो बाँध रही मुझे बंधन में, वह प्यास मेरी- हाँ तुम ही हो। हो प्यार मेरा, संसार मेरा, जैसे हाथों का कंगन हो। तुम जादू हो, मैं खो सी गई, मेरे जीवन का सार तुम्हीं। जो दूर भी है, पर जान मेरी, ऐसा विश्वास- हाँ तुम ही हो। रुक जाओ, ऐसे जाओ मत, मैं खड़ी मिलूंगी यहीं तुम्हें। तुम मानो, चाहे ना मानो, मेरी राह तुम्हीं, अधिकार तुम्हीं। यह प्राण जुड़े इन नैनों से, प्रकाश मेरा- हाँ तुम ही हो। संसार की सीमा भूल गई, अस्तित्व मेरा अब तुम से है। यह आँचल उनकी छाया है, जिस खुशबू के, हक़दार तुम्हीं। मृत्यु का अब भय कैसा, मैं बस तुमको ही देख रही। पूजा के फूलों को लेकर, तुम लज्जा हो मेरी आत्मा हो। हाँ ईश्वर मेरे- अब तुम ही हो। 


19/12/2017

नीर की कुछ प्रेम कविताएँ

पावस नीर दिल्ली में रहते हैं -कविताएँ करते हैं - फ़ुट्बॉल खेलते हैं और पत्रकारिता करते हैं.
वो कहते हैं जब वो प्यार में होते हैं तब भी लिखते हैं, जब नहीं होते तब भी.


उनकी कुछ कविताएँ -


मूव आन

हम रोज फैसला लेते हैं, फैसला लेने का
हम रोज दिल को थोड़ा और कड़ा करते हैं
होते हैं अधिक निष्ठुर, अधिक साहसी
भूल जाते हैं प्यार
हो जाते हैं समझदार

चालाक हो गई हैं प्रेम कहानियां
आज के युग में
वह अपना अंत खुद लिख रही हैं
बेकार हो रहे हैं कवि, लेखक
जनतंत्र से बाहर किए जा रहे हैं पागल

'13 रीजन्स वाई' से जानते हैं जवाब
लेकिन सबसे अहम सवाल नहीं पूछ पाते कभी
'क्यों'

अब जब पर्दे पर जब पूछता है डिंपल वाला हीरो
'क्यों हम सब प्यार के बिना जीना सीख लेते हैं
... क्यों प्यार को मौका नहीं देते'
तो हम हिलाते हैं सिर
और चैनल बदल लेते हैं

अब हम इंतजार नहीं करते
सबकुछ ठीक होने का एतबार नहीं करते
अब हम चुन-चुनकर चुनते हैं रिश्ते
बेसाख्ता, बेपरवाह, बेमतलब वाला प्यार नहीं करते.

सिर्फ तुम्हारे लिए लिखना
 
तुम्हारे लिए लिखना 
अब किसी सूखे तालाब से मछली मार लाने जैसा है
(सिंपली इम्पोसिबल)

शब्द गढ़ना पानी का पुल बनाने सा है
भावनाएं बची हैं थोड़ी सी तलछट में
पर सूख रही हैं तेजी से
अकेले होना धूप वाली दुपहरी से कम कहां रहा है कभी

चुल्लू भर प्यार
कई बार डूब चुका हूं मैं
और ऐसा नहीं कि मरा न हूं
एक भी बार

इतने प्रेमगीत, इतने शोकगीत
की-बोर्ड पर तुम्हारे नाम के सारे अक्षर मिट गए हैं
और कलम से लिखना तो छूट चुका है कब का
अब ये मत कहो कि इस कहानी का
मर्सिया भी मुझे ही लिखना है

झूठ नहीं बोलूंगा
सिर्फ तुम्हारे लिए लिखना भूला नहीं हूं
तुम्हें भूल गया हूं भले ही (huh.. Who am I kidding?)

पर, अब बस और न लिखूं तुम्हारे लिए
और यही मेरा प्रतिशोध हो।

फिर से रॉकस्टार देखने की इच्छा पर...
 
“पता है यहां से बहुत दूर गलत और सही के परे एक मैदान है... मैं वही मिलूंगा तुझे..”

आज फिर से उड़ चलने का मन है
मन है कि
कागज की एक छोटी सी पर्ची पर लिखूं प्यार
और बदले में पाऊं जिंदगी भर का आवारापन

जहां खत्म होता है उजाले और अंधेरे का वक्त
वहीं कई दिनों अकेला खड़ा रहूं एक सपने की तरह
और पुकारता रहूं तुम्हारा नाम बेसाख्ता

चांदी के परदे पर हंसते चेहरे के साथ जोर-जोर रो लूं
अपनी पहली कहानी चिंदी-चिंदी कर दूं, गाउं

मिट्टी जैसे सपने, भटकते नादान परिंदे और जलता हुआ एक रॉक गिटार
एक सपने को डाउनलोड कर रहा हूं... 1 घंटे 12 मिनट बाकी हैं.




10/12/2017

युवा कविता #16 नीरज प्रियदर्शी




नीरज प्रियदर्शी परवरिश भोजपुर के गांव में हुई है, इसीलिए रंग दिखता है । पिता अब दर्शनशास्त्र के लेक्चरर हैं।तब ठेठ किसान थे। इन्हीं की सोहबत ने पहले पढ़ना सिखाया और फिर लिखना। अब तो उम्मीद भी करने लगे हैं। कहते हैं- कुछ भी लिखो, मगर ऐसा लिखो कि वो कागज किसी के हाथ आए तो आईने सा लगे। तुम्हारे खुद के भी । जब भी लिखता हूं, किसी न किसी के वास्ते ही लिखता हूं। और वास्ते का क्या है! किसी से भी हो जाता है। पेशे से पत्रकार हूं। हर दफे बस यही चाहता हूं कि कागज पर सिर्फ कविताएँ लिखूं, मगर नौकरी ने उसी कागज पर लूट, हत्या और बलात्कार लिखवा दिए। अब नौकरी छोड़ दी है। मन का लिखता हूं। मन करता है हर बार कविता ही लिखूं। विचार अघोर है, सो हर बार प्रेम पर अटक जाता है । हर बार प्रेम भी हो जाता है।







मुमकिन नहीं था 'के मुमकिन नहीं था तुम्हारा आना फिर से उदास कमरे में ये सिर्फ हम नहीं वरन, समझती है हमारी रात भी मुझसे ही खफा है घुप्प बैठी है मुझसे पूछ के सिर्फ़ मेरी ही होकर कैसे गुजर सकती है जबकि पहर बाकी है अभी। शहर छोटा है जब सोता है तब ख्वाब बुनता है और जुगत भिड़ाता है इक और शहर बनाने की खिड़की भर नजर बड़ी है पूरे शहर को नाप लेती है स्याह गगन का चांद दूर टिमटिमाता है, मगर खिड़की में समा जाता है अगले पहर का साथी है।


 संपादक से अरज 

ए संपादक एक काम करिए भावनाओं को डाल लीजिए कहाँ ? वहीं...! उसी तरह, जैसे डाल लिया है पर्दा, इतिहास पर भरी जवानी पर शब्दों के सार्थकता पर। शर्म तो आती नहीं आपको दामन लुटाने में अखबार बेचने में खबरें खरीदने में जैसे कि, मान लिया हो नंगा हो जाना फिर पैसे कमाना बुरा तो है उसी तरह जैसे वैश्यालय में औरते हैं तो हैं मगर, जरूरत......! खैर.... ए संपादक एक बार बोलिए ना जरुरत क्या है ?

 धरती के सारे पात्र काल्पनिक हैं इस मुर्दाघर में तुम्हारे चप्पल की जोड़ी भी नहीं पहुंचती जिसे लगाकर तुमने नाप ली थी अपने हिस्से भर की जमीन। इस मुर्दाघर में देह से लिपटी बनियान ओर उसे ढकने वाली कमीज तार-तार हो गई होती है कभी बटन नहीं होते तो कभी छलनी हुआ हृदय उस चिथड़े में साफ नजर आता है। इस मुर्दाघर में रूह कंपा देने वाली सड़ांध भेद देती है तुम्हारी परफ्यूम और डीओ की महक जिसमें मदहोश होकर निकले थे अहले सुबह तुम आज उसी इत्र की खुशबू किसी का तुमसे लिपट जाने का ख्वाब सब कम पड जाता है जब लोग पांच कदम के फासले को तु्मसे मिलने की शर्त बना बैठे हैं। इस मुर्दाघर में काश तुम्हारी आँखें खुली होतीं तुम देखते ये विद्रुप और विभत्स नजारे फर्श पर बिखरे मांस के लोथड़े सिराहने पड़ा बेधड़क सकुचाया सा दिल तुम पर हर नजर के बाद थूकता अपना ही बाप उरोजों को सहलाने वाला वो डॉक्टर आज नंगी जांघें देखकर भी स्पर्श करने की हिमाकत नहीं करता तुम्हें विजय की खुशी होती देखकर। इस मुर्दाघर में तुम उठ के बैठते जरा सा इक बार हर सुबह को चाय लाने वाली पत्नी इंतजार कर रही है बाहर कफन के साथ बचपन में तुम्हारी मैली चड्ढी धोने वाली मां नाक पर रूमाल लगा लेती है तुम्हारे ही जिस्म की महक से। इस मुर्दाघर में काश तुम सच देख पाते दर्द महसूस करते ये सोचकर कि इस धरती के सभी पात्र काल्पनिक हैं जिन्हें तुम हकीकत मान बैठे थे अब जान पड़ेगा कि बाहों में भरने को आतुर वो अब छुआने से भी परेहज करती है।

30/11/2017

"विद यु विदआउट यु " के लेखक प्रभात रंजन से शुभम की बातचीत

पटना के नये लेख़क प्रभात रंजन यूँ तो पेशे से इंजीनियर हैं लेकिन आजकल लेखन के क्षेत्र में लोग इन्हें जानने लगे हैं। उसकी वजह हैं इनकी पहली पुस्तक 'विद यु विदआउट यु'। इस महीने रिलीज के बाद यह किताबों हिंदी पाठकों के बीच चर्चा में हैं। आज मैंने प्रभात रंजन से बातचीत की।

1. आपको पहली किताब की बधाई। आप अपने बारे में और अपनी किताब के बारे में हमें कुछ बताएं।

उत्तर- धन्यवाद। मैं भारतीय रेल में इंजीनियर के पद पर कार्यरत हूँI विद यू विदाउट कहानी है सच्चे प्यार और सच्ची दोस्ती की परिभाषा गढ़ते, उसे तलाशते और उसे अपने हिसाब से जीते निशिन्द,आदित्य और रमी की। ‘बचपन की अल्हड़ता’ और ‘व्यस्क होने पर की गम्भीरता’ के बीच पनपी दो प्रेम कहानियाँ जो आपस में उलझ कर सम्पूर्णता की चाह में मानवीय रिश्तों के भीतर और बाहर के तमाम अन्तर्द्वन्द से जद्दोजहद करते हुए जीवन के कई यक्ष प्रश्नों का साक्षात्कार करती हैं और उनके उत्तर ढून्ढती हैं।

2. विद यु विदाउट यु कैसी उपन्यास है? यह किस तरह के पाठकों के लिए है? हिंदी किताब का इंग्लिश शीर्षक... इस विषय पर आपकी कोई राय?

उत्तर- वस्तुत यह एक लव ट्रायंगल है लेकिन यह फ़िल्मी नहीं है बल्कि हमारे बीच घटित होती सी कहानी हैI इस कहानी के पात्र आपको अपने आस-पास हर जगह दिख जायेंगे, कुछ इस कहानी से प्रभावित दिखेंगे तो कुछ इस कहानी को प्रभावित करते दिखेंगेI
जिन्हें भी मानवीय रिश्तों की विवेचना में रूचि है उन्हें यह पसंद आयेगीI
इंग्लिश शीर्षक को लेकर मेरे मन में भी काफी दुविधा थी लेकिन जब आप इस पूरे उपन्यास को पढ़ेंगे तो पायेंगे कि इस कहानी के लिये यह बिल्कुल ही उपयुक्त हैI वैसे इस उपन्यास में एक इंग्लिश पोएम है जिसमें यह वाक्य कई बार प्रयोग में आया है, उससे भी इस शीर्षक को प्रभावित माना जा सकता हैI    

3. दोस्ती और प्यार दोनों आपस में परस्पर संबंध रखते हैं। आपकी उपन्यास भी इसी विषय पर है। ‎आज के समय में आप प्रेम और दोस्ती को किस प्रकार देखते हैं?

उत्तर- दोस्ती और प्यार दिल से जुड़े एक सरीखे दो निजी रिश्ते जिनके बीच कई बार काफी महीन रेखा होती है, तो कई बार ये आपस में ही इतने उलझे होते हैं कि निर्दोष मन के लिए उचित निर्णय कठिन हो जाता है। कई बार आप समझ ही नहीं पाते कि आपका दोस्त कब आपका प्यार बन गया, तो कई बार आप किसी के प्यार में होते हुए भी उसे दोस्त ही मानते रहते हैं।
मैं तो वर्तमान समय को दोस्ती का ही युग मानता हूँ, आज हम हर रिश्ते में दोस्ती ढूंढ रहे हैं, भाई-बहन के रिश्ते में, पिता-पुत्र, माँ-बेटी के रिश्ते में, पति-पत्नी के रिश्ते में और इन रिश्तों की सफलता की कुंजी भी दोस्ती की मात्रा में ही है, जिस रिश्ते में दोस्ती की मात्र जितनी ज्यादा है वह रिश्ता उतना ज्यादा सफल हैI
यह तेज आधुनिक दुनिया दिल से जुड़े भावनाओं के समक्ष आज भी ठहर सी जाती है, तमाम आधुनिकता भरा कोलाहल हमारे निर्दोष चाह के कमरों में कोई शोर नहीं कर पाता, वहाँ तो हम निश्चित रूप से तन्हा ही होते हैं, पौराणिक और पारम्परिक ही होते हैं। दिल से जुड़े रिश्ते आज भी हमें पारम्परिक रूप से ही उद्वेलित करती हैंऔर यदि उद्वेलित नहीं करती है तो सिर्फ इसलिए क्योंकि वह रिश्ता दिल से जुड़ा ही नहीं होता।   
    
4. ‎किताब रिलीज होने बाद लोगों के बीच चर्चा में है। सोशल साइट्स पर भी लोग इसके बारे में लिख रहे हैं। आपको कैसा रिस्पॉन्स मिल रहा है? विद यू विद आउट यू आपसे कितना जुड़ी हुई है?

उत्तर-यह अपने आप एक सुखद अनुभूति है, सच कहूँ तो पहली किताब होने की वजह से मैं काफी सशंकित थाI इतने अच्छे रिस्पांस की मुझे अपेक्षा नहीं थीI चूँकि आजकल प्रेम और दोस्ती पर आधारित काफी पुस्तक आ रही है ऐसे में पाठक जब इस कहानी में कुछ नया देख पा रहे हैं, उन्हें यह अपनी कहानी महसूस हो रही है तो स्वभाविक रूप से मुझे काफी ख़ुशी होती हैI
इस कहानी के पात्र काल्पनिक जरुर हैं पर मेरी कल्पना भी कहीं न कहीं मेरे स्वयं केअनुभवों से प्रभावित है, इस कहानी के कई पात्र और इस कहानी के कई घटनाक्रम सम्भवतः कभी न कभी, कहीं न कहीं किसी अन्य रूप में मेरी आँखों के सामने से गुजरे हैं जिनसे मुझे प्रेरणा मिली है।

5. ‎इंजीनियर से लेखक तक का सफर कैसा रहा? साहित्य में रुचि कब और कैसे आई? आप किन लेखकों को पढ़ते हैं?

उत्तर- साहित्य में रूचि बचपन से रही है, यह बात अवश्य है कि भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति के रेस में कुछ इस कदर उलझा कि अपनी इस रूचि को गम्भीरता से लेकर इस तरह लेखन के रूप में मूर्त रूप देने में मैंने काफी वक्त लगा दिया और निश्चित रूप से काफी विलम्ब से मैंने लिखना शुरू किया हैI
ऐसे तो अनेकानेक लेखक हैं जिन्हें मैं पढ़ते रहा हूँ लेकिन बचपन से अमृता प्रीतम की किताबों में विशेष रूचि रही हैI

6. आपने लेखन की शुरुआत कैसे की? अपने अन्दर के लेखक को कैसे पहचाना आपने?

उत्तर- लिखने का शौक तो हमेशा से रहा है और जैसा कि मैंने अभी कहा है कि रूचि होने के बाद भी काफी बिलंब से गम्भीरतापूर्वक लिखना प्रारम्भ किया हूँI कुछ कहानियाँ काफी समय से मन में थी जिनमें से एक विद यू विदाउट यू है, अब लगा कि इसे किताब का रूप देना चाहिये और परिणाम आपके सामने हैI
सच कहूँ तो मैं लेखक हूँ यह आप गुणीजन के मुँह से सुनने पर ही विश्वास हो पाता हैI इसीलिए यदि ऐसा सच में है तो उसे अब तक पहचान नहीं पाया हूँ और यदि पहचान पाया हूँ क्योंकि तीन किताब अब तक लिख चूका हूँ तो इसका मतलब है कि इस बात को स्वीकार नहीं पाया हूँI

7. ‎आज देशभर में हिंदी रचनाओं को खूब पढ़ा जा रहा है और लोग साहित्य के तरफ फिर से आकर्षित हो रहे हैं। इसके बारे में आपका क्या ख्याल है?

उत्तर- यह वाकई बहुत अच्छी बात हैI हिंदी पाठकों की उपलब्धता ने अब लेखकों को भी इस भाषा में लिखने को मजबूर किया है जिससे लोगों की साहित्यिक रूचि में उत्तरोत्तर विकास हो रहा है, अर्थात पाठकों और लेखकों की परस्पर सहभागिता ने हिंदी साहित्य को पुनः प्रतिष्ठित करना प्रारम्भ कर दिया है और यह हिंदी साहित्य के उज्ज्वल भविष्य के लिहाज से काफी शुभ संकेत हैI 

8. ‎सोशल मीडिया और अमेजन जैसी वेबसाइट आज लेखकों और पाठकों के लिए वरदान बन गया है। आप किस हद तक सोशल मीडिया से जुड़े हैं और पाठकों की प्रतिक्रिया आप को कैसे प्रभावित करती है?

उत्तर- मैं आपसे अक्षरशः सहमत हूँ, वास्तव में सोशल मीडिया और अमेजन जैसी वेबसाइट आज लेखकों और पाठकों के लिए वरदान बन गया है। फेसबुक और ट्विटर पर मैं भी सक्रिय हूँI पाठकों की प्रतिक्रिया देखकर अपने काम को उनकी नजर से देख पाने का मौका मिलता हैI वे जब तारीफ़ करते हैं तो लगता है कुछ अच्छा लिख पाया हूँ और जब वे आलोचना करते हैं तो अपनी कमी की तरफ नजर ले जाने का मौका मिल जाता हैI  

9. ‎हाल के समय में एक नया ट्रेन्ड देखा गया है कि कॉलेज लाइफ या युवा प्रेम पर बहुत किताबें लिखी और पढ़ी जा रही है। आपने भी कुछ ऐसी किताब लिखी है। आप इस पर क्या कहेंगे?

उत्तर- मैं तो समझता हूँ कि हर दौर के लेखकों के लिये युवा वर्ग और उनके बीच पनपने वाले प्रेम सम्बन्ध एक महत्वपूर्ण विषय रहा है और इसपर हमेशा लिखा जाते रहा हैI हाँ यह बात जरुर है कि अंग्रेजी के कुछ सफल लेखकों ने जब इस विषय को अपने लेखन के केंद्र में रखा और उन्हें उल्लेखनीय सफलता मिली तो अन्य लेखक भी इससे प्रभावित हुएI इसका एक कारण यह भी है कि आज इस युवा राष्ट्र का सबसे बड़ा पाठक वर्ग ये जागरूक युवा ही हैं तो स्वभाविक है कि लेखक इनके कॉलेज लाइफ और प्रेम सम्बन्धों पर ज्यादा लिखेंगेI

10. ‎आजकल के समय में हिंदी लेखकों के सामने कैसी चुनौतियां हैं? किताब प्रकाशित करवाने से लेकर पाठकों तक पहुंचने में क्या क्या चुनौतियां आपके सामने आई?प्रकाशन और लेखन से जुड़े अपने अनुभव बताएं ?

उत्तर- यह आपने बहुत ही अच्छा प्रश्न किया हैI यह बात सच है कि हिंदी भाषा के प्रति आकर्षण बढ़ा है लेकिन आज भी हमारे देश में सबसे ज्यादा पाठक अंग्रेजी भाषा के हैं और इस तथ्य का असर हिंदी लेखकों पर स्वभाविक रूप से पड़ता हैI जो बड़े प्रकाशक हैं वे अंग्रेजी को ज्यादा प्राथमिकता देते हैं क्योंकि अंग्रेजी का बाजार हिंदी से बड़ा हैI अब मेरे जैसा कोई व्यक्ति पहली बार कोई किताब लिखता है तो उसके सामने सबसे बड़ा प्रश्न प्रकाशक द्वारा उनके रचना को स्वीकृत होने या न हो पाने की ही होती हैI कई सारे सेल्फ पब्लिशर भी उपलब्ध हैं लेकिन यदि आप अपने लेखन के प्रति गम्भीर हैं तो फिर सेल्फ पब्लिशिंग के रास्ते आगे बढने से आपके विकल्प काफी सीमित हो जाते हैंI
मैंने भी जब अपनी पहली किताब लिखी तो काफी समय तक इस उलझन और उहापोह की स्थिति से गुजराI प्रकाशक आपके धैर्य की परीक्षा लेते हैं, दरअसल उनकी भी अपनी मजबूरियां हैं, आपके लिए आपकी एक रचना आपका सबकुछ होता है जबकि प्रकाशक ऐसे रचनाओं के बाढ़ के बीच होते हैंI संयोग से मैं इस मामले में थोड़ा सौभाग्यशाली हूँ कि मुझे अच्छा प्रकाशक मिलने में ज्यादा वक्त नहीं लगा और स्टोरी मिरर ने बहुत जल्दी मुझे स्वीकृति दे दीI प्रकाशन की पूरी प्रक्रिया से लेकर अब तक का उनका रवैया काफी सहयोगात्मक रहा है और इस हेतु मैं तहे दिल से आभारी हूँI   

11. ‎एक लेखक के तौर पर आगे की योजनाएं क्या है? आप आजकल क्या लिख रहे हैं? आपकी अगली किताब कब आएगी? कुछ बताइए उसके बारे में।

उत्तर- मैंने अभी-अभी अपनी दो किताब पूरी की है जिसमें कि एक किताब “प्रियंका एक पाकिस्तानी लड़की” अगले कुछ महीनों में प्रकाशित हो जानी चाहियेI  “प्रियंका एक पाकिस्तानी लड़की”- कहानी है पाकिस्तान के एक हिन्दू परिवार में जन्मी प्रियंका की, मुस्लिम पाकिस्तान में एक हिन्दू अल्पसंख्यक के रूप में उसके जीवन के दर्द व संघर्ष की, पाकिस्तान से दुखद पलायन की और धर्मनिरपेक्ष हिंदुस्तान में बहुसंख्यक हिन्दू के तौर पर अल्पसंख्यकों के दर्द के उसके अवलोकन की। यह कहानी आजादी के बाद खुद को बुरी तरह ठगा हुआ महसूस कर रहे पाकिस्तानी हिन्दुओं के उस अंतहीन दर्द की दास्ताँ भी बताती है जिसके तहत वे पाकिस्तान में हिंदुस्तानी हैं और हिंदुस्तान में पाकिस्तानी हैं।
इस पुस्तक के प्रकाशन के पश्चात् बिहार की एक पौराणिक लेकिन काफी महत्वपूर्ण कहानी पर काम करना हैI यदि आपने और पाठकों ने मुझे लेखक के रूप में स्वीकार किया है तो मेरी इच्छा है कि हिंदी भाषा में काफी अच्छा लिखने वाले लोग जो अब तक किसी कारणवश पुस्तक लिखने से झिझक रहे हैं उन्हें किताब लिखने के लिये प्रेरित करूंI अच्छे लेखक जितना ज्यादा इस भाषा में सक्रिय होंगे उतना ज्यादा पाठक वर्ग का निर्माण होगा और स्वतः ही हमारी राष्ट्रभाषा का प्रसार होगाI


28/11/2017

'वो बात जिसका फ़साने में जिक्र न था/वो बात उनको बहुत नागवार गुज़री है'- कुमार राहुल

मलिक मुहम्मद जायसी कृत 'पद्मावत' पढ़ने बैठेंगे तो फैज़ के इस शेर से सहमत हो जायेंगे । मगर दुर्भाग्य से हमारे पास भारत को देखने के अब दो नज़रियेे थे - दो हज़ार चौदह के पहले और दो हज़ार चौदह के बाद । हम जो अब 'अतिसंवेदनशीलता' के दौर से गुज़र रहे हैं इसको कई तरह से देख और समझ सकते हैं ; इसकी व्याख्या कर सकते हैं । मसलन आजकल मैं इसे देश में बढ़ती बेरोजगारी के दुष्प्रभाव के रूप में भी देखता हूँ । ख़ैर, देश में वैविध्य है तो विवाद भी है । बहुत देर तक इससे बचा नहीं जा सकता । समय बदलेगा तो समय का मिज़ाज़ भी बदलेगा । किसके हक़ में और किसके हक़ को मार के बदलेगा ये अलग विषय है ।

कला और संस्कृति का सदियों से सम्मान करने वाले , सहेज़ के रखने वाले देश की भाषा कब इतनी हलकी हो गयी पता ही नहीं चला । देश में सुनने-सहने की प्रवृत्ति में जिस तरह से गिरावट आयी है उसमें ये आशा तो नहीं की जा सकती मगर क्या ही अच्छा होता कि हम एक बार संजय लीला भंसाली की आगामी फ़िल्म को देखने के बाद किसी निष्कर्ष पे पहुँचते ।

जरुरत है थोड़ा धीर धरते हुए समस्या के मूल में जाने की । किसी के कहे-सुने में आने से पहले खुद से खुद में विश्लेषण करने की । कुछ और नहीं तो अपने दस्तावेजों , किताबों की तरफ तो लौट ही सकते हैं हम (हालाँकि इतिहास और किताबों की सत्यता और प्रमाणिकता भी पिछले कई वर्षों से कटघरे में है) ।

इस बार भी जो विवाद बढ़ा तो लगा कि अच्छा मौका है इस अद्भुत काव्य रचना का दुबारा से रसास्वादन करने का । सो राजा-सुआ संवाद खंड, जोगी खंड, पद्मावती-रत्नसेन भेंट खंड, नागमती-पद्मावती विवाद खंड आदि पढ़ने की उत्सुकता फिर से हिलोड़ मारने लगी ।

अवधि भाषा में रचे इस काव्य के माध्यम से कवि ने प्रेम, बैराग और समर्पण के उच्च मापदंडों की अद्भुत व्याख्या की है । पद्मावती के बहाने से भारतीय संस्कृति का भी सबसे समृद्ध रूप सामने आता है (ख़ैर, होने को एक वाद-विवाद प्रतियोगिता इसपे भी करायी जा सकती है कि जिस सतीत्व और जौहर प्रथा का इतना गुणगान किया जा रहा है वो स्वयं में कितनी उचित रही है)। पढ़ते हुए आप महसूस करेंगे कि कैसे जनता की उक्तियाँ, भावनाएं, और मान्यताएँ स्वयं छंद में बंध कर काव्य में गुंथ गयी हों । कहते हैं कि तुलसी का रामचरितमानस उस समय तक अस्तित्व में न आया था । किन्तु रामकथा अवध के ग्रामों में लोगों की जीभ पर थी । जायसी ने जनता के स्तर से ही रामकथा का संग्रह कर के लगभग सौ बार पद्मावत में उसका उल्लेख किया है ।

चौपाइयों और दोहों के सानिध्य से कवि ने जैसेे इक नयी शैली खोज निकाली हो । भाषा एकबारगी आपको सरल लग सकती है मगर जैसे-जैसे आप आगे पढ़ते चलेंगे आप ये महसूस करेंगे कि भाषा कई जगह अपभ्रंश होते हुए भी कैसे क्लिष्ट है और अपने अंदर गूढ़ अर्थ समेटे हुए है । अलंकारों और व्यंजनाओं के अनूठे प्रयोग पाठक के मन पे एक अमिट छाप छोड़ती हैं । उदाहरण के लिए एक जगह राजा रत्नसेन कहते हैं, "प्रेम में वही गुण है जो पानी में है । दोनों में एक सी कला है । पानी मृत व्यक्ती को डुबोता नहीं, अपने ऊपर तैरा कर बहा ले जाता है । मैं जानकर प्रेम समुद्र में पड़ा हूँ । वह मुझे डूबा नहीं सकता । उसी के सहारे बहता हुआ जहाँ ले जायेगा वहाँ जा पहुँचूँगा ।"

इस काव्य में जायसी स्वयं भी यह मानते हैं कि रत्नसेन और अलाउद्दीन का संघर्ष दो जातियों की टक्कर नहीं , बल्कि दो आदर्शों की टक्कर है , जो मानव जाति में सदा से रही है ।

कहते हैं अंत में कुछ भी नहीं बचता और शायद इसलिए जायसी जब अपनी इस अनूठी काव्य कृति में ये पूछते हैं कि कहाँ है वो वीर रत्नसेन ? कहाँ है वो बुद्धिमान सुग्गा ? कहाँ हैं वो अलाउदीन ? कहाँ है सुंदरी पद्मावती ? ....तो लगता है कि अब भी कितने प्रासंगिक हैं ये प्रश्न !

जायसी के ही शब्दों में - "कोई नहीं रहा । जग में कहानी भर रह गयी ।"

- कुमार राहुल

19/11/2017

गौरव अदीब की कविताएँ

गौरव कविता और थिएटर से ख़ूब जुड़े हुए हैं, उनकी कविताएँ कई जगह प्रकाशित हैं और कई नाटकों का निर्देशन भी उन्होंने किया है. पिछले दस साल से लगातार लिख रहे हैं और कविता पोस्टर भी बनाते हैं. लिखने की प्रेरणा के बारे में कहते हैं - "पिता लेखन से जुड़े थे, वहीँ से लिखने की प्रेरणा मिली , 14 साल की उम्र में पहली कविता लिखी थी."

अमृता और साहिर के लिए

 (कवि का नोट : - ये तीन कवितायेँ एक श्रृंखला की हैं जिसमें अब तक 38 लिखी जा चुकी हैं अमृता और साहिर की ज़मीन पर इन्हें लिखा गया है।।)

1. 

 सुनो अमृता !! तन की थकन को टूटने की हद तक बरदाश्त कर सकता हूँ बहुत-बहुत बार पहले भी टूटा तो हूँ पर बिखरा नही अब तक हर बार किसी न किसी के लिए समेट लिया ख़ुद को चुपचाप हर बार कुछ कम रह गया लेकिन जितनी बार ख़ुद को समेटा अपना कुछ हिस्सा शायद खोता गया हर बार और अब इतना कम रह गया हूँ ख़ुद में कि टूटता नही हूँ - सीधा बिखर जाता हूँ मन की थकन ऐसे ही होती है अमृता !! तुमने मन को जोड़ना सीखा है क्या ?? सुनो, मन का माथा चूमना कभी आत्मा के गाल लाल हो जाते हैं, सच्ची और इसकी लालरी कहीं नही दिखती मन पर लव बाइट बन जाती है दो लोगों को ही दिखती है ये बस कई बार एक को ही तुम्हारी आत्मा का गोरापन यूँही नही सुहाता मुझे एक कत्थई लव बाइट बनानी है वहाँ गाढ़ी और चिरस्थायी ये मेरे छोटे से घर की नेमप्लेट होगी मेरा घर तो पता है न !! ----------------------------------------------------------- - 2. 

 सुनो अमृता !! देर शाम नीम अँधेरे में जब सूरज घर पहुँच कर मुँह हाथ धो चुका हो और चाँद आने की तैयारी में लगा हो जैसे नाईट शिफ़्ट पर जाने से पहले तैयार होता है कोई वक़्त के इसी पल में ज्यादातर घरों में जब डिनर की तैयारी हो रही हो और A 39 के बाहर लगे सफ़ेद गुलहड़ों ने तुनक कर समेट लिया हो ख़ुद को ख़ुद में जैसे उस रोज़ तुमने समेट लिया था ख़ुद को और लाख कहने पर नही मिलायी थी मुझसे नज़रें दरसल मैं अपनी मौजूदगी की शर्म नापना चाहता था तुम्हारी आँखों में मैं तुम्हारी उँगलियों की पंखुड़ियों को खोल देना चाहता हूँ अपनी हथेली की गर्माहट से होंठो के पास लाकर चूमना चाहता हूँ और घोल देना चाहता हूँ इनमे अपनी साँसों की महक को तुम भी चाहो तो कर सकते हो ऐसा ही कुछ या आज़मा सकते हो वो नया हुनर जो हाल ही में तुमने मुझसे सीखा है लेकिन मैं मानता हूँ कि अभी हुनर को निखारने की गुंजाइश बाकी है बहुत पेड़ की टहनियों के बीच से झाँकती लाइट जब दिखाई थी तुम्हे तुमने यकायक कहा था तुम इस अँधेरे में सुनसान रस्ते पर कहीं दूर तक चलना चाहोगी मेरे साथ ठीक उसी पल से मैं जंगल हुआ जाता हूँ जहाँ से गुम हुई जाती है वो जंगली ख़ुशबू वो जो घुली थी उस रोज़ हवा में सुबह की सारी बेवकूफियां दरसअल इस खुशबू को ढूंढने की कवायद भर थी मैं जंगल हो गया था अकेला बेंच पर अकेले बैठने से डर लगता है मुझे हर मंज़र के कितने पसमंज़र होते हैं !! --------------------------------------------------------------- 3. सुनो अमृता!! कोई भी कविता बहुत अंदर से उपजती है अंतस की तलहटी से वहाँ से जहाँ से नीचे कुछ और नही होता इसीलिए जब अंत में कुछ नही बचता कविता बचती है इसका उपजना इसका आना वैसा ही है जैसे अचानक किसी दरार से नज़र आये कोई नन्ही कोपल सी या सर के ऊपर से गुज़र जाए जहाज़ इनका होना तय नही होता कमोबेश मेरे लिए तो मैं इन्हें खोदकर नही निकाल सकता ये फुहार सा बरस जाती हैं जैसे कल हम एक दुसरे पर बरस गये थे न बादल आये थे न बदली हुई थी अचानक फुहारें आयीं और दोनों के मन भीग गए थे तुमसे दूर होकर कुछ नही लिखा जाता तुम्हारा ह्रदय रस है तुम्हारे चुम्बन शब्द हैं तुम्हारी पीठ कागज़ तुम्हारी गन्ध शिल्प है तुम्हारी आँखें अलंकार तुम्हारे बाल समास हैं और तुम्हारी देह व्याकरण माफ़ करना इन सबके बग़ैर कविता क्यूँकर होगी बोलो !!

15/11/2017

कुँवर नारायण : बाक़ी बची दुनिया उसके बाद का आयोजन है- निशान्त रंजन

इसे महज संयोग ही कहा जा सकता है की परसों अर्थात् 13 नवंबर को मेरे प्रिय लेखक मुक्तिबोध की जन्म शताब्दी थी. रायपुर में उनके जन्म शताब्दी को लेकर जो आयोजन हुआ था, उसमें मेरा भी जाना हुआ था. वहाँ पर भी कुछ दोस्तों से कुंवर नारायण को लेकर बातें हुई थीं. यह भी संयोग ही है की मुक्तिबोध ने भी दुनिया को अलविदा मस्तिष्काघात के चलते ही कहा था. कुंवर नारायण को भी करीब तीन महीने पहले मस्तिष्काघात लगा था और आज यह महान आत्मा हमारे बीच से सदा के लिए अलविदा कह गयी. लेकिन वास्तव में कवि मरते नहीं. मैंनें जाना है की सोना, आभूषण और कवि समय के साथ और भी अधिक महान और मूल्यवान बनते हैं. आज के कठिन समय में समाज को कुंवर नारायण जैसे कवियों की और भी जरूरत है. कुंवर नारायण ने अपने आपको हर विधा में आजमाया चाहे वह कहानी लेखन हो, कविता, निबंध, आलोचना और काव्य तक. वर्ष 2009 में कुंवर नारायण को ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया था. कुंवर नारायण एक ऐसे इंसान थे जो खबर बनने से दूर रहे और बहुतों के लिए आज भी एक अनजान नाम हैं. ज्ञानपीठ पुरस्कार मिलने पर राजेन्द्र यादव ने तीखी टिप्पणी कि थी की '" आज के समय में हिन्दी का ऐसा कोई भी पुरस्कार ऐसा नहीं है। जिसे खरीदा न जा सकता है. इस बात पर कुंवर नारायण ने कहा था कि वैसे तो विवादों का कोई चेहरा और चरित्र नहीं होता पर राजेद्र् यादव जैसे लोग ही माहौल को बनाए रखते हैं. कुछ दिनों पहले मैंने कुंवर नारायण की कविता संग्रह "वाजश्रवा के बहाने" को पढ़ा और उसके बाद मेरे मन में तरह -तरह के विचार तैरने लगे. एक ऐसे कवि जिन्होंने ने कठिन से कठिनतम समय में भी महान मानवीय मूल्यों को बरकरार रखकर जिंदगी के प्रति एक विशेष लगाव, आग्रह,सम्मान का सृजन किया. मेरे मन में जीवित हैं उनके शब्द और मेेरे द्वारा बनाया गया वह चित्र जिसमें नचिकेता अपने पिता से गले मिलते हुए आश्वस्त होता है कि उसके पिता जीवन और संसार आज भी जीवित हैं. नचिकेता कल्पना करता है कि माँ महज शब्द नहीं, बल्कि एक भाषा है, एक दुनिया. नचिकेता लौटना चाहता है अपने घर जहाँ एक खूला आँगन हो और दीवारों पर गुदे हो तुतलाते बच्चों के हस्ताक्षर. नचिकेता के बहाने कुंवर नारायण ने अपने घर और अपने गंतव्य के महत्व को इंगित किया है. पलायनवादियों का अपन घर नहीं होता, कहाँ होता है अप्रवासियों का कोई अपना घर. पर मुझे उम्मीद है की एकदिन मैं लौटूँगा अपने घर, कुंवर नारायण की कविताओं के बहाने ही सही. कुंवर नारायण अपने आप में एक संपूर्ण दुनिया थे.फिल्म समीझा से लेकर कला के विषयों पर भी उन्होंने गहनतम शोध किया. कुंवर नारायण की कविताओं में इतिहास और मिथक, परंपरा और आधुनिकता का एक अनूठा संगम है.कुंवर नारायण हमारे बीच से बस शरीर से दूर हुए हैं. वह हमें मिलते रहेंगे जबभी हम उनकी कविताओं से गुजरेंगे. जैसे कि कुंवर नारायण हमारे बीच इस तरह लौटते रहेंगे कविताओं के माध्यम से जैसे लौटती है पानी में एक मछली और एक मरी हुई मछली भी पानी मेंं ही मिलती है : अबकी बार लौटा तो बृहत्तर लौटूंगा चेहरे पर लगाए नोकदार मूँछें नहीं कमर में बांधें लोहे की पूँछे नहीं जगह दूंगा साथ चल रहे लोगों को तरेर कर न देखूंगा उन्हें भूखी शेर-आँखों से अबकी बार लौटा तो मनुष्यतर लौटूंगा घर से निकलते सड़को पर चलते बसों पर चढ़ते ट्रेनें पकड़ते जगह बेजगह कुचला पड़ा पिद्दी-सा जानवर नहीं अगर बचा रहा तो कृतज्ञतर लौटूंगा अबकी बार लौटा तो हताहत नहीं सबके हिताहित को सोचता पूर्णतर लौटूंगा.

(निशान्त कहानियाँ लिखते हैं और किताबें पढ़ते हैं.)

14/11/2017

YUVA KAVITA #15 SMRITI CHOUDHARY - A PROSE POEM OF SORTS

Smriti says about herself- 
If I had to describe myself in one word, the word would be 'writer', because there's no other part to my soul. I have grown up with my pen, and shall live with it.

 5-4-3-2-1

 The sun’s soft gaze is falling on our eyes, we’re sitting on the wet grass in our backyard, holding a mug of warm coffee in our hands. 

Sun has peeked from the foggy sky for the first time since winter commenced, there are other things hiding behind a fog, and no matter how hard I try, they refuse to peek outside, but today is different, today is a sunny day, for the first time in a long time.
 He places his coffee mug on the grass, and wraps his arm around me. It feels warm, but I’m cold.

 “When I was little”, he begins talking. My mind begins to wander around. It is everywhere, but not in the summer of 99 when he fell off a tree at his grandfather’s farm house, from where he got that scar behind his left ear. I let out a soft giggle, softer than the gaze of sun that is falling on our eyes.
“The scars on my left knee and right foot, they tattooed themselves on me when I was seven. It was a stormy evening, and I was playing with my cousins, when I tripped over. My elder brother carried me all the way back home.” I begin talking to myself.

There is a flood of words echoing around in the walls of my brain, but there’s no way to get them out. The walls are too high. Why are we talking about scars? Scars that don’t hurt anymore, but they’re there, shining brighter than diamonds, announcing that once upon a time, we were all damsels in distress.
“…And that is how this little baby on my elbow came into existence.” He finishes off his sentence. I still don’t know how or when did he get that tiny mark shaped like Harry Potter’s scar on his elbow. All I know is it is there, and it does not hurt anymore, but it is there. I begin looking for five things I can see, the sky, our house, birds, a door, him. A door, but there are no doors inside me, no windows, no peek holes, just a long and high stretch of wall, beyond which lies a world unexplored. He is looking for a door too, a door to my soul, but I have kept him waiting outside. I immediately begin looking for four things I can touch. Coffee mugs, grass, our shoes, him. I can touch him, but why am I so far away. How? I close my eyes and trace my fingers over his face, his forehead, his nose, his lips, him. “Bring me closer, please.” I scream, but not loud enough for him to hear. I realize I need to continue, and I begin looking for three things I can hear. A building under construction in the neighbourhood, a car honk, him. He is still talking about scars. Why can’t he stop? My scars are refusing to leave me, and no, they’re not harmless. They shout and scream into my ears, that once upon a time, I was hurt, and I can be hurt again. They ask me to run as fast as I can, into a huge black hole, to never return again, but he is guarding my walls, and I know I am safe, but these scars push me deep into anticipation of a deadly future.
Quick, two things I can smell. The coffee, and him. They smell vaguely similar, two things I am very fond of. Why is the smell drifting away? I push myself closer to him, to trap that scent with me forever. But beyond my walls, no flower lives on to see the sunshine of the day. I see the vapours rising from the coffee mugs, and disappearing into nothingness. I need to stop them, I need them, I need him. One thing I can taste, him. He leans in for a kiss. For the first time in a while, I am feeling like I’ve reached home. But when he pulls his lips away, I find myself lost again, in the labyrinth that I’ve built, the labyrinth that he’s trying to find a way in, the labyrinth that has made him seem far away, even when he’s beside me, holding my hand, promising to never let go.


My father taught me this trick. Grounding, when the thoughts kick in. Think of five things you can see, four things you can touch, three things you can hear, two things you can smell, one thing you can taste, it connects you with the environment, the connect which you otherwise seem to be losing. It connects me with him, the connect which I otherwise seem to be losing.

16/10/2017

युवा कविता #14 एकांश गुप्ता

मैं एकांश गुप्ता, कहने को तो इंजीनियरिंग कर रहा हूं NIT JAMSHEDPUR से, लेकिन अक्सर हिंदी साहित्य की किताबें पढ़ते हुए पाया जाता हूं।

 मैं क्यों लिखता हूं? इस प्रश्न का कोई मनभावन जवाब ना तो मुझे अब तक मिल पाया है ना उम्मीद है कभी मिल पाएगा । बस अक्सर ऐसा लगता है कोई टीस है मन में जो अक्सर मजबूर करती है अपनी बात कहने को क्योंकि शायद जिस माहौल में हूं, वहां अक्सर अपने मन की बातें कह नहीं पाता। शायद इसलिए ही लिख देता हूं।

सिगरेट

मेरे साथ खड़े दोस्त अक्सर, जब सिगरेट जला लेते हैं। मैं भी अक्सर तुम्हारी, यादों के छल्ले उडाने लगता हूं। इस उम्मीद में किसी रोज, तुम मेरे अंदर से खत्म हो जाओगी। जैसे वह सिगरेट हो जाती है, उंगलियों के बीच में फस कर। मगर यह भूल जाता हूं, उडाने के लिए छल्ले हवा में, कश को अंदर लेना पड़ता है। शायद इसलिए तुम से, जितना दूर जाना चाहा है। अक्सर उतना दिल तुम्हारी, यादों को मन में भर लेता है।। मानो तुम कोई सिगरेट हो, जिंदगी की, जिसे हर शाम, में यादों के लाइटर से, जला लेता हूं।। 


जख्म


कुछ चोटे होती है ना, जो बरहा कुछ नहीं होती। बस छलक उठता है लहू या आंसू। यूं ही कहीं टकराने से, लेकिन हम लोग अपनी आदत से मजबूर। उन्हें, कुरेद कुरेद कर। अक्सर एक करहाता घाव बना देते हैं।। और तड़पते रहते हैं दर्द में, जब तक कोई किसी नश्तर के सहारे से, उसका मुकम्मल इलाज नहीं कर देता।। भर जाता है वह घाव, वक्त की धूप के साए में और, रह जाता है बस एक निशान, अनंत काल तक।। यह बताने को कि, हर चोट को जख्म नहीं बनाया जाता।। अच्छा सुनो, कुछ रिश्ते भी तो ऐसे ही होते हैं ना ?


इश्क हुआ था

 एक शाम में, जब सावन बरस कर जा चुका था। वह तीज का त्योहार भी, अपने नए रंगों से या कुछ मनोभाव से, प्रकृति को सवार कर जा चुका था।। उस रोज तुम थोड़ी देर से आई थी, गुस्सा नहीं था मैं। पर न जाने क्यों तुमने अपना, सुर्ख लाल मेहंदी लगा हाथ आगे कर दिया था ? जिसमें एक दुनिया बसी थी, एकटक देखता रहा था मैं, फिर पता चला कि उस दुनिया के किसी कोने में, मेरे नाम का पहला अक्षर छुपा हुआ था।। उस मेहंदी से, तुमसे, उस पल, उस शाम में फिर से इश्क हुआ था।। फिर एक रोज जब जनवरी की सर्दी जाने को थी तब तुम्हारे नाम से एक कोरियर मिला था उसे देख कर पसीने से भीग गया था जैसे न जाने कौन सी भला आने को थी इतने अरसे बाद यह अचानक क्या और क्यों.? उसमें कार्ड रखा था, "मुझे पता है तुम यह नहीं रखोगे, लेकिन हैंड मेड हार्ड तुम्हें पसंद है इसलिए।" यह एक छोटे से कोने में लिखा हुआ था। उस कार्ड से, तुमसे उस पल, उस शाम में फिरसे इश्क हुआ था।।

फिर कल रात, जब मैं ऐसे ही हर बात लिखना चाहता था। तुम्हारी याद नहीं थी फिजा में कहीं भी, लेकिन दूर कही तूफान में, कुछ लम्हे गिर रहे थे। मैं हर उस ख्याल को खुद से बहुत दूर जमा देना चाहता था। लेकिन रह-रहकर पिघलता रहा था कुछ, मेरे भीतर। शायद वह नफरत थी, जो मैं एक अरसे से तुम से निभा नहीं पाया हूं। या वह मोहब्बत थी, तुमने निभाने का वादा कभी किया ही नहीं था। रात बीत रही थी मेरी आंखों के सामने से, संग उसके बीत रहे थे लम्हे जैसे कल ही सब हुआ था। उन लम्हों से, तुमसे, कल शायद आखिरी दफा इश्क हुआ था।

15/10/2017

युवा कविता #13 आफिज़ा तरन्नुम

आफिज़ा कहती हैं :- 
लिखना सुकून देता है ठीक वैसे ही जैसे की कुछ अच्छा पढ़ना...जब आप चीज़ों को महसूस करते हैं तो दिल करता है उस एहसास, उस पल, उस भावना और उस प्रेम को सहेज कर रख लें हमेशा के लिए... और इसके लिए लिखने से अच्छा और क्या हो सकता है..क्यूँकि कहा हुआ भुलाया जा सकता है पर लिखा हुआ मिटाया नहीं जा सकता



लिखो, 

कि अभी बहुत कुछ लिखा जाना बाकी है लिखो,
कि बहुतों का पढ़ा जाना बाकी है ये न सोचो कि 
लिखने से क्या हासिल होगा ये सोचो कि जो न लिखा तो फिर बहुतों का क्या होगा? तुम्हारे लफ्ज़ देते हैं आवाज़ उन छुपे हुए हौसलों को, दबी हुई चीख को.. लिखो, कि जो न लिखा तो खुद से कैसे नज़रें मिला पाओगे ?

 कलम जो उठे तो किसी का तुम पर यकीन बने

 किसी मासूम के खून के धब्बों को छिपाने के लिए मत लिखो किसी की चीख दबाने के लिए मत लिखो लिखो, जो न लिखा तो बहुत देर हो जाएगी अभी तो है उजियाला समझ का...जो न लिखा तो अंधेर हो जाएगी जो न लिखा तो कैसे भेड़ चाल से अलग कहलाओगे ? जो न लिखा तो मुमकिन है कि जीते जी अपनी अंतरात्मा को मार खाओगे 

लिखो की अभी बहुत ट्रोलिंग भी बाकी है बहुत स्क्रोलिंग भी बाकी है

 क्या हुआ जो है मालूम कि गर लिखा तो क़त्ल कर दिए जाओगे लिखो कि लिखने वालो के दिलो से ये खौफ मिटाना जरूरी है लिखो कि अभी बहुत कुछ लिखा जाना बाकी है...

 PS: हम लड़ेंगे साथी उदास मौसम के लिए! 
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हूँ कौन मैं...

 
खुली हुई किताब हूँ,
या धुंधली सर्द रात हूँ...

लहजे से कोई ना पकड़ सका
इज़्तेराब मेरे हालात का,
मुसलसल गिरती हुई
मैं कोई आबशार हूँ...
 

मुख्तलिफ ख़यालात हैं
ज़माने की भीड़ से,
कौन मासूम, कौन अय्यार
हूँ इसी आज कशमकश में मैं...
समझ सकूँ मैं ये जो फन
मैं उस मौत्ज्ज़े की तलाश हूँ...

हूँ कौन मैं...

मुख़्तसर ये ज़िन्दगी
है मुझको लम्बी लगने लगी,
दिन गुज़रते जा रहे
मंजिल मगर मिलती नहीं,
लड़खड़ाने लगे हैं अब क़दम
मैं कोई खौफ्ज़ेदाह सी राह हूँ...

मुतास्सिर हूँ हर्फों से मैं
है मिलता सुकून वस्ल-ए-कलम से,
दो लफ्ज़ कागज़ पर उतार
मैं सहर के इंतज़ार हूँ..

खुद में हूँ गुमशुदा
या भीड़ में,
वाकिफ़ हूँ हक़ीक़त से फिर भी
मुन्तज़िर कोई ख़्वाब हूँ...

हूँ कौन मैं...

PS: बड़ी Aristocracy है ज़बान में
फ़कीरी में भी नवाबी का मज़ा देती है उर्दू