where it all began

Hearth, in its earlier days, came out in form of a newsletter. while the magazine was a tedious, more strenuous affair and was periodical, Hearth never depended itself on time and was published whenever an incessant need to do so was felt- be it some political or literary incident or the opening of a new joint in the city -
as a famous philosopher once said, we are not prisoned by time but by clocks, we must accept our ruins and our downfalls. true poetry and literature will come out of those.
The cover of the blog is called "LOVERS" and has been clicked by eminent poet and photographer Anurag Vats

24/09/2017

युवा कविता #7 आदित्य प्रकाश वर्मा

आदित्य  दिल्ली में रहते हैं और एक कवि, दिल्ली महाविश्वविद्यालया से स्नातक  और एक शिक्षक हैं. कहते हैं -
मैं कविता लिखता हूं बताने को जो महसूस करता हूं, जो नहीं कह पाता ऐसे ही सीधे।

अकल दाढ़

अकल दाढ़ का निकलना
दर्दनाक परेशान करने वाला हो सकता है
कवि अपनी अकल  दाढ़ से जुझ रहा है
उससे ये पूछ रहा है
क्यों आ जाती हो बार बार ?

क्या कोई नाता है तुम्हारे नाम का तुम्हारे काम से ?

अगर तुम सिर्फ एक मामूली दाढ़ हो
तो मत आओं !!
तुम्हारे आने से पहले भी,
मै ठीक ही चबा रहा था |

शायद अकल दाढ़ को सवाल पसंद नहीं
शायद ये सवाल उसकी अकल पर अंकुश
लग रहे है उसे
और गुस्से में वो
हर लजीज  दावत के बाद
मेरा खून बहा, मुझे ही पिला देती है
मेरा सुजा हुआ गाल और
शरीर का बढा हुआ तापमान
उसकी नाराजगी की निशानी है

एक तरफ कवि है कि
उसके बिना खाना भी नहीं खाता

अकल दाढ़ का निकलना
कुछ सालों या
ज़िन्दगी भर का रासा (झंझट) हो सकता है

अगर तुम पिघलो

तुम बर्फ की एक चट्टान हो
तो मैं प्यार सा गर्म
थाम लूं तुमको मैं
अगर तुम पिघलो
तो फैल जाना मुझ पर
जैसे आकाश धरा पर
तुम वो सूरज मत बनना
वो सिर्फ दिन का साथी
अंधेरा कर चला जाता है
रात में
चांद सी यादें दिए

अगर तुम पिघलो
तो लेना रुप रुधिर
फैल जाना मुझ में
तुम वो सांस मत बनना
जो सिर्फ एक  पल साथ  
फिर खो जाती है

अगर तुम पिघलो
तो समय हो जाना , फैल जाना
मेरे भूत, भविष्य और वर्तमान पर
तुम वो अच्छे दिन मत बनना 

अगर तुम पिघलो
तो मौत बनना
बस आ जाना
ज़िन्दगी मत बनना
जो सिर्फ चार दिन की है.

19/09/2017

युवा कविता #6 अभिषेक राज

अभिषेक मगध यूनिवर्सिटी से अंग्रेजी में स्नातक की डिग्री ले रहे हैं. अभी प्रथम वर्ष में हैं. कहते हैं - ज्यादातर हिंदी में ही लिखता हूँ ।
मुहब्बत की गज़लें और कविताएँ लिखता हूँ। 1. 

छत के घेरे से टिककर वो प्रेमी देख रहा है चाँद को देख-देख कर खुश होता है, चाँद की चमक ; हवाओं की सरसराहट में सुनता है पाजेब की खनक ; मुस्कुराता है, हँसता है हवा में किसी का नाम लिखता है। चाँद कोने में खड़ा देखता है तमाशा उसका , जानता है, सब समझता है देख रहा है मुद्दतों से वो प्रेमियों का खुश होना, उसे पता है कुछ समय बाद आएगा ये इसी छत पर आँसू बहाने, चाँद फीकी हँसी हँसता है ।। 2.
 लोग अक्सर मुझसे पूछते हैं मेरी मोहब्बत की दास्ताँ और वो बातें, जज्बातें अनसुलझी मुलाकातें; मैं अक्सर मौन हो जाता हूँ उनके सामने जब मैं शब्दों से शून्य नहीं माप पाता कह नहीं पाता कि समंदर की गहराई दिखाई नहीं देती हाँ कूद कर माप सको तो संभव है भवसागर पार होना । 3. 
तुझे भुलाने की कोशिशों में हद से गुजर भी जाऊँ फिर भी मुमकिन है तेरी तस्वीर आँखों से होकर दिल तक पहुँच जायेगी मैं धड़कनें रोक भी दूँ पर क्या करूँ तुम जो मुझ में साँस लेती हो मेरा कहा कब मानोगी । 4. 
किसी पेड़ के सूखे पत्तों की तरह मेरे ख्वाब गिर पड़ते हैं आँखों से बेजान होकर, चुपचाप निकल पड़ते हैं दर्द से परेशान होकर ; उनको भी पता है मुश्किल है जिन्दा रहना मुर्दों की तरह ।। 5. 
ये भी रोज़ का हिस्सा हो गया है, चाँद का निकलना मेरा उसे तकना , न किसी रोज़ चाँद को नींद आती है न मुझे ; अब धरती को ही कुछ करना होगा मुँह फेर लो इस चाँद से ।

18/09/2017

युवा कविता #5 अभिषेक

अभिषेक पटना में रहते हैंऔर कवितायेँ पढ़ते लिखते हैं.वो कहते हैं - 

पढना अच्छा लगता है. पढते-पढते जब मन के भाव आकार लेने लगते तो लिखने की कोशिश करता हूँ। सीखने की जिज्ञासा है।




1.
 हलकी बरसातों से गर्मियां बढ़ गयी है मिटटी की खुशबू भी आ रही है कुछ तो भींगा होगा कोई कही से तो कोई कविता निकली होगी किसी पागल ने कही कुछ उखेरा होगा 
बादलों पर फिर कविता को सोच नहीं बोल सकते कुछ सोच के नहीं लिखता कोई लिखने की ज़िद में कोई नहीं लिख पाता कुछ शब्द आते हैं  अचानक से कागज़ों पर उतर गए तो पंक्तियाँ बन गयी यादों की सिसकियाँ  मन की चंचलता शब्दों से प्रेम 
कविता है 

कहीं भी ,कभी भी , कुछ भी शब्दों की माला फिरो ली
कविता है|| 2.
 नदी से किनारे सटा हुआ घर और घाट पर एक मंदिर पीपल के पेड़ नीचे ताश खेलते लोग आज भी जाता हूं तो मिलते है लोग पर चेहरे बदले हुये हैं  नदी भी लगभग आधी सूख चुकी है वो शोर नहीं है  जो घर के बरामदे से ही सुनाई देता था  लगता है नदी के उस पार कोई नहीं रहता सिर्फ पंछियों को जाते देखा है आसमान गिरते हुए दूसरी छोर नज़र आता है बस और कभी -कभी कुछ मौसमी मछुआरे अनायास ही जीविका ढूंढते इस  सिथिर पानी में इस बदलते,
आधुनिकता के दौर में विलीन होती 
वो नदी

17/09/2017

मन भर लिख सकूँ और अपनी शैली में स्वीकार की जाऊं - अपर्णा अनेकवर्णा


अपर्णा अनेकवर्णा हमारे समय की ज़रूरी कवि हैं. हिंदी के अलावे अंग्रेजी में भी लिखती हैं. इनकी अपनी शैली और अपना कहन है . काफी डाइवर्स पढ़ती हैं और खूब लिखती हैं.


 १. कविता क्या है आपके हिसाब से? क्यों लिखनी शुरू की? 

 कविता को मैं पद्य में बाँध कर नहीं देख पाती. मुझे कविता की सम्भावना और उसकी उपस्थिति हर जगह दिखती है. वो संवेदना हो, नौ रसों में सिक्त क्रिया-प्रतिक्रिया हो या उनकी अनुपस्थिति हो, प्रकृति के हर स्वरुप में, गद्य में हो, कविता हर जगह है. अपनी 'रॉ' और 'प्राइमल फॉर्म' में. जो हम शब्दों में अभिव्यक्त कर पाते हैं वो 'टिप ऑफ़ द आइसबर्ग' ही है. मैंने कविता जीवन के चौथे दशक में प्रवेश करने के बाद लिखनी शुरू की. तो मैं ये कह सकती हूँ कविता ने मुझे चुना. एक परिपक्वता को पाने के बाद ही मैं स्वयं में इससे साक्षात्कार कर सकी. उसके पहले मैं एक पूर्ण रूप से समर्पित और सम्मोहित पाठक ही थी और उपन्यास ही मेरी सर्वप्रिय विधा थी. हिंदी साहित्य से भी यथासंभव समग्र रूप में जुड़ना इन चार सालों में ही हुआ. मैं ये भी नहीं जानती कि ये कृपादृष्टि कब तक रहेगी पर ये बात निश्चित है की इन चार सालों में एक काव्य-बोध उत्पन्न और विकसित हुआ है और आगे भी हो रहा है. २.पठन का रचना में क्या योगदान है, आपको क्या लगता है?

 किसी भी कवि की आरंभिक रचनाओं में एक कच्चापन होता है जो कि एक अजीब सा आकर्षण और ताज़गी लिए होता है. उसकी मौलिकता अपनी उपस्थिति दर्ज़ करा रही होती है. इसमें बेपरवाह उड़ान का उद्घोष और कहीं नयेपन का संकोच भी होता है. पर इस फेज़ के बाद कविता में एक ठहराव नहीं आये तो यही गुण चुभने लगते हैं. पठन से लेखन को एक दिशा मिलती है. बल्कि मेरा अनुभव रहा है कि रचनाकार जितने ही भाषाओं और संस्कृतियों से जुड़ता है उसका संसार को देखने का नजरिया उतना ही विस्तृत होता जाता है. और एक कवि का संकुचित रह जाना अक्षम्य अपराध है. पठन प्रचलित और अनोखे बिम्बों और शैलियों से परिचित करता है. कभी आपको ये आश्वस्ति होती है कि मुझ सी सोच वाले और भी हैं. ३. पहली पढ़ी हुई कविता कौन सी याद आती है? प्रिय कविता कौन सी है ? प्रिय कवि कौन हैं?

 मेरी शिक्षा उत्तर प्रदेश माध्यमिक बोर्ड (हिंदी माध्यम) से हुयी. साहित्यिक हिंदी ही पढ़ाई गयी और छायावाद तक के कवियों से परिचय हुआ. पता नहीं क्यों हमें आधुनिक कविता बिलकुल ही नहीं पढ़ाई गयी. महादेवी वर्मा और कबीर शुरू से अच्छे लगे. 'मैं नीर भरी दुःख की बदरी' ने तब मात्र उस दृष्टि के कारण बहुत प्रभावित किया. सुभद्रा कुमारी चौहान की 'बुंदेले हरबोलों के मुंह' भी अपनी अभूतपूर्व ऊर्जा के कारण पसंद थी. उसका सस्वर पाठ किया जाता. पर कबीर पर लौट लौट आती. सुबह रेडियो पर भजन में भी कबीरवाणी अलग तरह से प्रभावित करती थी. फिर उपन्यास आये जीवन में और कविता कहीं पीछे छूट गयी. 'धर्मयुग' में डॉ धर्मवीर भारती की लिखी एक लम्बी कविता ने भी बहुत प्रभावित किया था. वो गंगा दशहरा पर लिखी थी उन्होंने.. जल प्रवाह में बहते कनेर के गुच्छे का बिम्ब आज भी याद है. किसी भी कवि की सभी कवितायेँ अच्छी नहीं हो सकतीं. पर कुछ रचनाकार हैं जिनकी शैली प्रभावित करती है.. जिनमें कुंवर नारायण अरुण कमल, दिलीप चित्रे, तेजी ग्रोवर, पारुल पुखराज, अनुराधा सिंह, दर्पण शाह, आशुतोष दुबे, अम्बर पांडेय की शैली प्रभावित करती है. जितना पढ़ रही हूँ उतना ही सीख रही हूँ. अनेक और नाम हैं. ४. कविता का रोल क्या है - समाज के सन्दर्भ में, या अन्य कोई सन्दर्भ आपके हिसाब से? क्या उसकी प्रासंगिकता जिंदा है अभी भी?

 कविता की प्रासंगिकता हमेशा ही रहेगी. शायद हम उसे समझ भी नहीं पाते पर वो मनुष्य होने की एक आवश्यक शर्त है. हमारे भीतर जो भी आवेग संवेग है, वो किसी गीत, ग़ज़ल, शायरी, कविता, भजन, लोक गीत, यहाँ तक कि नए युग के नए प्रतिमानों पर कसे हुए नए बोल, धुन के गीत.. जो किसी एक भाषा के मोहताज नहीं, में अभिव्यक्ति पाते हैं, हम उनसे रिलेट करते हैं. बदलाव कितने भी आ जाएँ कविता किसी न किसी रूप में हमेशा रहेगी. ५. क्या पढना है इसका चयन करने का आपका क्या तरीका है?

 कुछ तो 'वर्ड ऑफ़ माउथ' से, और बाकी अपने इंस्टिंक्ट और कुछ पूर्व अनुभव से चुनती हूँ. अब बहुत कुछ नेट पर उपलब्ध है तो वहां से पढ़कर एक अनुमान लग ही जाता है. हाँ, यहाँ भी आश्चर्यजनक और अनअपेक्षित रूप से गलत भी साबित होती हूँ. वो भी रोचक होता है. ६. लिखते हुए शिल्प कितना महत्वपूर्ण होता है?

 छंदमुक्त ही लिखती रही हूँ तो और भी ज़रूरी हो जाता है कि इस आज़ादी में अराजक न हो जाऊं. तो शिल्प का एक मोटा-मोटा खांचा तो आपके ज़हन में होना ही चाहिए. मसलन कविता है तो प्रथम शर्त तो यही है कि लय होनी ही चाहिए. मुझे संस्कृतनिष्ट-हिंदी और उर्दू का घालमेल नहीं पसंद. अंग्रेजी के कुछ शब्द कभी कभी और अधिकतर हिन्दुस्तानी ही प्रयोग करती हूँ. अनावश्यक विस्तार भी ध्यान भटकाता है, एकरसता उत्पन्न करता है. बाकी इतना ध्यान तो रखती ही हूँ कि जो कहना है वो कम से कम शब्दों में भरपूर कह सकूं. ७. कविता से चरम महत्वाकांक्षा क्या है - प्रसिद्धि , पैसा, अमरता - कवि आखिर में क्या चाहता है?

 अपनी बात कहूँ तो जो इच्छा धीरे धीरे पनपी वो यही थी कि मैं अपने मन भर लिख सकूं और मुझे मेरी शैली में ही स्वीकार किया जाए. पाठक कम हों पर वो मेरी कविता को जस का तस समझ आनंद लें. संभव हो तो अपना पाठ भी जोड़ें. आप इसे प्रसिद्धि ही समझ लें और मैं इसे अमरता से भी जोड़ कर देखती हूँ. यहाँ ये स्पष्ट करना चाहती हूँ कि अन्य किसी भी क्षेत्र की तरह साहित्य में भी सभी हथकंडों का प्रचलन है और इसका आपके एक प्रतिभाशाली रचनाकार होने न होने से कोई सम्बन्ध नहीं. बहुत भ्रम भी टूटे और अच्छा हुआ कि टूटे. उसने मुझे भयमुक्त और आज़ाद किया है.

 ८. नए लिखने वालों के लिए क्या सलाह देंगे?

 अभी तो खुद को ही नया ही मानती हूँ. पर अपने वयस के अनुभवों की और लम्बे समय से एक पाठक बने रहने के बाद लेखन में आने की भी एक विशेष 'वरीष्ठता' है. तो हर नए और कमउम्र लिखने वालों को कहूँगी कि खूब पढ़ें और लोक से लेकर विश्व साहित्य सब पढ़ें, सिनेमा, थिएटर, कला, संगीत से भी यथासंभव जुड़ें, एक विस्तृत और उदार दृष्टिकोण विकसित करें और सबसे महत्वपूर्ण कुछ भी नया प्रयोग करने से न झिझकें. ये आपमें एक परिपक्वता, एक दर्शन, एक मौलिकता, एक साहस भरेगा जो आपके लेखन में हर बार परिलक्षित होगा. ९. इधर क्या पढ़ रहे हैं और कौन सी किताबें आपको लगता है कि हर किसी को पढनी चाहिए?

 मैंने गेब्रियल गार्सीअ मार्क्वेज़ की 'वन हंड्रेड इयर्स ऑफ़ सोलिट्यूड' अंग्रेजी में जो कि स्पेनिश का अनुवाद थी, को कॉलेज में पढ़ा था और बेहद मुतास्सिर हुयी थी. बल्कि जादुई यथार्थवाद मेरा प्रिय जॉनर बन गया था. आजकल मैं उसका हिंदी अनुवाद पढ़ रही हूँ जो आउट ऑफ़ प्रिंट होने की वजह से फोटोकॉपी ही उपलब्ध हो सका है. तो इस 'ट्वाइस रिमूव्ड वर्शन' का भी एक अलग आनंद है. दिलीप चित्रे की अंग्रेजी और मराठी कविताओं का हिंदी अनुवाद पढ़ रही हूँ. पढ़ने के लिए जो ऊर्जा और समय चाहिए वो कमउम्र में भरपूर होती है. मैं पठन को किसी सीमा में नहीं बांधना चाहती. बल्कि आप सब कुछ पढ़ें जो और जितना पढ़ सकें. नयी भाषाएँ सीखें. मूल नहीं आता तो अनुवाद पढ़ें. हर जॉनर को पढ़ें और समृद्ध हों.

12/09/2017

युवा कविता #4 हिमांशु

"मैं क्यों लिखता हूँ?" - मैं प्रेम में लिखता हूँ। कभी अत्यधिक प्रेम मिलने पर लिखता हूँ, कभी बिल्कुल नहीं मिलने पर लिखता हूँ। कभी प्रेम मिलने की उम्मीद में लिखता हूँ, तो कभी प्रेम देने की चाह में लिखता हूँ।


 स्याह रातों की बात जिन रातों को मुझे कोई बेचैनी नहीं थी, जिन रातों को मुझे कोई उलझन नहीं थी, जिन रातों को मुझे कोई इंतेज़ार नहीं था, पर जब मैं देखता था दीवारों पर लगे मकड़ी के उन जालों को, जब मैं सुनता था पानी के बूंदों की निरंतर आती टप-टप की आवाज़ को, जब मैं सोचता था बाहर पसरे मुर्दा सन्नाटे के बारे में, ये उन स्याह रातों की बातें हैं। कहते हैं सपने सोने नहीं देते। सपना ही था कोई, या शायद तैयारी हो रही थी मन में कहीं, उस सपने को जीने की। या शायद युक्तियां सोची जा रही थी, उस सपने को उन स्याह रातों के कैद से निकालने की। पर एक जूनून और भी था आने वाले सूरज को रोक लेने का। सुबह के लाल सूरज से कोई दिक्कत थी शायद। या शायद आसमान में बिखरी सूरज की लालिमा पसंद नहीं थी। रोशनाई के गाढ़े-नीले रंग सा आसमान चाहिए था जब मुझे ये उन स्याह रातों की बातें हैं। उड़ान भरनी थी मुझे, उस पतंग के साथ जो मैंने खुद बनायी थी। पर मेरी बनायी पतंग भी मेरी तरह ही उड़ने से डरती थी। डरती थी कहीं हवा तेज़ हुई तो क्या करेगी। मैं भी डरता था। डरता था कहीं पंख ना खुले तो क्या करूँगा। धीरे-धीरे वो समझ गयी कि तेज़ हवा में वो खुल के उड़ पायेगी। एक दिन मैंने अपनी पतंग को आसमान में छोड़ दिया। मेरे रोशनाई वाले गाढ़े-नीले आसमान में। मेरी पतंग अब उड़ने लगी थी, सपने अब भी कैद थे। मैं अब भी डरता था। हिम्मत के धागे जोड़ने थे जब मुझे ये उन स्याह रातों की बातें हैं।


 
मैं तुम्हारा कवि नहीं हूँ मैं तुम्हारा कवि नहीं हूँ। तुम्हारी ये उम्मीद मुझसे फ़ालतू है कि मेरी कविता तुम्हारे लिए नाचेगी। ये मेरी कविता है। पर तुम इसे मेरा भोंपू समझो। मेरी ये कविता मेरे हिसाब से बोलेगी। मैं चाहूंगा तो गधे के ढेंचू में लय ढूंढेगी, या किसी बजबजाते नाले की तरह बदबू देगी। पर ये तुम्हारे आगे नहीं नाचेगी। खोखले उम्मीदों की लिपा-पोती भी मेरी मर्ज़ी से होगी। और ठरक की मात्रा भी मैं ही तय करूँगा। तुम्हारे बाल खुले रखने से मेरी कविता का कोई लेना देना नहीं है। तुम्हारे स्तनों के बीच फंसा लॉकेट, मेरी कविता नहीं निकालेगी। तुम चाहे जो कर लो, मेरी कविता तुम्हारी मेहंदी का रंग गाढ़ा नहीं करेगी। तुम चाहो तो नसें काट लो अपनी, या रो-रो कर गला फाड़ लो अपना। बता दो सबको मैं कितना गिरा हुआ था, ले लो सबकी झूठी सहानुभूति ख़्वाब पाल लो मुझे पछाड़ देने के। मेरी कविता तुम्हारे सारे भ्रम तोड़ देगी। मेरी कविता तुम्हारे आगे नहीं नाचेगी। क्योंकि मैं, तुम्हारा कवि नहीं हूँ।



तुम्हारी है तुम ही संभालो ये दुनिया नकार दो मुझे। मत पढ़ो मुझे। क्यूँ पढ़ना मुझे, या मेरे लिखे किसी भी झूठ को। नापसंद हो जाऊं मैं, तुम्हारे चित्त से उतर जाऊं, यही चाहता हूँ मैं। मैं चाहता हूँ तुम छोड़ दो मुझसे अब कोई आस रखना। अब तक तुम्हारे जैसा हो कर, जो भी कमाया है मैंने, सब झूठ है। अब और झूठ कमाना मेरे बस का नहीं। तुम्हारी ये दुनिया, जो बस झूठ पर चलती है, इसका हिस्सा बनना अब, नहीं चाहता हूँ मैं। नहीं चाहता हूँ तुम्हारी दुनिया का झूठा प्यार। सच्चे मन से आया था मैं, पर तुमने, और तुम्हारे जैसे तमाशबीनों ने, झूठे प्यार का जो चोगा डाल दिया है मेरे ऊपर वो मेरे सच्चाई का ईनाम नहीं है। ये जो तुमने षड़यंत्र रचा है झूठी शोहरत का, इसके दांव-पेंच सीखना नहीं चाहता हूँ मैं। मैं धड़ाम से मुँह के बल गिर जाना चाहता हूँ। तुम्हारे झूठे आसमान में उड़ने से बेहतर है गिर जाना। क्योंकि गिर का संभला जा सकता है, पर अगर एक बार, तुम्हारे बनाये किसी झूठ की अट्टालिका से टकरा गया, तो टूट कर ढहे हुए उसी मलबे में शामिल हो जाऊंगा। उस मलबेे तले अपने सूरज बिना, मुरझाई हुई कोम्पल बनना, नहीं चाहता हूँ मैं। मैं डरा नहीं हूँ तुम्हारे इस झूठे मायाजाल से। बस इतना साहस मैंने पहले कभी महसूस नहीं किया था। इतना साहस कि अकेला हो जाऊं, अपनी सच्चाई के साथ। मेरी वही सच्चाई जिसको तुम भ्रष्ट करने देना चाहते हो, अपने जैसा बना देने की होड़ में। तुम्हारे चंद ठहाकों के लिए, और सस्ता हो जाना, नहीं चाहता हूँ मैं। मंजूर है मुझे बंद हो जाना अकेलेपन की काल-कोठरी में। तुम्हारे झूठे इशारों से मन बहलाने से बेहतर है वो। पर उस अँधेरी कोठरी से, मेरा कालजयी सच बाहर निकले, शायद उसको भी तुम नकार दो, जिसे तुम अनसुना कर दो, पर मेरा वही सच मेरे साथ चले और मेरी पहचान बने, वही सच तुम्हारे कानों को बहरा कर देने तक गूँजें, यही चाहता हूँ मैं

01/09/2017

युवा कविता #3 सना आसिफ


सना पटना में रहती हैं और अभी पटना विश्वविद्यालय से अंग्रेजी में एम ए कर रही हैं. 
क्यों लिखती हैं ?
-मैं लिखती हूँ मगर क्यों ये कभी सोचा ही नही। लिखना अच्छा लगता है शायद इसलिए।


1.

पता है!
कल एक तितली आई थी मिलने
बाहर की दुनिया की ख़बर लाई थी 
आसमान का रंग अब भी नीला ही है
पेड़ अब भी झूमते गाते हैं 
झूले भी लगते हैं उनपर 
शाम में फ़िज़ा उतनी ही रंगीन होती है
तारे अब भी टिमटिमाते हैं 
लेकिन अब उन्हें देखकर 
सफ़र कोई नहीं करता 
कोई उनसे रास्ता नहीं पूछता 
तारे अब लोगों की मुट्ठी में होते हैं।
मेरा तारा खो गया था कहीं 
मेरा सफ़र अधूरा ही रहा
या यूँ कहें पिंजरे तक का सफ़र 
मुकम्मल हुआ।

2.

ये टोपी, ये चश्मे
सब नए ले लिए हैं 
तुमने,
पोशाक भी तो 
नए ही हैं ना
रंग रूप सब अलग
भेस ही बदल डाला
पहचान अलग बना ली।
मगर फिर भी तुम्हें
पहचान लेती हूँ 
तुम्हारे पुराने जूते से
जो धूल से सने हुए
ज़मीन पे ही होते हैं।

3.

क्या कहा?
मेरा कमरा देखना चाहते हो?
हाँ आओ, अंदर आओ।
नहीं नहीं, जूते मत उतारो
ऐसे ही आ जाओ।
यहाँ कुरसी पे बैठो।
माफ़ करना 
अस्त व्यस्त है सब
बिस्तर के आधे हिस्से में 
किताबें फैली हुईं हैं।
कपड़े बिखरे पड़े हैं।
समय ही नहीं समेटूँ सब।

अच्छा वह श्रृंगार मेज़!
हाँ कई वर्ष पुराना है।
आईना चनक गया था,
घर बदली के समय ही।
क्या? 
अपशगुन?
क्या कहा? बनवा दोगे?
जब मैं कहुँ? ठीक है।
किताब की अलमारी?
हाँ अवश्य देखो।
अच्छा! तुम्हें भी यह कवि पसंद है।
तुम बैठो।
मैं चाय लाती हुँ।
शक्कर कितनी लोगे?

29/08/2017

Bandukbaz Babumoshay : the cult it could have been.



Vast deserted wastelands, two cheeky killers, some selfish politicians/mafia trying to usurp power, a couple of freewheeling women, a lot of guns and bullets and sharp dialogues entwined in a plot which showed promise at least in the first half - bandukbaz babumoshay had all the potential in the world to become a cult in a genre defining way. 

It could have been a tarantino flick - american west like in all its splendour with all the black humour, the accent, the abuse and unique characters. 

the first half got me very excited - the main anti-hero pretty tight about his rules of killing, a sidekick wanting to be better than the guru, their tussels, the sex - in my heart i started rooting for a convulated version of a sort of batman-jason todd thing- vigilantes, only contract killers, on adventures in an indian version of american west, dealing with love, politics and police. 

is it too wrong to dream? 

what started with a brilliant nawaz - too much in ease , to the point that it often seems repetitive on his part, and a good story unfurling - the last two acts of the film seemed falling apart. i often found myself yearning for "keh ke loonga" track from GOW, as the music could not compete.

the killings in the last half an hour seemed too easy, the surprise in the climax seemed heavy and not at all exciting and once we got that out of the way , the ending had no surprises whatsoever. 

i wonder if there are the director cuts of these films where they shed the necessity of moral correctness,  straight jacketed explanatory conclusions and rugged stereotyping of characters and make them the way they want to because who is a genius in the first half of the film must remain so in the second half. after all, it is the same person or people who is behind the camera or who is writing? 

the actors were in place - most of them at least, treating their material with appropriate correctness and dedication, the music at times appealed.

the editing could have helped condensing - too many kids, an unnecessary scene at the butcher even if it was a homage to GOW,  and too many policemen dying in the end did not favour the overall structure of the film

but what could have begun as the adventures of babu bihari and banke bihari got all entangled in itself and yet 

in an industry where Cinema generally is not an art in itself, serious viewers seldom go to the theater to watch a hindi film, generally never expecting more than a few punch lines and a couple of rap-mixed loud soundtracks can watch this one for both biharis, the inspector with the piles problem, dubey, fulwa and the inspector who fell in love with the female politician. 

3 stars - all earned for the way the director set up the story, with that kind of cast, you know acting is not going to be the main concern.

(anchit writes. )

28/08/2017

कविता से चरम महत्वाकांक्षी व्यक्ति हमेशा निराश रहते हैं : राजकिशोर राजन

राजकिशोर राजन हमारे समय के ज़रूरी और चर्चित कवि हैं, इनके चार कविता संग्रह आ चुके हैं और "कुशीनारा से गुज़रते हुए" सबसे हाल का संग्रह है. राजन भाई काफी कुछ पढ़ते रहते हैं और आलोचना और अनुवाद में भी उनके कई काम हैं. उनसे हमने बातचीत की. १. कविता क्या है आपके हिसाब से? क्यों लिखनी शुरू की? 
  
कविता अपरिभाषेय रही है अब तक।अब तक जो भी परिभाषाएं दी गयीं वे पूर्व से अधिक रिक्त रहीं।कविता शब्दों से लिखी जाती है पर वे मात्र शब्द नहीं हैं।पता नहीं क्यों लिखना शुरू किया।हाँ,इतना पता है कि जब बहुतों से कुछ कहना चाहता हूँ और सुनना चाहता हूँ तो संवाद के लिए लिखना शुरू किया।

 २. पठन का रचना में क्या योगदान है, आपको क्या लगता है? 

 पठन से रिक्त हुआ जाता है।मनुष्य जितना पठन पाठन करेगा उसी मात्रा में रिक्त होगा और अपनी लघुता से साक्षात्कार करेगा।अगर ऐसा नहीं तो बुनियाद में दोष है।पठन के बाद ही पता लगता है कि जो कागज़ मेरे सामने है उस पर न्य क्या लिख दूँ जो थोडा-बहुत पूर्व से भिन्न हो।

 ३. पहली पढ़ी हुई कविता कौन सी याद आती है? प्रिय कविता कौन सी है ? प्रिय कवि कौन हैं? 
  
पहली पढ़ी हुई कविता याद नहीं कौन सी थी।प्रिय कविताएँ कई कई हैं किनका नाम गिनायें।प्रिय कवियों में तुलसी,कबीर,निराला,नागार्जुन,त्रिलोचन,मुक्तिबोध,केदारनाथ सिंह,राजेश जोशी ,अरुण कमल आदि हैं।

४. कविता का रोल क्या है - समाज के सन्दर्भ में, या अन्य कोई सन्दर्भ आपके हिसाब से? क्या उसकी प्रासंगिकता जिंदा है अभी भी? 

. कविता लिखना,मनुष्य होना है।और मनुष्य को मनुष्य होना है,इसीलिए कविता की प्रासंगिकता बढ़ती जायेगी।

५. क्या पढना है इसका चयन करने का आपका क्या तरीका है?


 प्रिय विषय और अलहदा पन,चयन का आधार है।
  ६. लिखते हुए शिल्प कितना महत्वपूर्ण होता है?

  लेखन अंततः कला है।कला को सुन्दर तो होना ही चाहिए,सच हो तो बहुत अच्छा।इसी सुंदरता और सच्चाई को साधते हुए आगे बढ़ना है।कला या शिल्प उसी तरह जरूरी है जितना दाल में नमक,चाय में चीनी।मात्रा सही हो तो ठीक नहीं तो सब कुछ बेकार।मेरा मानना है कि लेखक अपनी वैचारिक दरिद्रता को ढंकने के लिए शिल्प के समक्ष आत्मसमर्पण कर देते हैं।उन्हें कलावादी ,रूपवादी कहा जाता है।

 ७. कविता से चरम महत्वाकांक्षा क्या है - प्रसिद्धि , पैसा, अमरता - कवि आखिर में क्या चाहता है?

 कविता से चरम महत्वाकांक्षी व्यक्ति हमेशा निराश रहते हैं।यह एक जटिल प्रश्न है।बहुतों के लिए प्रसिद्धि,पैसा,अमरता, तीनों है जबकि ऐसे भी रचनाकार हैं जिनके लिए ये गौण है।

 ८. नए लिखने वालों के लिए क्या सलाह देंगे?

 नए को क्या सलाह देना।साहित्य में कोई पुराना कब होता है।एक तो जीवन है,दुनिया भर के काम हैं।बहुत कुछ तो छुट जाता है जो हथेली पर आता है वह एक बूँद के समान है।लेकिन जैसा की बुद्ध ने कहा है--संसार में कोई किसी का दीपक नहीं बन सकता है,इसीलिए तुम अपना दीपक स्वयं बनो।किसी की बात इस लिए मत मान लो कि किसी महत्वपूर्ण किताब में लिखी हुई है अथवा किसी महत्वपूर्ण व्यक्ति ने कही है।तुम अपने सोचो,अपने विचारो और लगे की सही हो तो मानो नहीं तो मत मानो।आगे बढ़ जाओ।

 ९. इधर क्या पढ़ रहे हैं और कौन सी किताबें आपको लगता है कि हर किसी को पढनी चाहिए?

इधर ,वोल्गा से गंगा,शेखर एक जीवनी,महागुरु मुक्तिबोध-कांति कुमार जैन,त्यागपत्र-जैनेन्द्र,वैश्या एवलिन रे-ब्रेख्त,मुक्तिमार्ग-हॉवर्ड फ़ास्ट पढ़ रहा हूँ।एक एक कर।अधिकतर दूसरी बार। मुझे लगता है कि रामचरित मानस,वोल्गा से गंगा,गोदान,मैला आँचल आदि सबको पढ़नी चाहिए।

27/08/2017

आत्मकथ्य : निशांत रंजन

मेरी  स्मृतियां  फीकी  पड़  रही  हैं. मुझे  अच्छी  तरह  यह  भी  याद  नहीं कि  पाँच  साल  पहले  मैं  अपने  घर  से  किस  तरह  बहुत  दूर  चला  आया था. एक  मक़सद  से  निकला था, मुट्ठी  भर  सपने  को  अपनी  झोली  में  लेकर, पक्के  इरादों  के  साथ. यादों  के  नाम पर  बस इतना  ही  याद  है  कि  माथे  पर  माँ  का चुंबन  की  हल्की  सी  नमी  को  लेकर निकला  था, दादी  ने  अपनी  झोली  भर  आशीर्वाद  दिया  था. बूढ़े  दादा  को  वादा  देकर  निकला  था  कि  आपकी  खाँसी  का  इलाज़  जरूर  करवाऊँगा. 

साथ  लेकर  कुछ  भी  तो  नहीं  निकला  था. थके  माँदे  पिता  स्टेशन  तक  साथ  आये  थे  और  तब तक  जमे  रहे  जबतक  रेलगाड़ी  खुल  नहीं   गई. रेलगाड़ी  धीरे-धीरे  स्टेशन  को  छोड़  रही  थी. मेरे  मन  में  अमर  चीटियों  का  सैलाब  उमड़  आया  था. 

तो  मैं  घर  से  क्यों  निकला  था ? किसके  लिए  निकला  था ? मैंने इरादे  पक्के  क्यों  कर  रखे  थे ? रेवायत  के  अनुसार  मेरी  उम्र  के  लड़के  तीन  वजहों  से  अपने  घर  से  निकलते  हैं. परीक्षा  में  फेल  होने  पर, अपनी  प्रियतमा के  साथ  नयी  दुनियाँ गढ़ने  को  और  कुछ  लोग  इंजीनियरिंग  करने  निकलते  हैं. मैं  इंजीनियरिंग  करने  निकला  था. इंजीनियर  बनने  निकला  था. 

इंजीनियर  बनने  के  पहले  ही  मैं  बोझ  से  दब  गया  था. खेती  के  लिए  लिया  गया  लोन  भरा भी  नहीं  गया  था  कि  पिता  को  मेरी  पढ़ाई  के  लिए  फिर  से  लोन  लेना  पड़ा.  मेरे  पिता  के  सपने  ऋण  से  ही  पूरे  होते  थे. उनके  सपने  बहुत  छोटे-छोटे  थे. उन्होंने  अपनी  ज़िन्दगी  में  बस  दो  बड़े  सपने  देखे  थे. पहला  सपना  अपनी  बेटी  को  एक  नौकरीशुदा  लड़के  से  शादी  करना  और  दूसरा  अपने  एकमात्र  बेटे  को  इंजीनियर  बनाना. अगर  सपने  को  यथार्थ  में  बदलने  के  पैमाने  को  सफलता  माना  जाता  है  तो, मेरी  नज़र  में  मेरे  पिता  दुनिया  के  सबसे  सफल  व्यक्ति  हैं. पिता  सपने  को  इस  अंदाज़  में  आत्मसात  किया  करते  थे कि  एक  सपना  दूसरे  सपने  को  कोसों  दूर तक  छू  न  पाये.

पिता  का  सपना  खेती  करना  था, उन्होंने  किया. उनका  सपना  मौसम  की  मार  को  झेल  रहे  फसलों  तक  पानी  को  पहुँचाना था, उन्होंने  किया. उन्होंने  गाँव  की  देवी  मंदिर  को  चंदा  के  रूप  में  5051 रुपए  देने  का  सपना  देखा  था, उन्होंने  फसल  की  कीमत  पर  चंदा  दिया. उनका  सपना  था  पसीने  से  तर-बतर  होकर  माँ  से  लिपटना, उन्होंने  माँ  को  उसी रूप  में  पाया. सोनपुर  मेले  से  एक  जोड़ी  बैल  लेने  का  सपना  देखा  था, खूँटे  पर  सोनपुर  के  बैल  भी  आये. 

माँ  के  सपने  का  अंदाज़ा  मुझे  नहीं  है. माँ  अक्सर  ही  कई  लोगों  के  लिए  सपने  देखती  है. सब्जी  में  अधिक  नमक  डल  जाने  के  सपने. अपनी  काल्पनिक  बहुरिया  के  लिए  झूमका  खरीदने  के  सपने. बरसात  में  आँगन  में  झाड़ू  लगाने  के  सपने. माँ  भी  एक  सपना  होती  है, कब  सच  हो  जाये  पता  नहीं  चलता.

मेरी  दादी  का  बस  एक  ही  सपना  था. आदमी  उम्र  की  एक  दहलीज  पर  पहुँच  कर  अपने  सपने  को  स्थिर  कर  लेता  है. दादी  ने  भी  गाँठ बाँध  लिया  था.तमाम  धार्मिक  महिलाओं  की  तरह  उसका  भी  एक  ही  सपना  अबतक  ज़िंदा था, चारों धाम  दर्शन  करने  का  सपना.

मेरे  पक्के  इरादों  के  पीछे  कई  लोगों  की  ज़िंदगी  का  मक़सद  छिपा  था, कई  लोगों  के  सपने  थे. मैंने  अबतक  कोई  सपना  नहीं  देखा  था, सपनों  को  बस ढो  रहा  था. दुनियां जहान  के  सपनों  से  कभी  मेरा  ताल्लुक  नहीं  रहा. दुनिया  को  मैंने  अपने  करीब  न  फटकने  दिया. मैंने  एक  छोटी  सी  दुनिया  को  गढ़ा,  कुछ  छोटे-छोटे  सपनों  के  साथ. 

जिस  जगह  गया  वहाँ  मुझे  कई  दोस्त मिले. वहाँ  मैं  अपने  तरह  का  मैं  अकेला  नहीं  था, असंख्य  लोग  मेरी  तरह  थे. सतह  से  देखने  पर  हर  आदमी  कितना  अलग  दिखता  है. गहराई  में  उतरने  पर  हमसब  एक  से  हो  जाते  है, हर  आदमी  अपने  आप  में  अनंत  रेखा  होता  है. नैसर्गिक  तौर  पर  मेरे  सारे  दोस्त  अपनी  ज़िंदगी  के  रंगमंच  पर  अनंत  रेखा  ही  थे. पर  कुछ  समय  बाद  हम  सभी  एक  ही  नाटक  के  किरदार  हो  गये. हमने  देखना  बंद  कर  दिया  था, जो  सुनाया  जाता  रहा, उसके  अतिरिक्त  कभी  सुनने  की  कोशिश  तक  न  की. 

हम  अनंत  रेखा  से  अचानक  वृत्त  बन  गये. अगर  रेखा  से  कोई  बिंदु  को  निकाल  भी  लिया  जाए  तो  दूसरी  नयी  रेखा  का  सृजन  हो  जाता  है. पर  जब  वृत्त  से  कोई  भी  बिंदु  को  निकाल  लिया  जाए  तो  वह  कुछ  भी  बन  सकता  है  पर  वृत्त  कभी  नहीं. मैं  जिस  उद्देश्य  की  पूर्ति  के  लिए  आया  था  वह  अनंत  रेखा  था. पर  कुछ  प्रशिक्षण  के  बाद  वह  एक  वृत्त  बन  गया  और  उसके  एक नहीं  कई  बिंदुओं  को  गायब  कर  दिया  गया. मैं  अधूरा  सा  रह  गया. इसमें  गलती  किसी  की  नहीं  थी.

मेरे   नीड़  में  फिर  कई  सपनों  का  निर्माण  हुआ. जैसे  मैंने  अंग्रेजी  बोलने  का  सपना  देखा. मुझे  अच्छी  तरह  हिन्दी  भी  नहीं  आती  पर  मैंने  अंग्रेज़ी  में  बोलने  का  सपना  देखा. मैंने  कई  सपनों  को  बस  वक़्त  की  माँग  पर  पलने  दिया.  मैंने  इंजीनियरिंग  के  विषयों  को  छोड़कर  बहुत  कुछ  करने  का  प्रयत्न  किया. इंजीनियरिंग  को  मैंने  बस  फ़र्ज़  समझा  और  एक  फ़र्ज़  की  पूर्ति  के  लिए  जितना  देना  होता  है,  उससे  अधिक  मैंने  कभी  नहीं  दिया.

समय  के  साथ  कई  घटनाएं  हुई. दादा  खाँसते-खाँसते  चल  गये. दादी  ने  भी  इस  सदमे  को  बर्दाश्त  नहीं  किया. एक  बात  मैं  बताना  चाहता  हूँ. मेरे  दादा-दादी  ने  घर  में  कभी  अतिरिक्त  आर्थिक  बोझ  न  दिया. पिता  जब  भी  चैत  के  महीने  में  धान  बेचा  करते  थे, वह  कुछ  पैसों  को  बचाकर  दादा-दादी  के  श्राद्ध  कर्म  के  लिए  रख  लिया  करते  थे. पर  हुआ  ऐसा  की  दादा  के  जाने  के  तीसरे  दिन  ही  दादी  ने  भी  जाने  की  तैयारी  कर  लिया. और  एक  ही  के  हिस्से  से  दोनों  का  श्राद्ध  कर्म  संभव  हो  सका. मैं  उन  दोनों  के  देहांत  से  थोड़ी  सी  राहत पा  सका.   चलो  कुछ  बोझ  तो  कम  हुआ, इसकी  खुशी  हुई  मुझे.

जिस  परिवेश  से  निकलकर  मैं  आया, वहाँ  असहजता  का  भाव  अधिक  था. बात  करने  से  लेकर  अपनी  बातों  को  साफगोई  से  पेश  करने  तक  में  हिचक  ही  हिचक. उस  असहजता  को  परास्त  करने  का  मंत्र  भी  मैंने  खोज  निकाला. मैं  अकेले  घूमने  निकल  जाता, घंटो  विचरते  रहता. अकेले  विचरना  मेरे  आदत  में  शामिल  हो  गया. सुना  था  की  सुंदरताओं  को  देखने  से  असहजता  कम  हो  जाता  है. सुंदरताओं  में  तलाश  में  मैं  इतवार  की  दोपहरी  में  शहर  की  सुनसान  गलियाँ  लांघ  आता. मुझे  अच्छा  लगता  था  ढ़िले  कपड़ो  में  उम्मीद  और  संशय  के  बीच  घरेलू  कार्यों  में  संलग्न  औरतों  को  देखना.  इन  औरतें  और  मेरी  माँ  में  तमाम  अंतर  होते  हुए  भी  कुछ  एक  जैसा  था  जिसकी  डोर  में  मैं  बंध  जाता  था. मेरी  माँ  भी  अपने  सभी  कार्यों  को  उम्मीद  और  संशय  के  बीच  ही  किया  करती  थी. संशय  न  होने  पर  उम्मीद  का  बाँध  भी  टूट  जाया  करता  है. सुंदरताओं  की  तलाश  मे  मैं  वेश्यालयों  तक  गया  जहाँ  हमारे  समाज  की  देवियां  रहती  हैं. मैं  वहाँ  से  भी  लौटा, जैसा  होना  चाहता  था  वैसा  ही  होकर. 

पर व्यक्तिगत  संलग्नता  के  चलते  मैं  अपने  मूल  से  दूर  होता  चला  गया. मैं  अकेले  में  अपने  पिता  की  स्थिति  पर  हँस  लेता. माँ  के  लिए  मेरे  मन  में  जो  उदात्त  भावना  थी, वह  दिन  प्रतिदिन  कमतर  होता  चला  गया. मैं  यही  सोचता  कि  पिता  जैसे  भी  हैं  अपनी  कमी  के  चलते  हैं. मैंने  उनको  अपना  नायक  मानने  से  परहेज  करने  लगा. मेरे  लिए  सफलता  के  मायने  बदल  गये  थे. जिस वृत्त  का  निर्माण  मेरे  इर्द-गिर्द हुआ  था  उसमें  से  मैंने  पिता  की  बिंदु  को  बाहर  कर  दिया, यह  जानते  हुए भी  की  एक बिंदु  के  निकलने  पर  भी  वृत्त  अपना  मूल  खो  देता  है.घर  जाना  मेरे  लिए  सबसे  बोझिल  कार्य  हो  गया.

व्यक्ति  को  सफल  होने  के  लिए  अपने  लिए  नये  दायरे  का  विकास  करना  होता  हैं. मैंने  नये-नये  दायरे  भी  ढूँढ  निकाले. आधुनिक  सफलता  की  जो  परिभाषा  है  उसपर  खरा  उतरने  का  पुरजोर  प्रयास  मैंने  किया. 

पर  जब  मैं  इस  लायक  हो  गया  कि  पिता  को  5051 रूपए  दे  सकूँ, मैंने  नहीं  दिया. मैंने  पिता  से  संवाद  के  हर  अंश  को  तोड़  दिया. उनकी  अनिवार्य  उपस्थिति  को   मैंने  जरूरी  नहीं  समझा. मैंने  पलायन  के  दुख  को  समझने  की  कोशिश  नहीं  की. 



(निशांत रंजन नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी में माइनिंग के छात्र हैं.  इन्हें  किस्से सुनाना पसंद है, हिंदी उर्दू के लेखकों के साथ कामु और काफ्का भी प्रिय हैं. फेसबुक पर दास्तान  लिखते हैं. )