Posts

Showing posts from 2017

युवा कविता #18 अभिषेक

Image
अभिषेक कहते हैं कि कविता उनके लिए एक हॉबी की तरह है जैसे दूसरी चीज़ें हैं मसलन भाषण और क्विज़.उन्होंने कई लेख लिखे हैं और अपना एक पर्सनल ब्लॉग भी चलाते हैं.

मुझे दूर ले चलो।

मुझे दूर ले चलो...कहीं और ले चलो। किसी ऐसी जगह, जहाँ आईने न हों। जहाँ दुनिया के बेड़ियों के मायने ने हों। जहाँ रुख़्सत लेने की विवशता न हो, जहाँ फ़ुर्सत से हम गुफ़्तगू कर सकें। जहाँ सपनो पर किसी का पहरा न हो, जहाँ ज़ख्म तो हो, पर गहरा न हो। जहाँ हो कर बेख़ौफ़ कह सकूँ दिल की बातें, जहाँ दिन भी हमारा, हमारी हो रातें। मुझे दूर ले चलो...कहीं और ले चलो।


एक गाँव था। एक गांव था, दूर तराई में। बसा घाटियों की गहराई में। थे लोग वहां के प्यारे से, …

युवा कविता #17 शालिनी झा

Image
शालिनी झा - मुझे ठीक से याद नहीं , मैं कब लिखने लगी, पहले छोटे छोटे भाषण और फिर कविताएँ और फिर ये सिलसिला जारी है. कविता लिखना मेरे लिए संगीत सुनने जैसा है! जैसे आप किसी गाने को बस सुनते हैं . उसमे से आवाज़ , ताल , सुर अलग किए बिना,बिना ज़्यादा सोचे समझे! एक पूरा गाना महसूस करते हैं और उस के बाद कमाल की तसल्ली मिलती है | वैसे ही मैं कविताएँ सोच के नहीं लिखती , कोशिश नहीं करती, बस जब कहीं तसल्ली नहीं मिलती, जब आँसू बाहर नही आ पाते, जब खुशी संभाली नहीं जाती और जब मन चुपचाप होता है तो कविताएँ बन जाती हैं .ऐसे ही! और फिर कविता पूरी होने पर जो सुकून मिलता है शायद वही ज़िंदगी है.

कुछ सोच रही हूं मैं

वो रात नहीं दिन भी तो नहीं एक शाम अधूरी बाकी थी गिरती थी मोती की बूंदे आंसू के फूलों को थामें वो धूप नहीं ना छांव ही थी एक सांस अधूरी बाकी थी रोका तो था पर टूट गया एक ख्वाब हवा के झोंको सा एक चुप्पी की चादर ओढ़े समेट रही उस खुशबू को कुछ सोच रही हूं मैं खामोशी है...एक सिसकी है शायद छोटी सी उलझन है वो कौन है जो , कुछ भी नहीं पर मेरा भाग्य विधाता है है किस भाषा के शब्द जिन्हें पीड़ा …

नीर की कुछ प्रेम कविताएँ

Image
पावस नीर दिल्ली में रहते हैं -कविताएँ करते हैं - फ़ुट्बॉल खेलते हैं और पत्रकारिता करते हैं.
वो कहते हैं जब वो प्यार में होते हैं तब भी लिखते हैं, जब नहीं होते तब भी.


उनकी कुछ कविताएँ -


मूव आन

हम रोज फैसला लेते हैं, फैसला लेने का
हम रोज दिल को थोड़ा और कड़ा करते हैं
होते हैं अधिक निष्ठुर, अधिक साहसी
भूल जाते हैं प्यार
हो जाते हैं समझदार

चालाक हो गई हैं प्रेम कहानियां
आज के युग में
वह अपना अंत खुद लिख रही हैं
बेकार हो रहे हैं कवि, लेखक
जनतंत्र से बाहर किए जा रहे हैं पागल

'13 रीजन्स वाई' से जानते हैं जवाब
लेकिन सबसे अहम सवाल नहीं पूछ पाते कभी
'क्यों'

अब जब पर्दे पर जब पूछता है डिंपल वाला हीरो
'क्यों हम सब प्यार के बिना जीना सीख लेते हैं
... क्यों प्यार को मौका नहीं देते'
तो हम हिलाते हैं सिर
और चैनल बदल लेते हैं

अब हम इंतजार नहीं करते
सबकुछ ठीक होने का एतबार नहीं करते
अब हम चुन-चुनकर चुनते हैं रिश्ते
बेसाख्ता, बेपरवाह, बेमतलब वाला प्यार नहीं करते.

सिर्फ तुम्हारे लिए लिखना

तुम्हारे लिए लिखना 
अब किसी सूखे तालाब से मछली मार लाने जैसा है
(सिंपली इम्पोसिबल)

शब्द गढ़ना पानी का पुल बनाने…

युवा कविता #16 नीरज प्रियदर्शी

Image
नीरज प्रियदर्शी परवरिश भोजपुर के गांव में हुई है, इसीलिए रंग दिखता है । पिता अब दर्शनशास्त्र के लेक्चरर हैं।तब ठेठ किसान थे। इन्हीं की सोहबत ने पहले पढ़ना सिखाया और फिर लिखना। अब तो उम्मीद भी करने लगे हैं। कहते हैं- कुछ भी लिखो, मगर ऐसा लिखो कि वो कागज किसी के हाथ आए तो आईने सा लगे। तुम्हारे खुद के भी । जब भी लिखता हूं, किसी न किसी के वास्ते ही लिखता हूं। और वास्ते का क्या है! किसी से भी हो जाता है। पेशे से पत्रकार हूं। हर दफे बस यही चाहता हूं कि कागज पर सिर्फ कविताएँ लिखूं, मगर नौकरी ने उसी कागज पर लूट, हत्या और बलात्कार लिखवा दिए। अब नौकरी छोड़ दी है। मन का लिखता हूं। मन करता है हर बार कविता ही लिखूं। विचार अघोर है, सो हर बार प्रेम पर अटक जाता है । हर बार प्रेम भी हो जाता है।







मुमकिन नहीं था 'के मुमकिन नहीं था तुम्हारा आना फिर से उदास कमरे में ये सिर्फ हम नहीं वरन, समझती है हमारी रात भी मुझसे ही खफा है घुप्प बैठी है मुझसे पूछ के सिर्फ़ मेरी ही होकर कैसे गुजर सकती है जबकि पहर बाकी है अभी। शहर छोटा है जब सोता है तब ख्वाब बुनता है और जुगत भिड़ाता है इक और शहर बनाने क…

"विद यु विदआउट यु " के लेखक प्रभात रंजन से शुभम की बातचीत

Image
पटना के नये लेख़क प्रभात रंजन यूँ तो पेशे से इंजीनियर हैं लेकिन आजकल लेखन के क्षेत्र में लोग इन्हें जानने लगे हैं। उसकी वजह हैं इनकी पहली पुस्तक 'विद यु विदआउट यु'। इस महीने रिलीज के बाद यह किताबों हिंदी पाठकों के बीच चर्चा में हैं। आज मैंने प्रभात रंजन से बातचीत की।

1. आपको पहली किताब की बधाई। आप अपने बारे में और अपनी किताब के बारे में हमें कुछ बताएं।

उत्तर- धन्यवाद। मैं भारतीय रेल में इंजीनियर के पद पर कार्यरत हूँI विद यू विदाउट कहानी है सच्चे प्यार और सच्ची दोस्ती की परिभाषा गढ़ते, उसे तलाशते और उसे अपने हिसाब से जीते निशिन्द,आदित्य और रमी की। ‘बचपन की अल्हड़ता’ और ‘व्यस्क होने पर की गम्भीरता’ के बीच पनपी दो प्रेम कहानियाँ जो आपस में उलझ कर सम्पूर्णता की चाह में मानवीय रिश्तों के भीतर और बाहर के तमाम अन्तर्द्वन्द से जद्दोजहद करते हुए जीवन के कई यक्ष प्रश्नों का साक्षात्कार करती हैं और उनके उत्तर ढून्ढती हैं।

2. विद यु विदाउट यु कैसी उपन्यास है? यह किस तरह के पाठकों के लिए है? हिंदी किताब का इंग्लिश शीर्षक... इस विषय पर आपकी कोई राय?

उत्तर- वस्तुत यह एक लव ट्रायंगल है लेकिन यह फ़िल…

'वो बात जिसका फ़साने में जिक्र न था/वो बात उनको बहुत नागवार गुज़री है'- कुमार राहुल

Image
मलिक मुहम्मद जायसी कृत 'पद्मावत' पढ़ने बैठेंगे तो फैज़ के इस शेर से सहमत हो जायेंगे । मगर दुर्भाग्य से हमारे पास भारत को देखने के अब दो नज़रियेे थे - दो हज़ार चौदह के पहले और दो हज़ार चौदह के बाद । हम जो अब 'अतिसंवेदनशीलता' के दौर से गुज़र रहे हैं इसको कई तरह से देख और समझ सकते हैं ; इसकी व्याख्या कर सकते हैं । मसलन आजकल मैं इसे देश में बढ़ती बेरोजगारी के दुष्प्रभाव के रूप में भी देखता हूँ । ख़ैर, देश में वैविध्य है तो विवाद भी है । बहुत देर तक इससे बचा नहीं जा सकता । समय बदलेगा तो समय का मिज़ाज़ भी बदलेगा । किसके हक़ में और किसके हक़ को मार के बदलेगा ये अलग विषय है ।

कला और संस्कृति का सदियों से सम्मान करने वाले , सहेज़ के रखने वाले देश की भाषा कब इतनी हलकी हो गयी पता ही नहीं चला । देश में सुनने-सहने की प्रवृत्ति में जिस तरह से गिरावट आयी है उसमें ये आशा तो नहीं की जा सकती मगर क्या ही अच्छा होता कि हम एक बार संजय लीला भंसाली की आगामी फ़िल्म को देखने के बाद किसी निष्कर्ष पे पहुँचते ।

जरुरत है थोड़ा धीर धरते हुए समस्या के मूल में जाने की । किसी के कहे-सुने में आने से पहले खुद से खुद …

गौरव अदीब की कविताएँ

Image
गौरव कविता और थिएटर से ख़ूब जुड़े हुए हैं, उनकी कविताएँ कई जगह प्रकाशित हैं और कई नाटकों का निर्देशन भी उन्होंने किया है. पिछले दस साल से लगातार लिख रहे हैं और कविता पोस्टर भी बनाते हैं. लिखने की प्रेरणा के बारे में कहते हैं - "पिता लेखन से जुड़े थे, वहीँ से लिखने की प्रेरणा मिली , 14 साल की उम्र में पहली कविता लिखी थी."

अमृता और साहिर के लिए

(कवि का नोट : - ये तीन कवितायेँ एक श्रृंखला की हैं जिसमें अब तक 38 लिखी जा चुकी हैं अमृता और साहिर की ज़मीन पर इन्हें लिखा गया है।।)

1. 

सुनो अमृता !! तन की थकन को टूटने की हद तक बरदाश्त कर सकता हूँ बहुत-बहुत बार पहले भी टूटा तो हूँ पर बिखरा नही अब तक हर बार किसी न किसी के लिए समेट लिया ख़ुद को चुपचाप हर बार कुछ कम रह गया लेकिन जितनी बार ख़ुद को समेटा अपना कुछ हिस्सा शायद खोता गया हर बार और अब इतना कम रह गया हूँ ख़ुद में कि टूटता नही हूँ - सीधा बिखर जाता हूँ मन की थकन ऐसे ही होती है अमृता !! तुमने मन को जोड़ना सीखा है क्या ?? सुनो, मन का माथा चूमना कभी आत्मा के गाल लाल हो जाते हैं, सच्ची और इसकी लालरी कहीं नही दिखती मन पर लव बाइट…

कुँवर नारायण : बाक़ी बची दुनिया उसके बाद का आयोजन है- निशान्त रंजन

Image
इसे महज संयोग ही कहा जा सकता है की परसों अर्थात् 13 नवंबर को मेरे प्रिय लेखक मुक्तिबोध की जन्म शताब्दी थी. रायपुर में उनके जन्म शताब्दी को लेकर जो आयोजन हुआ था, उसमें मेरा भी जाना हुआ था. वहाँ पर भी कुछ दोस्तों से कुंवर नारायण को लेकर बातें हुई थीं. यह भी संयोग ही है की मुक्तिबोध ने भी दुनिया को अलविदा मस्तिष्काघात के चलते ही कहा था. कुंवर नारायण को भी करीब तीन महीने पहले मस्तिष्काघात लगा था और आज यह महान आत्मा हमारे बीच से सदा के लिए अलविदा कह गयी. लेकिन वास्तव में कवि मरते नहीं. मैंनें जाना है की सोना, आभूषण और कवि समय के साथ और भी अधिक महान और मूल्यवान बनते हैं. आज के कठिन समय में समाज को कुंवर नारायण जैसे कवियों की और भी जरूरत है. कुंवर नारायण ने अपने आपको हर विधा में आजमाया चाहे वह कहानी लेखन हो, कविता, निबंध, आलोचना और काव्य तक. वर्ष 2009 में कुंवर नारायण को ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया था. कुंवर नारायण एक ऐसे इंसान …

YUVA KAVITA #15 SMRITI CHOUDHARY - A PROSE POEM OF SORTS

Image
Smriti says about herself- 
If I had to describe myself in one word, the word would be 'writer', because there's no other part to my soul. I have grown up with my pen, and shall live with it.

5-4-3-2-1

 The sun’s soft gaze is falling on our eyes, we’re sitting on the wet grass in our backyard, holding a mug of warm coffee in our hands. 

Sun has peeked from the foggy sky for the first time since winter commenced, there are other things hiding behind a fog, and no matter how hard I try, they refuse to peek outside, but today is different, today is a sunny day, for the first time in a long time.
 He places his coffee mug on the grass, and wraps his arm around me. It feels warm, but I’m cold.

 “When I was little”, he begins talking. My mind begins to wander around. It is everywhere, but not in the summer of 99 when he fell off a tree at his grandfather’s farm house, from where he got that scar behind his left ear. I let out a soft giggle, softer than the gaze of sun that is falling …

युवा कविता #14 एकांश गुप्ता

Image
मैं एकांश गुप्ता, कहने को तो इंजीनियरिंग कर रहा हूं NIT JAMSHEDPUR से, लेकिन अक्सर हिंदी साहित्य की किताबें पढ़ते हुए पाया जाता हूं।

मैं क्यों लिखता हूं? इस प्रश्न का कोई मनभावन जवाब ना तो मुझे अब तक मिल पाया है ना उम्मीद है कभी मिल पाएगा । बस अक्सर ऐसा लगता है कोई टीस है मन में जो अक्सर मजबूर करती है अपनी बात कहने को क्योंकि शायद जिस माहौल में हूं, वहां अक्सर अपने मन की बातें कह नहीं पाता। शायद इसलिए ही लिख देता हूं।

सिगरेट

मेरे साथ खड़े दोस्त अक्सर, जब सिगरेट जला लेते हैं। मैं भी अक्सर तुम्हारी, यादों के छल्ले उडाने लगता हूं। इस उम्मीद में किसी रोज, तुम मेरे अंदर से खत्म हो जाओगी। जैसे वह सिगरेट हो जाती है, उंगलियों के बीच में फस कर। मगर यह भूल जाता हूं, उडाने के लिए छल्ले हवा में, कश को अंदर लेना पड़ता है। शायद इसलिए तुम से, जितना दूर जाना चाहा है। अक्सर उतना दिल तुम्हारी, यादों को मन में भर लेता है।। मानो तुम कोई सिगरेट हो, जिंदगी की, जिसे हर शाम, में यादों के लाइटर से, जला लेता हूं।।


जख्म

कुछ चोटे होती है ना, जो बरहा कुछ नहीं होती। बस छलक उठता है लहू या आंसू। यूं ही कहीं टकराने से, ल…

युवा कविता #13 आफिज़ा तरन्नुम

Image
आफिज़ा कहती हैं :- 
लिखना सुकून देता है ठीक वैसे ही जैसे की कुछ अच्छा पढ़ना...जब आप चीज़ों को महसूस करते हैं तो दिल करता है उस एहसास, उस पल, उस भावना और उस प्रेम को सहेज कर रख लें हमेशा के लिए... और इसके लिए लिखने से अच्छा और क्या हो सकता है..क्यूँकि कहा हुआ भुलाया जा सकता है पर लिखा हुआ मिटाया नहीं जा सकता



लिखो, 

कि अभी बहुत कुछ लिखा जाना बाकी है लिखो,
कि बहुतों का पढ़ा जाना बाकी है ये न सोचो कि
लिखने से क्या हासिल होगा ये सोचो