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Showing posts from August, 2017

Bandukbaz Babumoshay : the cult it could have been.

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Vast deserted wastelands, two cheeky killers, some selfish politicians/mafia trying to usurp power, a couple of freewheeling women, a lot of guns and bullets and sharp dialogues entwined in a plot which showed promise at least in the first half - bandukbaz babumoshay had all the potential in the world to become a cult in a genre defining way. 
It could have been a tarantino flick - american west like in all its splendour with all the black humour, the accent, the abuse and unique characters. 
the first half got me very excited - the main anti-hero pretty tight about his rules of killing, a sidekick wanting to be better than the guru, their tussels, the sex - in my heart i started rooting for a convulated version of a sort of batman-jason todd thing- vigilantes, only contract killers, on adventures in an indian version of american west, dealing with love, politics and police. 
is it too wrong to dream? 
what started with a brilliant nawaz - too much in ease , to the point that it ofte…

कविता से चरम महत्वाकांक्षी व्यक्ति हमेशा निराश रहते हैं : राजकिशोर राजन

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राजकिशोर राजन हमारे समय के ज़रूरी और चर्चित कवि हैं, इनके चार कविता संग्रह आ चुके हैं और "कुशीनारा से गुज़रते हुए" सबसे हाल का संग्रह है. राजन भाई काफी कुछ पढ़ते रहते हैं और आलोचना और अनुवाद में भी उनके कई काम हैं. उनसे हमने बातचीत की. १. कविता क्या है आपके हिसाब से? क्यों लिखनी शुरू की? 

कविता अपरिभाषेय रही है अब तक।अब तक जो भी परिभाषाएं दी गयीं वे पूर्व से अधिक रिक्त रहीं।कविता शब्दों से लिखी जाती है पर वे मात्र शब्द नहीं हैं।पता नहीं क्यों लिखना शुरू किया।हाँ,इतना पता है कि जब बहुतों से कुछ कहना चाहता हूँ और सुनना चाहता हूँ तो संवाद के लिए लिखना शुरू किया।

 २. पठन का रचना में क्या योगदान है, आपको क्या लगता है? 

पठन से रिक्त हुआ जाता है।मनुष्य जितना पठन पाठन करेगा उसी मात्रा में रिक्त होगा और अपनी लघुता से साक्षात्कार करेगा।अगर ऐसा नहीं तो बुनियाद में दोष है।पठन के बाद ही पता लगता है कि जो कागज़ मेरे सामने है उस पर न्य क्या लिख दूँ जो थोडा-बहुत पूर्व से भिन्न हो।

 ३. पहली पढ़ी हुई कविता कौन सी याद आती है? प्रिय कविता कौन सी है ? प्रिय कवि कौन हैं?

पहली पढ़ी हुई कविता याद नहीं कौन स…

आत्मकथ्य : निशांत रंजन

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मेरी  स्मृतियां  फीकी  पड़  रही  हैं. मुझे  अच्छी  तरह  यह  भी  याद  नहीं कि  पाँच  साल  पहले  मैं  अपने  घर  से  किस  तरह  बहुत  दूर  चला  आया था. एक  मक़सद  से  निकला था, मुट्ठी  भर  सपने  को  अपनी  झोली  में  लेकर, पक्के  इरादों  के  साथ. यादों  के  नाम पर  बस इतना  ही  याद  है  कि  माथे  पर  माँ  का चुंबन  की  हल्की  सी  नमी  को  लेकर निकला  था, दादी  ने  अपनी  झोली  भर  आशीर्वाद  दिया  था. बूढ़े  दादा  को  वादा  देकर  निकला  था  कि  आपकी  खाँसी  का  इलाज़  जरूर  करवाऊँगा. 

साथ  लेकर  कुछ  भी  तो  नहीं  निकला  था. थके  माँदे  पिता  स्टेशन  तक  साथ  आये  थे  और  तब तक  जमे  रहे  जबतक  रेलगाड़ी  खुल  नहीं   गई. रेलगाड़ी  धीरे-धीरे  स्टेशन  को  छोड़  रही  थी. मेरे  मन  में  अमर  चीटियों  का  सैलाब  उमड़  आया  था. 
तो  मैं  घर  से  क्यों  निकला  था ? किसके  लिए  निकला  था ? मैंने इरादे  पक्के  क्यों  कर  रखे  थे ? रेवायत  के  अनुसार  मेरी  उम्र  के  लड़के  तीन  वजहों  से  अपने  घर  से  निकलते  हैं. परीक्षा  में  फेल  होने  पर, अपनी  प्रियतमा के  साथ  नयी  दुनियाँ गढ़ने  को  और  कुछ  लोग  इंजीनियर…

युवा कविता #2 : शशांक मुकुट शेखर

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मेरे लिए कविता खुद को ढूंढने का एक माध्यम है. और उन सभी बातों को व्यक्त करने का भी जो मेरे अंदर पलकर मुझे बैचैन सी करती रहती है. कविता मेरे लिए आत्म-संतुष्टि है. और खुद को एक बेहतर इंसान बनाने का बहाना भी. कविता मुझे संपूर्ण बनाती है.अपनी लिखी हरेक कविता मेरे लिए मेरी प्रेमिका की एक चुम्बन है, जो हमेशा मुझमें प्यार को और थोड़ा गहरा कर जाता है.


रुखसाना 1. फ़ज़र की पहली अज़ान के साथ तुम याद आती हो रुखसाना अब मेरी नींद सुबह जल्दी नहीं खुलती तुम्हारे घर से आने वाली चाय की महक मुझतक पहुँच ही नहीं पाती जैसे रुक जाती है श्लोक की ध्वनि मस्जिद के दरवाजे तक जाते-जाते और जैसे पहुँच ही नहीं पाती कभी अजान की आवाजें मंदिर के कपाट तक पहले हर सुबह तुम पढ़ती थी कलमा और बज उठती थी मेरे कमरे के कोने में बनी मंदिर की घंटियाँ गुजरात के रास्ते तुम ना जाने कहाँ गुम हो गई और मैंने तुम्हारा नाम पिरो रखा है अपने श्लोक में जिसे जपता हूँ काबा की सीढियों पर लिखे आयत की तरह 2. पता नहीं तुम कहाँ हो रुकसाना मैं अब भी यहीं हूँ, इसी शहर में अब सबकुछ वैसा तो नहीं है, पर सबकु…

रेखना मेरी जान और रत्नेश्वर - सुधाकर रवि और नचिकेता वत्स से बातचीत.

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पटना पुस्तक मेला में अपने नए उपन्यास ‘रेखना मेरी जान’ के लिए प्रकाशक के साथ पौने दो करोड़ रुपये का करार के घोषणा के बादरत्नेश्वर सिंहदेश स्तर पर चर्चा में आए हैं, अपने आगामी नॉवेल ‘रेखना मेरी जान’ पर इन्होने बातचीत की है सुधाकर रवि और नचिकेता वत्स के साथ . बातचीत के प्रमुख अंश - सवाल- रेखना मेरी जान का कथानक किस विषय पर है ? जवाब- इसका कथानक ग्लोबल वार्मिंग पर है जो एक प्रेम कहानी के साथ पैरेलल चलती है और इसका कथानक युवाओं को ध्यान में रख कर लिखा गया है. सवाल- पॉपुलर लिटरेचर में कॉलेज, हॉस्टल, इंजीनियरिंग जैसे विषयों पर किताब लिखी जा रही है ताकि यूथ तक पहुँच पाएं, आप यूथ तक पहुँचने के लिए ग्लोबल वार्मिंग जैसी विषय को क्यों चुनते हैं ? जवाब- ग्लोबल वार्मिंग एक बड़ी समस्या है और इस विषय पर हिंदी में कोई किताब नहीं आई है, तो हमें लगा कि इस विषय पर युवाओं को ध्यान में रख कर लिखा जाना बेहद जरुरी है , ताकि आज का युवा इस समस्या को महज किताबी या इसे खबर की शक्ल में न जाने , बल्कि भावनात्मक रूप से इस समस्या से जुड़ पाएं. सवालइस किताब की भाषा शैली कैसी है, क्या परम्परागत हिंदी लेखन जैसी है या कुछ नयाप…