where it all began

Hearth, in its earlier days, came out in form of a newsletter. while the magazine was a tedious, more strenuous affair and was periodical, Hearth never depended itself on time and was published whenever an incessant need to do so was felt- be it some political or literary incident or the opening of a new joint in the city -
as a famous philosopher once said, we are not prisoned by time but by clocks, we must accept our ruins and our downfalls. true poetry and literature will come out of those.
The cover of the blog is called "LOVERS" and has been clicked by eminent poet and photographer Anurag Vats

29/08/2017

Bandukbaz Babumoshay : the cult it could have been.



Vast deserted wastelands, two cheeky killers, some selfish politicians/mafia trying to usurp power, a couple of freewheeling women, a lot of guns and bullets and sharp dialogues entwined in a plot which showed promise at least in the first half - bandukbaz babumoshay had all the potential in the world to become a cult in a genre defining way. 

It could have been a tarantino flick - american west like in all its splendour with all the black humour, the accent, the abuse and unique characters. 

the first half got me very excited - the main anti-hero pretty tight about his rules of killing, a sidekick wanting to be better than the guru, their tussels, the sex - in my heart i started rooting for a convulated version of a sort of batman-jason todd thing- vigilantes, only contract killers, on adventures in an indian version of american west, dealing with love, politics and police. 

is it too wrong to dream? 

what started with a brilliant nawaz - too much in ease , to the point that it often seems repetitive on his part, and a good story unfurling - the last two acts of the film seemed falling apart. i often found myself yearning for "keh ke loonga" track from GOW, as the music could not compete.

the killings in the last half an hour seemed too easy, the surprise in the climax seemed heavy and not at all exciting and once we got that out of the way , the ending had no surprises whatsoever. 

i wonder if there are the director cuts of these films where they shed the necessity of moral correctness,  straight jacketed explanatory conclusions and rugged stereotyping of characters and make them the way they want to because who is a genius in the first half of the film must remain so in the second half. after all, it is the same person or people who is behind the camera or who is writing? 

the actors were in place - most of them at least, treating their material with appropriate correctness and dedication, the music at times appealed.

the editing could have helped condensing - too many kids, an unnecessary scene at the butcher even if it was a homage to GOW,  and too many policemen dying in the end did not favour the overall structure of the film

but what could have begun as the adventures of babu bihari and banke bihari got all entangled in itself and yet 

in an industry where Cinema generally is not an art in itself, serious viewers seldom go to the theater to watch a hindi film, generally never expecting more than a few punch lines and a couple of rap-mixed loud soundtracks can watch this one for both biharis, the inspector with the piles problem, dubey, fulwa and the inspector who fell in love with the female politician. 

3 stars - all earned for the way the director set up the story, with that kind of cast, you know acting is not going to be the main concern.

(anchit writes. )

28/08/2017

कविता से चरम महत्वाकांक्षी व्यक्ति हमेशा निराश रहते हैं : राजकिशोर राजन

राजकिशोर राजन हमारे समय के ज़रूरी और चर्चित कवि हैं, इनके चार कविता संग्रह आ चुके हैं और "कुशीनारा से गुज़रते हुए" सबसे हाल का संग्रह है. राजन भाई काफी कुछ पढ़ते रहते हैं और आलोचना और अनुवाद में भी उनके कई काम हैं. उनसे हमने बातचीत की. १. कविता क्या है आपके हिसाब से? क्यों लिखनी शुरू की? 
  
कविता अपरिभाषेय रही है अब तक।अब तक जो भी परिभाषाएं दी गयीं वे पूर्व से अधिक रिक्त रहीं।कविता शब्दों से लिखी जाती है पर वे मात्र शब्द नहीं हैं।पता नहीं क्यों लिखना शुरू किया।हाँ,इतना पता है कि जब बहुतों से कुछ कहना चाहता हूँ और सुनना चाहता हूँ तो संवाद के लिए लिखना शुरू किया।

 २. पठन का रचना में क्या योगदान है, आपको क्या लगता है? 

 पठन से रिक्त हुआ जाता है।मनुष्य जितना पठन पाठन करेगा उसी मात्रा में रिक्त होगा और अपनी लघुता से साक्षात्कार करेगा।अगर ऐसा नहीं तो बुनियाद में दोष है।पठन के बाद ही पता लगता है कि जो कागज़ मेरे सामने है उस पर न्य क्या लिख दूँ जो थोडा-बहुत पूर्व से भिन्न हो।

 ३. पहली पढ़ी हुई कविता कौन सी याद आती है? प्रिय कविता कौन सी है ? प्रिय कवि कौन हैं? 
  
पहली पढ़ी हुई कविता याद नहीं कौन सी थी।प्रिय कविताएँ कई कई हैं किनका नाम गिनायें।प्रिय कवियों में तुलसी,कबीर,निराला,नागार्जुन,त्रिलोचन,मुक्तिबोध,केदारनाथ सिंह,राजेश जोशी ,अरुण कमल आदि हैं।

४. कविता का रोल क्या है - समाज के सन्दर्भ में, या अन्य कोई सन्दर्भ आपके हिसाब से? क्या उसकी प्रासंगिकता जिंदा है अभी भी? 

. कविता लिखना,मनुष्य होना है।और मनुष्य को मनुष्य होना है,इसीलिए कविता की प्रासंगिकता बढ़ती जायेगी।

५. क्या पढना है इसका चयन करने का आपका क्या तरीका है?


 प्रिय विषय और अलहदा पन,चयन का आधार है।
  ६. लिखते हुए शिल्प कितना महत्वपूर्ण होता है?

  लेखन अंततः कला है।कला को सुन्दर तो होना ही चाहिए,सच हो तो बहुत अच्छा।इसी सुंदरता और सच्चाई को साधते हुए आगे बढ़ना है।कला या शिल्प उसी तरह जरूरी है जितना दाल में नमक,चाय में चीनी।मात्रा सही हो तो ठीक नहीं तो सब कुछ बेकार।मेरा मानना है कि लेखक अपनी वैचारिक दरिद्रता को ढंकने के लिए शिल्प के समक्ष आत्मसमर्पण कर देते हैं।उन्हें कलावादी ,रूपवादी कहा जाता है।

 ७. कविता से चरम महत्वाकांक्षा क्या है - प्रसिद्धि , पैसा, अमरता - कवि आखिर में क्या चाहता है?

 कविता से चरम महत्वाकांक्षी व्यक्ति हमेशा निराश रहते हैं।यह एक जटिल प्रश्न है।बहुतों के लिए प्रसिद्धि,पैसा,अमरता, तीनों है जबकि ऐसे भी रचनाकार हैं जिनके लिए ये गौण है।

 ८. नए लिखने वालों के लिए क्या सलाह देंगे?

 नए को क्या सलाह देना।साहित्य में कोई पुराना कब होता है।एक तो जीवन है,दुनिया भर के काम हैं।बहुत कुछ तो छुट जाता है जो हथेली पर आता है वह एक बूँद के समान है।लेकिन जैसा की बुद्ध ने कहा है--संसार में कोई किसी का दीपक नहीं बन सकता है,इसीलिए तुम अपना दीपक स्वयं बनो।किसी की बात इस लिए मत मान लो कि किसी महत्वपूर्ण किताब में लिखी हुई है अथवा किसी महत्वपूर्ण व्यक्ति ने कही है।तुम अपने सोचो,अपने विचारो और लगे की सही हो तो मानो नहीं तो मत मानो।आगे बढ़ जाओ।

 ९. इधर क्या पढ़ रहे हैं और कौन सी किताबें आपको लगता है कि हर किसी को पढनी चाहिए?

इधर ,वोल्गा से गंगा,शेखर एक जीवनी,महागुरु मुक्तिबोध-कांति कुमार जैन,त्यागपत्र-जैनेन्द्र,वैश्या एवलिन रे-ब्रेख्त,मुक्तिमार्ग-हॉवर्ड फ़ास्ट पढ़ रहा हूँ।एक एक कर।अधिकतर दूसरी बार। मुझे लगता है कि रामचरित मानस,वोल्गा से गंगा,गोदान,मैला आँचल आदि सबको पढ़नी चाहिए।

27/08/2017

आत्मकथ्य : निशांत रंजन

मेरी  स्मृतियां  फीकी  पड़  रही  हैं. मुझे  अच्छी  तरह  यह  भी  याद  नहीं कि  पाँच  साल  पहले  मैं  अपने  घर  से  किस  तरह  बहुत  दूर  चला  आया था. एक  मक़सद  से  निकला था, मुट्ठी  भर  सपने  को  अपनी  झोली  में  लेकर, पक्के  इरादों  के  साथ. यादों  के  नाम पर  बस इतना  ही  याद  है  कि  माथे  पर  माँ  का चुंबन  की  हल्की  सी  नमी  को  लेकर निकला  था, दादी  ने  अपनी  झोली  भर  आशीर्वाद  दिया  था. बूढ़े  दादा  को  वादा  देकर  निकला  था  कि  आपकी  खाँसी  का  इलाज़  जरूर  करवाऊँगा. 

साथ  लेकर  कुछ  भी  तो  नहीं  निकला  था. थके  माँदे  पिता  स्टेशन  तक  साथ  आये  थे  और  तब तक  जमे  रहे  जबतक  रेलगाड़ी  खुल  नहीं   गई. रेलगाड़ी  धीरे-धीरे  स्टेशन  को  छोड़  रही  थी. मेरे  मन  में  अमर  चीटियों  का  सैलाब  उमड़  आया  था. 

तो  मैं  घर  से  क्यों  निकला  था ? किसके  लिए  निकला  था ? मैंने इरादे  पक्के  क्यों  कर  रखे  थे ? रेवायत  के  अनुसार  मेरी  उम्र  के  लड़के  तीन  वजहों  से  अपने  घर  से  निकलते  हैं. परीक्षा  में  फेल  होने  पर, अपनी  प्रियतमा के  साथ  नयी  दुनियाँ गढ़ने  को  और  कुछ  लोग  इंजीनियरिंग  करने  निकलते  हैं. मैं  इंजीनियरिंग  करने  निकला  था. इंजीनियर  बनने  निकला  था. 

इंजीनियर  बनने  के  पहले  ही  मैं  बोझ  से  दब  गया  था. खेती  के  लिए  लिया  गया  लोन  भरा भी  नहीं  गया  था  कि  पिता  को  मेरी  पढ़ाई  के  लिए  फिर  से  लोन  लेना  पड़ा.  मेरे  पिता  के  सपने  ऋण  से  ही  पूरे  होते  थे. उनके  सपने  बहुत  छोटे-छोटे  थे. उन्होंने  अपनी  ज़िन्दगी  में  बस  दो  बड़े  सपने  देखे  थे. पहला  सपना  अपनी  बेटी  को  एक  नौकरीशुदा  लड़के  से  शादी  करना  और  दूसरा  अपने  एकमात्र  बेटे  को  इंजीनियर  बनाना. अगर  सपने  को  यथार्थ  में  बदलने  के  पैमाने  को  सफलता  माना  जाता  है  तो, मेरी  नज़र  में  मेरे  पिता  दुनिया  के  सबसे  सफल  व्यक्ति  हैं. पिता  सपने  को  इस  अंदाज़  में  आत्मसात  किया  करते  थे कि  एक  सपना  दूसरे  सपने  को  कोसों  दूर तक  छू  न  पाये.

पिता  का  सपना  खेती  करना  था, उन्होंने  किया. उनका  सपना  मौसम  की  मार  को  झेल  रहे  फसलों  तक  पानी  को  पहुँचाना था, उन्होंने  किया. उन्होंने  गाँव  की  देवी  मंदिर  को  चंदा  के  रूप  में  5051 रुपए  देने  का  सपना  देखा  था, उन्होंने  फसल  की  कीमत  पर  चंदा  दिया. उनका  सपना  था  पसीने  से  तर-बतर  होकर  माँ  से  लिपटना, उन्होंने  माँ  को  उसी रूप  में  पाया. सोनपुर  मेले  से  एक  जोड़ी  बैल  लेने  का  सपना  देखा  था, खूँटे  पर  सोनपुर  के  बैल  भी  आये. 

माँ  के  सपने  का  अंदाज़ा  मुझे  नहीं  है. माँ  अक्सर  ही  कई  लोगों  के  लिए  सपने  देखती  है. सब्जी  में  अधिक  नमक  डल  जाने  के  सपने. अपनी  काल्पनिक  बहुरिया  के  लिए  झूमका  खरीदने  के  सपने. बरसात  में  आँगन  में  झाड़ू  लगाने  के  सपने. माँ  भी  एक  सपना  होती  है, कब  सच  हो  जाये  पता  नहीं  चलता.

मेरी  दादी  का  बस  एक  ही  सपना  था. आदमी  उम्र  की  एक  दहलीज  पर  पहुँच  कर  अपने  सपने  को  स्थिर  कर  लेता  है. दादी  ने  भी  गाँठ बाँध  लिया  था.तमाम  धार्मिक  महिलाओं  की  तरह  उसका  भी  एक  ही  सपना  अबतक  ज़िंदा था, चारों धाम  दर्शन  करने  का  सपना.

मेरे  पक्के  इरादों  के  पीछे  कई  लोगों  की  ज़िंदगी  का  मक़सद  छिपा  था, कई  लोगों  के  सपने  थे. मैंने  अबतक  कोई  सपना  नहीं  देखा  था, सपनों  को  बस ढो  रहा  था. दुनियां जहान  के  सपनों  से  कभी  मेरा  ताल्लुक  नहीं  रहा. दुनिया  को  मैंने  अपने  करीब  न  फटकने  दिया. मैंने  एक  छोटी  सी  दुनिया  को  गढ़ा,  कुछ  छोटे-छोटे  सपनों  के  साथ. 

जिस  जगह  गया  वहाँ  मुझे  कई  दोस्त मिले. वहाँ  मैं  अपने  तरह  का  मैं  अकेला  नहीं  था, असंख्य  लोग  मेरी  तरह  थे. सतह  से  देखने  पर  हर  आदमी  कितना  अलग  दिखता  है. गहराई  में  उतरने  पर  हमसब  एक  से  हो  जाते  है, हर  आदमी  अपने  आप  में  अनंत  रेखा  होता  है. नैसर्गिक  तौर  पर  मेरे  सारे  दोस्त  अपनी  ज़िंदगी  के  रंगमंच  पर  अनंत  रेखा  ही  थे. पर  कुछ  समय  बाद  हम  सभी  एक  ही  नाटक  के  किरदार  हो  गये. हमने  देखना  बंद  कर  दिया  था, जो  सुनाया  जाता  रहा, उसके  अतिरिक्त  कभी  सुनने  की  कोशिश  तक  न  की. 

हम  अनंत  रेखा  से  अचानक  वृत्त  बन  गये. अगर  रेखा  से  कोई  बिंदु  को  निकाल  भी  लिया  जाए  तो  दूसरी  नयी  रेखा  का  सृजन  हो  जाता  है. पर  जब  वृत्त  से  कोई  भी  बिंदु  को  निकाल  लिया  जाए  तो  वह  कुछ  भी  बन  सकता  है  पर  वृत्त  कभी  नहीं. मैं  जिस  उद्देश्य  की  पूर्ति  के  लिए  आया  था  वह  अनंत  रेखा  था. पर  कुछ  प्रशिक्षण  के  बाद  वह  एक  वृत्त  बन  गया  और  उसके  एक नहीं  कई  बिंदुओं  को  गायब  कर  दिया  गया. मैं  अधूरा  सा  रह  गया. इसमें  गलती  किसी  की  नहीं  थी.

मेरे   नीड़  में  फिर  कई  सपनों  का  निर्माण  हुआ. जैसे  मैंने  अंग्रेजी  बोलने  का  सपना  देखा. मुझे  अच्छी  तरह  हिन्दी  भी  नहीं  आती  पर  मैंने  अंग्रेज़ी  में  बोलने  का  सपना  देखा. मैंने  कई  सपनों  को  बस  वक़्त  की  माँग  पर  पलने  दिया.  मैंने  इंजीनियरिंग  के  विषयों  को  छोड़कर  बहुत  कुछ  करने  का  प्रयत्न  किया. इंजीनियरिंग  को  मैंने  बस  फ़र्ज़  समझा  और  एक  फ़र्ज़  की  पूर्ति  के  लिए  जितना  देना  होता  है,  उससे  अधिक  मैंने  कभी  नहीं  दिया.

समय  के  साथ  कई  घटनाएं  हुई. दादा  खाँसते-खाँसते  चल  गये. दादी  ने  भी  इस  सदमे  को  बर्दाश्त  नहीं  किया. एक  बात  मैं  बताना  चाहता  हूँ. मेरे  दादा-दादी  ने  घर  में  कभी  अतिरिक्त  आर्थिक  बोझ  न  दिया. पिता  जब  भी  चैत  के  महीने  में  धान  बेचा  करते  थे, वह  कुछ  पैसों  को  बचाकर  दादा-दादी  के  श्राद्ध  कर्म  के  लिए  रख  लिया  करते  थे. पर  हुआ  ऐसा  की  दादा  के  जाने  के  तीसरे  दिन  ही  दादी  ने  भी  जाने  की  तैयारी  कर  लिया. और  एक  ही  के  हिस्से  से  दोनों  का  श्राद्ध  कर्म  संभव  हो  सका. मैं  उन  दोनों  के  देहांत  से  थोड़ी  सी  राहत पा  सका.   चलो  कुछ  बोझ  तो  कम  हुआ, इसकी  खुशी  हुई  मुझे.

जिस  परिवेश  से  निकलकर  मैं  आया, वहाँ  असहजता  का  भाव  अधिक  था. बात  करने  से  लेकर  अपनी  बातों  को  साफगोई  से  पेश  करने  तक  में  हिचक  ही  हिचक. उस  असहजता  को  परास्त  करने  का  मंत्र  भी  मैंने  खोज  निकाला. मैं  अकेले  घूमने  निकल  जाता, घंटो  विचरते  रहता. अकेले  विचरना  मेरे  आदत  में  शामिल  हो  गया. सुना  था  की  सुंदरताओं  को  देखने  से  असहजता  कम  हो  जाता  है. सुंदरताओं  में  तलाश  में  मैं  इतवार  की  दोपहरी  में  शहर  की  सुनसान  गलियाँ  लांघ  आता. मुझे  अच्छा  लगता  था  ढ़िले  कपड़ो  में  उम्मीद  और  संशय  के  बीच  घरेलू  कार्यों  में  संलग्न  औरतों  को  देखना.  इन  औरतें  और  मेरी  माँ  में  तमाम  अंतर  होते  हुए  भी  कुछ  एक  जैसा  था  जिसकी  डोर  में  मैं  बंध  जाता  था. मेरी  माँ  भी  अपने  सभी  कार्यों  को  उम्मीद  और  संशय  के  बीच  ही  किया  करती  थी. संशय  न  होने  पर  उम्मीद  का  बाँध  भी  टूट  जाया  करता  है. सुंदरताओं  की  तलाश  मे  मैं  वेश्यालयों  तक  गया  जहाँ  हमारे  समाज  की  देवियां  रहती  हैं. मैं  वहाँ  से  भी  लौटा, जैसा  होना  चाहता  था  वैसा  ही  होकर. 

पर व्यक्तिगत  संलग्नता  के  चलते  मैं  अपने  मूल  से  दूर  होता  चला  गया. मैं  अकेले  में  अपने  पिता  की  स्थिति  पर  हँस  लेता. माँ  के  लिए  मेरे  मन  में  जो  उदात्त  भावना  थी, वह  दिन  प्रतिदिन  कमतर  होता  चला  गया. मैं  यही  सोचता  कि  पिता  जैसे  भी  हैं  अपनी  कमी  के  चलते  हैं. मैंने  उनको  अपना  नायक  मानने  से  परहेज  करने  लगा. मेरे  लिए  सफलता  के  मायने  बदल  गये  थे. जिस वृत्त  का  निर्माण  मेरे  इर्द-गिर्द हुआ  था  उसमें  से  मैंने  पिता  की  बिंदु  को  बाहर  कर  दिया, यह  जानते  हुए भी  की  एक बिंदु  के  निकलने  पर  भी  वृत्त  अपना  मूल  खो  देता  है.घर  जाना  मेरे  लिए  सबसे  बोझिल  कार्य  हो  गया.

व्यक्ति  को  सफल  होने  के  लिए  अपने  लिए  नये  दायरे  का  विकास  करना  होता  हैं. मैंने  नये-नये  दायरे  भी  ढूँढ  निकाले. आधुनिक  सफलता  की  जो  परिभाषा  है  उसपर  खरा  उतरने  का  पुरजोर  प्रयास  मैंने  किया. 

पर  जब  मैं  इस  लायक  हो  गया  कि  पिता  को  5051 रूपए  दे  सकूँ, मैंने  नहीं  दिया. मैंने  पिता  से  संवाद  के  हर  अंश  को  तोड़  दिया. उनकी  अनिवार्य  उपस्थिति  को   मैंने  जरूरी  नहीं  समझा. मैंने  पलायन  के  दुख  को  समझने  की  कोशिश  नहीं  की. 



(निशांत रंजन नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी में माइनिंग के छात्र हैं.  इन्हें  किस्से सुनाना पसंद है, हिंदी उर्दू के लेखकों के साथ कामु और काफ्का भी प्रिय हैं. फेसबुक पर दास्तान  लिखते हैं. )

24/08/2017

युवा कविता #2 : शशांक मुकुट शेखर

 मेरे लिए कविता खुद को ढूंढने का एक माध्यम है. और उन सभी बातों को व्यक्त करने का भी जो मेरे अंदर पलकर मुझे बैचैन सी करती रहती है. कविता मेरे लिए आत्म-संतुष्टि है. और खुद को एक बेहतर इंसान बनाने का बहाना भी. कविता मुझे संपूर्ण बनाती है.अपनी लिखी हरेक कविता मेरे लिए मेरी प्रेमिका की एक चुम्बन है, जो हमेशा मुझमें प्यार को और थोड़ा गहरा कर जाता है.


रुखसाना 1. फ़ज़र की पहली अज़ान के साथ तुम याद आती हो रुखसाना अब मेरी नींद सुबह जल्दी नहीं खुलती तुम्हारे घर से आने वाली चाय की महक मुझतक पहुँच ही नहीं पाती जैसे रुक जाती है श्लोक की ध्वनि मस्जिद के दरवाजे तक जाते-जाते और जैसे पहुँच ही नहीं पाती कभी अजान की आवाजें मंदिर के कपाट तक पहले हर सुबह तुम पढ़ती थी कलमा और बज उठती थी मेरे कमरे के कोने में बनी मंदिर की घंटियाँ गुजरात के रास्ते तुम ना जाने कहाँ गुम हो गई और मैंने तुम्हारा नाम पिरो रखा है अपने श्लोक में जिसे जपता हूँ काबा की सीढियों पर लिखे आयत की तरह 2. पता नहीं तुम कहाँ हो रुकसाना मैं अब भी यहीं हूँ, इसी शहर में अब सबकुछ वैसा तो नहीं है, पर सबकुछ वही है मेरा यकीन करो सबकुछ वही है, वहीँ है वही शहर, वही लोग बस तुम नहीं हो हाँ.. और कुछ भी नहीं है मेरी चाय में अब मिठास नहीं है शहर की हवा में तुम्हारे कलमें की आवाजें नहीं गूंजती रातें अब भी काली ही होती है पर दिन भी अब काला-काला होने लगा है नफरत और तल्खियों के साए में लिपटा डरवाना काला दिन करीम मियां और रमुवा अब गले नहीं मिलते मोहसिना और महेंद्र अब साथ नहीं पढ़ते मजहब ने ज्ञान के भी अब हिस्से कर दिए हैं यहाँ शहर की मस्जिदों में आज भी रोज अज़ान होता है आज भी जलते हैं दिए यहाँ के मंदिरों में पर हां, पंडित भोलाराम और मौलवी रहमान अब दोस्त नहीं रहे तुम्हारे जाने के बाद पता चला कि मजहबें जोडती नहीं अलगाव पैदा करती है यह शहर अब वो शहर नहीं रहा जहाँ आयतें और श्लोक साथ पढ़े जाते थे 3. पता है रुकसाना, शायद हम गलत थे हमें समझना चाहिए था कि ना राम से तुम्हारा कोई वास्ता ना अल्लाह पर मेरा कोई अधिकार ये धर्म ये कौम ये मजहबी सियासतें इनसब ने बना रख्खे हैं तमाम रुखसानाओं और रह्मानों और रोहितों और राहुलों के लिए एक अलग-अलग तीर्थ स्थल जहाँ प्रवेश करने लिए बनानी पड़ती है दोनों हाथों से भिन्न-भिन्न मुद्राएँ हम क्यों नहीं समझ पाए कि मंदिर के ‘म” और मस्जिद के ‘म’ में बहुत फर्क है और राम का ‘र’ और रहीम का ‘र’ दो अलग-अलग वर्णमाला के ‘र’ हैं शायद मुझे पक्का यकीन है कि तुम्हारा नवरात्रा का व्रत रखना गलत था या मुझे रमजान में रोजा नहीं रखना चाहिए था 4. कभी-कभी सोचता हूँ आकर लेट जाऊं तुम्हारे बगल में किसी दिन पर वो भी संभव नहीं क्योंकि मेरा ईश्वर मुझे लेटने का अधिकार नहीं देता और तुम्हारा खुदा.... खैर छोड़ो पर हम मिलेंगे हम जरुर मिलेंगे सुना है जन्नत और स्वर्ग एक ही जगह का नाम है या शायद वो भी अलग-अलग.. पता नहीं पर इस ब्रह्मांड के परे कोई तो जगह होगी कोई तो ऐसा शहर होगा जहाँ अल्लाह और राम साथ रहते होंगे हम वहां मिलेंगे पर हम मिलेंगे जरुर तुम इंतजार करना. ------------------------ किसी दिन लिखूंगा तुमपे एक लम्बी कविता जिसमे पाकिस्तान से लेकर गुजरात तक का जिक्र होगा और फिर कोई रुकसाना गुजरात के रास्ते कहीं गुम ना होगी.


             मैंने किया था प्यार 

            -------------------------
मैंने किया था प्यार शहर के पुराने हिस्सों की छांव तले ओढ़नी के झुरमुट में गुपचुप मीर के गजल सा प्यार पुरानी खिडकियों के साए में बेखबर.... नालंदा के बसे खंडहरों से तक्षशिला के रंगीन उजाड़ों तक अमलतास के पीले फूलों सा प्यार क्या तुमने पाटलिपुत्र के गौरव अतीत सा किया है कभी प्यार? किया है कभी मगध के अदृश्य सूर्योदय की लालिमा सा? उस रात जब हस्तिनापुर नष्ट हो रहा था गंगा का पानी गायब होता है जैसे अचानक गर्मियों में ग़ालिब की नज्म सा गुनगुना मैं मशगूल था रचने में एक नया हर दफा एक नयी सभ्यता की शुरुआत किसी पुराने बसे परम्पराओं के खात्मे के साथ होती है और प्यार ही उस नयी सभ्यता को बसाती है उसी जतन से जैसे माँ नवजात को अपने स्तन की नमी से सींचकर जैसे धरती किसी बीज को बादलों से मांगकर दो बूंद शहर के सारे पुराने हिस्से गायब होते गए एक-एककर ओढ़नी के रंगीन रेशों सा हवा में दूर,बहुत दूर तक पर जीवित है अब भी तक्षशिला और सांसें ले रहे हैं नालंदा की मटमैली दीवारें ये प्यार ही है जिसने बचा रखा है पाटलिपुत्रा को और मुझे भी प्यार ने ही बचाए रखा है अबतक अमलतास के पीले फूलों सा फिजाओं में दूर तक फैले हुए.

 
 
संवाद


हमेशा से हमारी चाह रही है द्विपक्षीय संवाद की
जहाँ हम सिर्फ सुनें नहीं
हम सुने भी जाएं

मैं अक्सर एकांत में
फेंकता हूँ एक ढेला
अपने विचारों में तल्लीन शांत जल में
पानी हमेशा आपके सवालों का जबाब देता है
हमें बस उनमें उठी तरंगों की भाषा समझना भर है

संवाद के पूरा होने के लिए
दोनों पक्षों का पूर्ण वक्तव्य कतई जरुरी नहीं
कई दफा अपूर्ण संवाद भी
संवाद के पूरा होने का कारण बनती है

अपूर्णता संवाद को एक नया अर्थ प्रदान करती है

जैसे
जब वह जाते वक़्त आपसे कहता है
"अपना ख्याल रखना"
इसका साफ़ मतलब है कि
वह जल्द ही आपसे मुलाकात चाहता है

अपूर्ण पूर्ण संवाद का सबसे अच्छा उदहारण है माँ

माँ का यह कहना कि 'अभी तुम बच्चे हो'
कहीं से भी आपको बच्चा साबित नहीं करती
दरअसल माँ ने देखा है
कई बच्चों को बड़ा होते हुए
इसलिए वो आपको हमेशा बच्चा ही देखना चाहती है

संवाद को हमेशा माँ की दृष्टि से देखा जाना चाहिए
और हर संवाद को
एक अदद माँ की आवश्यकता होती है.

21/08/2017

रेखना मेरी जान और रत्नेश्वर - सुधाकर रवि और नचिकेता वत्स से बातचीत.

पटना पुस्तक मेला में अपने नए उपन्यास ‘रेखना मेरी जान’ के लिए प्रकाशक के साथ पौने दो करोड़ रुपये का करार के घोषणा के बाद रत्नेश्वर सिंह देश स्तर पर चर्चा में आए हैं, अपने आगामी नॉवेल ‘रेखना मेरी जान’ पर इन्होने बातचीत की है सुधाकर रवि और नचिकेता वत्स के साथ . बातचीत के प्रमुख अंश -
सवाल - रेखना मेरी जान का कथानक किस विषय पर है ?
जवाब - इसका कथानक ग्लोबल वार्मिंग पर है जो एक प्रेम कहानी के साथ पैरेलल चलती है और इसका कथानक युवाओं को ध्यान में रख कर लिखा गया है.
सवाल - पॉपुलर लिटरेचर में कॉलेज, हॉस्टल, इंजीनियरिंग जैसे विषयों पर किताब लिखी जा रही है ताकि यूथ तक पहुँच पाएं, आप यूथ तक पहुँचने के लिए ग्लोबल वार्मिंग जैसी विषय को क्यों चुनते हैं ?
जवाब - ग्लोबल वार्मिंग एक बड़ी समस्या है और इस विषय पर हिंदी में कोई किताब नहीं आई है, तो हमें लगा कि इस विषय पर युवाओं को ध्यान में रख कर लिखा जाना बेहद जरुरी है , ताकि आज का युवा इस समस्या को महज किताबी या इसे खबर की शक्ल में न जाने , बल्कि भावनात्मक रूप से इस समस्या से जुड़ पाएं.
सवाल इस किताब की भाषा शैली कैसी है, क्या परम्परागत हिंदी लेखन जैसी है या कुछ नयापन है ?
जवाब - किताब की भाषा यूथ को ध्यान में रख कर लिखा गया है, आम बोलचाल वाली भाषा है, देवनागरी के साथ रोमन शब्दों के भी प्रयोग है. जिसे से आज की जनरेशन आसानी से जुड़ पाएं.
सवाल ग्लोबल वार्मिंग एक व्यापक विषय है जिससे हर एक देश प्रभावित है, ऐसे में इस नॉवेल को किस शहर या देश को केंद्र में रख कर लिखा गया है ?
जवाब - ग्लोबल वार्मिंग से सबसे पहले सागर तटीय देश प्रभावित होंगे , इसे लिहाज़ से मैंने इस किताब को बांग्लादेश को केंद्र में रख कर लिखा है. आप किताब में देखेंगे कि हिंदी का आलावा किताब में बांग्ला भाषा का भी प्रयोग है.
सवाल – रेखना मेरी जान की दस लाख प्रति बेचने का नोवेल्टी प्रकाशन ने लक्ष्य रखा है, हिंदी में इतनी प्रतियाँ बेच पाना क्या आपको असंभव नहीं लगता ?
जवाब – यह पहली बार नहीं है, इससे पहले भी वर्दी वाला गुंडा की लाखों प्रतियाँ बेची जा चुकी हैं. लोग ऐसा पहले भी कर चुके हैं, यह कोई अद्भुत बात नहीं है. मैं ऐसा काम नहीं करने जा रहा जो पहले न हुआ हो.
सवाल – (टोकते हुए ) फिर आज के समय में किस आधार पर लाखों प्रतियाँ बेच पाना संभव है ?
जवाब – हमारे प्रकाशक ने सबसे पहले कई सर्वे का अध्ययन कर के पता लगया की हिंदी के पाठक हैं कितने. हमें यह ज्ञात हुआ कि लगभग 5 करोड़ लोग हिंदी के अखबार पढ़ते हैं. मतलब हिंदी के पाठक तो है और खास स्ट्रेटजी के साथ बाज़ार उतरें तो 10 लाख किताब बेची जा सकती है. यह योजना इसी संख्या को ध्यान में रख कर के है.
सवाल – हिंदी के लेखक और प्रकाशक और अंग्रेजी के लेखक प्रकाशक ने आप क्या अंतर देखते हैं ?
जवाब – हिंदी के लेखक और प्रकाशक दो धरातल पर खड़े हैं , लेखक को प्रकाशक से कोई मतलब नही है, और प्रकाशक को लेखक से कोई मतलब नहीं. लेखक का काम लिख देने भर से हैं और प्रकाशक का काम किताब छाप कर पूंजी निकाल लेना है बस. दोनों में कोई तारतम्य नही होता कि हमारी किताब कैसे बिके. हिंदी का दुर्भाग्य है कि इसका बाज़ार खड़ा नहीं है. जबकि अंग्रेजी में ऐसा नहीं है, उसका बड़ा बाज़ार है, किताब आने से पहले उसका बाज़ार देखा जाता है, कई एडिटर बैठते हैं, मार्केट स्ट्रेटजी तैयार की जाती है. हिंदी को बेचना आसान होना चाहिए लेकिन इस पर काम ही नही हुआ है, ऐसा हमें लगता है. हिंदी के अखबार और अंग्रेजी के अखबार से कई गुना ज्यादा बिकती है या यूं कहें कोई तुलना ही नही है. मतलब की हिंदी के पाठक हैं लेकिन आपने खड़ा नही किया साहित्य पढ़ने के लिए , आप पहुँच नहीं पाएं. लेखन का काम सिर्फ लिखना नहीं है , मैं कोई चुनौती नहीं दे रहा लेकिन मेरा प्रयास है इसका बाज़ार दिखाऊं, इसका बाज़ार खोलूं.
सवाल – ‘रेखना मेरी जान’ के बाद हिंदी का बाज़ार कितना बदल पायेगा ?
जवाब – एक लेखक से पूरे समाज में बदलाव आ जायेगा ऐसा नहीं है , मेरी किताब के 10 लाख कॉपी बिक भी गयी तो कोई बहुत बड़ा भूचाल आ जायेगा , ऐसा नहीं है. इसके लिए निरंतर सभी को प्रयास करना होगा तभी वो बदलाव आएगा . एक चेतन भगत की किताब बिक गयी तो कहाँ अंग्रेजी के दुसरे लेखकों की किताब उतनी बिक पाती है. लेकिन हाँ हमारे इस कदम से साहित्य जगत सोचेगा, उन्मुख होगा.
सवाल – पटना पुस्तक मेला से जुड़े आप अपने अनुभव बताएं ?
जवाब – पुस्तक मेला में मेरी शुरुआत बतौर लेखक हुई. 1990 में मैं अपनी किताब खुद खड़े होकर बेचता था. लोग हँसते भी थे कि कैसा लेखक है जो खुद अपनी किताब बेच रहा है. 1996 में पटना पुस्तक मेला समिति में एक सदस्य के रूप में शामिल हुआ , फिर पटना पुस्तक मेला का प्रवक्ता के रूप में नियुक्त हुआ. उस समय मेला में राजनितिक वर्चस्व था, हमने इसे थोड़ा साहित्य संस्कृति और पत्रकारिता का केंद्र बनाने की कोशिश की. उस समय बिहार में कोई साहित्यिक केंद्र नहीं था , कई केंद्र थे भी तो उस समय तक कमजोर पड़ गयी थी. हमें यह लगा की पटना पुस्तक मेला एक केंद्र हो सकता है, भले ही साल भर में पन्द्रह दिन ही हो . शुरू में लेखकों, कवियों को घर-घर पास पहुंचवाने का काम हुआ फिर कई सम्मान और पुरस्कार की शुरुआत की गयी. सांस्कृतिक आयोजन शुरू हुआ और धीरे-धीरे माहौल बदलना शुरू हुआ. 2003 में हमने फिल्म फेस्टिवल भी शुरू किया और कई कार्यक्रमों के साथ पुस्तक मेला का हर साल विस्तार होता रहा. आज पटना पुस्तक मेला साहित्य संस्कृति और पत्रकारिता का एक मजबूत केंद्र है.
सवाल – आपके जीवन में कौन सा ऐसा पल है जो आपको परेशान करता है ?
जवाब – यूं तो जीवन में कई ऐसे पल हैं जो परेशान करते हैं लेकिन एक वाकया मैं भूल नहीं पता. अक्सर मुझसे लोग पूछते थे कि आप क्या करते हैं ? मैं कहता था कि लिखता हूँ, तो लोग समझते थे कि मैं कवि हो गया हूँ, लेकिन वो फिर पूछते थे कि असली काम मैं क्या करता हूँ जीवकोपार्जन के लिए ? मैं निरुतर सा हो जाता था, क्यों कि मेरे पास कोई काम था नहीं. जब मेरी शादी कि बात हुई तो सवाल था की एक लेखक से भला कौन शादी करेगा ? लेकिन मेरा पटना में जो यह पुस्तैनी घर है और कुछ ज़मीन है, लोगों को लगा इससे रोजी रोटी चल जाएगी और इसी आधार पर मेरी शादी हुई. जब पत्नी से लोग पूछते थे कि आपके पति क्या करते हैं तो वो शरमा जाती थी कि क्या कहें ‘’मेरे पति लिखते हैं’’. एक दिन मेरी पत्नी मुझसे आकर भावुक होकर कहीं कि कोई जब पूछता है कि आपके पति क्या करते हैं ? जब मैं कहती हूँ की लेखक हैं, तो सामने वाले के भाव देख कर बहुत ख़राब लगता है. मैंने अपनी पत्नी से कहाँ की जिस बात के लिए आपको गौरव होना चाहिए आप शर्मिंदा हो रही हैं. मुझे ऐसा उम्मीद है कि ‘रेखना मेरी जान’ के बाद मेरे लेखक होने के प्रति लोगों में जो भाव है इसमें बदलाव आएगा और मेरी पत्नी को शर्मिंदा नहीं होना पड़ेगा. गौरव के साथ कह पाएंगी की मेरे पति लेखक हैं.
नचिकेता साहित्य पढ़ते हैं
सुधाकर कवि है.