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Showing posts from 2016

Quote unquote feminism - some general personal thoughts

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Dear women, Being repetitively told that you are strong, smart and independent does not make you one, you should feel that yourselves.  Let no one ever tell you what you are and what you are not. Not only us but also others including transgender and homosexuals whose rights have become a subject of recent concern, are surrounded by same insecurities as us. Ours have always been a patriarchal set up but that didn’t mean that women were not given any ‘rights’, they did have a say in household matters and had their own social life. We should not compare the past to the present. Comparing would only be useful if we compare contemporary societies.  To change anything today would require a change of people’s mental set up. There have always been movements which demand certain things from the society and are able to succeed in getting some fulfilled, but just by telling to start a movement is no solution. You should stand up for what you believe. I am not suggesting that there shouldn’t have…

To the Women - a letter by Neha Shama

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Dear Women ,
we are strong ,smart and independent and also responsible. We have many perils around,we have been suppressed by the regressive society of which we are an equal part for long.
Let's change where we are and how we are.
Let us claim our power.
We shall bring feminist movements to actions and I am sure all men would support us only if we do not exploit the resources to our advantage. If we want equal rights ,we should be equally ready to give upon the privilegesthat being women brings along. We shouldn't be exploiting the rape and dowry and laws to avenge old hatreds or to get personal benefits. We should stop slut shaming our own gender.
Men and the society will follow once we ourselves become united and give ourselves to the cause. It is our own actions that are not letting the change come.
Not all women are wrong.
But then the wrong ones are making a deeper impact. Let the world not fear the change we want. It is essential for everyone.
Give power to the right ones and th…

दिल्ली दरबार

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आख़िरकार इस साल के अंत में 'सत्य व्यास' का दूसरा उपन्यास पाठकों के बीच आ गया। जिन्होंने इनका पहला उपन्यास पढ़ा था वो सब इसका बेसब्री से इंतज़ार कर रहे थे। इस बात से आप समझ सकते हैं कि लेखक ने अपने पहली किताब से ही कुछ जादू कर दिया था और ढेरों फैन बना लिए थे। 'बनारस टॉकिज' तो आज भी पाठकों के बीच बहुत प्रसिद्ध है। अभी इनकी दूसरी किताब की बात करते हैं जिसका नाम है "दिल्ली दरबार"। किताब के रिलीज़ होने से पहले वीडियो ट्रेलर आया और प्री-बुकिंग भी शुरू हुई। मैंने भी उत्साहित होकर प्री-बुकिंग की और सत्य व्यास के हस्ताक्षर वाली किताब मेरे घर आयी। किताब देखते हीं मन खुश हो गया और जल्द ही पूरा पढ़ लिए। जैसा की लेखक बताते है - "कहानी इसी सदी के दूसरे दशक के पहले दो सालों की है। वह वक्त जब तकनीक इंसान से ज्यादा स्मार्ट होकर उसकी हथेलियों में आनी शुरू ही हुई थी। नई तकनीक ने नई तरकीबों को जन्म देना शुरू किया था।" आगे कहानी इन बातों को सही साबित भी करती है। उपन्यास की कहानी दो दोस्तों के बैचलर लाइफ की है। कहानी है एक ऐसे मनमौजी युवा की जो सिर्फ अपनी सुनता है। चतुर, आवार…

letter to the chef

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Sanjeev kapoor Sir,
How are you? Wish you are allright. It's very cold and being a foody how can I forget you. I am in a car on a road trip, on my way to your state Haryana. I will stay in karnal. Thought to inform you.
                                           Anyway winter means tasty and spicy foods for me. As I love cooking, so now a days I am trying some regional dishes. Last time I tried south indian but my cooking failed to meet my expectations. Now sir I want you to mail me some new recipes.I also tried your paneer and it was just awesome. Now tell me something about your city. Now a days all are talking about weather. Your place being nearer delhi, I can imagine the condition there. But today, the weather is quite sunny and it feels great. Infact I am able to type on my small screen with my bare hands. Winters are great for travelling, isn't it?. Life has just two things for me food and travel. Rest is just "moh maya". Funny but true, right. Now what else sh…

I WAS THERE WHERE IT ALL BEGAN

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so,  this is an interesting story to tell- the one i have told too many times. 
there are these moments in one's live which gleam more than other usual monochromatic ones, the moments, gogol, the russian writer calls, the moment of absolute happiness and satisfaction. chandradhar sharma guleri talks about it the important moments in one's life, which one remembers, may be years later, and they flash in the final moments of ones life.  let us start before the start then. it was 2012. i had already lost hope to see some good literary activity in the department of English  Patna college. there was no initiative from the faculty and the students in my batch had taken on themselves to prove that at last, poetry and creative writing had lost all their relevancy. a failed attempt to publish a magazine sat on my back- the burden tiring and the life threatening experience it had been, it led me to believe that my days in literature were numbered. 
but it was 2012 and things changed - …

वीकेंड डायरी : गम-ए-हस्ती का 'असद' किस से हो जुज्मर्ग इलाज

( इस लेख का संक्षिप्त रूप आज दैनिक भास्कर से प्रकाशित हुआ है. लिखते हुए कुछ ज़्यादा लिख गया था, सो बाकी इधर है.  - अंचित)
पांच साल की औपचारिक ट्रेनिंग और उसके पहले और बाद मिला कर कुछ दसेक साल का वास्ता साहित्य और कविताओं से, इतने सालों के अनुभव से जो एक वाजिब निष्कर्ष निकल कर सामने आता है वो ये कि हमलोग दरअसल पूरा जीवन एक बढ़िया पाठक बनने की प्रक्रिया में होते हैं और बढ़िया पाठक पूरी तरह से निर्भर होता है बढ़िया कवियों,लेखकों पर. पैमानों पर बहस तो चंगेज़ खान से ज़माने से शराबबंदी तक जारी है और रोज़े क़यामत तक उसको दरबदर चलना है. पर फिर भी गुस्ताखी माफ़. बढ़िया पाठक जो होता है वो घाघ होता है, अपना मसाला, अपनी दवा, उसके चंगुल में अब फंसे तो तब फंसे. जैसे कोई बगुला. (सुधांशु फिरदौस अपनी ताज़ी कविता में लिखते हैं , "वक़्त एक बगूला है जो किसी को भी अपने चपेटे में ले सकता है" भैया, ये बढ़िया पाठक भी ऐसा ही है. खैर सुधांशु पर बाद में आते हैं.) बगुले हमेशा फ़िराक में रहते हैं और पाठक भी ऐसे ही हैं.और अगर मैं मान लूं कि कई धाकड़ बगुलों के बाद, मेरा भी नम्बर आता है तो काम की बात शुरू हो. हर समय में ब…

आखिरी जन कवि की पहली पुण्यतिथि

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जेएनयू को अगर राष्ट्र मान ले तो उस राष्ट्र के राष्ट्रीय कवि थे रमाशंकर यादव विद्रोही। विद्रोही जी ने पिछले साल इसी दिन दिल्ली में यूजीसी के सामने सरकार के पीएचडी कर रहे छात्रों के स्कॉलरशिप वापस लेने के फैसले का विरोध करते हुए अपनी आखिरी सांस ली। दिल्ली के कड़कड़ाती हुई ठण्ड में भी वो छात्रों के साथ धरने पर बैठे रहे और अपनी कविता से उन ऊँचे ओहदे पर बैठे लोगों को ललकारते रहे। वो कवि थे और उनकी कविता का छंद, रस और अलंकार था विद्रोह करना और रमाशंकर यादव आखिरी समय तक सत्ता से विद्रोह करते रहे। उनके जीवन का केंद्र भले ही जेएनयू था लेकिन वो अपनी कविता में जॉर्ज बुश से ले के भगवा हुकुमत को ललकारते रहे, वो कविता के अखाड़े में भारत भाग्य विधाता से ले के भगवान तक को पटकनी दे देते रहे। वो कबीर की तरह अखड़ और दू टुक बात करते रहे। विद्रोही जी की दो खासियत थी एक तो उनकी कविता शीर्षक मुक्त थी दुसरे विद्रोही जी को उनकी सारी कवितायेँ मुंह जुबानी याद थी मानो विद्रोही जी ने कविता सिर्फ लिखा ही नहीं बल्कि हर एक शब्द को जिया है। उनकी कविता बंद कमरें में कैद नहीं थी , उनकी कविता आम आदमी और व्यवस्था के घर्षण …

ख़त नंबर एक

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मियां असद 
सलाम, 
सर्दियों की पहली खेप आकर गुज़र गयी. दूसरी अपनी लम्बी उम्र की दुआ करती हुई मारी जायेगी. इसको तो हर साल आना होता है. घर से कुछ दूर एक कंप्यूटर की दूकान है. वहां से पुराना कंप्यूटर ठीक करा कर लौटा हूँ. सोचा तुम्हारे ख़त से ही इसकी नयी ज़िन्दगी की इबारत शुरू हो. दिल्ली में भी ठण्ड पड़ने लगी होगी, वहां की शामों का हाल तुमसे बेहतर कौन जानता है. यहाँ इतनी दूर उस जाड़े के बारे में सोचना भी ठिठुरन बढ़ा देता है, पर पटने का भी कोई अलग हाल नहीं है. यहाँ भी पेड़ों के तने और लाशें सब एक तरह से महकते हैं.  तुम्हारा दीवान एक बार फिर पढ़ डाला है. इस बार पिछली बार जैसी तल्खी से नहीं, ना किसी के साथ. अकेले ही. मियाँ मीर की किस्मत कब होगी अल्लाह पर ही छोड़ देना बेहतर है. ये जो लैपटॉप है, थोडा स्लो है पर हाथों में समा जाता है. तुमको ख़त लिखता हुआ सोचता हूँ, जाने कितनी चीज़ें अब बची हैं जिनको पूरी तरह समेटा जा सके. एक भीड़ से तो भरी हुई जगह पर बैठा हूँ, अकेला, एक शीशे की बड़ी खिड़की के पास प्रेम देखता हुआ. कैमरे की पुरानी रील की तरह एक एक कर पुराने प्यार याद आ जाते हैं. सिर्फ अपने नहीं सबके... अधूरे. तुम …

Jane Eyre - A thoughtful journey

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Whenever we are depressed we want someone to relate to. And what can be more relatable than a book. I find same relating and inspiring element in the novel JANE EYRE which was penned down in nineteenth century by Charlotte Bronte.
                 It revolves around the life of a girl, from her childhood to marriage. While reading it I was so much engrossed in the story that I felt as if I know Jane personally. It took few days to complete and every time I picked it up, there was an excitement to know more about Jane. Her childhood was not normal. It was in fact tough. I felt pity when her cousin hits her, at the same time, I felt hatred for her savage aunt and cousins. It imparts a sense for the kind of life an orphan child leads all around the world.
                 Anyway,  at that instant I wanted Jane to run away which obviously she doesn’t do. When she is sent to boarding school I feel great that now she could live the way she wants to. But life is itself the biggest struggle w…

मुसाफिर कैफ़े

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इस साल के सितम्बर में आई हिन्दी नॉवेल है ‘मुसाफ़िर कैफ़े’ । लेखक हैं दिव्य प्रकाश दुबे और प्रकाशक हैं हिन्द युग्म और वेस्टलैंड . बुक का सोशल मीडिया पर जम से प्रचार किया गया । किताब का वीडियो ट्रैलर भी बनाया गया । जो हिंदी में एकदम नया काम है। प्रकाशक का दावा है कि बुक 10 दिन में 5000 बिक गयी । जो कि हिंदी प्रेमियों के लिए खुश होने वाली बात है। मैं ‘मुसाफ़िर कैफ़े’ को कुछ दिन पहले ही पढ़ा हूँ। लेकिन बुक पर इसलिए नहीं लिख रहा हूँ कि मुझे ‘मुसाफ़िर कैफ़े’ ने उत्साहित या निराश किया. बल्कि बुक के बैक कवर पर लिखे कुछ वाक्य ने मुझे लिखने को विवश कर दिया । --Story--
नॉवेल का मेन कैरेक्टर है चन्दर। जो सॉफ्टवेर इंजिनियर है। उम्र शादी की हो गयी तो घर वाले प्रेशर डाल रहे हैं शादी करने के लिए। सेकंड कैरेक्टर है सुधा जो लॉयर है। फैमिली कोर्ट में डिवोर्स दिलवाती है । उसके फैमिली भी शादी करने के लिए प्रेशर डाल रहे है। चंदर और सुधा एक ही शहर मुंबई में रहते हैं और संयोग से दोनों एक दुसरे को शादी के लिए मिलने जाते हैं. सुधा को शादी से एलर्जी रहती है और चंदर का उसकी एक्स गर्लफ्रेंड का प्रॉब्लम रहता है. बस घर व…

शोभित की कवितायेँ

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शोभित  कविता के साथ अपने अफेयर की शुरुआत में है. हम अपना सफर जब शुरू करते हैं , हमारे साथ हमारा उत्साह और उम्मीद ही होते हैं और सामने एक बड़ी दुनिया जिसको लिख देने का मन होता है. ये उत्साह ताउम्र ज़रूरी होता है. शोभित रंगकर्मी भी है और नाटकों को भी जीता है. आज उसकी तीन कवितायेँ -
1. खुदरे सिक्के की हालत है
क़ैद बयां कैसे करूँ
ज़ेेब ही महफ़िल है
खुद के पैर नहीं,
छनक औरों के क़दमों से
गुल्लक की क़ैद मिले तो रह भी लूं
यहाँ तो टॉफियां लूटा दी जाती है
मेरी गुलामी क़ायम रखने के लिए
बाज़ार की बिक्रियां तेज़ होने को है
खूब होगी तरफ़दारी ऐ नोट तेरी
मैं तो पसंदीदा रहूँगा बस फ़क़ीरों का
शाम की तख़्त से फेंक दिया जाऊंगा नदी में
किसी की मन्नत का बोझ लिए ।। 2.
उस वक़्त को खोज लो
ज़रा सा वक़्त लेकर
जिस वक़्त के लिए हो बने
तुम हर वक़्त आलमगीर
कुछ अलग तो होगा ही
तुम हो किनारा मैं बहता नीर
न मिले वो वक़्त तो छोड़ो
खोज लो उस आग को
जिससे सुलगती सांस है
फिर दिसंबर आ रहा है
बैठ जाना तुम किनारे
मैं बहूँगा सुलगता नीर । 3.
हर ख़बर रखता हूँ चाँद का
रात के ओझल होने तक
एक पंछी मेरी ओर से
मेरे मन का वो कोलंबस
उड़ता चला जाता है जो
रास्ते भटके हुए
वो पहुँच जाता है …

आगा शाहिद अली की कवितायेँ

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(आगा शाहिद अली यादों के शायर हैं और उनकी व्यक्तिगत स्मृतियाँ उनकी ज़मीन के इतिहास से मिलती जुलती डूबती उतरती रहती हैं. अपनी कविताओं में वो हमेशा घर लौटने को बेचैन दिखाई देते लगते हैं. उनकी कविता दर्द की पड़ताल में अपना समय व्यतीत करती है और कविता में उस ख़ास चीज़ की बहुतायत है जिसको पामुक अपनी किताब इस्तांबुल में "हुज़ुं" कहते हैं.
उनका अनुवाद करते हुए उनके करीब जाना उनके काम्प्लेक्स पोएटिक सिस्टम से भी रूबरू होना है और दर्द और शैली के अभूतपूर्व संयोजन से झूझना भी है. एक अनुवादक के लिए ये एक बहुत मुश्किल काम था और उनकी अंग्रेजी के ग़ज़लों की रेंदिशन का शायद ही अनुवाद किया जा सके. -अंचित) आज आगा शाहिद अली की तीन कवितायेँ-
मैदानों के मौसम कश्मीर में,जहाँ साल में
चार चिन्हित अलग अलग मौसम होते हैं
अम्मी अपने लखनऊ के मैदानी इलाके में बीते बचपन की बात करती हैं
और उस मौसम की भी,
मानसून, जब कृष्ण की बांसुरी
जमुना के किनारों पर सुनाई देती है.
वो बनारस के ठुमरी गायकों के पुराने रिकार्ड्स बजाया करती थीं -सिद्धेश्वरी और रसूलन,
उनकी आवाजों में चाह होती, जब भी बादल जमा होते,
उस अदृश्य,नीले भगवान के लिए. बि…

रामकृष्ण पाण्डेय की कुछ कवितायेँ. 

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(वैसे तो "आवाजें" हर दो तीन महीने में एक बार पलट ही लेते हैं, कुछ तकनीक की सरलता की और लौटने के लिए और कुछ जो अपने बूते से बाहर होता है उसको समझ सकने के लिए. बड़े पापा को गये अब सात साल बीत गये हैं. उनसे आखिरी बहस सितम्बर २००९ में हुई थी वो एक सोमवार को गये,सोलह नवम्बर की तारीख. बहस कई बार होती थी और अलग अलग विषयों पर. हॉस्टल से हर शनिवार रविवार उनके पास चले जाते थे, नार्थ कैम्पस से लगभग दो घंटे दूर उनके घर पर कुछ घर के खाने के लालच में, कुछ उनसे सीखने के चक्कर में. कैम्पस की हर गतिविधि पर उनकी गंभीर नज़र रहती थी. इक पूरी इतवार वो बस इसीलिए डांटते रहे क्योंकि मेरा किसी पोलिटिकल पार्टी की किसी कार्यशाला में जाना हो गया था. फिर खुद उन्होंने अख़बार के मार्जिन में पोलिटिकल स्ट्रक्चर समझाया था. एक बार अनुवाद के बारे में हमने बहुत लम्बी बात की. ऐसे ही एक बार कविताओं की तकनीक पर. मार्केज़ और बोर्खेज़ में फर्क करने के लिए उन्होंने एक बार हैरी पॉटर से भी एक उदाहरण उठाया था. वो बढ़िया पत्रकार थे, उस तरह के जो शायद उनके जाने के साथ विलुप्त हो गए. वो बढ़िया शिक्षक हो सकते थे पर उनको जीवन से थोड…