where it all began

Hearth, in its earlier days, came out in form of a newsletter. while the magazine was a tedious, more strenuous affair and was periodical, Hearth never depended itself on time and was published whenever an incessant need to do so was felt- be it some political or literary incident or the opening of a new joint in the city -
as a famous philosopher once said, we are not prisoned by time but by clocks, we must accept our ruins and our downfalls. true poetry and literature will come out of those.
The cover of the blog is called "LOVERS" and has been clicked by eminent poet and photographer Anurag Vats

16/06/2017

अपना शहर और रंगमंच


अधिकांश लोग समझते हैं
सपनो का घर है रंगमंच
और सारे अभिनेता
जगाते हैं नशा 
अंधेरे कमरे में..

ब्रतोल्त ब्रेख्त का यह काव्यांश यह बतलाने के लिए काफी है कि फिलवक्त रंगमंच के संबंध में लोगों ने किस प्रकार की राय बना रखी है. बहरहाल आज लोगों का इस प्रकार से सोचना भी कहीं ना कहीं जायज हीं जान पड़ता है ! वर्तमान समय स्वयं अपने आप में इस बात का गवाह है जो हमारे देश के लोगों में इन दिनों सोचने-समझने की क्षमता कम हुई है, साथ हीं कायदे से पढ़ने-लिखने वाले लोग भी लगातार कम हो रहे हैं.

यह भी इसका प्रतिफल हीं है जो मोटे दिमाग वाले लोगों का हुजूम हमारे इर्द-गिर्द इतना ज्यादा बढ़ गया है जो कि सरकार चुनने से लेकर, सच्ची कला की परख करने और चीजों को देखने-समझने तक में अधिकांश लोग एकदम से गलत दिशा की ओर अग्रसर हो रहे हैं.

इन्हीं बातों के कारण वह आजकल काफी चिढ़ा हुआ सा रहता था तथा लोगो से बातचीत करते हुए भी उसकी बातों में  चिड़-चिड़ापन देखा जा सकता था. वैसे उस समय में भी जब हिन्दी सिनेमा की कद्र करनेवाले ज्यादातर लोग यश चोपड़ा की फिल्मों का मुरीद हुआ करते थे उसे अनुराग कश्यप की फिल्में पसन्द होती थी.

हालाँकि  नाटक से उसका परिचय गाँव में दुर्गापूजा के अवसर पर प्रत्येक वर्ष मंचित होने वाले नाटकों भर से था फिर भी वह जो भी था वह सारा कुछ छुटपन के दिनों की खेलकूद, मौज-मस्ती का ही हिस्सा मात्र था. तब तक इन चीजों पर गंभीरता से सोचने-समझने का सामर्थ्य वह अपने अंदर जरा भी नहीं जुटा पाया था.
यह दूसरी बात है कि वह अब भी इन चीजों को देखने-परखने की थोड़ी सी विशेषज्ञता भी नहीं हासिल कर सका है.


उसने गौर किया जो गाँव में लोगों के मध्य नाटक, रामलीला, मोटी-मोटी उपन्यास आदि किताबें मात्र मनोरंजन के ध्येय से देखी-पढ़ी जाती थी ठीक उसी प्रकार जैसे मुजफ्फरपुर से लायी गई बाइजियों के द्वारा प्रस्तुत किया जाने वाला नृत्य होता था. धीरे-धीरे थोडे-बहुत अनुभव और  अध्ययन के उपरान्त चीजों को लेकर उसकी सोच समयानुसार बदलती चली गई.

रंगमंच अब उसके लिए मनोरंजन का साधन मात्र नहीं रह गया ठीक जैसा कि साहित्य की मोटी-मोटी पुस्तकें. कला की ये सभी उत्कृष्टतम विधाएं उसे समाज को सकारात्मक दिशा प्रदान करने से लेकर, लोगों की मानसिकता में फरक पैदा करने, उसके भीतर संवेदना जगाने, गलत चीजों पर प्रतिरोध जताने के साधन के रूप में परिणत होती चली गई.
यह सारी बातें उसे एक मनुष्य के क्रमिक विकास में निरंतर मददगार और अत्यावश्यक सिद्ध होती चली गई.



इस बीच, बीते चार-पाँच वर्षो में उसने कई नाटकों के  मंचन देखे. पटना में भी और पटना से इतर भी.

इधर अपने यहाँ पटना में नाटको के प्रर्दशन देखते हुए उसमें कुछ अलग ढूंढ़ना ठीक उसी प्रकार का कार्य बन गया है जैसे सरकार के प्रशस्ति गान में लगे देश के बिके हुए अधिकांश मीडिया हाऊसों के एंकरो से यह उम्मीद पालना कि वह देश-समाज की वास्तविक स्थिति को भी कभी हमारे मध्य उपस्थित करेंगे.

खैर मीडिया की बात अलग मसला है और यहाँ बात फिलवक्त रंगमंच की हो रही है.

ब्रेख्त अपनी उसी कविता में जिसका काव्यांश ऊपर दिया गया है, कला को मनोरंजन, कोई सवप्न, नशा समझने वाले लोगों को समझाते हुए लिखते हैं - 

सपनों का स्वागत करते हैं हम सब
आखिर बिन सपनों का जीवन हीं कैसा
लेकिन अभिनेतागण
इससे तुम्हारा रंगमंच
वह तो नहीं बन रहा हैं ना
जो जीवन की एकरसता-विरूपता को हो सहने में सक्षम
एक नशा
जो थोड़े वक्त तक दुःखो को भुला दे
बिना प्रयास किए हीं हार मान ले
और चुन ले अपने लिए आत्महत्या
तो फिर आप दिखलाओ वह नकली दुनिया
बेतरीके सजाया-संवारा
ठीक वैसे जैसे होता है सपनो में
कामना और भय से भरा
यह धोखा है एक दयनीय धोखा.

यह काव्यांश हीं बहुत सटीक उत्तर है उन लोगों के लिए जिसकी संख्या बहुत ज्यादा बढ गयी है.

ये रसिक लोग हैं प्रेक्षक नहीं. कला को देखने के लिए ये दोनों बिल्कुल दो किस्म के इंसान हैं और यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि इनदिनों प्रेक्षको की संख्या रसिको की तुलना में कुछ नहीं है.
                                                                  
                                                                  बीते मंगलवार प्रेमचंद रंगशाला में उसने सुरजमुखी और हैमलेट नाटक का टिकट लिया और उसके मंचन देखे. यहाँ एक बड़ा हादसा हो गया उसके साथ.
 हैमलेट- शेक्सपियर का फेमस प्ले मानकर देखने की उसकी उम्मीद धरी की धरी  रह गई और यह कोई तीसरा ही  हैमलेट निकल आया एकदम से बीच में. ठीक वैसा हीं जैसे रन फिल्म में छोटी गंगा बोलकर विजय राज को नाले में कूदवा दिया जाता  है. वैसे नाटक यह भी कतई  बुरा नहीं था. फिर भी उसकी उम्मीद मुताबिक भी नहीं.

यद्यपि लोगों का तो खूब मनोरंजन किया इसने और उन्होंने काफी चाव ले-लेकर इसे देखा. यह एक हास्य नाटक था और इसके संवाद भी लोगों के मूड अनुसार हीं लिखे गए थे. नाटक के बाद निर्देशक ने भी कलाकारो से हमेशा इसी तरह हँसते रहने और लोगों को हँसाते रहने के लिए कहा !
मगर यह बात उसे जरा भी पसन्द नहीं आयी. वैसे भी वह कोई हँसने भर के लिए थोड़े हीं ना आया था रंगशाला. वो भी हैमलेट जैसे नाम पर. लोगों को कम से कम इस तरह का शीर्षक रखते वक्त तो सोचना हीं चाहिए था ?

खैर इन सब के अतिरिक्त जिन चीजों ने उसे काफी प्रभावित किया वह था सारे कलाकारों का काबिले-तारीफ अभिनय और महिला पात्रों की बराबर की सहभागिता.

उसे अब भी महज तीन-चार साल पहले की बातें याद है जब सुरेश कुमार हज्जू जैसे स्थापित रंगकर्मी को नाटको में काम करने वाली लड़कियाँ नहीं मिला करती थी और काफी खोज बीन के पश्चात किसी तरह इधर-उधर से एक-आध पात्रों का बंदोबस्त हो पाता था.

बहरहाल नाटक में काम करनेवाले सारे लोग नए थे फिर भी उनका काम बेहतरीन था. ये लोग उसे भविष्य के लिए काफी उम्मीद जगाते मालूम पड़े. हाँ यह अलग मामला है कि उन्हें भविष्य में अच्छी पटकथा, कुछ अलग और बेहतर काम करने वाला निर्देशक और उम्दा प्लेटफार्म मिल सकेगा भी कभी या नहीं ?

बालमुकुन्द
(बालमुकुंद कवि  है) 


01/06/2017

Patna : Near the rubble and city's broken walls

Darbhanga house : from glory to ruins

What makes Rome,  Rome and Paris, Paris?

 “Cities, like dreams, are made of desires and fears, even if the thread of their discourse is secret, their rules are absurd, their perspectives deceitful, and everything conceals something else.” Italo Calvino famously writes in "Invisible Cities."

 As someone who has spent his entire life in the city, exploring its nooks and corners, I often ask to myself and other people, what makes Patna, Patna?

Surely, there ought to be many perspectives, one for each resident and one for each traveller.

A CITY LIVES IN THE MEMORY 
                    I remember myself, sitting in one of my classrooms which could have been a room in a great museum or may be a chapter from a history book because of the old fire place in the back or the wooden doors that have stood the test of time.
the windows outside the classroom at Darbhanga house

                                On that particular day, an author had come to speak to us. He had shifted to Delhi perhaps in late nineties and since then, he had been coming back after long intervals.

 we seldom had these visits at Darbhanga house so when the talk begin, i jumped upon the opportunity and asked him about the city and about the changes he sees from his time to our times.
His reply was a simple dull one sentence - " i see a lot of crowd and new buildings."
as boring and discouraging it sounds, it is true to an extent.

WHERE IS THE UNIQUENESS


With Pawas Neer, a young poet at the restored haveli of Mirza Ghalib
at gali Qasimjaan in delhi 
The beauty of Varanasi doesn't only lie in his famous structures but to an explorer, a traveller, true varanasi also lies in its interconnected alleys, its desolated kabir-chaura grounds,its low ceiling doors with giant and heavy latches.

One doesn't live in Delhi till he can stand on Chandni Chauk and can imagine the red walls of old Delhi  surround him, till the azan reaches his ears, till he sees Mirza Ghalib sitting on a tea stall.

a romantic's dream it may seem but it is possible to an extent in Delhi or Varanasi to be a lennon and imagine...in our city, as unfortunate as it is , these markers are fast vanishing.
these marginalized structures,insignia of the past, are finally falling to our unawareness.

Orhan Pamuk, the famous nobel laureate, who was born in Istanbul and still lives in the same family apartment where his mother first held him in her arms, writes, “It was in Cihangir that i first learned Istanbul was not an anonymous multitude of walled-in lives - a jungle of apartments where no one knew who was dead or who was celebrating what - but an archipelago of neighbourhoods in which everyone knew each other.”

The same is true of Patna. the apartments  or shopping malls in Delhi or New York for that matter are no different from apartments and shopping malls of patna. they do not define us as a city but these small signia of the past do, they make us unique and in our unawareness, we are destroying them.
THE VANISHING CITYSCAPE
 i do not need to give examples but please dare to digest a few.
the temple dome at harisabha, the only signia of its past glory

the old structure of harisabha temple in sabzibag was bulldozed to ground to make place for an ugly shopping mall which protrudes upon the adjacent buildings like a monster with a hungry mouth. the old structure, though not many know was at least one twenty years old with domes made in vishnupur style - a mixture of oriya and bengali architecture.


a similar ill-fate has been shared by the old christian graveyard on ashok rajpath. as hidden as it is to the common eye, - in the name of renovation, it was surrounded by an ugly boundary and is now slowly being encroached upon.  a place of meeting for writers of urdu and hindi in the late sixties to early seventies and even later, it has been a witness to the short-story movement in urdu and "nai kavita" movement in hindi literature.
ghats


To a dreamer in our city, the river ghats were perfect escape. while in the name of renovation, ugly structures, with no link whatsoever to denote their belonging to the city  have been built, we have also been losing the river to the new construction in the name of development.
surely, there are other famous examples as well. 


WHERE DOES THE PROBLEM LIE - THE NEGLIGENCE TOWARDS OUR ROOTS AND HERITAGE ?

it is not only a diplomatic or political fault.
the purpose of this article is not to play the blame game.

as simple as it is, it is our unawareness which is making us lose our city without even realizing it. the bosphorus makes istanbul istanbul, the boats and churches, venice, venice! a city exists in its own memories and in the memory of those who reside in them. 

WHAT DO WE LEAVE BEHIND?
                   my first important memories with my father are of boarding a small ship from "mahendru ghat" on a certain monday of "sawan" when a fair was in town and it had rained and near the ticket counter was a tree full of yellow flowers.

we sure all have such unique memories of the city, tiny unimportant bits of no materialistic importance and without any greater purposes but personal and unique, things that could have happened in Patna and not in Paris, Rome, Istanbul or New York.

the question to ask is, what city do i take my son to?

what history, what heritage do i show him?

what memories do i offer him  and what places, where he can revisit and remember me when i am gone?

- Anchit

(Anchit is a poet. The pictures have been clicked by Utkarsh, Satyam and Kautuk)