where it all began

Hearth, in its earlier days, came out in form of a newsletter. while the magazine was a tedious, more strenuous affair and was periodical, Hearth never depended itself on time and was published whenever an incessant need to do so was felt- be it some political or literary incident or the opening of a new joint in the city -
as a famous philosopher once said, we are not prisoned by time but by clocks, we must accept our ruins and our downfalls. true poetry and literature will come out of those.


30/03/2017

मनोज कुमार झा : हर भाषा में जीवित-मृत असंख्य लोगों की सांस बसती है



मनोज उन थोड़े कवियों में से हैं जो लिखते हैं तो अपनी भाषा से भाषा के बाकी पथों को तोड़ते हुए चलते हैं. उन थोड़े लोगों में से भी हैं जो rigorously पढ़ते हैं और पाश्चात्य चिंतकों और दर्शन पर उनकी कमाल  की पकड़ है.



1. कविता क्या है आपके हिसाब से?क्यों लिखनी शुरू की?
    हमलोग बातचीत शुरू करें इससे पहले मैं उद्धरण उदृत करना चाहूँगा heraclitus को , जो कहते हैं, कि Let us not conjecture at random about great things. कविता क्या है , इसको कई लोगों ने कई तरह से कहा है , मैं अभी तक उस स्थिति तक नहीं पहुंचा हूँ जहाँ आके पूरे जोर से कह सकूं की कविता क्या है, हाँ यह जरुर बता सकता हूँ की कविता क्या नहीं है . कोई कविता देखूं तो कह सकूं की यह कविता नहीं है,  क्यों नहीं है . चूँकि मैं दूसरा काम मैं जानता नहीं था , खेल में कमजोर था , पढने में ठीक ठाक था, कविता लिखने लगा. 

2. पठन का रचना में क्या योगदान है, आपको क्या लगता है?
    बहुत योगदान है , दृष्टि देता है , पता चलता है कि  आपकी परम्परा में क्या कुछ हो चुका है और आप कहाँ हैं.चीज़ें इतनी जटिल होती गई हैं कि सिर्फ common sense से कवि का काम नही चलेगा।

3. पहली पढ़ी हुई कविता कौन सी याद आती है? प्रिय कविता कौन सी है ? प्रिय कवि कौन हैं?
    भवानी प्रसाद मिश्र  की सतपुड़ा के घने जंगल . प्रिय कवि कौन हैं यह कहना मुश्किल है क्योंकि लम्बी परम्परा है हिंदी कविता की लेकिन हिंदी कविता में सबसे प्रिय निराला . जिन प्रणम्य कवियों के साथ हम लोगो को लिखने का सुख और सौभाग्य हासिल है,उनमे सबसे प्रिय अरुण कमल हैं।

4. कविता का रोल क्या है - समाज के सन्दर्भ में, या अन्य कोई सन्दर्भ आपके हिसाब से? क्या उसकी प्रासंगिकता जिंदा है अभी भी?
     हाँ बिलकुल जिंदा है , कविता जो इतने दिन लिखी गयी , कविता नाम की चीज़ ने समाज में शक्ति अर्जित कर ली है . कविता का या इन जेनरल साहित्य का रोल क्या है यह हमेशा सतह पर नही रहता।कभी आप आधी रात बडी बेचैनी ,बड़ी निर्थकता महसूस करते हैं कि तभी कोई एक पंक्ति ज़ेहन में आती है और आपको बचा ले जाती है।
Einstien ने the brother Karamazov उपन्यास को अपने किये गए काम से बड़ा माना था।जबकि हम सब जानते हैं कि उन्होंने विज्ञानं का paradigm ही बदल डाला, उनका डंका मूर्खो में भी बजता है।
तो बड़े आड़े-तिरछे ढन्ग से साहित्य काम करता है. फिर इतने महान लोगों द्वारा लिखी जाकर कविता ने एक शक्ति भी हासिल कर ली है,इसका भी उपयोग होता है।

5. क्या पढना है इसका चयन करने का आपका क्या तरीका है?
    यह तरीका बदलता गया . शुरू में किसी के नाम सुन के , सलाह से , चर्चा से किताब पढ़ता था .  अब तो है साल में दो तीन चिंतकों को पढ़ता हूँ , उनकी सारी किताबें पढ़ ली .वह भी सारा का सारा नहीं पढ़ता , जहाँ से मन हुआ वही से पढ़ लिया . कविता में होने का सबसे बड़ा सुख यही है , अगर में सोशियोलॉजी में होता या पॉलिटिकल साइंस में होता तो मुझे एक नियम के साथ पढ़ना पढ़ता , लेकिन यहाँ फ्रीडम मिलता है पढने का .

6. लिखते हुए शिल्प कितना महत्वपूर्ण होता है?
   बहुत होता है ।कथ्य की तरह इसकी व्याप्ति भी पूरी कविता में होती है.

7. कविता से चरम महत्वाकांक्षा क्या है - प्रसिद्धि , पैसा, अमरता - कवि आखिर में क्या चाहता है?
    हिंदी में कवि को प्रसिद्धी तो मिलती नहीं , मोहल्ले का आदमी तक नहीं जानता और पैसा तो थोडा ही चाहिए होता है जिससे जीवन यापन हो जाये और अमरता तो किसी चीज़  में होती नहीं क्योंकि दुनिया को भी एक दिन नष्ट हो जाना है.पैसा को लेकर Oscar wild का कथन सर्वाधिक उपयुक्त है की गरीबी नष्ट करती है,अमीरी और ज़्यादा नष्ट करती है

8. नए लिखने वालों के लिए क्या सलाह देंगे?
     खूब पढ़े,अपने परम्परा को जाने, जितना पढ़ सकते हैं उतना पढ़े तब लिखे.परंपरा का मतलब मंनुष्य होने की तहदार परंपरा,फिर विश्वसाहित्य की परंपरा,फिर अपनी हिंदी की परंपरा,फिर जो चीज़ें परम्परा में अँत नही पायी उनकी परम्परा।एक बात जरूर कहूंगा कि कोई मौज-मस्ती के लिए कविता लिखता है तो उनसे कविता नही सकती,कविता की भूमि तोखाला का घर तो बिलकुल नही है और भाषा के प्रति गम्भीर हों,हर भाषा में जीवित-मृत असंख्य लोगों की सांस बसती है।

9. इधर क्या पढ़ रहे हैं और कौन सी किताबें आपको लगता है कि हर किसी को पढनी चाहिए?
    इधर में zizek और deleueze को पढ़ रहा हूँ पिछले डेढ़ साल से,साथ ही निराला का गद्य भी . यह मैं नहीं कह सकता की कौन सी किताबें अच्छी हैं , खुद कवि को चुनना चाहिए की कौन सी किताबें पढ़ें , जो सामान्य युवा कवि समुदाय है उनको नहीं बता सकता सबकी अपनी रुचियाँ होंगी सब अपने रूचि से पढ़ें.  


(कवि  से बात की अंचित और सुधाकर ने)

29/03/2017

पढ़ते हुए 3 : गंदी बात @ क्षितिज रॉय


क्षितिज जब पटना आये थे इस बार के पुस्तक मेला में तो , सवाल-जवाब के क्रम में मैंने उनसे पूछा कि “साहित्य में जहाँ इतना उठा पटक है, खेमेबाज़ी और विचारधारा का टकराव है, उस जगह एक युवा रचनाकार का छपना कितना मुश्किल है ?"

आप जवाब जाने उससे पहले एक युवा रचनाकार का संघर्ष देखिए। क्षितिज की उपन्यास गंदी बात से दो साल पहले नीलोत्पल मृणाल की उपन्यास आई थी डार्क हॉर्स. किताब आने के महज़ हफ्ता भर में इसका दूसरा संस्करण छापना पड़ा , आज तक डार्क हॉर्स की पांच से अधिक संस्करण आ गये हैं. पिछले साल ही नीलोत्पल को डार्क हॉर्स के लिए साहित्य अकादमी युवा पुरस्कार से सम्मानित किया गया.

लेकिन नीलोत्पल की कहानी इतनी हैप्पी टाइप भी नहीं है . किताब लिखने के बाद महीनों तक वे प्रकाशनों के चक्कर काटते रहे, उन्हें सलाह मिलता की अभी और पढ़िए , थोड़ा पकिए तब लिखिए . डार्क हॉर्स की पांडुलिपि इस ऑफिस से उस ऑफिस होती रही. एक युवा के लिए अपने लिखे किताब की पांडुलिपि को लेकर इस प्रकाशन से उस प्रकाशन तक ठोकर खाना कितना ह्रदय विदारक है. जो युवा आँखों में अपने किताब छप जाने , अपनी बात कह पाने की ललक के साथ किताब लिखता है , जो शरीफ-शरीफ सा लग रहे साहित्य में जगह पाना चाहता है उस पर इतनी बंदिशे लाद दी जाती है कि युवक टूट सा जाता है , लेकिन तारीफ नीलोत्पल जैसे जुझारू युवा-लेखक का जो बने रहे अपने रास्ते पर और शब्दारम्भ प्रकाशन का खैरमकदम की उन्होंने डार्क हॉर्स को छापा. आज डार्क हॉर्स की पांच से अधिक संस्करण तो आये ही साथ ही किताब की यह सफलता की मुखर्जी नगर में इसके ज़ेरॉक्स कॉपी तक बिकी.

अब फिर से क्षितिज से किये सवाल पर, युवा रचनाकार का छपना कितना मुश्किल है ? मुझे अब लगता है कि मैं यह सवाल मुक्कमल तरीके से पूछ ही नहीं पाया। मुझे पूछना चाहिए था कि हिंदी साहित्य में युवा रचनाकार का छप पाना कितना मुश्किल है ? सवाल में सिर्फ हिंदी लगा देने भरा से सारे जवाब बदल जाते हैं ।

अंग्रेज़ी में साल भर पहले एक नॉवेल आती है 'Every one has a story' के नाम से। बिना किसी बड़े प्रकाशन से प्रकाशित हुए यह किताब देखते-देखते मार्केट में छा जाती है , पाठक पसंद करने लग जाते हैं । किताब के अप्रत्याशित सफलता से प्रभावित होकर अंग्रेजी के दो बड़े प्रकाशन वेस्टलैंड और पेंग्विन किताब के राइटर के पास बुक छापने का ऑफर लेटर भेजते हैं। किताब फिर से छपती है वेस्टलैंड प्रकाशन से और किताब की एक लाख से ज़्यादा प्रतियां बिक जाती है और बुक की राइटर एकदम से न्यू नॉवेल स्टार बन जाती है - AUTHOR SAVI SHARMA. सवी शर्मा वन बुक वंडर नहीं हैं , इंग्लिश में कई ऐसे युवा राइटर हैं जिनकी किताबें खूब बिकती हैं, और युवा पसंद भी करते हैं. रविन्द्र सिंह ( 35 वर्ष ) , दुर्जोय दत्ता ( 30 वर्ष ) , निकिता सिंह ( 25 वर्ष ) कुछ ऐसे नाम हैं जिनकी किताबें स्टेशन पर या फिर अमेज़न इंडिया के होम पेज पर दिख जाएंगी. फिर हिंदी के प्रकाशक नए लोगों को छापने में क्यों कतराते हैं ?

हिंदी और इंग्लिश प्रकाशन से बीच इतना बड़ा अंतर कैसे हैं ? अंग्रेजी का प्रकाशक क्यों राइटर को पकिये तब लिखिए वाली बात नहीं कहता ? कुछ लोग कहते हैं कि यह सब किताब का कोई स्टैंडर्ड नहीं होता. माना की इंग्लिश के ये राइटर क्लासिक्स या सीरियस टाइप नहीं लिख रहे हैं, इनकी किताबें बाज़ार बेस्ड हैं लेकिन ये किताबें पाठकों तक पहुँच तो रही हैं ये लेखक अपने नए पाठक तो तैयार कर रहे हैं जो स्टूडेंट इंजीनियरिंग या मेडिकल की तैयारी कर रहा है या फिर कोई किसी सफ़र में है तो टाइम पास के लिए ही सही कम से कम कुछ पढ़ तो रहा है रीडिंग कल्चर तो बन रहा है , लिटरेचर से एकदम से जुड़ाव ना रखने वाला कुछ तो पढ़ रहा और संभव है एकदिन इन राइटर को पढ़ते हुए क्लासिक लिटरेचर को पढ़े .

पिछले साल आई हिंदी उपन्यास मुसाफिर कैफ़े पुस्तक के लेखक दिव्य प्रकाश दुबे कहते हैं कि उन्हें कई पाठकों के मेसेज आये की हिंदी में स्कूल में प्रेमचंद पढ़ा था उसके बाद आपको पढ़ रहा हूँ हिंदी में . इतना बड़ा गैप . जाहिर से बात है यह कि यह गैप , रीडिंग कल्चर न बन पाने के कारण बना है.

साल 2015 में हिन्द युग्म प्रकाशन से सत्य व्यास की उपन्यास बनारस टॉकीज़ आई . महज कुछ महीने में बनारस टॉकीज़ और सत्य व्यास हिंदी प्रकाशन के लिए न्यू सेंसेशन बन गये. आज उनके पास अपना बड़ा पाठक वर्ग है . बनारस टाल्कीस की बड़ी कामयाबी है कि इस उपन्यास पर फिल्म बनाने के लिए हिंदी फिल्म निर्देशक लेखक सत्य व्यास को अप्प्रोच कर रहे हैं. चेतन भगत के इंग्लिश के नावेल पर फ़िल्में बनी लेकिन नए हिंदी राइटर के नावेल पर फिल्म बने यह हिंदी के लिए सुखद है .

 गंदी बात पढ़ते हुए कुल बात यही कि राजकमल प्रकाशन से युवा रचनाकार क्षितिज रॉय का प्रकाशित होना उम्मीद जगाता है कि पकिये तब लिखिए वाली बात अब टूटने लगी है. यंग ब्लड अपनी नई भाषा , अपनी नई शैली इजाद कर रहे हैं . उम्मीद है कि नए राइटर नए पाठक तैयार करें . जो हिंदी के नये लोगों सत्य व्यास , दिव्य प्रकाश दुबे , क्षितिज रॉय को पढ़ते हुए उदय प्रकाश , मन्नू भंडारी , राजेंद्र यादव , धर्मवीर भारती , परसाई को पढ़ पाए .

सुधाकर

27/03/2017

शहर डायरी : पारो के लिए 




नाटक देखना बहुत देर से शुरू किया. दिल्ली यूनिवर्सिटी चले जाने के बाद. तब तक बारहवीं की पढाई में ज़िन्दगी ही नाटक बनी हुई थी. तो पटना से पहले दिल्ली में नाटक देखे थे. मोहन राकेश के "आधे- अधूरे" का मंचन देखा था, गिरीश कर्नाड का कोई नाटक था, जो बीच से देखा था और समझ नहीं पाया था. टॉम आल्टर "मौलाना" लेकर हमारे कॉलेज आये थे. कोई चस्का लगा नहीं फिर भी. बढ़िया नाटक भले ही अगर कहीं दिख जाता तो देख लेता था. स्कूल में "कलिंग विजय" नाटक में अशोक का किरदार निभाया था और फिर कॉलेज में दो नाटकों में भी रोल निभाए, निर्देशन किया और लिखा भी. पर फिर भी, ये शुरू से पता था कि अपनी जगह देखने वाली जनता में ही है. पटना आने के बाद दो सालों तक कोई नाटक नहीं देखा. हिंदी नाटकों की जानकारी नहीं थी, अंग्रेजी के नाटक यहाँ होते नहीं. तो युट्यूब पर ही मंचन की बकवास रिकॉर्डिंग देखता रहा. 
फिर यहाँ पढ़ते हुए कॉलेज के तीसरे साल में फिर नाटक देखने शुरू किये पर अनुभव सों सों रहा. कुल दस के आसपास नाटक देखे. इनमे से जो पहला नाटक अटका वो कोर्ट-मार्शल था. शायद इप्टा से हुआ था. वरिष्ठ रंगकर्मी जावेद अख्तर का सधा अभिनय और निर्देशन किसका ये याद नहीं पर वो भी सधा हुआ. बाकी नाटक उच्चारण की कमियों, मंच की कमियों और क्लियर विज़न के आभाव में जूझते दिखे. दस के आसपास देख चुकने के बाद, दोहराव लगने लगा और कुछ अच्छे नाटक भी रहे होंगे उस लिस्ट में पर वो दिमाग में अटके नहीं. जावेद अख्तर का जो अगला नाटक मैंने देखा वो कामू के लिखे का नाट्य- रूपांतर था और उसको साध पाना भीषण काम. पहले एक्ट में टीम बेजोड़ रूप से सफल रही पर दूसरा एक्ट , खास कर अंत का कुछ वक़्त टीम पर और दर्शकों पर भारी गुज़रा पर इसको मैं कामू के लिखे और उनकी जटिलता का दोष मानता हूँ. 
आज जिस नाटक की चर्चा कर रहा हूँ, उसकी तुलना वरिष्ठ रंगकर्मियों से नहीं की जा सकती. ना ये नयी टीम वहां तक पहुंचेगी इसको लेकर मैं दंभ भर रहा हूँ. दोहराव से परेशान एक गंभीर दर्शक की हैसियत से कहूँगा जो कुछ कहूँगा और पारो का आकर्षण भी उस दोहराव में ना फंसने की वजह से ही है. पटना में चीज़ों से नयापन खोजना बीरबल की खिचड़ी पकाने जैसा काम है. सांस्कृतिक कार्यक्रमों में वही पचास लोग जुटते हैं, मंच पर वही दस लोग बैठते हैं और कमोबेश वही कहा सुना जाता है जो हमेशा से कहा सुना जा रहा है. इसमें भी वही हाईलाइट होता है जो बाहर से इम्पोर्ट हुआ होता है या जो डायस्पोरा वापस आता है- थोडा नास्टैल्जिया लेकर और थोड़ा सम्मान की लालसा में - और यहाँ तो होती है भाग जाने की जदोजेहद.  इन वजहों से, नया ना भी और ढांचे से बंधा हुआ ही सही , कुछ ताज़ा सीखने, सुनने और समझने वाले लोगों को कभी कभी ही मन-मुताबिक मिलता है. 
"पारो" आश्चर्यजनक रूप से कई नाटकों के बाद एक फ्रेश नाटक लगता है. नागार्जुन का उपन्यास होने के कारण इसका नाट्य रूपान्तर कर देना सरल नहीं हो सकता था. इसलिए त्रुटियों का रह जाना स्वाभाविक था. जहाँ यह नाटक खेला गया और मैंने दो मंचन देखे, उस कालिदास रंगालय की अपनी सीमितता है- सो उसकी बाद करने का कोई फायदा नहीं है. नाटक की यु.एस.पी. उसके कलाकार हैं. अपने शहर में सबसे ज्यादा उच्चारण की कमी खटकती है, फ्लैट संवाद कुछ हद तक आदमी भूल भी जाता है, सब समझ भी नहीं पाते. सो, नाटक के मुख्य पात्रों में से एक बिरजू बना सोवित, जो ग्रामीण पृष्ठभूमि से आता है जब उच्चारण की एक भी गलती नहीं करता, सहज हर्ष होता है. मात्सी, युसूफ जिस सहजता से बिना किसी अभिनय की लम्बी ट्रेनिंग से काम्प्लेक्स किरदारों को निभा जाते हैं, अचम्भा भी होता है और ढांचों के टूटने की आवाज़ सुनकर संतुष्टि भी होती है. कलाकार अपने किरदारों की स्किन में अभी भी परिपक्व नहीं हैं और शायद यही इनको "मेथड" से दूर और संवाद अदाएगी के टोनों से दूर रखता है. नॉन-एक्टर्स की म्हणत में निर्देशन और टीम-स्पिरिट का भी महत्वपूर्ण रोल होता है और एक उठता अभिनेता भी पूरी टीम उठा सकता है. कईयों का ये पहला नाटक है- औरत की दुनिया और मर्द की दुनिया के बीच के विमर्श पर खुद को केन्द्रित करता हुआ- सबसे बड़ी बात, सभागारों के आख्यानों से दूर- विमर्श की, गद्य होती कविताओं और उनके उबासीपन से दूर- सरल और सहज- शायद सचमुच का बदलाव लाने के काबिल, कम से कम दर्शक तक खुद को संप्रेषित करता हुआ. 
हाँ ऐसा नहीं है कि मंचन की दृष्टि से इसके दो शो जो मैंने देखे, वो सम्पूर्ण रहे, कुछ चीज़ें आराम से अवॉयड की जा सकती थीं. पर उन बातों का यहाँ ज़िक्र करने की ज़रूरत नहीं. एक अच्छी शाम को एक बढ़िया नाटक करने के बाद, कलाकार थके हों और अपनी हद से बाहर जा कर अपना कैलिबर प्रूव कर चुके हों तो हम दर्शकों को उनके मुक्कमल होने का सम्मान करते हुए खड़े होकर ताली बजानी चाहिए.

अंचित
(कवितायेँ लिखता है.)


25/03/2017

रोमियो ओ रोमियो


                       यूपी में जो एंटी रोमियों स्क्वाड बना है, उस से मुझे अपने बचपन के दिनों पर अतिरेक हर्ष हो रहा है. हर्ष का दूसरा विषय ये है कि मैं बिहार में हूँ, जो यूपी के पास है पर यूपी नहीं है. थोडा मुझे नीति- निर्धारण करने वालों की सोच पर भी हर्ष हो रहा है कि वो किस गफलत में क्या कर बैठे हैं. बचपन से जो मुझे प्रेम का अनुभव रहा है और जिस प्रकार तथाकथित मनचले रगेदे जा रहे हैं, मुझे यूपी वाली पुलिस पर भी अफ़सोस हो रहा है.  वो प्रेमियों की मनोस्थिति और प्रेमिकाओं की गुंडागर्दी समझने में असफल रहे हैं. इस से यही निष्कर्ष निकलता है कि हो सकता है एंटी रोमियो स्क्वाड वाले या तो एकतरफ़ा प्यार वाले रहे होंगे या भगवान ने उन्हें भाग्यशाली समझा होगा इसीलिए उनके पैसे और ह्रदय का ख्याल करते हुए उनके जीवन में प्यार का प्रवेश कराया ही नहीं होगा.  दो तीन परिस्थितियों पर ध्यान देना आवश्यक है. पहले तो भारत में प्रेम का व्यवहारिक पक्ष समझा जाए. 
१. अगर लड़के को प्रेम हो गया और लड़की ने दुर्भाग्यवश उसे स्वीकार कर लिया तो फिर लड़का सुधर ही जाता है. वो मनचला नहीं रह पाता. लड़की छेड़ना, कमेंट करना तो दूर है. उसकी आँख गलती से उस दिशा में मुड़ भी गयी जिधर कोई और लड़की हो, तो प्रेमिका को दूर से भी इंट्यूशन हो जाती है. अगर पता ना भी चले तो ऐहतियातन, हर दूसरे दिन प्रेमिकाएं प्रेमियों की कुंडली में राहू केतु प्रवेश करा ही देती हैं. तो पार्क हो या सोशल मीडिया, लड़का गालियाँ और बदतमीज़ी का प्रयोग तभी करता है जब वो निरा मूढ़ हो या कोई उसकी देशभक्ति को चुनौती दे दे. 
२. मित्रों, नौकरियां तो गुज़रे ज़माने की बात हो गयी हैं. चचा गमे इश्क को गमे रोज़गार से पहले रखते हैं पर भारत में लड़के के बाप की लिस्ट में रोज़गार के अलावा कुछ नहीं दिखता. और कम नौकरियां हो तो बाप की मार में बढ़ोतरी और मित्रों को संख्या में कमी आ जाती है. नौकरी नहीं होती तो पैसे नहीं होते. भारत में तो प्रेम की खरीद फरोख्त होती है. इधर से पैसे नहीं तो उधर से पैसे नही. एंटी रोमियो स्क्वाड की क्या ज़रूरत. हम लोगों ने सामाजिक तौर पर प्रेम की माँ बहन और बाप भाई सब किया हुआ है. 
३. भाई की भी ज़रूरत यही बड़के भैया पूरी करने की कोशिश कर रहे हैं. एक लड़की के भाई ने मुझसे मिलने की शर्त रखी. प्रेमिका से मैंने कहा- जहाँ मिलना है बुलाले. मैं निहत्था और अकेला आऊंगा. भाई ने फिर अपने ईगो का हवाला दिया या मुझे बच्चा समझते हुए छोड़ दिया ये वो जाने पर मिला नहीं. ये जो मोरल पुलिसिंग में लगे हैं, ये यही दग्ध भाइयों की बिग्रेड है. महिला अपराध तो घंटा कम हो रहे हैं, राखी का खर्चा खामखाह बढ़ता जा रहा है. 
                           जो प्रेमिका आते ही घर जाने की जिद लगा बैठती है, उसे घर भेजने से क्या होगा. जो लड़का पूरे दिन प्रेमिका का सामान उठाये कसरत करता रहता है, उसके लिए चार उठक बैठक क्या है. जो सबसे शोषित वर्ग है समाज का उसी के पीछे हाथ धोके पढ़ गये हो.एक चर्चा नाम की भी हो रही है. भाई रोमियो सोलह साल का नौजवान आशिक था. तेरह साल की जूलियट से आज प्यार हुआ,कल रोमांस किया और परसों दोनों गलतफहमी में चल बसे. रोमियो के खिलाफ होना तो प्यार के खिलाफ होना हुआ. ऊपर से इटालियन . मुझे पक्का यकीन है कि रोमियो को गोमांस से कोई परहेज नहीं था. इंडिया को आर्यावर्त कहने वाले रोमियो का नाम क्यों रखें, अपने यहाँ तो प्यार करने वाले सदाबहार भगवान यूपी से आते हैं, उनके बारे में सोचते, उनकी शिक्षा के बारे में सोचते, खैर इतना सोचते तो फिर प्यार के बारे में सोचते.  लड़कियां प्यार करें तो उनका चरित्र गलत होता है- ये नैरेटिव तो नमक मिर्च के साथ ठेल ही रहे थे, हे समानता के चौकीदारों, पब्लिक प्लेसेस पर प्रेमिका से सार्वजनिक स्थानों पर अकारण पिटने वालों को भी तुमने अपने राडार पर ले लिया. नौजवान प्रेम नहीं करेगा तो लव जिहाद और घर वापसी का क्या होगा - तुम दंगे कैसे करोगे? 
छेड़खानी तो पार्कों में साथ बैठ के लड़का लड़की करते नहीं. और अधिकतर छेड़खानी जैसे मैंने देखा है,होने के बावजूद, कोई कुछ नहीं करता. महिला पुलिस उसके लिए पहले रखी हुई थी. क्रिमिनल के सामने लाठी चलेगी नहीं तो जो लड़का पहले से दुखी है कि उसके जेब में पैसे नहीं है, जो प्रेमिका पहले से दुखी है कि उसका बॉयफ्रेंड इतना निक्कमा है कि पल्सर चलता है और बुलेट नहीं, उसको काहे और त्रस्त करते हो. 
अब तो वो मटन बिरियानी भी नहीं खा सकते. आखिर भारतीय ब्रह्मचर्य परिषद् का सदस्य अगर सब बन गये तो हिन्दू जनसँख्या का क्या होगा. एक विराट हिन्दू ब्राह्मण दुःख से ये प्रश्न करता है. पहले ही डॉक्टर और इंजिनियर लोगों ने हम लेखकों की कुंडली पर ग्रहण लगाया हुआ है. बनारस जा कर एक विदेशी से प्रेम करते हुए अमेरिका जाने का जो सपना इस ब्राह्मण ने देखा हुआ था उसको इसबगोल की भुस्सी के साथ क्यों पीने पर विवश कर रहे हैं. 

जनता खाक विरोध करे. फासीवाद और जहानाबाद के बीच में अंतर बुझती नहीं और जो तनिक समझदार हैं उनको तो विकास दिखिए जाता है. ऊपर से इतना अजेंडा थोप रहे हैं, पूजा पाठ का कोर्स शुरू करा के कैंपस शुरू करा दीजिये, लड़का सब प्रेमिका को भूल जायेगा. नहीं तो प्रेमी के यहाँ लड़की जाती है तो सास ससुर का सम्मान करती है, लड़का अपने सास ससुर की कदर करता है. न दहेज़ मांगता है, न लड़की सास के कलेजा पर कत्थक करती है. ये सब परम्परा का ह्रास ठीक थोड़े है. ऐसे थोड़े भारत अपने अतीत वाले चरम पर पहुचेगा.

सोचियेगा हो, इस स्क्वाड का कोई फायदा नहीं हो रहा है. जिसको प्यार करना है वो प्यार करने के तरीके खोज ही लेगा. जिसको विरोध करना है वो विरोध कर ही लेगा. अगर बिना प्यार का समाज चाहिए. लड़की को दबा के रखना है अंगूठा से और मर्द को मर्द बनाये रखना है. रोमियो कहा के हीरो खुश ही होगा और लड़की और जुलिअट बनने की कोशिश ही करेगी. बाकी जब अकेले जाने और वो भी निहत्थे जाने का हिम्मत प्यार में मिल ही जाता है तो वो लोग तो समझ ही लेंगे. एक थो कह रहा था कि इतिहास में जितना प्रेमी हुआ सब, वही सब फेमस है, रोकने वाला सब विलेन गिना जाता है. आदिगुरू के साथ इस व्यवहार के बारे में सोच कर कलेजा टूट रहा है. 

-अंचित

24/03/2017

जब तक आदमी का होना प्रासंगिक है कविता भी प्रासंगिक है - कुमार मुकुल


आज से हमलोग अपनी इंटरव्यू वाली श्रृंखला की शुरुआत कर रहे हैं. इस श्रृंखला में हम कवियों से बात करेंगे और उनकी मनोस्थिति और कविता के प्रति नजरिया जानेंगे. हर कवि से हमने एक ही तरह के सवाल पूछे हैं और आगे हम देखेंगे कि उनमें किस तरह भिन्नता और समानताएं हैं. 

कुमार मुकुल जाने-माने कवि हैं और अभी हाल ही में उनका नया कविता संग्रह आया है. उन्होंने हमारे सवालों के जवाब दिए :- 
१. कविता क्या है आपके हिसाब से? क्यों लिखनी शुरू की?
कविता अपनी बातों को रखने का एक रूपाकार या फार्मेट है। एक कन्विंश करने वाला फार्मेट। पिता बचपन में रामायण,गीता आदि के हिस्‍से याद कराया करते थे। फिर दिनकर की किताब 'चक्रवाल', मुक्तिबोध की 'भूरि भूरि खाक धूल', कविता के नये प्रतिमान आदि उनकी टेबल पर रखे होते थे जिन्‍हें पढते हुए लगता है कविता की समझ आई और फिर उस समझ को प्रकट करने की ईच्‍छा से कविता का आरंभ हुआ होगा।

२. पठन का रचना में क्या योगदान है, आपको क्या लगता है?
पढने का तो योगदान है ही। यह पढना किताब तक सीमित नहीं रहता कलाकृतियों और जीवन को भी साथ साथ पढना होता है। पढना ही मनुष्‍य बनाता है। सबसे कम संसाधन में मनुष्‍य बनाने की तकनीक है पढाई।

३. पहली पढ़ी हुई कविता कौन सी याद आती है? प्रिय कविता कौन सी है ? प्रिय कवि कौन हैं?
गीता में स्थितपज्ञ के लक्षण जो गिनाए गए हैं और रामचरित मानस में शिव की प्रार्थना, नमामीशमीशान निर्वाण रूपं...जो पिता ने कंठस्‍थ कराए ही पहली पढी कविताएं होंगी। प्रिय कविताएं तो तमाम हैं। नेरूदा की 'जहाज' , नवारूण की 'हाथ देखने की कविता', शमशेर की 'उषा', मुक्तिबोध की 'भूल गलती' , केदारनाथ सिंह का 'टूटा हुआ ट्रक' और 'बादल ओ...' से शुरू होने वाली कविता आदि प्रिय हैं। कवियों में ब्रेख्‍त, गालिब, मीर, मीरा, पंत, प्रसाद, परवीन शाकिर,शक्ति चटोपाध्‍याय, पाश, विजय कुमार, सविता सिंह, रघुवीर सहाय और अन्‍य सैकड़ो कवि हैं।

४. कविता का रोल क्या है - समाज के सन्दर्भ में, या अन्य कोई सन्दर्भ आपके हिसाब से? क्या उसकी प्रासंगिकता जिंदा है अभी भी?
जब तक आदमी का होना प्रासंगिक है कविता भी प्रासंगिक है क्‍योंकि वह आदमी के मानस की हलचलों को बाकी लोगों तक पहुंचाने का अब तक का सबसे लोकप्रिय रूपाकार है। एशिया में तो कविता के लिए अभी हजारों साल तक माहौल रहेगा। यहां लोग पिछडे हैं बडी आबादी उनकी अभी शिक्षित हो रही तो कविता की भूमिका रहेगी। अति विकसित देशों में मशीनीकरण के साथ कविता की भूमिका घटती जा रही पर वह व्‍यवहार में नये रूपाकारों में जीवित रहेगी।

५. क्या पढना है इसका चयन करने का आपका क्या तरीका है?
मैं कुछ भी पढ लेता हूं। क्‍योंकि हर लेखन एक तरह के व्‍यक्त्‍ाि और समाज के बारे में बतलाता है। फिर आदमी, जमीन, आसमान, पेड पौधे सब को पढते रहना पडता है हर क्षण को पढना होता है। हां पढते पढते यह जानना आ गया है कि आगे क्‍या होगा तो अब एक पंक्ति या पैरा या पेज पढ कर जानता हूं कि आगे इसे पढा जाए या नहीं।

६. लिखते हुए शिल्प कितना महत्वपूर्ण होता है?
शिल्‍प मेरे लिए प्राथमिकता नहीं। दुनिया जहान को देखते सुनते जो बातें भीतर पैदा होती हैं वो अपना एक शिल्‍प लिए सामने आती हैं मैं उसे आने देता हूं फिर उसे थोडा बहुत संपादित करता हूं।

७. कविता से चरम महत्वाकांक्षा क्या है - प्रसिद्धि , पैसा, अमरता - कवि आखिर में क्या चाहता है?
कविता से क्‍या चाहना है। जीवन से क्‍या चाहना है उसे तो जीना है। लिखना है। यह तो बस अपनी बाबत, अपने समाज, परिवेश आदि के बारे में कहन है कि यह हूं मैं और इस तरह से हूं और इसकी रोशनी में चाहे तो कोई ऐसा या वैसा हो सकता है।
८. नए लिखने वालों के लिए क्या सलाह देंगे?
कि वे आपस में खूब बातें करें। एक दूसरे , तीसरे , दुनिया जहान सबसे बातें करें उन्‍हें जानें और उस रोशनी में खुद को जानें। संवाद के बिना लिखना नहीं हो सकता। जानना ही रचना है।
९. इधर क्या पढ़ रहे हैं और कौन सी किताबें आपको लगता है कि हर किसी को पढनी चाहिए?
यूआर अनंतमूर्ति का उपन्‍यास संस्‍कार पढ रहा, रोचक लग रहा। कवियों में गोविन्‍द माथुर, समर्थ वशिष्‍ठ, संजय शांडिल्‍य, विपिन चौधरी आदि की पुस्‍तकें पढ रहा। मुगलकाल के शासकों के जीवन चरित्र पढे इस बीच। परिवार निजी संपत्ति और राज्य की उत्पत्ति - एंगेल्‍स, वॉन गॉग की जीवनी -लस्‍ट फॉर लाइफ, हिंदी साहित्‍य का इतिहास- रामचंद्र शुक्‍ल, चेखोव, अन्‍ना करेनिना, अपराध और दंड, प्रेमचंद, जैनेन्‍द्र और सैकडों लेखक हैं। पढनी तो अनंत पुस्‍तकें हैं।

22/03/2017

पढ़ते हुए 2 : गीत चतुर्वेदी, न्यूनतम मैं !

                                                                                                               
                            गीत की कविताओं पर बहुत लिखा जा चुका है. इसीलिए ये एक मुश्किल काम है. गीत चतुर्वेदी का मिलना मुश्किल था. उनके बारे में अनिमेष जोशी ने मुझे बताया था लगभग एक साल पहले. अनिमेष तब "आनक" नाम की एक पत्रिका निकालते थे. उन्होंने मेरी कुछ कवितायें छापी थीं और मैं उनसे अक्सर हिंदी में क्या पढूँ इस बारे में सलाह लिया करता था .इसी बातचीत के दौरान एक बार गीत का ज़िक्र हुआ और फिर मैंने उनको कुछ कुछ पढ़ा. "सदानीरा" में उनके कुछ अनुवाद भी पढ़े थे पर पूरा संग्रह नहीं पढ़ा था. गीत के बारे में लिखना इसीलिए भी मुश्किल रहा मेरे लिए क्योंकि मुझे उन्हें प्लेस करने में दिक्कत हुई. हिंदी कविता का जो आम मिजाज़ है, (फिर ये कहना ज़रूरी है कि हिंदी कविता इस लेबल से परिभाषित नहीं होती) उस के साथ कंटेंट और कहन में गीत को किस के साथ रखा जाए ये एक सवाल मेरे सामने रहा. अमूमन हम पढ़ते हुए दो चार कवियों को साथ में पढ़ते हैं, फिर जो अभी तक पढ़ा हुआ है उसका असर आगे पढ़े पर तो पड़ता ही है, ये कोई नयी बात नहीं है.
गीत की जो शुरुआती कवितायेँ पढ़ीं, वो नयी लगीं इसीलिए गीत को बिना किसी पूर्वाग्रह के पढ़ पाया. साहित्य के पाठकों के लिए ये मुश्किल काम है.
"न्यूनतम मैं" की कुछ कवितायेँ, गीत की वाल पर पढ़ी थीं, कुछ अनुराग वत्स के ब्लॉग पर, कुछ राजकमल के पेज पर. पटना पुस्तक मेले के आखिरी दिन, ये किताब पुस्तक मेले से गायब थी और अपने अजेंडे में रहते हुए भी ये किताब वहां नहीं खरीद पाया. कुछ दिनों बाद दरियागंज से ये किताब उठाई पर पढना नहीं हो पाया. हाँ, जहाँ जहाँ मैं रहा, किताब साथ घूमती रही और मैं भी किताब के मुझ तक आने का इंतज़ार करता रहा. आप कवितायेँ ऐसे ही पढ़ सकते हैं, सही तरीका शायद यही है. जैसे कवितायेँ लिखते हुए कवि को इंतज़ार करना होता है, पाठकों को भी सहज मिलें ये मुश्किल होता है. इस दौरान, गुलज़ार के अफसाने, मंटों के एसेज और कुछ और कवियों की कवितायेँ पढता रहा और गीत की किताब सिरहाने पड़ी रही. इसका पहला पाठ मुझे हवाई जहाज में नसीब हुआ, होली की देर शाम दिल्ली आते हुए. सहयात्री एक प्रेमी जोड़ा था जो पूरे सफ़र के दौरान किसी प्रेजेंटेशन और रिपोर्ट पर काम करने और चिकन सैंडविच खाने में व्यस्त रहा. मुझे लगा गीत की किताब में ही सिर घुसना चाहिए.
                                                        किताब ख़ूबसूरत है. कवितायेँ जिस तरह खण्डों में बांटी गयी हैं, और उनके साथ दूसरे कवियों और अपनी पंक्तियों का इस्तेमाल किया गया है वो चार्मिंग भी है और aesthetically प्लीसिंग भी है. गीत की कविताओं के बारे में कैसे लिखा जाए. इनको ना एकल पढ़ा जा सकता है ना कवि से अलग कर के. ये कवि का हाई पॉइंट भी है और लो पॉइंट भी है. जो गीत का पढ़ा हुआ है वो उनके लेखन में हाईलाइट होता है और उसको समझने के लिए आपको अपने पढ़े हुए का भी इस्तेमाल करना पड़ता है. सुन्दरता की समझ भी गीत को अलग करती है, जो उनकी अपनी है और विश्व साहित्य से प्रेरित है कहीं कहीं.  मेरी समझ के अनुसार जो बातें किताब में मुझे याद रह गयीं, उनकी बात करता हूँ. गीत उन सवालों से जूझते हुए कवी के रूप में सबसे परिपक्व होते हैं जो सवाल, हिंदी कविता अपने मान कर नहीं चलती. गीत का समाज उनके भीतर है और गीत उस ओर सफ़र करते हुए कम्फर्टेबल भी हैं और सहज भी हैं. जीवन के उद्देश्य और दर्शन जैसे सवालों को हिंदी के आलोचक समीक्षक लोगों को हाल ही कलावादी सवाल मानते हुए सुना है. हालांकि उनकी चर्चा इस लेख में करने की आवश्यकता नहीं है. प्रेम इन कविताओं में वायुमंडल जैसा है, सब अपने भीतर समेटे हुए - कामू, कर्क्गार्ड, नीत्ज़े सार्त्र इधर उधर मिल जाते है. प्लेटो और अरस्तु भी. पर इनको जोड़ने के लिए गीत के पास प्रेम है. और कुछ चाहिए भी नहीं. इन सबसे गीत के फासले और नजदीकियां अलग अलग हैं पर जिल्द एक ही है -उर्जा उसी फ्रीक्वेंसी तक जाने की कोशिश करती हुई. पाश्चात्य एपिक की शैली की किन्तु छोटी छोटी कवितायेँ, उद्हरण ग्रीक कवियों के,महान नाटकों से और सवाल जो तब भी प्रासंगिक हे और अब भी हैं. एक एकान्तप्रिय पाठक की जिज्ञासा- अपना अन्दर और बाहर अलग अलग रखने की कोशिश, असल और  क्षद्म की पड़ताल - अपनी उम्र के अच्छे कवियों से गीत को अलग करता है.सबसे असहज कवि उन कविताओं में है (हालाँकि इसको छुपाने के लिए वो करतब करता है और यहाँ मेरी सब्जेक्टिव समझ का भी रोल है.) जहाँ वो दबाव में उस ओर जाता है जिधर वो स्वत: नहीं होना चाहता है. वहां दोहराव हैं, हिंदी साहित्य का चिर-उपस्थित peer pressure है और शायद थोड़ी बहुत conformity और acceptance की जदोजहद भी है. हाँ, एक गिल्ट फैक्टर भी काम करता है. किताब का चतुर्थ असाधारण होते हुए भी बाकी खण्डों जितना असाधारण नहीं है. आखिर में उनकी टिप्पणियों में रेफ़रन्स देते हुए इलियट वाली अकड़ नहीं, हिंदी के पाठकों को कॉन्टेक्स्ट से परिचित करने की कोशिश है.
                                                                                         जो गीत पर लिखते होंगे, गीत की कविताओं में उसके बिम्बों में बात करते होंगे. विश्व साहित्य की थोड़ी समझ रखने वाला भी ज़रूर इनपर बात करेगा. गीत बिम्बों को खोजते रहते हैं, किताब पढ़ते हुए ऐसा कई बार लगा. कई बार वो बिम्ब क्लिक करते हैं, कई बार वो कवि से संभाले नहीं जाते पर कवि का लेबर पेन, उसके शिल्पों में दिखता है.  अब जबकि हिंदी कविता की मुख्यधारा उसी एकरसता से एकरूप हो रही है, जिसने भारतीय अंग्रेजी कविता का नब्बे प्रतिशत मार गिराया है, गीत का बिम्बों में होना, कविता के हम पाठकों के लिए न सिर्फ सुखद है, उम्मीद भरा भी है. हालाँकि नयी कविता को परिभाषित कर पाने जितनी समझ मुझमे नहीं है ना टेक्स्टबुक की तरफ जाने का कोई सद्विचार कभी मेरे मन में रहा है, हमारी कविताओं का स्वरुप बदल रहा है, उनकी भाषा की संरचना दूसरी ओर घूम चुकी है और अधिकांश इससे या तो अनिभिज्ञ हैं या इसको इग्नोर करना चाह रहे हैं. अगले पचास सालों में कविता में जो abstract और randomness आने वाला है,उसकी व्यूह रचना का प्रथम भाग अब लिखा जा रहा है.  अरुण कमल की कविता "प्रलय" इसका एक बढ़िया उदहारण है. गीत भी उसी रास्ते की conscious तलाश में नज़र आते हैं . 
अंत में, ये बस पढ़ते हुए बनाये गये रफ नोट्स हैं जो मैंने किताब पढ़ते हुए वहीँ पन्नों में इधर उधर लिख दिए. आलोचना लिखते हुए "वादों" का वादा करना होता है जो कि मेरे लिए संभव नहीं है. कविता की तरफ मैं अपने हेडोनिजम में बंधा हुआ आता हूँ - बिम्ब आकर्षित करते हैं और इसका इस्केप. अपने न्यूनतम में भी कविता मुझे दीर्घ लगती है. जैसे गीत कहते हैं - 
" तुम जो सुख देती हो, उनसे जिंदा रहता हूँ.
तुम जो दुःख देती हो, उनसे कविता करता हूँ
इतना जिया जीवन, कविता कितनी कम कर पाया." 

anchit

05/03/2017

पढ़ते हुए, एक : रंजन बाबू के गाँव में



(ये कोई आलोचनाएं नहीं हैं. "पढ़ते हुए" कॉलम का काम भी ये नहीं है. जहाँ तक मेरी बात है, ना कविता में ना हिंदी आलोचना में इतनी मेरी इतनी समझ है कि कोई गूढ़ बात कह पाऊं. बहरहाल जैसे कुछ लिखते हुए लेखक/कवि अपने पाठकों से संवाद करता है, उसको पढ़ते हुए पाठकों में भी एक कहन पैदा होती है. मुझे लगता है मैं और मेरे जितने साथी इस श्रृंखला में लिखेंगे सब इसी कहन का अनुभव लिखेंगे. तो ये प्यार की चिट्ठियां हैं, कवि के लिए नहीं, उसकी कविताओं के लिए. शिकायतें भी हो सकती हैं और असंभव अतार्किक मोहब्बत भी.)

राकेश रंजन का संग्रह "दिव्य कैदखाने में" इधर पढ़ा. उनका पहला कविता संग्रह "अभी अभी जन्मा है कवि" एक बड़े कवि की मेज़ से उठाया था जिन्होंने बहुत ताकीद से कहा था कि राकेश रंजन को ज़रूर पढना चाहिए. मेरी हिंदी भाषा और हिंदी कविता को लेकर समझ कम है. बार बार लिखते और पढ़ते हुए इसकी हीन भावना से जूझना पड़ता है. राकेश रंजन उन तीन कवियों में से हैं, जो मेरे पटने के आसपास से हैं और "फ्रेश" वाली कविताओं को लिखते हैं. मनोज कुमार झा को पढना अनुभव होता है और शंकरानंद जी की सूक्ष्म दृष्टि वाली कविताओं से प्रभावित होने में कोई गुरेज़ नहीं दिखता. जो आसपास के कवियों का एक और कविता संग्रह पढना चाहता हूँ, वो राजकिशोर राजन का "कुशीनारा से गुज़रते हुए" संग्रह है. पाठक मतलबी होता है और मेरे जैसा अंग्रेजी वाले विमर्श और ट्रेंड की ट्रेनिंग रखने वाला पूर्वाग्रह ग्रसित कवि-पाठक जो अपनी सीमितताओं को अपनी रीडिंग के बल पर टालने की कोशिश करता रहता है वो और ज्यादा मतलबी होता है. तो हमारी समझ से हिंदी कविता अभी "उत्तरआधुनिक" समझ के आसपास चलती है और हिंदी समाज का पाठक वर्ग अभी भी व्यक्ति और समाज के बीच कविता जोड़ कर चलता है - जहाँ जन संघर्ष और समाज के लिए कला वाले प्रिंसिपल काम करते हैं. "art for art's sake" या "art for one's own sake" जैसे वाक्य या तो घोर पुरातन हैं या फिर शायद भविष्य में कभी सन्दर्भ पाएंगे. तो इस तरह की कविता में जो सबसे बड़ी दिक्कत होती है वो होती है कविता का सपाटबयानी हो जाना या फिर एक फोर्मुले फॉर्मेट पर कवि का चलते चले जाना. ऐसे में जो कवि की uniqueness या individuality है, वो लोप हो जाती है. पाठक कवि अ और कवि ब में भेद करले ये भी मुश्किल होता है. पर आजकल कवि "साइड से" समीक्षक होने की ज़रूरत भी करता है और अधिकांश: भीड़ इस खुशफहमी में जीती है कि कविता trolling और social media के युग में प्रासंगिक है .
बहरहाल लेख का मकसद मार्क्सवादी विमर्श से जूझना नहीं बल्कि अभी तक के कथन का कारण बस ये सिद्ध करना है है कि "नया" बस शिल्प की दृष्टि से ही खोजा जा सकता है क्योंकि उत्तरआधुनिकता हमसे मांग करती है कि हम मान कर चलें कि कुछ नया नहीं है सूरज के नीचे कम से कम कंटेंट के लिहाज से. ऐसे में कम से कम हिंदी में शिल्प की दृष्टि से ही सही और अगर सब की सब नहीं तो कुछ कवितायेँ ज़रूर ही साबित करती हैं कि ग्लोबल वार्मिंग वाले हिंदी युग में कभी कभी ठंडी हवा भी चलती है.उत्तर-आधुनिकता में जो सबसे अच्छी चीज़ है वो ये कि वो जो "लोकल" है वहां तक लौटने की कोशिश करती है- फिर चाहे भाषा के स्तर पर या फिर शैली के स्तर पर. farce भले ही हमारे समय की भाषा है पर उस लायक हास्य प्रवीणता कम लोगों में दिखती है. सौभाग्य से कम कम से मेरे आसपास के क्षेत्रों में जो एलिवेटेड हास्य है, वो सब का सब शायद रंजन बाबू के गाँव से ही निकलता है.  इसीलिए मेरे जैसे नए हिंदी पाठक के लिए जो अपने गुरुओं के बिगाड़े जाने के कारण नए और यूनिक की तलाश में रहता है, क्षेत्रीय और  सामायिक सुखाड़ के बाद राकेश रंजन का मिलना सुखद है. मार्केज़ को पढ़ते हुए जिस एक बात की समझ सबसे कम होती है वो ये कि हँसना कब है और कब जो हास्य था वो ट्रेजेडी में बदल गया. इस कविता संग्रह में कुछ हद तक ये उहापोह बना रहा. कवि अपना मजाक बनाता है, कविता में जो समाज है उसको भी कई जगह छेड़ता है और ये सब करते हुए भी इन सब का कारुण्य कविता की काया में लहू बनकर बहता रहता है. 
                                                                                         मैं कविताओं की बात करता हूँ.हमारा समय "भाग्य-विधाताओं" और "अधिनायकों" का समय है. हमारे राष्ट्रीय गान से जुडी जो दो कवितायेँ मुझे याद आती हैं, एक तो विद्रोही की और दूसरी रघुवीर सहाय की. तीसरी कविता राकेश रंजन की है और कवि रघुवीर सहाय को याद करते हुए बात करते हैं . ये राष्ट्रगान है पर जोश में नहीं गाया जा रहा, ना अभिव्यक्ति की आज़ादी से बेलौस उसका मखौल, ना क्रांतिकारी की अधिनायकवाद को चुनौती. कैदखाना है कोई, दिखता-अनदेखा पर हर जगह हाज़िरी दाखिल करता हुआ जहाँ मन को बेमन ज़बरदस्ती वो करना पड़ता है जो कहा जाता है. हमारा समय "विकल्प-हन्ता" होने का पाप भी अपने काँधे ढोता है- ये बेबसी इस कविता में दिखती है और इस बेबसी का और उन्मुक्त रूप "बेकस-बकरे" कविता में सामने आता है - जब आप हँसते हुए इस कविता को पढ़ते हैं और फिर एकबारगी आपको लग सकता है कि बकरे आप हैं. छंद कवि का अस्त्र है छंद को जो कपड़े कवि पहनता है उसको अपनी फैक्ट्री में बनाता है.(मैं चरखा लिखना चाहता था पर चरखा लिखते ही एक दूसरा हैशटैग ट्रेंड करने लगता है मित्रों.) इस बेबसी का उपाय भी कविताओं में है और ये खोज अंत में जनता में भरोसे में जाकर खत्म होती है क्योंकि "सब हिसाब जनता करती है, नहीं किसी को देती माफ़ी." 
जन्मते हुए कवि ने जो स्वर पाए थे वो कवि के साथ ही हैं और कभी कभी तो उनसे कवि का इतना संवाद हो जाता है कि फिर उसके microcosm और macrocosm में भेद मिट जाता है- वसंत होता है , खंजन होता है और रंजन होता है- जहाँ रंजन सीधे तौर पर नहीं होता वहां दोनाली से डरता हुआ प्रेम पांडे होता है, कहीं रंजन साइकिल होता है और कहीं पूरा गाँव रंजन होता है और कहीं रंजन पूरा गाँव हो जाता है. 
अभी जब कि सामान्यत: एक स्वर में ही तमाम कथन होता है, अधिकांश कवितायेँ फॉर्म और स्ट्रक्चर से बहुत छेड़छाड़ करती हुई नहीं दिखती ( पटना और आसपास कम से कम.) और जब कंटेंट भी अपनी सीमाओं से बंधा हुआ है( किसी कवि की स्वीकृति हो समाज में ये एक बिंदु है, प्रकाशक क्या चाह रहा है ये दूसरा बिंदु है, और जो समय का प्रधान स्वर होता है वो तो होता ही है और नयी कविता युग से, अज्ञेयवादियों को ज्यादा नहीं तो थोडा बगल करते हुए, मोटे तौर पर स्वयं को दोहराता हुआ है, ये भी सही गलत से परे है. ), बेकस बकरे जैसी कविताओं का होना फूस के ढेर में सुई जैसा है.  एक तरह से ये संग्रह स्मृति में पुनर्वास का आह्वान भी है. एक बड़े कैदखाने में घूमते हुए रंजन बाबु, नाई की दुकान पर बैठा या भैंस की बात करता या सिलौट कूटने वाले को खोजता हुआ रंजनवा है जो जितना मुस्कुराता है उतनी शिद्दत से कैदखाने की बेबसी भी महसूस कर रहा है. अंत में ये कहना ज़रूरी लगता है कि हमारी समझ पर हमारे पढ़े हुए का गहन प्रभाव पड़ता है और जो हम पढ़ते हैं उस पर पहले से हमारी बनी हुई समझ का प्रभाव भी बहुत पड़ता है.

- अंचित                              
(अंचित लिखता है.)