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Showing posts from March, 2017

मनोज कुमार झा : हर भाषा में जीवित-मृत असंख्य लोगों की सांस बसती है

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मनोज उन थोड़े कवियों में से हैं जो लिखते हैं तो अपनी भाषा से भाषा के बाकी पथों को तोड़ते हुए चलते हैं. उन थोड़े लोगों में से भी हैं जो rigorously पढ़ते हैं और पाश्चात्य चिंतकों और दर्शन पर उनकी कमाल  की पकड़ है.



1. कविता क्या है आपके हिसाब से?क्यों लिखनी शुरू की?     हमलोग बातचीत शुरू करें इससे पहले मैं उद्धरण उदृत करना चाहूँगा heraclitus को , जो कहते हैं, कि Let us not conjecture at random about great things. कविता क्या है , इसको कई लोगों ने कई तरह से कहा है , मैं अभी तक उस स्थिति तक नहीं पहुंचा हूँ जहाँ आके पूरे जोर से कह सकूं की कविता क्या है, हाँ यह जरुर बता सकता हूँ की कविता क्या नहीं है . कोई कविता देखूं तो कह सकूं की यह कविता नहीं है,  क्यों नहीं है . चूँकि मैं दूसरा काम मैं जानता नहीं था , खेल में कमजोर था , पढने में ठीक ठाक था, कविता लिखने लगा. 
2. पठन का रचना में क्या योगदान है, आपको क्या लगता है?     बहुत योगदान है , दृष्टि देता है , पता चलता है कि  आपकी परम्परा में क्या कुछ हो चुका है और आप कहाँ हैं.चीज़ें इतनी जटिल होती गई हैं कि सिर्फ common sense से कवि का काम नही चलेगा।
3.…

पढ़ते हुए 3 : गंदी बात @ क्षितिज रॉय

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क्षितिज जब पटना आये थे इस बार के पुस्तक मेला में तो , सवाल-जवाब के क्रम में मैंने उनसे पूछा कि “साहित्य में जहाँ इतना उठा पटक है, खेमेबाज़ी और विचारधारा का टकराव है, उस जगह एक युवा रचनाकार का छपना कितना मुश्किल है ?"
आप जवाब जाने उससे पहले एक युवा रचनाकार का संघर्ष देखिए। क्षितिज की उपन्यास गंदी बात से दो साल पहले नीलोत्पल मृणाल की उपन्यास आई थी डार्क हॉर्स. किताब आने के महज़ हफ्ता भर में इसका दूसरा संस्करण छापना पड़ा , आज तक डार्क हॉर्स की पांच से अधिक संस्करण आ गये हैं. पिछले साल ही नीलोत्पल को डार्क हॉर्स के लिए साहित्य अकादमी युवा पुरस्कार से सम्मानित किया गया.
लेकिन नीलोत्पल की कहानी इतनी हैप्पी टाइप भी नहीं है . किताब लिखने के बाद महीनों तक वे प्रकाशनों के चक्कर काटते रहे, उन्हें सलाह मिलता की अभी और पढ़िए , थोड़ा पकिए तब लिखिए . डार्क हॉर्स की पांडुलिपि इस ऑफिस से उस ऑफिस होती रही. एक युवा के लिए अपने लिखे किताब की पांडुलिपि को लेकर इस प्रकाशन से उस प्रकाशन तक ठोकर खाना कितना ह्रदय विदारक है. जो युवा आँखों में अपने किताब छप जाने , अपनी बात कह पाने की ललक के साथ किताब लिखता है…

शहर डायरी : पारो के लिए 

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नाटक देखना बहुत देर से शुरू किया. दिल्ली यूनिवर्सिटी चले जाने के बाद. तब तक बारहवीं की पढाई में ज़िन्दगी ही नाटक बनी हुई थी. तो पटना से पहले दिल्ली में नाटक देखे थे. मोहन राकेश के "आधे- अधूरे" का मंचन देखा था, गिरीश कर्नाड का कोई नाटक था, जो बीच से देखा था और समझ नहीं पाया था. टॉम आल्टर "मौलाना" लेकर हमारे कॉलेज आये थे. कोई चस्का लगा नहीं फिर भी. बढ़िया नाटक भले ही अगर कहीं दिख जाता तो देख लेता था. स्कूल में "कलिंग विजय" नाटक में अशोक का किरदार निभाया था और फिर कॉलेज में दो नाटकों में भी रोल निभाए, निर्देशन किया और लिखा भी. पर फिर भी, ये शुरू से पता था कि अपनी जगह देखने वाली जनता में ही है. पटना आने के बाद दो सालों तक कोई नाटक नहीं देखा. हिंदी नाटकों की जानकारी नहीं थी, अंग्रेजी के नाटक यहाँ होते नहीं. तो युट्यूब पर ही मंचन की बकवास रिकॉर्डिंग देखता रहा.  फिर यहाँ पढ़ते हुए कॉलेज के तीसरे साल में फिर नाटक देखने शुरू किये पर अनुभव सों सों रहा. कुल दस के आसपास नाटक देखे. इनमे से जो पहला नाटक अटका वो कोर्ट-मार्शल था. शायद इप्टा से हुआ था. वरिष्ठ रंगकर्मी जावेद…

रोमियो ओ रोमियो

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यूपी में जो एंटी रोमियों स्क्वाड बना है, उस से मुझे अपने बचपन के दिनों पर अतिरेक हर्ष हो रहा है. हर्ष का दूसरा विषय ये है कि मैं बिहार में हूँ, जो यूपी के पास है पर यूपी नहीं है. थोडा मुझे नीति- निर्धारण करने वालों की सोच पर भी हर्ष हो रहा है कि वो किस गफलत में क्या कर बैठे हैं. बचपन से जो मुझे प्रेम का अनुभव रहा है और जिस प्रकार तथाकथित मनचले रगेदे जा रहे हैं, मुझे यूपी वाली पुलिस पर भी अफ़सोस हो रहा है.  वो प्रेमियों की मनोस्थिति और प्रेमिकाओं की गुंडागर्दी समझने में असफल रहे हैं. इस से यही निष्कर्ष निकलता है कि हो सकता है एंटी रोमियो स्क्वाड वाले या तो एकतरफ़ा प्यार वाले रहे होंगे या भगवान ने उन्हें भाग्यशाली समझा होगा इसीलिए उनके पैसे और ह्रदय का ख्याल करते हुए उनके जीवन में प्यार का प्रवेश कराया ही नहीं होगा.  दो तीन परिस्थितियों पर ध्यान देना आवश्यक है. पहले तो भारत में प्रेम का व्यवहारिक पक्ष समझा जाए.  १. अगर लड़के को प्रेम हो गया और लड़की ने दुर्भाग्यवश उसे स्वीकार कर लिया तो फिर लड़का सुधर ही जाता है. वो मनचला नहीं रह पाता. लड़की छेड़ना, कमेंट करना तो दूर है. …

जब तक आदमी का होना प्रासंगिक है कविता भी प्रासंगिक है - कुमार मुकुल

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आज से हमलोग अपनी इंटरव्यू वाली श्रृंखला की शुरुआत कर रहे हैं. इस श्रृंखला में हम कवियों से बात करेंगे और उनकी मनोस्थिति और कविता के प्रति नजरिया जानेंगे. हर कवि से हमने एक ही तरह के सवाल पूछे हैं और आगे हम देखेंगे कि उनमें किस तरह भिन्नता और समानताएं हैं. 
कुमार मुकुल जाने-माने कवि हैं और अभी हाल ही में उनका नया कविता संग्रह आया है. उन्होंने हमारे सवालों के जवाब दिए :-  १. कविता क्या है आपके हिसाब से? क्यों लिखनी शुरू की? कविता अपनी बातों को रखने का एक रूपाकार या फार्मेट है। एक कन्विंश करने वाला फार्मेट। पिता बचपन में रामायण,गीता आदि के हिस्‍से याद कराया करते थे। फिर दिनकर की किताब 'चक्रवाल', मुक्तिबोध की 'भूरि भूरि खाक धूल', कविता के नये प्रतिमान आदि उनकी टेबल पर रखे होते थे जिन्‍हें पढते हुए लगता है कविता की समझ आई और फिर उस समझ को प्रकट करने की ईच्‍छा से कविता का आरंभ हुआ होगा।
२. पठन का रचना में क्या योगदान है, आपको क्या लगता है? पढने का तो योगदान है ही। यह पढना किताब तक सीमित नहीं रहता कलाकृतियों और जीवन को भी साथ साथ पढना होता है। पढना ही मनुष्‍य बनाता है। सबसे …

पढ़ते हुए 2 : गीत चतुर्वेदी, न्यूनतम मैं !

गीत की कविताओं पर बहुत लिखा जा चुका है. इसीलिए ये एक मुश्किल काम है. गीत चतुर्वेदी का मिलना मुश्किल था. उनके बारे में अनिमेष जोशी ने मुझे बताया था लगभग एक साल पहले. अनिमेष तब "आनक" नाम की एक पत्रिका निकालते थे. उन्होंने मेरी कुछ कवितायें छापी थीं और मैं उनसे अक्सर हिंदी में क्या पढूँ इस बारे में सलाह लिया करता था .इसी बातचीत के दौरान एक बार गीत का ज़िक्र हुआ और फिर मैंने उनको कुछ कुछ पढ़ा. "सदानीरा" में उनके कुछ अनुवाद भी पढ़े थे पर पूरा संग्रह नहीं पढ़ा था. गीत के बारे में लिखना इसीलिए भी मुश्किल रहा मेरे लिए क्योंकि मुझे उन्हें प्लेस करने में दिक्कत हुई. हिंदी कविता का जो आम मिजाज़ है, (फिर ये कहना ज़रूरी है कि हिंदी कविता इस लेबल से परिभाषित नहीं होती) उस के साथ कंटेंट और कहन में गीत को किस के साथ रखा जाए ये एक सवाल मेरे सामने रहा. अमूमन हम पढ़ते हुए दो चार कवियों को साथ में पढ़ते हैं, फिर जो अभी तक पढ़ा हुआ है उसका असर आगे पढ़े पर तो पड़ता ही है, ये कोई नयी बात नहीं है. गीत की जो शुरुआती कवितायेँ पढ़ीं, वो नयी लगीं इसीलिए गीत को बिना किसी पूर्वाग…

पढ़ते हुए, एक : रंजन बाबू के गाँव में

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(ये कोई आलोचनाएं नहीं हैं. "पढ़ते हुए" कॉलम का काम भी ये नहीं है. जहाँ तक मेरी बात है, ना कविता में ना हिंदी आलोचना में इतनी मेरी इतनी समझ है कि कोई गूढ़ बात कह पाऊं. बहरहाल जैसे कुछ लिखते हुए लेखक/कवि अपने पाठकों से संवाद करता है, उसको पढ़ते हुए पाठकों में भी एक कहन पैदा होती है. मुझे लगता है मैं और मेरे जितने साथी इस श्रृंखला में लिखेंगे सब इसी कहन का अनुभव लिखेंगे. तो ये प्यार की चिट्ठियां हैं, कवि के लिए नहीं, उसकी कविताओं के लिए. शिकायतें भी हो सकती हैं और असंभव अतार्किक मोहब्बत भी.)
राकेश रंजन का संग्रह "दिव्य कैदखाने में" इधर पढ़ा. उनका पहला कविता संग्रह "अभी अभी जन्मा है कवि" एक बड़े कवि की मेज़ से उठाया था जिन्होंने बहुत ताकीद से कहा था कि राकेश रंजन को ज़रूर पढना चाहिए. मेरी हिंदी भाषा और हिंदी कविता को लेकर समझ कम है. बार बार लिखते और पढ़ते हुए इसकी हीन भावना से जूझना पड़ता है. राकेश रंजन उन तीन कवियों में से हैं, जो मेरे पटने के आसपास से हैं और "फ्रेश" वाली कविताओं को लिखते हैं. मनोज कुमार झा को पढना अनुभव होता है और शंकरानंद जी की सूक्ष्म द…