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Showing posts from November, 2016

Jane Eyre - A thoughtful journey

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Whenever we are depressed we want someone to relate to. And what can be more relatable than a book. I find same relating and inspiring element in the novel JANE EYRE which was penned down in nineteenth century by Charlotte Bronte.
                 It revolves around the life of a girl, from her childhood to marriage. While reading it I was so much engrossed in the story that I felt as if I know Jane personally. It took few days to complete and every time I picked it up, there was an excitement to know more about Jane. Her childhood was not normal. It was in fact tough. I felt pity when her cousin hits her, at the same time, I felt hatred for her savage aunt and cousins. It imparts a sense for the kind of life an orphan child leads all around the world.
                 Anyway,  at that instant I wanted Jane to run away which obviously she doesn’t do. When she is sent to boarding school I feel great that now she could live the way she wants to. But life is itself the biggest struggle w…

मुसाफिर कैफ़े

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इस साल के सितम्बर में आई हिन्दी नॉवेल है ‘मुसाफ़िर कैफ़े’ । लेखक हैं दिव्य प्रकाश दुबे और प्रकाशक हैं हिन्द युग्म और वेस्टलैंड . बुक का सोशल मीडिया पर जम से प्रचार किया गया । किताब का वीडियो ट्रैलर भी बनाया गया । जो हिंदी में एकदम नया काम है। प्रकाशक का दावा है कि बुक 10 दिन में 5000 बिक गयी । जो कि हिंदी प्रेमियों के लिए खुश होने वाली बात है। मैं ‘मुसाफ़िर कैफ़े’ को कुछ दिन पहले ही पढ़ा हूँ। लेकिन बुक पर इसलिए नहीं लिख रहा हूँ कि मुझे ‘मुसाफ़िर कैफ़े’ ने उत्साहित या निराश किया. बल्कि बुक के बैक कवर पर लिखे कुछ वाक्य ने मुझे लिखने को विवश कर दिया । --Story--
नॉवेल का मेन कैरेक्टर है चन्दर। जो सॉफ्टवेर इंजिनियर है। उम्र शादी की हो गयी तो घर वाले प्रेशर डाल रहे हैं शादी करने के लिए। सेकंड कैरेक्टर है सुधा जो लॉयर है। फैमिली कोर्ट में डिवोर्स दिलवाती है । उसके फैमिली भी शादी करने के लिए प्रेशर डाल रहे है। चंदर और सुधा एक ही शहर मुंबई में रहते हैं और संयोग से दोनों एक दुसरे को शादी के लिए मिलने जाते हैं. सुधा को शादी से एलर्जी रहती है और चंदर का उसकी एक्स गर्लफ्रेंड का प्रॉब्लम रहता है. बस घर व…

शोभित की कवितायेँ

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शोभित  कविता के साथ अपने अफेयर की शुरुआत में है. हम अपना सफर जब शुरू करते हैं , हमारे साथ हमारा उत्साह और उम्मीद ही होते हैं और सामने एक बड़ी दुनिया जिसको लिख देने का मन होता है. ये उत्साह ताउम्र ज़रूरी होता है. शोभित रंगकर्मी भी है और नाटकों को भी जीता है. आज उसकी तीन कवितायेँ -
1. खुदरे सिक्के की हालत है
क़ैद बयां कैसे करूँ
ज़ेेब ही महफ़िल है
खुद के पैर नहीं,
छनक औरों के क़दमों से
गुल्लक की क़ैद मिले तो रह भी लूं
यहाँ तो टॉफियां लूटा दी जाती है
मेरी गुलामी क़ायम रखने के लिए
बाज़ार की बिक्रियां तेज़ होने को है
खूब होगी तरफ़दारी ऐ नोट तेरी
मैं तो पसंदीदा रहूँगा बस फ़क़ीरों का
शाम की तख़्त से फेंक दिया जाऊंगा नदी में
किसी की मन्नत का बोझ लिए ।। 2.
उस वक़्त को खोज लो
ज़रा सा वक़्त लेकर
जिस वक़्त के लिए हो बने
तुम हर वक़्त आलमगीर
कुछ अलग तो होगा ही
तुम हो किनारा मैं बहता नीर
न मिले वो वक़्त तो छोड़ो
खोज लो उस आग को
जिससे सुलगती सांस है
फिर दिसंबर आ रहा है
बैठ जाना तुम किनारे
मैं बहूँगा सुलगता नीर । 3.
हर ख़बर रखता हूँ चाँद का
रात के ओझल होने तक
एक पंछी मेरी ओर से
मेरे मन का वो कोलंबस
उड़ता चला जाता है जो
रास्ते भटके हुए
वो पहुँच जाता है …

आगा शाहिद अली की कवितायेँ

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(आगा शाहिद अली यादों के शायर हैं और उनकी व्यक्तिगत स्मृतियाँ उनकी ज़मीन के इतिहास से मिलती जुलती डूबती उतरती रहती हैं. अपनी कविताओं में वो हमेशा घर लौटने को बेचैन दिखाई देते लगते हैं. उनकी कविता दर्द की पड़ताल में अपना समय व्यतीत करती है और कविता में उस ख़ास चीज़ की बहुतायत है जिसको पामुक अपनी किताब इस्तांबुल में "हुज़ुं" कहते हैं.
उनका अनुवाद करते हुए उनके करीब जाना उनके काम्प्लेक्स पोएटिक सिस्टम से भी रूबरू होना है और दर्द और शैली के अभूतपूर्व संयोजन से झूझना भी है. एक अनुवादक के लिए ये एक बहुत मुश्किल काम था और उनकी अंग्रेजी के ग़ज़लों की रेंदिशन का शायद ही अनुवाद किया जा सके. -अंचित) आज आगा शाहिद अली की तीन कवितायेँ-
मैदानों के मौसम कश्मीर में,जहाँ साल में
चार चिन्हित अलग अलग मौसम होते हैं
अम्मी अपने लखनऊ के मैदानी इलाके में बीते बचपन की बात करती हैं
और उस मौसम की भी,
मानसून, जब कृष्ण की बांसुरी
जमुना के किनारों पर सुनाई देती है.
वो बनारस के ठुमरी गायकों के पुराने रिकार्ड्स बजाया करती थीं -सिद्धेश्वरी और रसूलन,
उनकी आवाजों में चाह होती, जब भी बादल जमा होते,
उस अदृश्य,नीले भगवान के लिए. बि…

रामकृष्ण पाण्डेय की कुछ कवितायेँ. 

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(वैसे तो "आवाजें" हर दो तीन महीने में एक बार पलट ही लेते हैं, कुछ तकनीक की सरलता की और लौटने के लिए और कुछ जो अपने बूते से बाहर होता है उसको समझ सकने के लिए. बड़े पापा को गये अब सात साल बीत गये हैं. उनसे आखिरी बहस सितम्बर २००९ में हुई थी वो एक सोमवार को गये,सोलह नवम्बर की तारीख. बहस कई बार होती थी और अलग अलग विषयों पर. हॉस्टल से हर शनिवार रविवार उनके पास चले जाते थे, नार्थ कैम्पस से लगभग दो घंटे दूर उनके घर पर कुछ घर के खाने के लालच में, कुछ उनसे सीखने के चक्कर में. कैम्पस की हर गतिविधि पर उनकी गंभीर नज़र रहती थी. इक पूरी इतवार वो बस इसीलिए डांटते रहे क्योंकि मेरा किसी पोलिटिकल पार्टी की किसी कार्यशाला में जाना हो गया था. फिर खुद उन्होंने अख़बार के मार्जिन में पोलिटिकल स्ट्रक्चर समझाया था. एक बार अनुवाद के बारे में हमने बहुत लम्बी बात की. ऐसे ही एक बार कविताओं की तकनीक पर. मार्केज़ और बोर्खेज़ में फर्क करने के लिए उन्होंने एक बार हैरी पॉटर से भी एक उदाहरण उठाया था. वो बढ़िया पत्रकार थे, उस तरह के जो शायद उनके जाने के साथ विलुप्त हो गए. वो बढ़िया शिक्षक हो सकते थे पर उनको जीवन से थोड…

Poems of Shristi

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Shristi is one of the budding poets from Patna University. in the process of finding her voice, she feels that writing helps in releasing stress and gives her a kind of  pleasure that nothing else can provide.

Here are few of her poems.

SUNSET AND DEATH

It’s ironical,
Day’s termination in west,
And the downfall of time,
Both has a touch of red,
The former enhances the sky’s shade,
While the latter incites blue, which dreads,
Though both are magical,
Both has a fixed spell,
Of first we are familiar,
But of second we have no clue, One lull,
Other knocks down imparting fear,
Still death is a road to incarnation,
Sunset is a hope of new inception.

  I LONG

I peeped at my intimate part,
I found splurging emotion,
And  uncovered an innocuous heart,
Devoid of worldly passion.
I pined to walk on the path of past,
A road on which I was surrounded,
My hands were never deserted,
I had an immature brain,
I cried for paper boat in rain,
Mud satisfied my hunger,
I played with …

Leonard Cohen : I'm leaving the table. I'm out of the game. RIP

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i started listening to cohen a long time ago. i was young, innocent and in love for the first time. first love brings with it, the melancholy of unrequited desires and  the ecstasy of belonging. and dramatically it all began. in those days, lovers would sit at their computers and burn cds for their beloveds. we were past the "recording-cassettes" time but not yet into sending songs through whatsapp. somehow, that felt more long lasting. and i stumbled upon leonard cohen. as one of the first sharers of the pangs that rip out the heart. the voice, the aura of the sixties and good old love.                                                                  soon i was quoting him to the beloved, to young friends and to anyone who would listen. i was imitating him at places as well. to a young writer, to most of the young writers in the last fifty years, cohen was an inspiration as he will be to …