where it all began

Hearth, in its earlier days, came out in form of a newsletter. while the magazine was a tedious, more strenuous affair and was periodical, Hearth never depended itself on time and was published whenever an incessant need to do so was felt- be it some political or literary incident or the opening of a new joint in the city -
as a famous philosopher once said, we are not prisoned by time but by clocks, we must accept our ruins and our downfalls. true poetry and literature will come out of those.
The cover of the blog is called "LOVERS" and has been clicked by eminent poet and photographer Anurag Vats

30/11/2016

Jane Eyre - A thoughtful journey

Whenever we are depressed we want someone to relate to. And what can be more relatable than a book. I find same relating and inspiring element in the novel JANE EYRE which was penned down in nineteenth century by Charlotte Bronte.
                 It revolves around the life of a girl, from her childhood to marriage. While reading it I was so much engrossed in the story that I felt as if I know Jane personally. It took few days to complete and every time I picked it up, there was an excitement to know more about Jane. Her childhood was not normal. It was in fact tough. I felt pity when her cousin hits her, at the same time, I felt hatred for her savage aunt and cousins. It imparts a sense for the kind of life an orphan child leads all around the world.
                 Anyway,  at that instant I wanted Jane to run away which obviously she doesn’t do. When she is sent to boarding school I feel great that now she could live the way she wants to. But life is itself the biggest struggle which has no end. When she searches for a job then it feels like now her life will be balanced. But her hardships don’t end here too. But she faces everything without compromising with her self respect.
                                   Jane represents every girl next door. This is not just a story but an expression of life. Whatever Jane does feels right as if everything is happening as should happen. I was remorseful; surprised as well shocked at the twists and turns of life but at the same time I admired Jane for her brashness. I enjoyed her vibe towards life. I loved her when she was in love. I liked her acceptance the way she was. I adored her simplicity. I fancied her kindness and caring attitude. I not just loved the story but lived it. I felt as if Jane was my friend. I think if anyone has to go for a classic which can relate to life in a better way, if it feels like its over, if nothing seems right and have no idea about what’s going on, then just skim through the pages of this novel.
It’s a fascinating and a thoughtful read.

shrishti



Shrishti is one of the budding writers from patna university.

26/11/2016

मुसाफिर कैफ़े

इस साल के सितम्बर में आई हिन्दी नॉवेल है ‘मुसाफ़िर कैफ़े’ । लेखक हैं दिव्य प्रकाश दुबे और प्रकाशक हैं हिन्द युग्म और वेस्टलैंड . बुक का सोशल मीडिया पर जम से प्रचार किया गया । किताब का वीडियो ट्रैलर भी बनाया गया । जो हिंदी में एकदम नया काम है। प्रकाशक का दावा है कि बुक 10 दिन में 5000 बिक गयी । जो कि हिंदी प्रेमियों के लिए खुश होने वाली बात है। मैं ‘मुसाफ़िर कैफ़े’ को कुछ दिन पहले ही पढ़ा हूँ। लेकिन बुक पर इसलिए नहीं लिख रहा हूँ कि मुझे ‘मुसाफ़िर कैफ़े’ ने उत्साहित या निराश किया. बल्कि बुक के बैक कवर पर लिखे कुछ वाक्य ने मुझे लिखने को विवश कर दिया ।
--Story--

नॉवेल का मेन कैरेक्टर है चन्दर। जो सॉफ्टवेर इंजिनियर है। उम्र शादी की हो गयी तो घर वाले प्रेशर डाल रहे हैं शादी करने के लिए। सेकंड कैरेक्टर है सुधा जो लॉयर है। फैमिली कोर्ट में डिवोर्स दिलवाती है । उसके फैमिली भी शादी करने के लिए प्रेशर डाल रहे है। चंदर और सुधा एक ही शहर मुंबई में रहते हैं और संयोग से दोनों एक दुसरे को शादी के लिए मिलने जाते हैं. सुधा को शादी से एलर्जी रहती है और चंदर का उसकी एक्स गर्लफ्रेंड का प्रॉब्लम रहता है. बस घर वालों के कहने पर मिलने चले जाते हैं . चंदर और सुधा दोनों एक दुसरे को रिजेक्ट कर देते हैं और फॅमिली को बोल देते हैं पसंद नहीं आया. एक दुसरे को रिजेक्ट करने के बावजूद दोनों टच में रहते हैं . बाद में सुधा और चंदर लिव इन में रहने लग जाते हैं. चंदर को सुधा अच्छी लगने लग जाती है वो सुधा को बार-बार शादी के लिए अप्प्रोच करने लग है. लेकिन सुधा हर बार शादी को अवॉयड करते रहती है. बाद में दोनों बिना शादी के ही हनीमून पे जाते हैं. हनीमून से आने के बाद चंदर एकदम से सब कुछ छोड़ मसूरी चला जाता है. जहाँ उसे मिलती है पम्मी. पम्मी के साथ मिलकर चंदर मसूरी में एक कैफ़े खरीदता है और नाम देता है मुसाफिर कैफ़े. नावेल की कहानी फिर दस साल जम्प करती है. चंदर को पता चलता है सुधा प्रग्नेंट थी और वो एक बच्चे का पिता बन गया है. 
कहानी के दुसरे हिस्से मुंबई में सुधा अपने बेटे अक्षर के साथ रह रही है. अब वह मुंबई की टॉप लॉयर बन गयी है. अभी तक उसने शादी नहीं की है. लेकिन अपने लाइफ को सेकंड चांस देने के लिए अपने फर्म पार्टनर विनीत से शादी को सोचती है . विनीत को अक्षर का पिता ही मानते हैं . शादी करने के ख्याल से सुधा अक्षर का एडमिशन देहरादून के बोर्डिंग स्कूल में कराने जाती है . सुधा देहरादून से मसूरी चली जाती है. जहाँ वह मिलती है चंदर से. चंदर अब फिर से सुधा के साथ रहने लग जाता है अपने बेटे अक्षर,और पम्मी के साथ . अक्षर पम्मी को बड़ी मम्मी बुलाता है . और फिर होती है नावेल की हैप्पी एंडिंग .

--Inside Book --
दिव्य प्रकाश इस नावेल के पहले स्टोरी लिखते थे उनकी दो कहानी संग्रह है ‘टर्म एंड कंडीशन अप्लाई’ और ‘मसाला चाय’. जो की ठीक ठाक है. पता नहीं दिव्य को नावेल लिखने की कहाँ से सूझी. सबसे पहले आते हैं कथानक पर. कथानक कुछ भारी भरकम नहीं है जिस कहने के लिए नावेल लिखनी पड़ जाये. मुसाफिर कैफ़े को कहानी या लम्बी कहानी के शक्ल भी कहा जा सकता था. नावेल में वातावरण चित्रण पर मेहनत कम किया गया है. पाठक को अपने स्तर पर वातावरण की कल्पना करनी पड़ती है . बुक में संवाद भरे पड़े हैं . बल्कि यह डायलाग बेस्ड नावेल है . शायद लेखक दिव्य प्रकाश दुबे ने फिल्म स्क्रिप्ट के लिए एक्स्ट्रा मेहनत नहीं करना चाह रहे थे . कहीं-कहीं किताब बोरिंग लगने लग जाती है. नावेल में अच्छे-अच्छे वन लाइनर हैं, लेखक ने सबसे ज्यादा मेहनत वही की है. 
अब आते हैं इसके सबसे जरुरी पॉइंट पर. नावेल के कैरेक्टर . सुधा , चंदर और पम्मी . ये तीनों पात्र धर्मवीर भारती की कालजयी उपन्यास ‘गुनाहों का देवता’ लिए गये हैं . दिव्य प्रकाश गुनाहों के देवता के पात्र को उठाने की प्रक्रिया को धर्मवीर भारती को श्रधांजलि देना बता रहे हैं. मेरी समझ से ये श्रधांजलि से आस पास वाला काम भी नहीं है. गुनाहों का देवता में सुधा और चंदर कहीं भी अपने प्रेम का इजहार तक नहीं करते और कई पाठक पीढियां सुधा और चंदर को आदर्श प्रेम मानती आ रही है. लेकिन वही दो कैरेक्टर के साथ दिव्य प्रकाश सेक्स अपील पैदा कर रहे हैं. जो मेरे ख्याल से पाठकों को बिलकुल भी अच्छा नहीं लगेगा.
बैक कवर पर किसी the news express के हवाले से लिखा गया है कि glory days of hindi literature are here again . रामचन्द्र शुक्ल हिंदी साहित्य का ग्लोरी पीरियड यानि स्वर्ण काल भक्ति काल को मानते हैं . कबीरदास , जायसी , तुलसीदास, सूरदास मीरा बाई का काल. अगर the news express को लगता है दिव्य प्रकाश के लिखने से हिंदी साहित्य का स्वर्ण काल वापस आ जायेगा तो यकीन मानिये मुझसे ज्यादा खुश कोई नहीं होगा . लेकिन वह वर्तमान साहित्य में भी स्थान नही बना पाता . संभव है की प्रचार के दम पर किताब की हजारों प्रतियाँ बेची जा सकती है . लेकिन पाठक हर बार प्रचार के दम पर बुक खरीद ले संभव नहीं लगता है. पाठक बुक में खुद का मनोरंजन ढूंढता है , लेकिन उसे किताब में डेप्थ भी तो चाहिए होता है . तभी तो राइटर या बुक का फोरेवर फैन बना पाता है . मुसाफ़िर कैफ़े की भाषा तो हिंदी है लेकिन इसमें हिंदी पट्टी नहीं है . जो सबसे ज्यादा खटकती है . महानगर की कहानी को इंग्लिश राइटर अर्से से बेच रहे हैं . वही काम दिव्य प्रकाश हिंदी में कर रहे हैं.
--Final Words--
मुसाफ़िर कैफ़े उन पाठकों के लिए हिंदी में प्रवेश द्वार की तरह है जिन्होंने स्कूल के बाद हिंदी पढ़ी ही नहीं. किताब की भाषा सरल है . आम बोलचाल आने वाले इंग्लिश के शब्द को हुबहू रखा गया है. दिव्य प्रकाश साहित्यिक जमात से अलग अपनी राह चल रहे हैं . यह पगडंडी कब हाईवे बनेगी नहीं कहा जा सकता लेकिन दिव्य प्रकाश को नई राह के लिए शुभकामनाएं .

-सुधाकर रवि




20/11/2016

शोभित की कवितायेँ

शोभित  कविता के साथ अपने अफेयर की शुरुआत में है. हम अपना सफर जब शुरू करते हैं , हमारे साथ हमारा उत्साह और उम्मीद ही होते हैं और सामने एक बड़ी दुनिया जिसको लिख देने का मन होता है. ये उत्साह ताउम्र ज़रूरी होता है.
शोभित रंगकर्मी भी है और नाटकों को भी जीता है. आज उसकी तीन कवितायेँ -

1.
खुदरे सिक्के की हालत है
क़ैद बयां कैसे करूँ
ज़ेेब ही महफ़िल है 
खुद के पैर नहीं,
छनक औरों के क़दमों से 
गुल्लक की क़ैद मिले तो रह भी लूं
यहाँ तो टॉफियां लूटा दी जाती है
मेरी गुलामी क़ायम रखने के लिए
बाज़ार की बिक्रियां तेज़ होने को है
खूब होगी तरफ़दारी ऐ नोट तेरी
मैं तो पसंदीदा रहूँगा बस फ़क़ीरों का
शाम की तख़्त से फेंक दिया जाऊंगा नदी में
किसी की मन्नत का बोझ लिए ।।
2.
उस वक़्त को खोज लो
ज़रा सा वक़्त लेकर
जिस वक़्त के लिए हो बने 
तुम हर वक़्त आलमगीर
कुछ अलग तो होगा ही 
तुम हो किनारा मैं बहता नीर
न मिले वो वक़्त तो छोड़ो
खोज लो उस आग को
जिससे सुलगती सांस है
फिर दिसंबर आ रहा है
बैठ जाना तुम किनारे
मैं बहूँगा सुलगता नीर ।
3.
हर ख़बर रखता हूँ चाँद का
रात के ओझल होने तक
एक पंछी मेरी ओर से 
मेरे मन का वो कोलंबस
उड़ता चला जाता है जो
रास्ते भटके हुए
वो पहुँच जाता है तुम तक
चाँद की तलाश में
मैं, 
हर ख़बर रखता हूँ चाँद का
रात के ओझल होने तक
हाँ वो लौटेगा कभी 
अपने साथ तुमको लिए ।
LikeShow more reactions
Comment

19/11/2016

आगा शाहिद अली की कवितायेँ


(आगा शाहिद अली यादों के शायर हैं और उनकी व्यक्तिगत स्मृतियाँ उनकी ज़मीन के इतिहास से मिलती जुलती डूबती उतरती रहती हैं. अपनी कविताओं में वो हमेशा घर लौटने को बेचैन दिखाई देते लगते हैं. उनकी कविता दर्द की पड़ताल में अपना समय व्यतीत करती है और कविता में उस ख़ास चीज़ की बहुतायत है जिसको पामुक अपनी किताब इस्तांबुल में "हुज़ुं" कहते हैं.
उनका अनुवाद करते हुए उनके करीब जाना उनके काम्प्लेक्स पोएटिक सिस्टम से भी रूबरू होना है और दर्द और शैली के अभूतपूर्व संयोजन से झूझना भी है. एक अनुवादक के लिए ये एक बहुत मुश्किल काम था और उनकी अंग्रेजी के ग़ज़लों की रेंदिशन का शायद ही अनुवाद किया जा सके. -अंचित)
आज आगा शाहिद अली की तीन कवितायेँ-

मैदानों के मौसम
कश्मीर में,जहाँ साल में
चार चिन्हित अलग अलग मौसम होते हैं 
अम्मी अपने लखनऊ के मैदानी इलाके में बीते
बचपन की बात करती हैं 
और उस मौसम की भी,
मानसून,
जब कृष्ण की बांसुरी 
जमुना के किनारों पर सुनाई देती है. 
वो बनारस के ठुमरी गायकों के पुराने रिकार्ड्स
बजाया करती थीं -सिद्धेश्वरी और रसूलन,
उनकी आवाजों में चाह होती, जब भी बादल जमा होते,
उस अदृश्य,नीले भगवान के लिए. बिछोह
संभव नहीं है जब बारिशें आती हैं ;
उनके हर गीत में ये होता था.
जब बच्चे दौड़ते थे गलियों में
अपनी अपनी उष्णता को भिन्गोते हुए,
प्रेमियों के बीच
चिट्ठियां बदल ली जाती थीं .
हीर-रांझा और दूसरे कई किस्से,
उनका प्रेम, कुफ्र.
और फिर सारी रात जलते हुए खुशबु की तरह
होता जवाब का इंतज़ार. अम्मी 
हीर का दर्द गुनगुनाती थीं 
पर मुझसे कभी नहीं कहा
कि क्या उन्होंने भी जैस्मिन की खुशबुएँ 
जलाईं जो, ख़ाक होते हुए,
राख की छोटी मुलायम चोटियाँ
बनाती जाती हैं. मैं कल्पना करता था कि
हर चोटी उम्साई हवा पर
लद जाती है.
अम्मी बस इतना कहती थीं :
मानसून कभी पहाड़ों को फांद कर 
कश्मीर नहीं आता.
(यहाँ incense sticks का अनुवाद "अगरबत्ती" की जगह "खुशबू" किया गया है)

चांदनी चौक, दिल्ली
इस गर्मी के चौराहे को निगल जाओ 
और फिर मानसून का इंतज़ार करो.
बारिश की सूईयाँ
जीभ पर पिघल जाती हैं. थोड़ी दूर 
और जाओगे? सूखे की एक याद
जकड़ती है तुमको: तुम्हें याद आता है
भूखे शब्दों का स्वाद 
और तुमने नमक के अक्षर चबाये थे.
क्या तुम इस शहर को पाक कर सकते हो 
जो कटी हुई जीभ पर खून की तरह जज़्ब होता है?

कश्मीर से आया ख़त
कश्मीर सिमट जाता है मेरे मेलबॉक्स में.
चार गुने छह का सुलझा हुआ मेरा घर.
मुझे साफ़ चीज़ों से प्यार था हमेशा. अब
मेरे हाथों में है आधा इंच हिमालय.
ये घर है.और ये सबसे करीब
जहाँ मैं हूँ अपने घर से. जब मैं लौटूंगा,
ये रंग इतने बेहतरीन नहीं होंगे,
झेलम का पानी इतना साफ़,
इतना गहरा नीला.मेरी मोहब्बत
इतनी ज़ाहिर .
और मेरी याद धुंधली होगी थोड़ी
उसमे एक बड़ा नेगेटिव,
काला और सफ़ेद, अभी भी पूरा रौशन नहीं.

16/11/2016

रामकृष्ण पाण्डेय की कुछ कवितायेँ. 




(वैसे तो "आवाजें" हर दो तीन महीने में एक बार पलट ही लेते हैं, कुछ तकनीक की सरलता की और लौटने के लिए और कुछ जो अपने बूते से बाहर होता है उसको समझ सकने के लिए. बड़े पापा को गये अब सात साल बीत गये हैं. उनसे आखिरी बहस सितम्बर २००९ में हुई थी वो एक सोमवार को गये,सोलह नवम्बर की तारीख. बहस कई बार होती थी और अलग अलग विषयों पर. हॉस्टल से हर शनिवार रविवार उनके पास चले जाते थे, नार्थ कैम्पस से लगभग दो घंटे दूर उनके घर पर कुछ घर के खाने के लालच में, कुछ उनसे सीखने के चक्कर में. कैम्पस की हर गतिविधि पर उनकी गंभीर नज़र रहती थी. इक पूरी इतवार वो बस इसीलिए डांटते रहे क्योंकि मेरा किसी पोलिटिकल पार्टी की किसी कार्यशाला में जाना हो गया था. फिर खुद उन्होंने अख़बार के मार्जिन में पोलिटिकल स्ट्रक्चर समझाया था. एक बार अनुवाद के बारे में हमने बहुत लम्बी बात की. ऐसे ही एक बार कविताओं की तकनीक पर. मार्केज़ और बोर्खेज़ में फर्क करने के लिए उन्होंने एक बार हैरी पॉटर से भी एक उदाहरण उठाया था.
वो बढ़िया पत्रकार थे, उस तरह के जो शायद उनके जाने के साथ विलुप्त हो गए. वो बढ़िया शिक्षक हो सकते थे पर उनको जीवन से थोडा ही चाहिए था. वो बेजोड़ कवि थे - आत्मसंतुष्ट, कितने प्रतिष्ठित कवि आज ये कह पायेंगे.  उनकी कविताओं से किरदार अक्सर निकल निकल कर आते हैं और उनकी कवितायेँ समय की सब सीमाएं लांघ कर अपनी स्वतंत्रता के साथ अमर हो चुकी हैं. कवि भर होने की हिम्मत, उनसे ही मिलती हैं.
 दूसरों को असुविधा ना हो ये उन्होंने हमेशा ध्यान में रखा.उनके होने में कोई शोर नहीं था पर उनका जाना अभी तक शोर करता है. - anchit)

हत्यारे
कहाँ जाएगी यह सड़क
किस जंगल, किस बियाबान की ओर
क़दम-क़दम पर जमा हुआ है
गाढ़ा-गाढ़ा ख़ून
हत्यारों का आतंक चारों ओर व्याप्त है
ठीक आपके पीछे जो चल रहा है
उसके हाथ में एक चाकू है आपके लिए
और जो लोग चल रहे हैं आपके आगे
वे अचानक ही पीछे मुड़ कर
मशीनगन का मुँह खोल सकते हैं
आपके ऊपर
तड़-तड़, तड़-तड़, तड़-तड़, तड़-तड़
आप क्या कर लेंगे
धीरे से आँखें मूंद कर सो जाएँगे
यही ना
अपनी नई कविता की आख़िरी पंक्ति सोचते हुए
या अपनी पेंटिंग में एक रंग और भरते हुए
ख़ून का गाढ़ा लाल रंग
यह सोचते हुए
कि थोड़ा-सा और सुन्दर नहीं बना पाए
इस बदरंग होती दुनिया को
बस थोड़ा सा
पर, हत्यारे
उतनी भी मोहलत नहीं दे सकते
क्योंकि वे जानते हैं
कि इतनी ही देर में उनकी वह दुनिया
बदल सकती है
पूरी हो सकती है कविता की आख़िरी पक्ति
अधूरी पेंटिंग को मिल सकता है
रंगों का आख़िरी स्पर्श
मुकम्मल हो सकता है मनुष्य
अपनी सम्पूर्ण गरिमा के साथ
पर, हत्यारों को

कोई ख़ूबसूरत दुनिया नहीं चाहिए

समय

आगे ही आगे
भाग रहा है समय
और मैं उसे पकड़ने के लिए
भागता जा रहा हूँ उसके पीछे
गुज़र गए
न जाने कितने नदी, जंगल, पहाड़
न जाने कितने पड़ाव छूट गए राह में
दौड़ लगी है समय से मेरी
थकूँगा नहीं मैं
रुकूँगा नहीं मैं
लाँघता ही जाऊँगा सारी बाधाएँ
अनवरत अविश्राम
भाग रहा है समय
आगे ही आगे
और मैं उसे पकड़ने के लिए
भागता जा रहा हूँ उसके पीछे

हम बहस करते हैं

हम बहस करते हैं
तूफ़ान की गति क्या थी
हम बहस करते हैं
पानी किस ऊँचाई से आया
हम बहस करते हैं
दस हज़ार लोग मरे या बीस हज़ार
हम बहस करते हैं
केन्द्र ने क्या कहा है और राज्य ने क्या कहा
हम बहस करते हैं
हम बहस करते हैं


15/11/2016

Poems of Shristi

Shristi is one of the budding poets from Patna University. in the process of finding her voice, she feels that writing helps in releasing stress and gives her a kind of  pleasure that nothing else can provide.

Here are few of her poems.

SUNSET AND DEATH

It’s ironical,
Day’s termination in west,
And the downfall of time,
Both has a touch of red,
The former enhances the sky’s shade,
While the latter incites blue, which dreads,
Though both are magical,
Both has a fixed spell,
Of first we are familiar,
But of second we have no clue, One lull,
Other knocks down imparting fear,
Still death is a road to incarnation,
Sunset is a hope of new inception.

  I LONG

I peeped at my intimate part,
I found splurging emotion,
And  uncovered an innocuous heart,
Devoid of worldly passion.
I pined to walk on the path of past,
A road on which I was surrounded,
My hands were never deserted,
I had an immature brain,
I cried for paper boat in rain,
Mud satisfied my hunger,
I played with dolls,
How cute was that mind insane,
I wish to plunder away those days,
I long for my life,
I desire my infancy,
I merely pine for my childhood.

11/11/2016

Leonard Cohen : I'm leaving the table. I'm out of the game. RIP

                                                                                        i started listening to cohen a long time ago. i was young, innocent and in love for the first time. first love brings with it, the melancholy of unrequited desires and  the ecstasy of belonging. and dramatically it all began. in those days, lovers would sit at their computers and burn cds for their beloveds. we were past the "recording-cassettes" time but not yet into sending songs through whatsapp. somehow, that felt more long lasting. and i stumbled upon leonard cohen. as one of the first sharers of the pangs that rip out the heart. the voice, the aura of the sixties and good old love. 
                                                                soon i was quoting him to the beloved, to young friends and to anyone who would listen. i was imitating him at places as well. to a young writer, to most of the young writers in the last fifty years, cohen was an inspiration as he will be to the coming generations. 
                                                                                              to me, he was never a companion in jubliation but one in pain. with him i cried (like many like me have) and with him i would find consolation. and when his final album came, he was already ready to call it off and as much as i  wanted to listen to it, i couldn't make time. the news came in the morning news feed when i was scrolling down and though i could not believe it initially, i knew he had decided. the saint-poet that it was, he deserved to go in peace and so it got for he brought just that to us. peace. 
                                                                                        i will keep listening to cohen on days when i am most tired, when i have no enthusiasm for classic jazz, when i am too much into agony, the weight of the world keeps trying to bury me down, usually when the world has fallen asleep and there is a little breeze. the yearning of a cool sleep, an open window and a lover with her neck smelling like trees on winter nights become unbearable, i give myself to him. he comes to the rescue like he always will. 
                                                                  may be there are better ways to do this. there will be hundreds and thousands of obituaries but like harry wanted to carve the epitaph on dobby's grave though he knew hermione could do it better, i want to wave him goodbye. you will never leave the table leonard, you will never be out of the game. 
i share my favourite song and tonight i will dare to think that you will see me listening to you and whispering you in my lover's ear. you will see us from up there and you will smile.

And why are you so quiet now 
standing there in the doorway? 
You chose your journey long before 
you came upon this highway. 

Trav'ling lady stay awhile 
until the night is over. 







(anchit is a poet.)