Posts

Showing posts from July, 2017

Nolan's Dunkirk : of misery, melancholy and Hope!

Image
Dunkirk will be appreciated world wide and rightly so. It was houseful on the first day in all the shows on the only screen they are showing it here in Patna. I had to watch it in 2D on the second day. Three is the number you are conscious of when you are watching it. the story takes place at three places- on land, in water and in air. there are three major perspectives - the private's, the pilot's and from the boat. Nolan looks at the unity of three - the visual, the audio and intellectual. In my opinion, it aims at being three things - a spectacle, a reminder and a warning. 
the story is simple. there are four hundred thousand British soldiers at Dunkirk, in need of immediate evacuation and are sitting ducks for the German army. the British prime minister wants thirty thousand of them to be saved. the army chief is looking at a figure of forty five thousand. with constant attacks from German airplanes a…

और क्या देखनें को बाकी है

चक्रधर के कोमल गालों पर जब लूसी का तमाचा लगा होगा तो शायद चक्रधर को फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की वो  शायरी जरूर याद आई होगी।
"और क्या देखनें को बाकी है, आप से दिल लगा के देख लिया"
समय था 12 जुलाई की शाम कालिदास रंगालय पटना में "मुंशी प्रेमचंद" द्वारा लिखित लघु कहानी "विनोद" (मानसरोवर भाग-3) पर आधारित नाटक "देसी मुर्गी, विलायती चाल" के मंचन का। इमेज आर्ट सोसायटी के बैनर तले मंचित इस नाटक का नाट्य रूपांतरण किया था विवेक कुमार और  निर्देशन किया था "शुभ्रओ भट्टाचार्य" ने।
 नाटक वर्तमान समय में भटकतें युवा पीढ़ी के लिए एक व्यंग था, जो अपनी कुछ इच्छाओं की पूर्ति के लिए अपनी सभ्यता/संस्कृति तक को त्यागने में कोई परहेज़ नहीं करतें है।

नाटक मुंशी जी की कहानी के साथ शुरू होता है, और कल्पना के रंग पटल पर उभर आता है। जहां विश्वविद्यालय में पढ़ने आए चक्रधर पंडित एम.ए. दर्शनशास्त्र के विद्यार्थी होतें है जो पश्चिमी सभ्यता संस्कृति से बिल्कुल अलग अपने जीवन को एक ब्रह्मचर्य के समान यापन करतें है.…

बैठक : भीष्म साहनी चैप्टर.

Image
कल भीष्म साहनी को गये चौदह साल हो गये, तमस की पृष्ठभूमि आज़ादी के समय की हैं, उनकी कहानियाँ विभाजन और फिर नेहरु राज के डिसइल्यूजनमेंट की बात करती हैं - प्रतिरोध का भार हिंदी भाषा में उनके कंधे भी रहा है. सबसे महत्वपूर्ण सवाल ये कि अभी आज क्या भीष्म साहनी को याद करना और उनके लिखे को दोहराना पढना क्यों ज़रूरी है? क्या ये बस एक परंपरा है कि उनको भी लेखक-संस्कृतिकर्मियों का तबका याद करे और फिर आगे बढ़ जाए?

"बैठक" पाटलिपुत्रा कॉलोनी के एक अपार्टमेंट में होती है, जिसमें विभिन्न विषयों से जुड़े लोग एक साथ बैठक करते हैं, औपचारिक नहीं है और विषय आकाश के नीचे और धरती के ऊपर कुछ भी हो सकता है. इसका आयोजन अमिताभ करते हैं.
शहर में छोटे छोटे ऐसे कई केंद्र अब वर्किंग हैं, जो अंतत: शहर की सांस्कृतिक और साहित्यिक मज्जा का पोषण कर रहे हैं. "बैठक" भी इनमें अपनी जगह बना रहा है.

तो कल भीष्म साहनी को याद किया गया. उनकी दो कहानियाँ, "अमृतसर आ गया" और "गंगो का जाया", का पाठ हुआ जो क्रमश: विनोद कुमार और अमिताभ ने किया. रवि ने साहनी जी की कहानियों के ऊपर सुन्दर तसवीरें बनाई…

बारिशों के जानिब

Image
#बारिश_एक
जैसे हर बारिश के लिए हमारे पास एक कविता होती थी,एक पेड़ होता था, एक किताब होती थी, आइसक्रीम का एक फ्लेवर होता था, एक गंध होती थी, एक डायलोग होता था, हाथ पकड़ने का एक अंदाज़ होता था, एक गाना भी होता था. 
आज बारिश है, शाम है, तुमसे बात करनी है, लम्बी वाली... कैसे बात होगी?


#बारिश_दो मुर्दों के बारे में नदी सिखा देती है. सन तेरह हमने मुर्दों को घूरते हुए बिताया. बारिश होती थी, बाढ़ आती थी, और दहते हुए मुर्दे आते थे, उनके साथ पानी पर बहते हुए कौए, एक आध बाज़, बहुत कम. मिट्टी के रंग का पानी, राख़ नदारद. ये कभी शामों को नहीं हुआ. जब हुआ दोपहरों को. तुम घाटों को एलियट सुनाती थी, फिर भी कुछ जी उठता था. काठ से सटता है पानी, फिर कई दिनों तक काठ नम रहता है. कैंटीन की बालकनी पर बैठे हुए, तुम्हारा इंतज़ार करना एक सुन्दर याद है बारिश की. अकल्पनीय शहर,
जाड़े की सुबहों के भूरे कुहासे से ढंका हुआ
तैरती हुई भीड़, लन्दन ब्रिज पर, इतने सारे,
मैंने नहीं सोचा था, मौत ने लील लिए इतने सारे.
- एलियट, मुर्दों की अंत्येष्टि, द वेस्टलैंड.
#बारिश_तीन दुनिया में जब इन्सान से पहले-पहल देखा होगा बारिशों को तो क्या सोचा हो…

"हम लौटेंगे हजारों लाखों की तादाद में " - भविष्य को उम्मीद से देखता स्पार्टाकस

जब मौत ज़िन्दगी के बहुत करीब हो या इंसान किसी कारणवस डरा हुआ होता है तो उसे उसके ओ सारे दिन याद आतें है जो उसने अपने शौर्यता के दिनों में किया होता है। इसी दुर्दशा के बीच फंसा है एक ग्लैडिएटर। जो अपने बीते दिनों में खोया हुआ है।
                                       शौर्य गर्जनी के साथ ही जब आवाज़ गूँजती है "एक Gladiator(तलवारबाज़) किसी दूसरे gladiator का कभी दोस्त नहीं बन सकता है, ओ हमेशा अपने सामने वाले कि जान लेने के लिए ही बना होता है।"
तभी सभागार में बैठे दर्शक वृन्द की तालियों की थाप पूरे सभागार में कौंध उठती है। समय था रविवार शाम को कालिदास रंगालय,पटना  में स्वतंत्र मंच (इस मंचन का किसी संघ-संस्था से कोई संबंध नहीं है।) द्वारा मंचित "अमेरिकी उपन्यासकार हावर्ड मेलविन फ़ास्ट" के द्वारा लिखित ऐतेहासिक उपन्यास "स्पार्टाकस" पर आधारित नाटक "स्पार्टाकस" के मंचन का।

इस एकल नाटक की रचना और निर्देशन किया था राजीव रंजन ने।

इस नाटक में निर्देशक स्पार्टाकस के चरित्र से ये दर्शाने की कोशिश करता ह…

वीडियो एडिटिंग -निशांत 

Image
जो अभी-अभी बीता वही भविष्य था.  बारह बजने के तीस सेकेंड पहले मैंने एक ऐसा सपना देखा जो बस उम्र के प्रभाव के चलते ही देखा जा सकता था. अब मुझे भी ऐसे सपने आने लगे थे जो मेरे शरीर को झनझना देते थे. मैं सपनों की दुनिया में पसीने से तारतार हो जाता और शर्म के मारे एक लाल तौलिये से अपना मुँह ढँक लेता और एक हरे रंग कि तौलिये से अपना गर्दन पोंछने लगता. मेरे हाँथ पेट के ज़रा सा नीचे जाकर अचानक ऊपर आ जाते और फिर स्वचालित होकर उसी जगह पर एक बेढंगे किरायेदार की तरह टीक जाते.
तीस सेकेंड बाद मेरी उम्र का बाद वाला अंक पाँच से छ: हो गया. मेरे दोस्त राकेश ने मुझे बताया था कि-‘ ऐसा होने पर राकेश के पास एक कॉल आता था जिसके उस पार से दबी हुई एक आवाज़ आती, हैप्पी बर्थ डे डियर’. इसके आगे राकेश ने कभी मुझे कुछ नहीं बताया.
पर मेरे मन ने मुझे बताया की-‘ इसके आगे राकेश फोन से ही एक पप्पी शेयर करता होगा और चाँद-तारे वाली एक-दो शायरी कहता होगा’. फिर मैंने उस आवाज़ को भी पहचान लिया. वह आवाज़ जिसपर राकेश मरता था , वह आवाज़ शालिनी भारद्वाज की थी. एक दिन मैंने देखा था कि शालिनी भारद्वाज स्टेशन के पीछे वाली मंदिर पर किसी …