where it all began

Hearth, in its earlier days, came out in form of a newsletter. while the magazine was a tedious, more strenuous affair and was periodical, Hearth never depended itself on time and was published whenever an incessant need to do so was felt- be it some political or literary incident or the opening of a new joint in the city -
as a famous philosopher once said, we are not prisoned by time but by clocks, we must accept our ruins and our downfalls. true poetry and literature will come out of those.
The cover of the blog is called "LOVERS" and has been clicked by eminent poet and photographer Anurag Vats


Nolan's Dunkirk : of misery, melancholy and Hope!

                                                                          Dunkirk will be appreciated world wide and rightly so. It was houseful on the first day in all the shows on the only screen they are showing it here in Patna. I had to watch it in 2D on the second day. Three is the number you are conscious of when you are watching it. the story takes place at three places- on land, in water and in air. there are three major perspectives - the private's, the pilot's and from the boat. Nolan looks at the unity of three - the visual, the audio and intellectual. In my opinion, it aims at being three things - a spectacle, a reminder and a warning. 

the story is simple. there are four hundred thousand British soldiers at Dunkirk, in need of immediate evacuation and are sitting ducks for the German army. the British prime minister wants thirty thousand of them to be saved. the army chief is looking at a figure of forty five thousand. with constant attacks from German airplanes and navy, the means of survival are quite few, the odds are very low and all seems lost.

great art doesn't come from what you tell in the story. it always lies in how you choose to tell it. Only Nolan could have made it would be exaggerating but once he wrote it, only he would have visualized it like it has been, is certain. poetry is not the art of putting all the words in right order only, it is also about the economy of them and most importantly about putting right words at right places. It has been easy for the director here, and also spontaneous. Hans Zimmer's composition stretches the film to epic proportions - at times, you feel you are sitting into a live opera or on one of the boats in the English channel, yearning for Home.

The climax is almost too heroic but one that fills with optimism and puts the words "achievement" into place. the writer's utopia and ultimate desire fully form as Tom Hardy, the hero of the moment, burns his plane and is captured by the german army. never for a moment are we are taken away from the stark realism and melancholy humanity respires in.
George dies accidentally,  Cillian Murphy vanishes into the crowd and the brilliant Kenneth Branagh stays at Dunkirk to help evacuate the French soldiers after he evacuates the thirty thousand Churchill needs and some more, around three hundred thousand to be more exact. 

the beauty lies in the fact that there are no long discourses on war, no conflicts about right and wrong and no moral statement. there is no flora, no fauna but human beings alone- deserted, driven with a single quest - of survival. this is where Dunkirk stops to be just a war film. this is where it becomes larger - a story not linearly told and though about war on the periphery, not about war at all - but about our vulnerability and stripped to the core, about survival.

Nolan is not an agnostic. a Christ arrives in the form of Tom Hardy's Ferrier and sacrifices himself to "Save" others- great literature always follies to put its faith in a center outside the structure- the game changer- that is the abstract where hope lies and that is where an optimist believes he is saved.
words are not needed mostly and they only fulfill the basic purpose of communicating the writer's perspective to the audience which is left to wonder the purpose of war and countless deaths- the necessity to remind what we have forgotten as a civilization and what history can still teach us. What war brings home ? what deaths mean? how we need each other and to what hate mongering will lead us to? 

Needless to say, there are no central characters, the necessity to survive and find hope form the core. Hans zimmer keeps your heart beating at a fast rate all the time- the experience that it is to hear to him. one is always anticipating an attack, afraid of the war planes, teary at the sacrifices and melancholic at the survival- driven to a brink where winning or losing doesn't matter - survival is "enough". 

though the old world crumbles and burns, the writer aspires to build a new one out of the old ruins- a better world with less misery - isn't that sufficient? 
(he writes poems.)


और क्या देखनें को बाकी है

                                                                        चक्रधर के कोमल गालों पर जब लूसी का तमाचा लगा होगा तो शायद चक्रधर को फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की वो  शायरी जरूर याद आई होगी।
"और क्या देखनें को बाकी है, आप से दिल लगा के देख लिया"
समय था 12 जुलाई की शाम कालिदास रंगालय पटना में "मुंशी प्रेमचंद" द्वारा लिखित लघु कहानी "विनोद" (मानसरोवर भाग-3) पर आधारित नाटक "देसी मुर्गी, विलायती चाल" के मंचन का। इमेज आर्ट सोसायटी के बैनर तले मंचित इस नाटक का नाट्य रूपांतरण किया था विवेक कुमार और  निर्देशन किया था "शुभ्रओ भट्टाचार्य" ने।
 नाटक वर्तमान समय में भटकतें युवा पीढ़ी के लिए एक व्यंग था, जो अपनी कुछ इच्छाओं की पूर्ति के लिए अपनी सभ्यता/संस्कृति तक को त्यागने में कोई परहेज़ नहीं करतें है।
नाटक मुंशी जी की कहानी के साथ शुरू होता है, और कल्पना के रंग पटल पर उभर आता है। जहां विश्वविद्यालय में पढ़ने आए चक्रधर पंडित एम.ए. दर्शनशास्त्र के विद्यार्थी होतें है जो पश्चिमी सभ्यता संस्कृति से बिल्कुल अलग अपने जीवन को एक ब्रह्मचर्य के समान यापन करतें है. लंबी शिखा से वह यह बताते हैं कि प्राचीन ऋषि-विद्वान इस शिखा से अपनी सर्वज्ञता का प्रचंड प्रमाण दिया करते थे, इस शिखा से किसी तरह की गलत भावना मन में नहीं पलती है बल्कि सकारात्मक ऊर्जा मिलती है इस से।
  नित्य पूजा-पाठ करना,रोज-रोज अपनी हाथों से सुपाच्य खाना खुद से चेताना और हां अंग्रेजी भाषा से तो वह बहुत दूर-दूर रिश्ता नहीं रखते रहे थे जिस कारण उनका अंग्रेजी भाषा पर पकड़ बहुत कमजोर था। लेकिन उनके ही कॉलेज के कुछ बच्चे ऐसे थे जो पढ़ाई के अलावे सब काम किया करते थे उन्हें चक्रधर की आदतें पसंद नहीं आती थी जिस कारण वे लोग चक्रधर पंडित को सबक सिखाने का प्लान करतें है कि तभी कुछ दिनों बाद उन्हें वो मौका हाथ लग जाता है।
                                       उनके वर्ग में एक अंग्रेजी स्वभाव की लड़की आ जाती है जो अति सुंदर होती है। उस लड़की को देख कर हिंदी और इतिहास के भी छात्र अब दर्शनशास्त्र में अपनी रुचि रखने लगे है। छात्र उस अंग्रेजन लड़की लूसी की बात सुनने और आस-पास बैठने को व्याकुल रहतें है।

इधर सामान्य पुरुष स्वभाव से परिपूर्ण पंडित चक्रधर पर भी प्रेम का जादू चल जाता है, वह छुप-छुप कर उस लड़की को देखता तो है पर मन में हमेशा कोई देख न ले ये भावना जरूर होती है,कि तभी विद्यालय के कुछ ऐसे खिलाड़ी जो निशाना देख कर कभी चुकतें नहीं ओ चक्रधर को अपना निशाना बना लेतें है, और अंग्रेजीयन लड़की लूसी के नाम से पत्राचार कर पंडित चक्रधर को अपने जाल में फंसा लेतें है।

उनके जाल में फंस चक्रधर अपनी सभ्यता-संस्कृति को भूल जाता है और पश्चमी सभ्यता के अनुरूप जीवन यापन करने लगता है। इधर झूठी प्यार की मकड़ जाल में फंसता हुआ चक्रधर अपने कॉलेज के उन लड़को की सारी बातें मानते है जो वह कहतें जातें है। अपनी मित्र मंडली की बात में आ कर पंडित चक्रधर पास में रुपया नहीं होने के वावजूद भी एक भोज का आयोजन करता है जिसमें लूसी को आमंत्रण किया जाता है कि तभी इस प्रीति भोज में सारे सचाई का पर्दाफाश हो जाता है।
                                     यहाँ चक्रधर की गलती बस इतनी होती है कि वह अपनी महत्वकांक्षा से वशीभूत होकर अपने अस्तित्व को ही खो देता है जिसके कारण अंत में उसे अपमानित होना पड़ता है, खैर ये सब देख चक्रधर ये जान जाता है कि इस सब झंझटों का कारण बेशक उसकी मित्र मंडली है, पर अब झंझट से निवारण का उपाय तो उसे ही ढूंढना था, सो उसने उपाय ढूंढते हुए यह निर्णय लेता है कि वह यहां से सब कुछ त्याग कर चला जाएगा । वह बहुत शांत रहने लगता है। वह अब एक पल भी लूसी के नाम को भी नहीं सुनना चाहता है। और एक दिन गायब ही जाता है। इस तरह मुंशी जी की कहानी ख़त्म होती है।
               नाटक में अभिनय की बात करूं तो नाटक का नायक चक्रधर के रूप हीरालाल जी ने अपने कला का सम्पूर्ण उपयोग किया है। अभिनेत्री के रूप में अदिति सिंह जिनका की नाटक में अभिनेता के अपेक्षा कुछ ज्यादा संजीदा अभिनय नहीं था फिर भी जितना था उन्होंने उसे सफल करने की भरपूर कोशिश की है।

नाटक में सह कलाकारों के अभिनय में कुछ कमियां नज़र आ रही थी जो ख़ारिज तो नहीं की जा सकती थीं लेकिन चक्रधर के अभिनय ने दर्शक को उस तरफ ध्यान आकर्षित नहीं होने दिया।
नाटक में सूत्रधार के रूप में निशांत कुमार प्रियदर्शी का अभिनय तारीफ के काबिल था।
        मंच सज्जा और परिकल्पना की बात करूं तो मंच कुछ खास नहीं कहा जा सकता था, मंच सज्जा सिर्फ नाटक को समझाने के काबिल थी  बाकी उसमें कुछ कमियां थी जो सुधारी जा सकती थीं ।
हां बहुत दिनों के बाद ख़ुशी की बात आज ये रही कि आज मंच की कमियों को प्रकाश परिकपना ने ढक दिया था। आज सही समय पर उचित तरह का प्रकाश देखने को मिला। प्रकाश परिकल्पक राजन कुमार सिंह और राजीव जी का काम काबिले तारीफ लगा।
    रूप सज़्ज़ा की जहां तक बात है तो चक्रधर को नाटक के लायक रंग-रूप में बिल्कुल सही तरह से रूप सज़्ज़ा विशेषज्ञ (जीतू जी) ने उतारा था, बाकी कलाकार भी सटीक थे।
            अपने अनुभव और लगनशीलता के साथ "विवेक कुमार" और "शुभ्रओ भट्टाचार्य" के काम को आज जिस तरह से दर्शक दीघा के लोग अपने तालियों की गड़गड़ाहट से परितोषित कर रहे थे, जो नाटक की सफ़लता का मूल-प्रमाण पत्र था।

निर्भय किशोर पांडेय

पटना यूनिवर्सिटी में स्नातकोत्तर पत्रकारिता के छात्र रहे हैं।
नाटक से जुड़े हुए हैं और समीक्षा लिखतें है.


बैठक : भीष्म साहनी चैप्टर.

लेखक साहनी की तस्वीर के साथ. तस्वीर रवि ने बनाई
कल भीष्म साहनी को गये चौदह साल हो गये, तमस की पृष्ठभूमि आज़ादी के समय की हैं, उनकी कहानियाँ विभाजन और फिर नेहरु राज के डिसइल्यूजनमेंट की बात करती हैं - प्रतिरोध का भार हिंदी भाषा में उनके कंधे भी रहा है. सबसे महत्वपूर्ण सवाल ये कि अभी आज क्या भीष्म साहनी को याद करना और उनके लिखे को दोहराना पढना क्यों ज़रूरी है? क्या ये बस एक परंपरा है कि उनको भी लेखक-संस्कृतिकर्मियों का तबका याद करे और फिर आगे बढ़ जाए?

"बैठक" पाटलिपुत्रा कॉलोनी के एक अपार्टमेंट में होती है, जिसमें विभिन्न विषयों से जुड़े लोग एक साथ बैठक करते हैं, औपचारिक नहीं है और विषय आकाश के नीचे और धरती के ऊपर कुछ भी हो सकता है. इसका आयोजन अमिताभ करते हैं.
शहर में छोटे छोटे ऐसे कई केंद्र अब वर्किंग हैं, जो अंतत: शहर की सांस्कृतिक और साहित्यिक मज्जा का पोषण कर रहे हैं. "बैठक" भी इनमें अपनी जगह बना रहा है.
तो कल भीष्म साहनी को याद किया गया. उनकी दो कहानियाँ, "अमृतसर आ गया" और "गंगो का जाया", का पाठ हुआ जो क्रमश: विनोद कुमार और अमिताभ ने किया. रवि ने साहनी जी की कहानियों के ऊपर सुन्दर तसवीरें बनाई  और लगाई थीं. विनोद कुमार जी ने "माधवी" नाटक की कहानी भी सुनाई.

वापस उस प्रश्न की ओर लौटें कि क्यों ज़रूरी हैं, भीष्म साहनी? साहनी से पहला परिचय स्कूल में हुआ था. अंतर-स्कूल निबंध प्रतियोगिता में पहले इनाम के तौर पर उनकी प्रतिनिधि कहानियों का संकलन मिला. तब से साहनी जी को थोडा इधर थोड़ा उधर पढता रहा. बैठक में भी ये सवाल मौजूद रहा.

विभाजन के समय जो दंगे भड़के, धार्मिक उन्माद उनका एक महत्वपूर्ण ड्राइविंग फ़ोर्स रहा. उस समय भी सरकारी तंत्र और सहकारी संस्थाओं ने एक ऐसा वातावरण बनाया जिसका परिणाम कुछ और नहीं हो सकता था. साहनी ने इन दंगों को, विभाजन के दंश को करीब से देखा और बहुत अन्दर तक जाकर उसकी परतें खोजने का प्रयास किया. उनकी कहानियां, उनके उपन्यास, दरअसल भारत की साइकी की जांच-पड़ताल भी है.

आज के समय में वापस उनतक जाना, माहौल में पनपती "हेट-मोंगरिंग" और उसके पीछे चल रहे षड्यंत्र को समझ पाने की तरफ का रास्ता हो सकता है.  इसीलिए साहनी बहुत प्रासंगिक हो जाते हैं.

अगर उनकी कहानियों के पाठ के बाद सन्नाटा होता है, शब्द गुमते हैं तो फिर ये सन्नाटा आपसे आपके आदमी होने की गवाही भी मांगता है - तो आज के भारत की भीड़ हो या असंख्य मीडियाकर्मी जो फेक न्यूज़ के लिए काम करते हैं या हम और आप , सबको ये गवाही देनी होगी.

(अंचित कवितायें लिखता है)


बारिशों के जानिब

जैसे हर बारिश के लिए हमारे पास एक कविता होती थी,एक पेड़ होता था, एक किताब होती थी, आइसक्रीम का एक फ्लेवर होता था, एक गंध होती थी, एक डायलोग होता था, हाथ पकड़ने का एक अंदाज़ होता था, एक गाना भी होता था. 
आज बारिश है, शाम है, तुमसे बात करनी है, लम्बी वाली... कैसे बात होगी?

मुर्दों के बारे में नदी सिखा देती है. सन तेरह हमने मुर्दों को घूरते हुए बिताया. बारिश होती थी, बाढ़ आती थी, और दहते हुए मुर्दे आते थे, उनके साथ पानी पर बहते हुए कौए, एक आध बाज़, बहुत कम. मिट्टी के रंग का पानी, राख़ नदारद. ये कभी शामों को नहीं हुआ. जब हुआ दोपहरों को. तुम घाटों को एलियट सुनाती थी, फिर भी कुछ जी उठता था. काठ से सटता है पानी, फिर कई दिनों तक काठ नम रहता है. कैंटीन की बालकनी पर बैठे हुए, तुम्हारा इंतज़ार करना एक सुन्दर याद है बारिश की.
अकल्पनीय शहर,
जाड़े की सुबहों के भूरे कुहासे से ढंका हुआ
तैरती हुई भीड़, लन्दन ब्रिज पर, इतने सारे,
मैंने नहीं सोचा था, मौत ने लील लिए इतने सारे.

- एलियट, मुर्दों की अंत्येष्टि, द वेस्टलैंड.

दुनिया में जब इन्सान से पहले-पहल देखा होगा बारिशों को तो क्या सोचा होगा?पानी महसूसते हुए वो भूल गये होंगे सब घाव, मौत का पास होना, अपने सब बिछोह या छूटे हुए अपने और शिद्दत से याद आये होंगे?
रोहिणी, सेक्टर पांच में जितने कैंसर के मरीज़ रहते हैं, उतने ही मोर भी रहते हैं, तीमारदार जब सुबह सुबह अपने मरीजों के लिए कीमोथेरेपी की दवाएं लेने निकलते हैं, ये मोर किसी बालकनी, किसी खिड़की, किसी पेड़ या सड़क पर चलते हुए, उन्हें ध्यान से देखते हैं.
वो मोर भी बारिश का वैसे ही इंतज़ार करते हैं, जैसे अस्पताल में रोज़ शाम को टहलने लायक मरीज़, अपने तीमारदार के कंधे से सटे, बड़े शीशे वाली खिडकियों से इन मोरों को देखते हैं. बारिश में भींगते मोरों को देख कर बहन चिड़िया हो जाती थी.

मैंने कभी बहुत पढाई नहीं की. स्कूल कभी पसंद नहीं आया. घूमना पसंद था. उनदिनों एक सस्ता वॉकमैन ख़रीदा था, एक सौ अस्सी रुपये का. एक कैसेट, मोहम्मद रफ़ी वाला, सैड सांग्स. पहला प्यार फेल हो चुका था, वो मुझसे बात करना छोड़ चुकी थी. मैंने स्कूल जाना कम कर दिया था. उस साल खूब बारिश हुई. पडोसी के पास एक बिना ब्रेक की साइकिल थी जो उधार मांग कर, सुबह मोहम्मद रफी वाला गाना सुनते, उसकी एक झलक के लिए, बस के पीछे सेंट ज़ेवियर तक जाता था.जिस दिन वो देख लेती थी, उस दिन रफ़ी चुभते थे कान में. कई बार पूरी तरह तर हुआ, कई बार पिट जाना पड़ा, केमिस्ट्री प्रैक्टिकल फ़ाइल कभी खत्म नहीं हुई (हो भी जाती तो केमिस्ट्री का क्या उखड़ जाता)...
पहले प्यार के वो आखिरी दिन थे, दिल जिसके कई टुकड़े अब खो चुके हैं, उसका पहला टुकड़ा उसी बरसात में टूटा था.

वो खुशनुमा बारिश के दिन थे. पहले मुक्कमल प्यार वाली पहली बारिश. जींस के ज़माने में फूलपैंट और बूट्स के ज़माने में चमड़े की चप्पल पहनने वाला प्रेमी. ईन्फिल्ड की जगह लम्बा छाता रखने वाला प्रेमी. रोज़ सुबह प्रेमिका फिर भी गाड़ी दूर पार्क कर, सुनसान युनिवर्सिटी वाली सड़क पर मिलने आया करती थी. एक दिन खूब बारिश थी, वो नहीं आई, उसका फोन आया - "भाई को सब पता चल गया है." प्रेमी मॉल रोड वाले बस स्टैंड पर बैठा था, एक झलक देखना चाहता था, ग्वायेर हॉल में रहने वाले सीनिअर को फोन किया, कुछ बात की, फिर प्रेमिका को फोन किया - "कह देना जहाँ बुलाना है, बुला ले, जितने भी लड़के आयें, मैं अकेला आऊँगा और निहत्था."
लड़के को हिम्मत जाने कहाँ से आई. लड़की रोती हुई हँस रही थी, बारिश भी उस दिन लड़की के आँसुओं सी थी - खुश भी और उदास भी.

सार्त्र को बायीं आँख से नाममात्र दिखता था. फिर भी उन्हें दूसरी बड़ी लड़ाई में सेना में भर्ती होना पड़ा.वो मौसम विभाग में काम करते थे और एक धावे में बंदी बना लिए गये.उन्हें "स्टैलग बारह" में रखा गया. पिछली शताब्दी की सन चालीस की गर्मियों के शुरुआती दिन रहे होंगे. कैम्प के पादरी ने उनसे कुछ लिखने को कहा...उन्होंने "बरिओना " नाम का एक नाटक लिखा. इसका हीरो एक यहूदी था जो रेजिस्टेंस के लिए काम करता था. 
फ़्रांस के कई हिस्सों में साल में कभी भी बारिश होती है. शमशान के शवदाह गृह के बाहर खड़े होकर अगर सूंघने की कोशिश करें तो पता चलता है कि राख़ और बारिश मिलकर कितनी परमानेंट गंध को जन्म देते हैं...इस से थोड़ी ही अलग एक बहुत ज्यादा मीठी गंध कब्र में लाश सड़ने के बाद, कब्रिस्तानों को बारिशों में मिलती है.हो सकता है सालों तक वो महक आपका पीछा करे.
एक ऐसा आदमी जो मानता था कि जीवन में कुछ भी करने का कोई मतलब नहीं, उसने बरिओना लिखा और थंडर के बेटे की बात की.
जब भी मुझे सार्त्र के पास जाना पड़ा, हरदम वही नाउम्मीदी और बेचैनी मिली. अनिश्चय से कितनी कितनी बारिश वाली रातों को हम साथ जूझते हैं.
उस बारिश में क्या हुआ होगा ? फिर कभी सार्त्र और मार्क्स इतने पास नहीं आये.
उस बारिश में "द बीवर" के लिए मिट्टी में उम्मीद उगी थी.

(अंचित कवितायेँ लिखता है.)


"हम लौटेंगे हजारों लाखों की तादाद में " - भविष्य को उम्मीद से देखता स्पार्टाकस

                                                           जब मौत ज़िन्दगी के बहुत करीब हो या इंसान किसी कारणवस डरा हुआ होता है तो उसे उसके ओ सारे दिन याद आतें है जो उसने अपने शौर्यता के दिनों में किया होता है। इसी दुर्दशा के बीच फंसा है एक ग्लैडिएटर। जो अपने बीते दिनों में खोया हुआ है।
                                       शौर्य गर्जनी के साथ ही जब आवाज़ गूँजती है "एक Gladiator(तलवारबाज़) किसी दूसरे gladiator का कभी दोस्त नहीं बन सकता है, ओ हमेशा अपने सामने वाले कि जान लेने के लिए ही बना होता है।"
तभी सभागार में बैठे दर्शक वृन्द की तालियों की थाप पूरे सभागार में कौंध उठती है। समय था रविवार शाम को कालिदास रंगालय,पटना  में स्वतंत्र मंच (इस मंचन का किसी संघ-संस्था से कोई संबंध नहीं है।) द्वारा मंचित "अमेरिकी उपन्यासकार हावर्ड मेलविन फ़ास्ट" के द्वारा लिखित ऐतेहासिक उपन्यास "स्पार्टाकस" पर आधारित नाटक "स्पार्टाकस" के मंचन का।

इस एकल नाटक की रचना और निर्देशन किया था राजीव रंजन ने।

इस नाटक में निर्देशक स्पार्टाकस के चरित्र से ये दर्शाने की कोशिश करता है कि उत्पीडन या यातना को बिना निजी विद्रोह या सामूहिक संघर्ष से खत्म नहीं किया जा सकता है बल्कि इसके लिए बिद्रोह की ज़रूरत होती है।
       हरी और पीली रंग से प्रकशित मंच और बीच में एकल अभिनेता स्पार्टाकस (राहुल सिंह) के रूप में नाटक की शुरुआत होती है।
         कथासार-- नाटक की शुरुआत सेनापति क्रसुस के टूटे हुए आत्मविश्वास से होती है जो जीत कर भी हारा हुआ महसूस कर रहा है। सिनेटर ग्राकुश ने आत्महत्या कर ली है। इधर रोम में चारो तरफ़ दहशत फैला हुआ है।
क्योंकि स्पार्टाकस जो कि रोम का एक सैनिक हुआ करता था जिसे बंदी बना कर बाद में एक ग्लैडिएटर के रूप में बेच दिया जाता है। बंदी होने के कारण स्पार्टाकस की दाढ़ी बहुत बड़ी-बड़ी हो गई होती है, शरीर मैले हो गए होतें है  उसे खरीदार के द्वारा ठीक कराया जाता है, मन लायक भोजन और फिर सोने के लिए औरत भी दिया जाता है ताकि ओ आराम से सो सके। क्योंकि एक अच्छा योद्धा जब तक ठीक से नहीं होगा तो ओ लड़ाई भी अच्छे से नहीं कर पाएगा। कहानी में रोमन सैनिको को भी दर्शाया जाता है, जहां लड़ाई भी होती है। उसी लड़ाई के दरम्यान स्पार्टाकस को एक योद्धा से लड़ना होता है जिससे स्पार्टाकस हार जाता है पर फिर भी ओ योद्धा स्पार्टा को नहीं मरता है लेकिन तभी रोम के सैनिक उस योद्धा को मार देतें है ये देख स्पार्टा को बड़ी पीड़ा होती है, और फिर वह विद्रोही रुख़ अख़्तियार कर लेता है। और लड़ाई कर रोम के 3 चौथे सैनिको को मार गिराया है। इस तरह स्पार्टाकस के एक सैनिक से विद्रोही तक कि कहानी का ताना-बाना बुना जाता है। और कहानी ख़त्म होती है विद्रोहियों के संवाद से- हम फिर आएंगे तादाद में, और अधिक तादाद में।
         इस तरह एकल अभिनय के बदौलत कहानी को दर्शकों के काल्पनिक दृष्टिपटल पर उकेरने में अभिनेता ने कोई कसर नहीं छोड़ी है। हालांकि सबसे रोमांचित करने वाली बात ये है कि अभिनेता राहुल कुमार जिनका ये पहला नाटक था उन्होंने अपने पहले ही नाटक में इस तरह का अभिनय कर अपनी मेहनत का लोहा मनवा दिया है। कहानी में कुछ शब्द-संवाद सामान्य दर्शक के सोच से ऊपर था। कुछ शब्दों का बार-बार इस्तेमाल जैसे "तादाद" भी उबाऊ सा लग रहा था।
               नाटक में प्रकाश परिकल्पना की बात करूं तो यह पक्ष कमज़ोर सा दिखा, मंच पर शुरू से लेकर अंत तक बस एक ही तरह के प्रकाश ने इस पक्ष को थोड़ा कमजोर किया है। नाटक में अभिनेता के संवाद के अनुसार जैसे कभी सुबह तो कभी शाम और रात भी होती है उसके अनुसार अगर प्रकाश को थोड़ा बदला गया होता तो दृश्य और ही मनमोहक होता।
              नाटक में म्यूजिक ने भी कुछ ख़ास वाह-वाही नहीं बटोरी है। नाटक में लगभग 2-3 Music जो कि कर्णप्रिय नहीं है का इस्तेमाल किया गया है जो लगभग दृश्य पर सही-सटीक नहीं बैठती है। अभिनेता के संवाद के अनुसार ही जैसे लड़ाई के वक्त जब तलवार की टक्कर होती है, या छिघाड़ मरता है उस समय, औरतों के साथ निर्ममता जैसे वर्ताव पर अगर कुछ ख़ास तरह के म्यूजिक का इस्तेमाल किया गया होता तो यह दर्शकों के समझ को और भी स्पष्ट कर देता, और लगातार संवाद बोलने से अभिनेता को थोड़ा बचा भी सकता था।
           कुल मिला कर बात करें तो स्वतंत्र मंच द्वारा आयोजित इस नाटक में कहानी, अभिनय जिसने रंगीन पर्दों में व्यस्त इस दुनिया के बीच से भी अच्छे ख़ासे लोगों को अंत तक बांधे रखा, मंच सज्जा और अभिनेता परिधान ने बहुत प्रभावित किया। नाटक में निर्देशन भी काबिले तारीफ़ है, जिसने अभिनेता को बखूबी कहानी के गहराइयों से परिचित कराया और अपनी कहानी को अभिनय के रूप में एक नवोदित पौधे से भी मन लायक फ़ल प्राप्त किया है।
      इस तरह कुल मिला कर कुछ पक्षों को छोड़ दिया जाए तो नाटक को काफ़ी सफ़ल माना जायेगा।
नाटक को 10 में 7.1/2 * मेरी तरफ से।

(निर्भय पटना में रहते हैं. नाटक खूब देखते हैं और उनपर खूब लिखते हैं.)


वीडियो एडिटिंग -निशांत 

जो अभी-अभी बीता वही भविष्य था. 
बारह बजने के तीस सेकेंड पहले मैंने एक ऐसा सपना देखा जो बस उम्र के प्रभाव के चलते ही देखा जा सकता था. अब मुझे भी ऐसे सपने आने लगे थे जो मेरे शरीर को झनझना देते थे. मैं सपनों की दुनिया में पसीने से तारतार हो जाता और शर्म के मारे एक लाल तौलिये से अपना मुँह ढँक लेता और एक हरे रंग कि तौलिये से अपना गर्दन पोंछने लगता. मेरे हाँथ पेट के ज़रा सा नीचे जाकर अचानक ऊपर आ जाते और फिर स्वचालित होकर उसी जगह पर एक बेढंगे किरायेदार की तरह टीक जाते.

तीस सेकेंड बाद मेरी उम्र का बाद वाला अंक पाँच से छ: हो गया. मेरे दोस्त राकेश ने मुझे बताया था कि-‘ ऐसा होने पर राकेश के पास एक कॉल आता था जिसके उस पार से दबी हुई एक आवाज़ आती, हैप्पी बर्थ डे डियर’. इसके आगे राकेश ने कभी मुझे कुछ नहीं बताया.

पर मेरे मन ने मुझे बताया की-‘ इसके आगे राकेश फोन से ही एक पप्पी शेयर करता होगा और चाँद-तारे वाली एक-दो शायरी कहता होगा’. फिर मैंने उस आवाज़ को भी पहचान लिया. वह आवाज़ जिसपर राकेश मरता था , वह आवाज़ शालिनी भारद्वाज की थी. एक दिन मैंने देखा था कि शालिनी भारद्वाज स्टेशन के पीछे वाली मंदिर पर किसी का इंतजार कर रही थी. दिसंबर का महीना था. शायद साढ़े पाँच बज रहा होगा, लेकिन आँखें खोलने पर आठ बजे का सुनसान मालूम होता था. माँ जब सात साल पहले मुझसे ख़ूब बातें किया करती थीं, तब उसने मुझे बताया था कि- मंदिर का वक़्त जाड़े में तीन घंटे आगे निकल जाता है. मंदिरों में देवियाँ रहती हैं और शर्दियों की हर शाम को वे अपने भगवान से मिलने निकलती हैं. देवियों को सिर्फ पुजारी ही देख पाते हैं.

शालिनी हमारे शहर की सबसे खूबसूरत लड़की थी. उसके आशिक़ों की लंबी लिस्ट थी.पहला आशिक़ था एक रिक्शेवाला जो फिज़िक्स क्लासेज़ से शालिनी को उसके घर तक छोड़ा करता था. क्योंकि शालिनी शहर की सबसे खूबसूरत लड़की,उसके पास सौ के नोट से कम कुछ नहीं होते थे. रिक्शेवाला शालिनी से सौ का नोट लेकर एक चायवाले के पास जाता और दस का नौ नोट वापस लेकर आता.नौ नोटों को वह शालिनी को नौ बार में देता और अंतिम में तीन शब्दों का एक सीधा सवाल पूछता-” ठीक है न”. इतना करने में उसको तीन मिनट छत्तीस सेकेंड का वक़्त लगता और इस दर्म्यान चायवाला शालिनी भार्द्वाज को अपनी कनखियों से से साठ बार देखता. चायवाले और रिक्शेवाले ने अंतराष्ट्रीय स्तर का कोई पैक्ट साईन किया था. “ठीक है न?”. ऐसा पूछने पर भी उसे कोई जवाब नहीं मिलता.

अचानक एक दिन मैंने देखा कि- राकेश एक रिक्शेवाले को पीट रहा है. बीच-बचाव करके जब मैंने राकेश को विदा किया तो रिक्शेवाले ने एक दिलज़ले आशिक़ की तरह मुझे बताया की राकेश और शालिनी रोज़ मंदिर के दक्खिन वाले कोने में एक-दूसरे से मिला करते हैं.

जिस शाम की मैं बात कर रहा था, मैं वहाँ लौटकर आना चाहता हूँ. छ: बजते ही शालिनी ने अपनी कलाई पर बँधी घड़ी को छ: बार देखा. ठीक सात मिनट बाद मैंने राकेश को आते हुए देखा. वे दोनों दक्खिन वाले कोने में गये. राकेश ने शालिनी को अपनी आगोश में ले लिया. शालिनी ने उसे झटक दिया और अपने हिस्से का गर्म चुंबन देकर नीले रंग की रजिस्टर को लेकर पीछे वाले दरवाजे से निकल ग ई. राकेश ने जीते हुए योद्धा की तरह अपनी बाईक को सेल्फ स्टार्ट दिया और सात सेकेंड बाद मेरी नज़रों से ओझल हो गया.

सपने में यथार्थवादी बातों को सपना बनाकर सोचते-सोचते घड़ी में दो बज गये. मैंने एकाएक सो जाना चाहा. मुझे नींद नहीं आ रही थी. मेरी नींद ने शालिनी को किराये पर ले लिया था.अचानक मैं कब सोया, मुझे कुछ याद नहीं.सिर्फ इतना याद है कि कुल दो घंटा पैंत्तालीस मिनट बाद माँ ने मुझे उठा दिया. माँ ने हैप्पी बर्थडे कभी नहीं बोला. पर आज जो कुछ भी था, माँ को अच्छी तरह याद था.

माँ ने पापा को कुछ बताया. वे मिट्टी के गणेश की तरह भाव किये रहे. उन्होंने मुझसे कहा-

“आज स्कूल नहीं जाना”

मैंने कहा-” नहीं”

वे यथास्थिति में नहाने चले गये और माँ दौड़ती हुई उनके पीछे उनका गमछा लेकर जिसमें अब सात छेद हो चुके थे. उन्होंने नहाते-नहाते ही मुझे अपने जूते पॉलिस करने का हुक्म दिया. मैं उनका जूता पॉलिस नहीं करना चाहता था. पॉलिस करने पर उनका जूता आधा सफेद हो जाता था जिसे माँ अपने एक ज़माने पहले की ब्लाऊज से रगड़कर काला करने की बेवकूफाना कोशिश करती. वे जैसे ही नहाकर आये, उन्होंने मुझे लताड़ा की पॉलिस का रंग चढ़ा नहीं. अगले सात मिनट में वे खाना खाते हुए कपड़े पहनकर एक मटमैला बैग लेकर निकल गये. मैंने मन ही मन उनके जूते को हज़ारों गालियाँ दी और उसके मर जाने तक की नृशंस कठोर कामना की.

पापा पीछले बीस सालों से एकाएक सुबह ऐसे ही गायब हो जाते और रात को ठीक न्यूज़ आवर डिबेट की तरह आ जाते थे. एक दो घंटे बाद अस्त-व्यस्त होकर सो जाते. शायद ऐसे ही किसी अस्त-व्यस्त वक़्त में दोनों ने मिलकर सोनम और मेरी पैदाईस की नींव रखी होगी.

मैं उस दिन स्कूल नहीं गया और दिनभर मल्लिका और मनीषा की कहानियाँ पढ़ता रहा.ऐसी हज़ारों कहानियाँ थोक भाव से रेलवे स्टेशन और पोस्ट ऑफिस के सामने मिल जाया करती हैं. मैंने सारी कहानियों को क्रमबद्ध पढ़कर फाड़ दिया. मुझे अक्सर डर लगा रहता की अगर ऐसी कहानियाँ सोनम को मिल जाये तो वह भी पढ़ने लगेगी. सोनम मुझसे सत्रह महीने बड़ी है. पर वह हर अच्छे-बुरे काम मेरे बाद ही किया करती. सिवाय इसके की वह मुझसे पहले जवान हो ग ई थी, ऐसा मैंने माँ को कहते हुए सुना था. भले ही वह जवान हुई हो या न हुई हो, पर वह मुझसे पहले समझदार जरूर हो ग ई थी. मध्यमवर्गीय घरों की लड़कियाँ अक्सर ही जल्दी समझदार हो जाती हैं. कुछ सालों पहले तक हमदोनों साथ-साथ खेला करते थे. मैं घर में चड्डी पहनकर ही सोनम से रेस लगाया करता जिसमें वह हरदम ही हार जाती, कभी-कभी तो जानबूझकर भी. फिर अचानक कुछ ऐसा हुआ की वह एकाएक जवान हो ग ई और हमदोनों के बीच की दूरियां भी जवान हो ग ईं. मैंने फिर चड्डी पहनकर सोनम के साथ कभी रेस न कर सका. और सोनम की वजह से मेरे ओलंपिक की तैयारी भी अधूरी रह ग ई.

मैंने उन कहानियों को इसलिए भी फाड़ दिया क्योंकि मैंने कुछ दिनों पहले सोनम को कुछ लड़को से बात करते हुए देखा था.

रात को आठ बजते ही पापा किसी स्वचालित यंत्र की तरह आ गये. आकर सबसे पहले उन्होंने मुझे पुकारा. मैं आधे मन से उनके पास गया. उन्होंने मेरे लिए कुछ कलाकंद लाये थे जिन्हें खाकर मैंने यह निष्कर्ष निकाला की आधे-धंटे बाद यह खाने लायक नहीं रहेगा. मुझे पता था की एक बचे हुए कलाकंद को सोनम आधे घंटे बाद खायेगी. मैंने देखा की पापा ने अपने लिए नये जूते खरीद लाये हैं. ऐसे जूते जिसे आज़ाद भारत का हर क्लर्क पहनकर अपने दफ़्तर जाया करता है.

शालिनी की यादों ने मुझे स्कूल तक न जाने दिया.अचानक एक दिन मैं अपनी ही गलती के चलते स्कूल चला गया. पहली क्लास हिस्ट्री की थी जिसमें मेरी रूचि उतनी ही थी जितनी की मेरे दोस्तों की राज श्री के किसी फिल्मों में. टीचर ने 1916 का माहौल बना दिया. कि कैसे नरम और गरम दल कांग्रेसी एनी बेसेंट के नेतृत्व में स्वराज के लिए एकजुट हो गये थे. शालिनी हमारे स्कूल की सबसे खूबसूरत लड़की, मेरे क्लास में भी दो गुट था. दोनों गुटों में तमाम अंतर्विरोध के बावजूद भी शालिनी सौंदर्य को बचाये रखने के लिए प्रचुर मात्रा में एकता थी. हिस्ट्री टीचर ने मुझसे एक सवाल किया जिसका मैंने पूर्ण विश्वास के साथ गलत जवाब दिया. टीचर ने मुझे फेल करने की दो-चार कसमें खाते हुए क्लास से विदा लिया.

मेरी ज़िंदगी सही पटरी पर दौड़ रही थी की अचानक से दो ट्रेनों की टक्कर हो ग ई. वसंत की एक शाम जब मुझे पहली बार फिज़िक्स से प्यार हुआ था, जब मैंने पहली बार समझा था की सेब को ऊपर उछालने पर भी वह नीचे ही क्यों चला आता है. ठीक जब मैंने किताब बंद किया तो देखा की राकेश दौड़ा-दौड़ा पहली बार मेरे घर आया था. कुछ मिनटों बाद किसी खबर को सुनकर पहली बार मैंने अपनी माँ को बेहोश पाया. पापा ट्रेन से गिरकर अस्पताल के किसी बेनाम बिस्तर पर अपनी न ई ज़िंदगी में रच-बस जाने की कोशिश कर रहे थे. डॉक्टर ने मुझे दिलासा दिला दिया था की पापा का आधा दिमाग हमेशा के लिए बैठ गया था जिसे मैं अपनी माँ को कभी नहीं समझा पाया.इस घटना के बाद भी पापा अवैतनिक व्यक्ति के स्तर तक नही आ सके थे. घटना के बाद पापा में क ई कालजयी परिवर्तन आये जिसे हमसब ढ़ो ही सकते थे बस.

वे माँ को देखकर एक ही गाना गुनगुनाया करते-

“रिलिया बैरन पिया के लियै जाय रे”

सोनम को देखकर वे वैकल्पिक तौर पर दो ही बातें बोल पाते-

” बिटिया संस्कृति होती हैं”

” पारस पत्थर है मेरी बिटिया”.

मुझे देखकर पापा कुत्ते की तरह आवाज़ें निकाला करते जिसके चलते मैं उसी तरह घर आने-जाने लगा जिस तरह से वह आते थे पहले. मेरी माँ का मानना था कि-” जो व्यक्ति अच्छे या बुरे की खबर लाता है, वह भगवान होता है. इसीलिए मेरी माँ ने राकेश को भगवान मान लिया था.

राकेश के आने-जाने से सोनम और जवान हो ग ई थी जिसके चलते माँ को सिरदर्द रहने लगा था. रात को जब माँ मुझे खाना देने आती तो माँ से धृतमाधुरी तेल का गंध आते रहता और आँखें बीते हुए बरसात की कुछ निशान लिए रहती और पापा माँ को देखकर अपनी रेल चलाते रहते. राकेश से मुझे चिढ़ थी और सोनम से मैं नफरत भरा प्यार करने लगा. सोनम ने फिजिक्स की एक कोचिंग पकड़ ली थी. फिज़िक्स टीचर मी. रौशन के बारे में मुझे इतना ही पता था कि ‘ उसे फिज़िक्स के अलावे हर चीज आती थी.. वह अपने दिल को अपनी मुट्ठियों में रखता था और उसे कभी-कभार खोलकर अपनी कोचिंग की लड़कियों को जादू दिखाता था. ईलेक्ट्रोस्टैट चैप्टर वह लड़के और लड़कियों के उदाहरण देखकर पढ़ाता. मुझे इस बात का पता कुछ दिनों बाद पता चला की मी. रौशन राकेश का पक्का यार है. कुछ इसी तरह मैंने सोनम और राकेश को मंदिर जाते देखा जहाँ पहले वह अक्सर शालिनी से मिलता था.

मुझे पैसे की सख़्त जरूरत थी और पैसे मुझे मिलने से रहे. माँ के पास भी पैसे नहीं थे. मैं पैसों की तलाश में महीने भर भटका. किसी ने मुझे लोकेश का नाम बताया जो मेरी मदद कर सकता था. मैं लोकेश के पास गया, उसने मंदिर के एक कमरे में अपना ऑफिस खोल रखा था. उस कमरे पर उसके पुरखों ने तीन पीढ़ी पहले से कब्जा कर रखा था. लोकेश ने मुझे विडियो एडिटिंग सीखने की सलाह दी.

मैं सोनम को जवान होते नहीं देख सकता था. एक दिन मैंने राकेश को सोनम के सामने दो तमाचा दे मारा. सोनम मेरी कमजोरी को बखूबी जानती थी. उसने मेरी कमजोरी राकेश को बता दी. राकेश ने मुझे एक विडियो दिखाया जिसमें राकेश और शालिनी एक थे और शालिनी की आँखें राकेश के बदन पर थीं. मैंने वीडियो को अच्छी तरह एडिट किया.

शालिनी की माँ कुछ महीने पहले अपनी सारी पतिव्रता पर असहमती का हस्ताक्षर करके कहीं दूर चली गयी थी..और उसका बाप रूख़सत के ग़म में शराब पी पीकर हर दिन ग़ालिब और मज़ाज़ बन जाता था. जिस घर में नर राजा नहीं रहते वहाँ मादा मुखिया राज करती है. तो राकेश ने शालिनी के साथ मेरी सेटिंग कर दी. मैं शालिनी से पहले से ही बेइंतहा मोहब्बत करता था.शालिनी ने मेरे इश्क़ को कुछ हफ़्ते बाद मान्यता दी जिसके बाद हमदोनों क ई बार एक हुए. शालिनी की उपस्थिति ने मुझे अपने घर से दूर कर दिया. कुछ महीने बाद शालिनी को कुछ संदेह हुआ, जबकि मैंने तो सुरक्षा से कभी समझौता नहीं किया था.

कुछ दिनों बाद मैं एक डॉक्टर के पास गया जहाँ बहुत दिनों बाद राकेश से फिर मेरी मुलाकात हुई. मैंने राकेश के सामने योद्धा की तरह शालिनी के प्रेगनेंसी रिपोर्ट के क ई टुकड़े किये.

मैंने वीडियो एडिटिंग में महारथ हासिल कर लिया था, मैं हर किस्म के वीडियो एडिट करता था और एडिट करने से पहले वीडियो के बाजार के भाव के अनुसार ही अपने लिए भी क़िमत तय करता था.

एक दिन मैंने किसी फिल्मी जासूस की तरह एक वीडियो ढ़ूँढ़ निकाला. वीडियो में पहले मुझे एक लड़की दीखी, फिर उसका पीठ, फिर राकेश और आखिर में मैं पहली बार अपने काम का पैसा लिये बिना घर लौट आया. मैं सोनम को मार देना चाहता था. मैंने घर पहुँचते ही सोनम को एक तमाचा जड़ा जिसके बाद वह बेहोश हो ग ई. फिर पापा ने मुझे उससे अधिक जोर से एक तमाचा मारा और वह चिल्लाने लगे-

“बिटिया संस्कृति होती है”

“पारस पत्थर होती है बिटिया”

फिर उन्होंने कुत्ते जैसी क ई आवाज़ें निकालीं और आख़िर में फफककर रोने लगे. मैं उन्हें पहली बार रोते देख रहा था.

(निशांत रंजन नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी में माइनिंग के छात्र हैं.  इन्हें  किस्से सुनाना पसंद है, हिंदी उर्दू के लेखकों के साथ कामु और काफ्का भी प्रिय हैं. फेसबुक पर दास्तान  लिखते हैं. )