"हम लौटेंगे हजारों लाखों की तादाद में " - भविष्य को उम्मीद से देखता स्पार्टाकस

                                                           जब मौत ज़िन्दगी के बहुत करीब हो या इंसान किसी कारणवस डरा हुआ होता है तो उसे उसके ओ सारे दिन याद आतें है जो उसने अपने शौर्यता के दिनों में किया होता है। इसी दुर्दशा के बीच फंसा है एक ग्लैडिएटर। जो अपने बीते दिनों में खोया हुआ है।
                                       शौर्य गर्जनी के साथ ही जब आवाज़ गूँजती है "एक Gladiator(तलवारबाज़) किसी दूसरे gladiator का कभी दोस्त नहीं बन सकता है, ओ हमेशा अपने सामने वाले कि जान लेने के लिए ही बना होता है।"
तभी सभागार में बैठे दर्शक वृन्द की तालियों की थाप पूरे सभागार में कौंध उठती है। समय था रविवार शाम को कालिदास रंगालय,पटना  में स्वतंत्र मंच (इस मंचन का किसी संघ-संस्था से कोई संबंध नहीं है।) द्वारा मंचित "अमेरिकी उपन्यासकार हावर्ड मेलविन फ़ास्ट" के द्वारा लिखित ऐतेहासिक उपन्यास "स्पार्टाकस" पर आधारित नाटक "स्पार्टाकस" के मंचन का।

इस एकल नाटक की रचना और निर्देशन किया था राजीव रंजन ने।

इस नाटक में निर्देशक स्पार्टाकस के चरित्र से ये दर्शाने की कोशिश करता है कि उत्पीडन या यातना को बिना निजी विद्रोह या सामूहिक संघर्ष से खत्म नहीं किया जा सकता है बल्कि इसके लिए बिद्रोह की ज़रूरत होती है।
       हरी और पीली रंग से प्रकशित मंच और बीच में एकल अभिनेता स्पार्टाकस (राहुल सिंह) के रूप में नाटक की शुरुआत होती है।
         कथासार-- नाटक की शुरुआत सेनापति क्रसुस के टूटे हुए आत्मविश्वास से होती है जो जीत कर भी हारा हुआ महसूस कर रहा है। सिनेटर ग्राकुश ने आत्महत्या कर ली है। इधर रोम में चारो तरफ़ दहशत फैला हुआ है।
क्योंकि स्पार्टाकस जो कि रोम का एक सैनिक हुआ करता था जिसे बंदी बना कर बाद में एक ग्लैडिएटर के रूप में बेच दिया जाता है। बंदी होने के कारण स्पार्टाकस की दाढ़ी बहुत बड़ी-बड़ी हो गई होती है, शरीर मैले हो गए होतें है  उसे खरीदार के द्वारा ठीक कराया जाता है, मन लायक भोजन और फिर सोने के लिए औरत भी दिया जाता है ताकि ओ आराम से सो सके। क्योंकि एक अच्छा योद्धा जब तक ठीक से नहीं होगा तो ओ लड़ाई भी अच्छे से नहीं कर पाएगा। कहानी में रोमन सैनिको को भी दर्शाया जाता है, जहां लड़ाई भी होती है। उसी लड़ाई के दरम्यान स्पार्टाकस को एक योद्धा से लड़ना होता है जिससे स्पार्टाकस हार जाता है पर फिर भी ओ योद्धा स्पार्टा को नहीं मरता है लेकिन तभी रोम के सैनिक उस योद्धा को मार देतें है ये देख स्पार्टा को बड़ी पीड़ा होती है, और फिर वह विद्रोही रुख़ अख़्तियार कर लेता है। और लड़ाई कर रोम के 3 चौथे सैनिको को मार गिराया है। इस तरह स्पार्टाकस के एक सैनिक से विद्रोही तक कि कहानी का ताना-बाना बुना जाता है। और कहानी ख़त्म होती है विद्रोहियों के संवाद से- हम फिर आएंगे तादाद में, और अधिक तादाद में।
         इस तरह एकल अभिनय के बदौलत कहानी को दर्शकों के काल्पनिक दृष्टिपटल पर उकेरने में अभिनेता ने कोई कसर नहीं छोड़ी है। हालांकि सबसे रोमांचित करने वाली बात ये है कि अभिनेता राहुल कुमार जिनका ये पहला नाटक था उन्होंने अपने पहले ही नाटक में इस तरह का अभिनय कर अपनी मेहनत का लोहा मनवा दिया है। कहानी में कुछ शब्द-संवाद सामान्य दर्शक के सोच से ऊपर था। कुछ शब्दों का बार-बार इस्तेमाल जैसे "तादाद" भी उबाऊ सा लग रहा था।
               नाटक में प्रकाश परिकल्पना की बात करूं तो यह पक्ष कमज़ोर सा दिखा, मंच पर शुरू से लेकर अंत तक बस एक ही तरह के प्रकाश ने इस पक्ष को थोड़ा कमजोर किया है। नाटक में अभिनेता के संवाद के अनुसार जैसे कभी सुबह तो कभी शाम और रात भी होती है उसके अनुसार अगर प्रकाश को थोड़ा बदला गया होता तो दृश्य और ही मनमोहक होता।
              नाटक में म्यूजिक ने भी कुछ ख़ास वाह-वाही नहीं बटोरी है। नाटक में लगभग 2-3 Music जो कि कर्णप्रिय नहीं है का इस्तेमाल किया गया है जो लगभग दृश्य पर सही-सटीक नहीं बैठती है। अभिनेता के संवाद के अनुसार ही जैसे लड़ाई के वक्त जब तलवार की टक्कर होती है, या छिघाड़ मरता है उस समय, औरतों के साथ निर्ममता जैसे वर्ताव पर अगर कुछ ख़ास तरह के म्यूजिक का इस्तेमाल किया गया होता तो यह दर्शकों के समझ को और भी स्पष्ट कर देता, और लगातार संवाद बोलने से अभिनेता को थोड़ा बचा भी सकता था।
           कुल मिला कर बात करें तो स्वतंत्र मंच द्वारा आयोजित इस नाटक में कहानी, अभिनय जिसने रंगीन पर्दों में व्यस्त इस दुनिया के बीच से भी अच्छे ख़ासे लोगों को अंत तक बांधे रखा, मंच सज्जा और अभिनेता परिधान ने बहुत प्रभावित किया। नाटक में निर्देशन भी काबिले तारीफ़ है, जिसने अभिनेता को बखूबी कहानी के गहराइयों से परिचित कराया और अपनी कहानी को अभिनय के रूप में एक नवोदित पौधे से भी मन लायक फ़ल प्राप्त किया है।
      इस तरह कुल मिला कर कुछ पक्षों को छोड़ दिया जाए तो नाटक को काफ़ी सफ़ल माना जायेगा।
नाटक को 10 में 7.1/2 * मेरी तरफ से।

(निर्भय पटना में रहते हैं. नाटक खूब देखते हैं और उनपर खूब लिखते हैं.)

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